Friday, July 20, 2007

खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों.........

प्यार और उसकी अभिव्यक्ति के मामले में अब हमारे शहर बदल रहे हैं , हमारे मन बदल रहे हैं ! प्यार करने के लिए अब प्रेमी जोडों को खेत खलिहान झाडी की ओट नहीं तलाशनी पडती न ही जमाने की घूरती नजर की परवाह करनी पडती है ! प्यार किया तो डरना क्या की तर्ज पर अपने आस पडोस की मानव आकृतियों की फिक्र किए बिना प्यार करने वाले प्यार भी कर रहे हैं और उसका इजहार भी !

अपने घर की बाल्कनी में खडे हों तो अक्सर नीचे सडक पर हाथ में हाथ डाले प्रेमी लडके - लडकियां घूमते दिखाई दे जाते हैं ! मेट्रो से यात्रा करें तो सब ओर मेट्रोमय प्रेम और प्रेममय मेट्रो ही होती है ! मॉलों की सीढियां प्रेमबद्ध युगलों को पार करके ही चढना संभव होता है !शहर के सारे पार्कों में हर बॆंच पर प्रेम में आकंठ डूबा जोडा लौकिक जगत के बोध से रहित प्रेमालाप करता दिखाई देता है !

ऎसा खुल्ला प्यारमय माहौल हमें तो सब ओर पॉजिटिव ही पॉजिटिव होता मानने को मजबूर कर देता है ! मन कहता है काहे का पिछडापन भई हम तो लगातार विकास कर रहे हैं ! आत्मा से आवाज निकलती है कहां है मध्यकालीनता , कौन- सी बंद सोसायटी ? हम तो एक आधुनिकतम खुला समाज हैं जहां कोने - कोने पे प्रेम की नदियां बह रही हैं .....

क्या है कि हम मसिजीवी जी की तर्ज पर कहें तो ठहरे मास्टर.. न न.. मास्टरनी .....! अब पिछले दो साल से पढा रहे हैं फर्स्ट इयर के लडकों को रीतिकाल ! कहने को कोऎड कॉलेज है पर हमारी क्लास में एक भी लडकी नहीं ! तो भाई लोगों कवि पद्माकर, मतिराम देव आदि आदि के प्रेमकाव्य की सप्रसंग व्याख्या करने की मुसीबत से हफ्ते में 3 बार गुजरते हैं....अब पद्माकर कह गये कि बच्चों देखो कैसे रति क्रीडा के बाद सुबह प्रेममग्न नायिका रति कक्ष की देहरी पर हाथ रखे खडी होती है ..कि कैसे उसके बाल उसके गले के हारों से गुत्थमगुत्था हो गए हैं ....कि कैसे वह नायक को मादक दृष्टि से देखती है और यह कि फलां छंद में विपरीत रति का चित्रण है फलां में नख और दंत छेदन ..और यहां मुग्धा नायिका है ....यहां प्रौढा.............................! अब क्या करें जब वात्सयायन जी कामसूत्र की रचना कर ही गए हैं , हमारे रीतिकालीन कवि उस पर आधारित नायिका- भेद व रति -चित्रण कर ही गए हैं तो हम भी उसे बिना हकलाए, बच्चों से बिना नजर चुराए और व्याख्या को बिना सारांश में बदले पढा ही डालते हैं ........

ऎसे में हमें हमारे पार्कों में लतावेष्टित आलिंगन में बंधे चुंबन के अनेकों वात्सायनी पाठों को आजमाते नायक नायिका ध्यान जरूर आते हैं ! वे स्कूल या कॉलेज से भागे हुए कच्ची पक्की उम्र के युवा .....! हम भरसक कोशिश करते हैं उन्हें न देखने की पर वे कोई कोशिश नहीं करते हमें न दिखने की .........मानो हम उनके लिए अदृश्य हैं !.....पार्क में खेलने गए किसी बच्चे की बॉल अपने पास आकर गिरने या फिर पिकनिक मनाने आए किसी बडे से परिवार के छोटे बडे सदस्यों वाले झुंड के अपने पास से गुजरने पर भी वे अपने शयन- कक्ष वाली मुद्रा को त्यागे बिना रत रहते हैं ......ऎसे में लगता है कि हम पीछे छूट गए और आउटडेटिड हैं ...कि यही ट्रेंड है ....यही अदा है नए प्यार की ....आप जले या नएपन को कोसें ....नजर चुराऎ या नजर भर देखॆं...... या फिर अपने बीत गए जमाने में प्यार करने की दिक्कतों को लेकर कुंठित हों........

..........हम इसे पब्लिक डिस्प्ले ऑफ अफेक्शन मानें या उन्मुक्त यौन अभिव्यक्ति......अपनी फिल्मों में यौनिक अभिव्यक्ति का स्वागत करते हम अपने आसपास क्यूं न करें इसे स्वीकार ? कला और यथार्थ में आती खाई को आओ पाट दें........या फिर अपनी आंखो के दोगलेपन पर करें फिर से विचार.....बहरहाल हम पता नहीं कब तक रीतिकाल को पढाऎगे और यह भी हमारी ही सरदर्दी है कि कैसे पढाऎगे.......वैसे एक बात है कि मन में कई बार उठ्ता है कि विभाग में बाकी सभी 9 पुरुष हैं...वे ही क्यों नहीं पढा लेते यह एक पेपर ! पंतु तभी मन में एक कोने से कोई आवाज सुनाई देती मैं क्यों नहीं ............ !

Wednesday, July 18, 2007

गालियों से रिसता चिपचिपा पदार्थ

अनामदास जी बोधिसत्व जी तथा और भी जितने भी जी गाली शास्त्र पर अपने विचार व्यक्त करते पाए गए उन सभी से क्षमा प्रार्थना के बाद ही मुझ जैसी-गाली अकुशल वर्ग की प्राणी इस विषय पर कुछ कहने की कुव्वत कर सकती है !बात यह है कि गाली प्रेषण में सम्पन्न पुरुष वर्ग से खुद को हीन समझने का एक और कारण हमॆं मिल गया है ,जिसे पाकर हम उस तरफ से अनदेखा नहीं कर पा रहे हैं !हमने पहले भी गाली को मर्दवादी ,वीर्यवादी समाज की भाषा संरचना कहा था ,आज भी कहेंगे! अभी हाल ही में उठा साहित्य भाषा,गाली और बहस का तर्क झंझावात साफ तौर पर हमें, हमारी सामाजिक स्थिति को डिफाइन करने का एक और प्रयास भर ही है शायद !एक स्त्री विहीन विमर्श का दायरा सुनिश्चित करता तमाम बौद्धिक वर्ग....!

......और हम रोज देखते हैं गली मोहल्ले मेट्रो यहां तक कि शिक्षण संस्थानों में गालियों से आकंठ भरे मदमस्त बेपरवाह अपकी -अधपकी -पकी उम्र के मर्दों को !ऎसे में हमें दिखना होता है अनजान..कि हमने नहीं सुना कुछ..कि हमें नहीं पडता फर्क क्योंकि यह जो गाली तुम दे रहे मेरे जननांगों या चरित्र पर नहीं लक्षित है..कि नहीं नहीं सब कुछ ठीक ही तो है ....!किसी चौराहे पर सिर्फ 7-8साल के फटेहाल या फिर गली में खेलते तीसरी क्लास मॆं पढने वाले बच्चे को ऎसी' ' भद्र' भाषा का इस्तेमाल करते सुनकर मात्र यह शुक्र मनाना होता हि कि अभी तक हमारे घर का बच्चा यह नहीं सीखा है !वैसे क्यूं इतनी आपत्ति है हमें गालियों से ..इसे पुरुष वर्ग की यौन कुंठा का उत्सर्ग द्वार मानकर भी तो भूला जा सकता है ! स्त्री के शरीर मात्र को लक्ष्य बनाकर करने दो इन्हॆं आपसी छीछालेदर! यहां पिता यह मानकर संतोषी होकर रह सकता है कि उसका पुत्र भाषा का यह तेवर न जानता होगा अपनाता होगा और पुत्र यह भ्रम पाले रहता है कि उसका पिता गालियों की भाषा बोल ही नहीं सकता ....कितने सहज हैं ये भाषिक व्यवहार अपनी- अपनी मर्यादा के खोलो को निभाने में भी कितने उन्मुक्त ....

कभी कभी ' विमल जाऎं तो जाऎं कहां' के विमल सिर्फ उस उपन्यास में ही नहीं रहते! विमल जानते हैं कि "पाजामे में पडे पिलपिले पत्थरों का' इतिहास...

हमारी एक मित्र हैं जो शिक्षा विभाग में प्राध्यापिका हैं ....उन्होंने ऎसी ही किसी भावना की रौ में बहकर पुरुष  लक्षित गालियों का संधान किया था इस बात को आज 7-8 वर्ष हो गए हैं ...लेकिन अभी तक उन्होंने उन गालियो का इस्तेमाल नहीं किया है ...शायद कर नहीं  पायीं...

Monday, July 16, 2007

समीर जी, दिल्ली ब्लॉगर मीट में साधुवाद वर्सिस असहमति पर हुआ द्वंद्व

यहां तो बहुत गडबडझाला हुआ जा रहा है! हमारे अतिप्रिय समीर जी को मैं स्पष्ट करना चाहूंगी कि दिल्ली ब्लॉगर मीट में उठे जुमले --'साधुवाद युग का अंत "--केवल एक शाब्दिक प्रतीक भर था जिसका प्रचलन आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणियों में आने वाले साधुवाद शब्द मात्र से हुआ है!
समीर जी ,आपका ब्लॉग लेखन हिंदी ब्लॉग जगत में जो भूमिका रखता है उसे जाहिर करने के लिए एक टिप्पणी मात्र काफी नहीं होगी ! मैं यहां इतना ही कहना चाहती हूं कि उपरोक्त जुमले का पूरे प्रसंग में उद्देश्य यही था कि हिंदी ब्लॉगिंग मेच्योर हो रही है और हम असहमतियों और विवादों को बढता देख रहे हैं ! वहां यह कहा गया था कि अब परस्पर उत्साह बढाने वाले माहौल के स्थान पर विरोधी विचारों को रखने की परंपरा की नींव पड रही है ! यह भी कहा गया कि नए ब्लॉगरों को उत्साह वर्धन की जरूरत हमेशा रहेगी लेकिन एक सीमा के बाद हर चिट्ठाकार अपने विचार रखेगा जो जाहिराना तौर पर आपस में मेल नहीं खाते होंगे और विमर्श को जन्म दॆंगे! ब्लॉग जगत के हालिया बदलावों के मद्देनजर इस बात की और भी ज्यादा पुष्टि होती है ! फुरसतिया जी के यहां सृजन जी की टिप्पणी में भी इस संबंध में बातें रखी गई हैं !
आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का इरादा वहां मौजूद किसी भी ब्लॉगर का नहीं था ! मसिजीवी ने अपने लेख में जो बात रखी वह उस मीट में पैदा हुए विमर्श से जुडी थी !यूं तो आपके पदचिन्हों पर चलकर हम सब भी साधुवाद के जुमले को बहुत इस्तेमाल करते हैं , लेकिन नए असहमतियों के दौर में इस साधुवाद करने की प्रवृत्ति के स्थान पर सार्थक विरोधी विचार रखने की प्रवृत्ति के बलवती होने की संभावनाओं पर विचार किया गया था! यहां लक्षय ----"हम सभी ब्लॉगरों की प्रवृत्ति पर था '!----आप के लेखन की सार्थकता या इस जगह पर आपकी उपस्थिति को कट्घरे में डालने का विचार कमसे कम मै जितना उक्त लेख के लेखक को जानती हूं सबसे आखिरी विचार होगा!आप से मौज की आप द्वारा ही दी हुई छूट का अगर यह अर्थ होना था तो वाकई यह एक कमजोर शैली के लेख के कारण ही हुआ होगा !

Friday, July 13, 2007

मेरे शहर में शाम


मेरे शहर में शाम हर रोज आती है ! रोज उतनी ही बासी, उतनी ही भागदौड भरी और उतनी ही उदासीन !अब शाम कवि की काव्य प्रेरणा उस तरह से नहीं रही है शायद जैसी पहले हुआ करती थी ! संझा का झुटपुट, चिडिया की टुट-टुट वाली कविता भावना उपजाने में नाकाम शहरी शाम ! ये शामें ललाती सी , लुभाती सी कहां रही हैं, न कवि का मन अब कहने को करता होगा---मेघमय आसमान से उतर रही संध्या -सुंदरी परी - सी- धीरे धीरे धीरे..! भीडे लालडोरे इलाकों या फिर ऊंची सोसायटियों की ऊंची बिल्डिंगों के ऊपर के आकाश में कब शाम रात से समझौते का सौदा कर बैठती है और कब डूब जाती है शहराती नहीं जान पाता ,न जानना चाहता है


!मेरे शहर में दोपहर ढलने का नोटिस हाथ में लिए उजास निर्वासित सा निकल पडता है ! शाम बडकुंवरिया की सी पथरीली भंगिमा लिए आन खडी होती है बेकली का भाव अपने चेहरे पर लिए , बेकली अंधेरे की भीमकाया में खो जाने की.... !


मेरे शहर की धमनियों में बहती है मेट्रो मेरी शान ! इस छोर से उस छोर !उडेलती चलती है तरल शहराती झुंड--छोटे छोटे क्षुद्र कटोरों जैसे घरों में ! ऊपर आकाश में लाल और काले रंग का पारंपरिक मिलन और उसकी छाया में यमुना के पुशतों पर दौडता साइकिलों का रेला ...रोज रोज के लिए यूं ही प्रोग्रांड है ये दृष्य..मेरे शहर के केनवास पर ! यहां हर शाम थका - मांदा सा सूरज दिन भर की ड्यूटी से पसीज जाता है पर इन साइकिलों पर सवार कामगरों का मेला दस -दस घंटों की काम की पारी से भी क्या नहीं थकता ?....कम से कम साइकिलों के पैडलों पर पडते उनके पैरों की गति तो यही कहती है ....शाम के बेतरतीबे कोलाज में बेमेली से चिपके निरर्थक हिज्जे से चिपके जीते जन ...लाकों जन....


दिन में हल्की शर्म का झीना नकाब ओढे मेरा शहर हर शाम मॉलों में नंगा होने पर उतारू सा लगता है ! चमक, यौवन मूड और मौके का अद्भुत हाट !नया मूल्य , नया तेवर लिए शाम वहां बाजारू सी होने पर आमादा हर सकुचाये को निमंत्रण देती है....नए नेह का निशा निमंत्रण...


कैसे ठुकरा दिया जाए ये निमंत्रण....बहुत संयम की बात है..




ऊपर आकाश मॆं विरोधी रंगों का कितनी कुशलता से किया गया मिश्रण और यहां शहर की जमीन पर अंधेरे और चमक का साफ साफ बंटवारा.....यहां शाम जानती है दोनो छोरों की परिभाषा ......हम जाने या न जाने .....और जानना चाहें या न चाहें...

Friday, July 06, 2007

ये दो और इनके सिर्फ तेईस...




रायटर ऐजेंसी से प्राप्‍त ये तस्‍वीर आज हिदुस्‍तान टाईम्‍स में छपी है! बड़े आकार के लिए क्लिक करें

Tuesday, July 03, 2007

अविनाश जी ! मोहल्ले के मर्दवादी भाषिक तेवरों को लगाम दीजिए

मोहल्ले पर जाना पहली बार एक दुखद अनुभूति रहा ! बडे विचारकों की साहित्य की जमीन पर की हुई विष्टा से जी मितला गया ! बहस की भाषा मर्दवादी , बदमजा और मुठभेडी ! चिंतन खोखला तो भाषा थुलथुली , लिजलिजी ! मन बना लिया था कि इस विवाद से दूर का नाता नहीं रख्ना है पर वहां नोटपैड जी टिप्पणियों में एक कोशिश देखकर मैंने सुबह अविनाश जी से बात की ! वह बहस तो अधूरी रह गई किंतु मोहल्ला बनाम अविनाश जी की सोच कुछ हद तक सामने आई--

me: क्या गदर मचा रहे हैं जनाब आप
avinash: आदाब... कुछ गड़बड़ हो गया है क्‍या....
me: आप को भी तो कुछ महसूस हो रहा होगा न गडबड जैसा ;)
avinash: मैं किसी गड़बड़ी को लेकर साकांक्ष नहीं हूं... अगर ऐसा है, तो मुझे बताया जाए कि मुझे क्‍या करना चाहिए...
me: नए लोगों को न डराओ यहां मैं तो अभी देख ही रही हूं सब अभी अमझ में नहीं आया है मामला पर जानना है आप क्या कुछ नहीं देख रहे क्या यही सब होना चाहिए ??क्लियर स्टेंड क्या है बताऎ तो यही भाषा हो सकती है कुछ और नहीं या हम सब नए और आम लोग बहुत नासमझ हैं
avinash: देखिए... मेरी मंशा है कि हिंदी पर बात हो... हिंदी में लिखे जा रहे पर बात हो... हममें से कइयों को लगता है कि हिंदी में जो कुछ भी आज लिखा जा रहा है, उसके सरोकार नहीं हैं... अभी भी सवर्ण मानस की अभिव्‍यक्तियां हिंदी साहित्‍य के केंद्र में हैं... तो हिंदी की मुख्‍यधारा में इन दिनों क्‍या-कैसी बहस चल रही है, उसकी एक झलकी ही आप यहां देख रही हैं... मसिजीवी ने सही लिखा- कि अगर हिंदी की दुनिया यही है, तो ऐसी दुनिया में हमें नहीं जाना...
क्लियर स्‍टैंड जैसा कभी कुछ होता नहीं... विमर्श की दुनिया में कम से कम... राजनीति की ज़मीन पर ज़रूर इस तरफ या उस तरफ रह कर बात की जा सकती है...
me: हां या तो यह सब दरकिनार होगा या आम लोग यहां से जाऎगे -यही भविष्य है
avinash: आम लोग कौन है
me: वैसे भाषा को लेकर स्टेंड की बात की थी मैंने
avinash: हमारे आपके समाज में जो अभिव्‍यक्तियां हैं, जो शब्‍द हैं, वही पन्‍ने पर उतरेंगे... भाषा दस तरह की आए, उसका मैं कायल हूं आपकी ही भाषा में जो अठखेलियां हैं- वह हिंदी के लिए नई हैं
me: यही तर्क तो आज के हिंदी सीरियल वाले , एकता कपूर देती हैं
avinash: तो भाषाई परहेज़ एक तरह से लोकतंत्र का निषेध है
तब तो आप दलित साहित्‍य को खारिज़ कर देंगी, जिसमें धड़ल्‍ले से गालियों का प्रयोग हो रहा है एकता कपूर क्‍यों‍ कह रही है, और साहित्‍य में इसकी मांग क्‍यों उठ रही है, इसकी अलग-अलग वजहें हैं... भाषाई गरिमा में हिंदी का दम घुटता रहा है बहुत सारी बातें निकलकर नहीं आ पायी हैं
me: भाषा में यह चूतिया वाली शब्दावली कभी किसी महिला की तो नहीं दिखी ? न ही महिला कहीं ऎसी किसी बहस में दिखती है ?
avinash: मैं इस शब्‍द या किसी भी गाली का प्रयोग नहीं करता...
me: चूतिया कहते ही सारी अभिव्यक्ति पा जाते हैं आप ?
avinash: व्‍यक्तिगत रूप से...
avinash: अभिव्‍यक्ति एक शब्‍द से नहीं फूटती आपने ब्‍लैक फ्राइडे फिल्‍म देखी होगी उसमें इस शब्‍द का धड़ल्‍ले से प्रयोग किया गया है पुरुषों की दुनिया में इस शब्‍द का इस्‍तेमाल चुइंगम की तरह किया जाता है
me: शब्द तो पूरी भाषिक संरचना हैं अकेले वजूद नहीं रखते
avinash: हमारे समाज में तमाम गालियां स्‍त्री विरोधी हैं
आप देखिए... बोधिसत्‍व हिंदी के बड़े कवि हैं...
me: तभी तो कह रही हूं पुरुषों की बहस जिसमें सारी यौन कुंठाओं की बारास्ता साहित्य अभिव्यक्ति हो रही है
avinash: उन्‍होंने चूतिया का इस्‍तेमाल किया... हां, अब आपने सही बात कही क्‍या होना चाहिए, क्‍या नहीं होना चाहिए... बात इस पर करनी ही नहीं चाहिए बात ये है कि जो जैसा है वो वैसा दिख जाए
me: साहित्य की भाषा और बहस की भाषा में फर्क होता है जनाब
avinash: तो जब बोधिसत्‍व जैसे बड़े कवि इस शब्‍द का इस्‍तेमाल करते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि हिंदी में इन दिनों अभिव्‍यक्तियों का कैसा दौर चल रहा है ! मैं दूसरों की भाषा सेंसर करने के पक्ष में नहीं हूं... मैं अनुरोध ही कर सकता हूं मैंने किया भी है
me: बहुत गलत बात कि वे बडे कवि हैं तो क्या वे फिलमी एक्टर की तरह हमें भाषा का फैशन बताऎगें ?
avinash: ये आप उन्‍हें बताइए...
me: आप भी तो जानिए हमारी बात! आपके यहां ही यह सब चल रहा है आप उस सब से वास्ता तोड कर साइड में नहीं खडे हो सकते हैं न
avinash: यही तो मैं कह रहा हूं... मैं दूसरों की भाषा सेंसर नहीं कर सकता। या तो मैं पूरा वाक्‍य ही नहीं छापूंगा... मेरे पास अभी 19 आर्टिकल है, जिसे नहीं छाप रहा... इस‍ी वजह से, क्‍योंकि वो छापने के काबिल नहीं है लेकिन विमर्श में कोई उग्र हो गया है या कोई बदज़ुबानी कर दी है, तो उसे खामोश नहीं कर देना चाहिए पूरी बात आने देनी चाहिए...
me: तो यह काबिल था यानि ?
avinash: इतना धैर्य हममें होना चाहिए... क्‍यों हम गालियों से परहेज़ करेंगे, अगर सिर्फ गाली के लिए गाली न दी गयी हो हमारे संस्‍कारों कें स्रोत दरअसल हमारी सुहागिन परंपराएं हैं, कोई आज़ाद और अपनी निर्मिति नहीं इसलिए हम हरे-हरे कहने लगते हैं... और शिव शिव कहने लगते हैं
me: बात घूम कर वहीं मत पहुंचाइए न ! गाली ! मर्दवादी अंदाज में गाली जिससे स्त्री के बारे में दबी हुई उनकी मानसिकता सामने आती है उन सब के दावों को खारिज करती हुई कि वे नए समय के स्त्रीवादी विमर्शों से ताल्लुक रखते हैं
avinash: तो ये तो अच्‍छी बात है... पर्दाफाश ज़रूरी है जो जिस मानसिकता का है, उसकी मानसिकता ज़ाहिर होनी चाहिए
me: तो मतलब यह कि उन सब को चूतिया कहने की आजादी होनी चाहिए बिना उसके एक मर्दवादी सटीक अभिव्यक्ति कर ही नहीं सकता
avinash: न आप मेरी बात समझ रही हैं... न मैं आपकी बात समझ रहा हूं... दरअसल मैं सेंसर के पक्ष में नहीं हूं.... ईस्‍वामी ने एक बार ठीक कहा था कि आप उधर मत जाओ, जिधर कुछ गंदी हवाएं बह रही हैं... चौपटस्‍वामी ने भी विवाद की अविनाशप्रियता में यही कहा था..
. me: अर्थात?
avinash: अभिव्‍यक्तियों का एक कोना ऐसा भी रहने देना चाहिए...
me: और वहां स्त्रियां जाऎ या नहीं ? और अगर जाऎ तो किस भाषा का इस्तिमाल करें ?
avinash: देखिए नोटपैड ने आकर अपनी बात कही कि नहीं... बहुत वाजिब बात कही है... स्त्रियां आएंगी... और आईना दिखा कर जाएंगी...
me: जाऎ तो यह मान कर कि वहां उनके गुप्तांगों पर बनाई गई गली वाली गालियों में बहस होगी avinash: क्‍या अक्‍सर ऐसा होता है
me: नोट पैड गई थी क्या हुआ वे जनाब मासूम बन गए नोट पैड ? कहां हो अविनाश जी ;)?
avinash: अभी सुबह-सुबह उठा ही था... चाय-पानी भी नहीं चढ़ाया है...
me: ओह ;)
avinash: कभी मिलेंगे तो बात करेंगे
me: चलो बाद में बहसेंगे
avinash: शुक्रिया
me: वैसे यह तो एक चिट्ठा तैयार हो गया है
avinash: आप इसे डाल दो
me: छाप दें ?
avinash: छाप दीजिए...

Sunday, July 01, 2007

कौन है असल फुरसतिया ?

आजकल हिंदी ब्लॉग जगत परेशान है ! सब ब्लॉगियों की समस्या है कि लिखना बहुत कुछ है पर वक्त बडा कम है ! उसका ज्यादातर हिस्सा तो नौकरी, घर आदि-आदि पचडों में जाया जा रहा है फुरसत की घोर कमी के काल में ब्लॉग जगत की बादशाही की तमन्ना दम तोड रही है ! अब जायज है कि ऎसे विकट समय संकट में मजे से लिखते फुरसतमय ब्लॉग लेखक से जलन हो बैठे ! ऎसे में जले पर नमक के छिदकाव सा करते ब्लॉग एग्रीगेटरों का उदय होने से वाकई मैं भी परेशान हूं ! ये बिन चाहे ही आपको आपकी औकात बता दे रहे हैं और बिन “ मांगे मोती मिले ...वाले दोहे के सत्यापित मतलब को एक बार फिर से शक के घेरे में डाल रहे हैं ! उधर ब्लॉगिए धड़ाधड पोस्टें दाग रहे हैं _हिट होने के तरीके , दो मिनट में पोस्ट लिखने के तरीके , पंगा लेके हिट होने के तरीके , कम समय में टिपियाकर ग्राहक बटोरने के तरीके , लिंक दो लिंक लो वाले तरीके., गाली देके हिट होने के तरीके............एक से एक जालिम और खुराफाती आजमाए हुए ! समझ नहीं आता किसकी दुकान में जाऎ ! हमें तो लगता है ये सारा मामला इतना सीधा नहीं है होता तो फुरसतिया जी बता न देते कि उनकी इस फुरसत का राज क्या है ! अब कई ब्लॉगर उनको उकसा बैठे कि भी कभी तो फंसेंगे ---- इयत्ता वाले लिख रहे हैं असल फुरसतिया कौन है ! अनुराग जी पानी के बतासे खिलवाकर भुलावे में उगलवान चाह रहें कि जैसे ही तीखा लगे और फुरसतिया जी पानी मांगे तो पानी का गिलास दूर से दिखला- दिखला के कहें कि पहले बताओ फुरसत का राज क्या है ? आलम यह है कि उनके यहां टिप्पणी में में एक सज्जन कह रहे हैं कि --आज कि आपकी पोस्ट आपके नाम को सार्थक नहीं कर कर रही—मानो जवाब मॆं धोखे से वे गुप्त रहस्य पर से पर्दा उठा बैठेंगे !
अब वैसे फुरसतिया तो कम अरुण भाईसा भी नहीं हैं देखिए न इतनी फुरसत में कि प्यारे से डागी के सजीलेपन की ओर हम सब गैरफुरसतियों का ध्‍यान दिलवा रहॆं है! अब कुत्ते तो कई हमारी गली में भी घूमते हैं और उनमें से दो एक सजीले भी हैं पर हममें कभी इतना फुरसतियापा होता तो वे सजीले सुकुमार हमारी भी काव्य प्रेरणा बन पाते ! वैसे आलोक जी से बडा फुरसतिया कौन होगा – जिस चीज में हम ऎब निकाल- निकाल कर रोंते हैं वे हर उस चीज में मजा ढूंढ लेते हैं! हमें तो भएया रोने को भी वक्त कम पड जाता है और वे हैं कि हंसते हैं और हंसाते भी है ! अब प्रमोद भइया का फुरसतपना उनसे ससुर कुछ भी लिखवा बैठता है ! यहां तक कि बकरी की लॆंडी उनकी रचना प्रेरणा का मूल आधार ही है! वे जड- मूल पर लिखते हैं , गहरा और मौलिक ! बकरी जैसी निरीह और सुकुमार प्राणी का महत्व प्रतिपादन करने की फुरसत वह भी इस आपाधापी के युग में निश्चय ही वे सच्चे फुरसतिया होंगे ! मोहल्ला तो फुरसत में ही चलाया जा रहा सामूहिक प्रयास है वरना कौन अपने दरवाजे से निकलकर दो मिनट गली मोहल्ले में रुकता है आजकल ! हमारा तो हाल यह है कि अपने ही विचार इकट्ठे नहीं कर पाते और मोहल्ला इतने सारे विद्वानों की अमृतवाणी संजोकर आ घमकता है और वह भी बिना नागा ! अब ज्ञानदत्त जी को ही देखो बेहद बिजी भारतीय प्लेटफार्म पर बैठकर ही वे कितनी फुरसत से अपने मन में हलचल होने देते हैं !वैसे हलचल तो हमारे मन मंदिर में भी होती है बहुत , पर क्या करें जब तक फुरसत में आते हैं मन शांत हो चुका होता है और आप सब एक बेहतरीन- लाजवाब पोस्ट से वंचित रह जाते हैं! उत्तराखंडियों की फुरसत बहुत ही सामयिक है जिस दिन भी उन्हॆं फुरसत होती है भुगतना हमें पडता है जनाब और यदि उस दिन हमारा चिट्ठाचर्चा की ड्यूटी हुई तो भगवान ही जानता है कि हमें अपनी काहिली पर कितनी शर्मिंदगी होती है !
वैसे मुझे अब लग रहा है कि पोस्ट अब कुछ ज्यादा ही लंबा गई है क्या मैं भी फुरसतिया हो गई हूं ? बिलकुल मुमकिन है जनाब !फुरसत पर बात करना कोई हंसी ठट्ठा नहीं है और जिसके भीतर फुरसतिया नहीं है वह तो कभी फुरसत पर अपनी लेखनी चला ही नहीं सकता ! यह वक्त की कमी या ज्यादती का सवाल नहीं है यह तो मूल्य है जिसे आज बहुत कमतर समझने वाले समय मॆं हम जी रहे हैं और ब्लॉगरी कर रहे हैं ! नेतागिरी , चमचागिरी , भाईगिरी , गुंडागिरी सब बने बनाए सेट रास्तों को छोड ब्लऑगिरी – आह ! तो आइए न पूछें फुरतिया जी से उनकी फुरसत का राज और ढूंढें अपने- अपने भीतर -- फुरसतिया -----एक असल फुरसतिया !

Monday, June 25, 2007

तो हाजिर है हिंदी ब्लॉगिंग पर मेरे शोध के परिणाम


क्या है ब्लॉगिंग

ब्लॉग़िंग ऎसी खोह है जामे सब खो जात
मनसा वाचा कर्मणा, जीवन वहीं बितात

ब्लॉगिंग ऎसी बानी है निसदिन करें बलात
यदि उच्चारें लोक में, बहुतहि मार हैं खात

ब्लॉगिंग के आनंद का कछु होत न सकत बखान
कहिबै कू सोभा नहीं करत ही मिलत परमान

फुरसत की यह लेखनी फुरसत मॆं पढी जाय
जबरन पाठक ढूंढि के , जबरिया जाई पढवाय

ब्लॉगित जाति से तात्पर्य

लोक जगत के सज्जन सभी मिलि मिलि यहां बतियात
टिप्पणी टिप्पणी खेलिके , हरतु परस्पर ताप

ब्लॉगर ऎसी जाति है जामें बहुत उपजाति
मैचिंग वाणी उवाचिए बैठिए एक ही पांति

ब्लॉगर ऎसा जीवडा जाके सिर नहीं पांव
कौन जाने किस नाम से कौन कहा कहि जाए

ब्लॉगिंग करि करि जग मुवा पापुलर भया न कोय
सबतें प्रेम ते भेंटिऐ , इंडिबलॉगिज कहलाय

गूंगे की यह सर्करा(चीनी) मन ही मन मुस्काय
और पूछें तो प्राणी यह सकत नहीं समझाय

ब्लॉगिंग का भविष्य एवं दिशा

ब्लॉगिंग करन जो मैं चला मन अकुंठ होय जाय
न जाने किस वॆश में खुद से खुद मिलि जाय

शुभ -शुभ मंगल लिखि- लिखि सहृदय को सहलाएं
जाकि अमंगल लेखनी तुरत ही गाली खाय

यह ब्लॉग का पंथ कराल महा तलवार की धार पे धावनो है
साचे ब्लॉगर चलें तजि आपनपौं(अहम)झिझकें कपटी जे निसांक (निश्शंक) नहीं
तुम कौन सी पाटी(पाठ) पढे हो लला लिखो ढेर पै पढत छटांक नहीं
गहे सत्य यहां निसिवासर ही उचरें सुरवाणी , अपवाद नहीं


कुछ सावधानियां

ब्लॉगिंग उतनी कीजिए कायम रहे कुटुंब
ब्लॉगराइन की व्यथा को दूर करें अविलंब


टारच गहि गहि सर्च किए ब्लॉगिंग के गुन - दोस
गुन दोसन की पोटली सम है यही संतोस


सर्च बहुत ही कीन्ही हम उत्तर बहु -बहु पाय
निष्कर्षन की पावती बहुविध दीन्हीं सुना

Wednesday, June 20, 2007

पल्‍लू के साए में राष्‍ट्रपति भवन

जब से मेरी सासू मां ने सिर पर पल्लू लिए प्रतिभा पाटिल की तस्वीर को टी वी – अखबारों में देखा है तब से वे अपने तजुर्बों और पूर्व कथनों की विजय गाथा गा पा रही हैं ! एक परंपरागत ,लज्जाशीला , मर्यादावाहिनी ,कुल -सेविका नारी –सिर पर आंचल माथे पर सिंदूरी बिंदी –अहा कैसी पवित्रता से भरी एक आदर्श भारतीय स्त्री-छवि ! पहले वे कहा करती रही हैं कि “ देखो सामने वाली डाक्टरनी को सिर पर आंचल लिए क्लीनिक जाती है सिलाई - कढाई सब जानती है, एक तुम आज कल की बेहयाई से सिर उघाडे घूमने वाली बहुएं जिन्होंने आजादी के नाम पे तबाही मची हुई है “!..... आज फिर एक बार उनकी दबी आवाज कडक हो उठी है प्रतिभा जी !

तो मैं आज जहां से चली थी फिर वहीं आ पहुंची हूं ! जाने क्यूं एक कवि लिख गए –पढिए गीता बनिए सीता , फिर किसी मूर्ख की हों परिणीता , भौंह कंटीली आंखें गीली , घर की सबसे बडी पतीली भर कर भात पसाइए........! सिर पर आंचल लिए दांत की पकड से उसे गिरने से बचाती घर बाहर के काम सवांरती आम भारतीय स्त्री ! जहां सब स्त्रियां एक सी हैं किसी का कोई अलग नाम नहीं अस्तित्व नहीं साडियां ही बताएंगी कि उनमें किसकी पत्नी या किसकी बहू लिपटी है.........
साडी का अपना समाजशास्र है , सिर पर पडे पल्लू का अपना अलग..... पर्दे पर उघडी “स्त्री” देह घर में साडी में ढकी “नारी” ! कितनी विराट खाई दो छवियों में , उन छवियों के नियंता समाज के द्वंद्वों में ... वैसे द्वंद्व भी कहां हैं न ? ये समाज तो विरुद्धों का सामंजस्य करने में हमेशा से माहिर रहा है ! कैसा द्वंद्व ...? अलग –अलग मकसदों के लिए इस्तेमाल होती स्त्री छवि , जिसे बनाने - तोडने में जुटी थकती - हारती - जीतती करोडो भारतीय औरतों का बिखरा हुआ संघर्ष ! घर-बाहर दोंनो दुनियाओं की आदर्श छवियों के मायाजाल में फडफडाती ....

प्रतिभा जी , आपके सिर पर पडा साडी का आंचल देश के नागरिकों को आश्वस्त करने वाला है ! यह सदियों से पाले - पोसे गए पुरुष अहम की आग पर पानी के ठंडे छिडकाव सा दिलासा देता सा है ! शीर्ष पर स्त्री है पर है तो हमारी गढी हुई छवि के साथ ही न ! ममत्व , सहनशीलता , पुरुष के वरद हस्त के सम्मान की भावना जो इस स्त्री चित्र से उपजती है कैसा निराला सामाजिक प्रभाव होता है उसका – ये प्रभाव सामंतीय मन को ढांढस दिलाता है ! दूसरी ओर नएपन के चक्कर से उगे औरत की आजादी - बराबरी वाले खयाल भी उपजाता है कि “ हम एक आधुनिक समाज हैं " !समाज का ये अर्जित संतोष , ये ग्लानि भाव से मुक्ति केवल ऎसे ही तो संभव थी मेरी सखी ! हमारी ये छवि हमारी भी कितनी बडी सहायिका है ऎसे ही तो हम आश्‍वस्ति हासिल करती हैं कि “ नहीं हम लुच्ची नहीं हैं , आजादी के मानकों का ईमानदारी से इस्तेमाल कर रहीं हैं ....और देखो तुमने हमपर जो विशवास किया हम योग्य थीं उसके ..” !.... एक मर्दवादी समाज के मन को तुम ही संभाल - समझ सकती हो , समाज की भावना को , अहम को लगातार तुम ही बल देती चल सकती हो हे स्त्री ! यूं भी अपने इस रूप में तुम देवत्व का अहसास दिलाती हो इसी दैवीय रूप के सहारे ही तो तुम शोभा पाती हो हर जगह ..और शीर्ष पर भी अपने इसी रूप के आधार पर बुरी नहीं लग रही हो.......

छोडिए जाने दीजिए प्रतिभा जी, यह आपके सिर पर पडे पल्लू का राष्ट्र के नाम संदेश नहीं है .....यह तो मेरे खामखां के विचारों का बहाव भर है ! ये तो वह मुगलकालीन परंपरा है जिसका आप पालन कर रही हैं और यूं भी खुद को कडी धूप से बचाने के लिए भी तो सिर पर रखा जाता है न आंचल ! बाहर तो कडी धूप कहर बरसा रही है और सुना है कि राजनीति की धूप भी काफी तेज होती है...........

Thursday, May 31, 2007

एक चिडि़या....अनेक चिडि़या

दूरदर्शन पर अक्‍सर यह कार्टून व गीत आता था। बचपन में मैं इस गीत को बेहद पसंद करती थी। आप लोगों में से भी कुछ को यह जरूर याद होगा। पिछले दिनों यू-ट्यूब पर यह दिखा तो जैसे स्‍मृतिओं का उफान सा आ गया और मैं सहज ही इस गीत को गुनगुनाने लगी। देखा तो बिटिया को भी यह पसंद आ रहा था, ठीक वैसे ही जैसे हमें आया करता था। लीजिए पेश है...एक चिडि़या ...अनेक चिडि़या


Friday, May 25, 2007

ठेले पर हिमालय

वर्षों पहले भारती का यह निबंध पढ़ा था जिसका केंद्रीय भाव यह था कि हिम ही तो हिमालय के सौंदर्य का आधार है। और सच ही है, हिम की धवलता ही हिमालय को उसका रहस्‍य उसका आकर्षण प्रदान करती है। इसलिए हाल के हमारे किन्‍नौरी अनुभवों में सबसे ऊपर इसी हिम का आकर्षण है। हिम का प्रथम दर्शन सरहन के निकट शुरू हुआ और फिर लगातार बना रहा। आप भी देखें-


Wednesday, May 02, 2007

सिर्फ चरसी लौंडे लौंडियां ही नहीं हैं देश में.....

अभी पिछले दिनों लैंसडाउन जाना हुआ ! वहां के नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य के कई विवरण सचित्र आपने यहां देखे, एक, दो, तीन, चार, पॉंच किस्‍तों में ! जब कमल शर्मा जी हम सबसे पूछ रहे थे कि इन चरसी लौंडे लौंडियों का क्या करे देश ठीक तभी लैंसडाउन में गढवाल राइफल्स में सैनिकों की भर्ती के लिए कच्ची उम्र के युवकों का जमावडा लगा हुआ था ! ये सभी खेतिहर घरों के युवक थे जहां खेती से खाना जुटाना तक दुशवार होता है ! सारे लैंसाडाउन में बिखरे ये युवक, पहाड़ की रात बाहर खुले में ही बिताने वाले थे.....अगले चार दिनों तक। इनके लिए गावों में रोजगार नहीं है पर्यटन भी इन्हें रोजगार नहीं दे सकता क्योंकि इन्हें पहाड से मातृत्व मिलता है उससे पैसा कमाने का सबक इन्हें अपने पुरखों से नहीं मिला है ! अपने अभावों को अभाव भी मानना इन्हें नहीं आता ! पहाड ही इन्हें सिखाता है अपने संसाधनों पर रश्क न करना , उसी सीमितता में जी जाना , अडिग आस्था के साथ ! यहां जीवन प्रकृति से है बाजार से नहीं ! उसी प्रकृति से जो साल में एकाध बार हमें अपनी ओर खींच लेती है..... पर हमारी महानगरीय आस्था और बाजार का पाश हमें दोबारा खींच लाता है इन शहरों में ........





चारों ओर ये युवक कमर पर छोटे- छोटे बैग टांगे घूमते दिखाई दे रहे थे ! हमने जिस भी आंख में झांका उत्साह की मणिमय चमक ही दिखाई दी ! उन आंखों में सपने थे , उन चेहरों पर तेज था , उनकी पतली -लंबी कायाओं में पहाड की पैदा की हुई फुर्ती थी ! बारहवीं का इम्तहान देकर यहां जुटे ये पहाडी बेटे चारों ओर बिखरे थे ! एक छोटे समूह से हमने बात की तो पता चला कि कल इनकी भर्ती प्रक्रिया का पहला टेस्ट होगा ! आखिरी टेस्ट में केवल कुछ सौ चुने जांएगे जबकि यहां आए युवकों संख्या पांच- छ्ह हजार है ! पहले दौर में सौ- सौ युवकों को एक साथ दौडना होगा और छांटे गए युवकों को आगे की शारीरिक परीक्षाओं से गुजरना होगा ! उन युवकों की मजबूत देह और निष्कलंक कोमल चेहरे देखकर अपने शहराती नवयुवक याद आए ! पीजा हट ,बरिस्ता , मेकदोनाल्ड , मालों की सीडियों पर या फिर पार्कों में बैठे फिल्मी प्रेम दृश्यों को साकार करते , पार्टियों में उमडे उधडे ये नवयुवा जिनके लिए देश , साहित्य , समाज ,संस्कृति, भावनाओं का कोई मूल्य नहीं है ! वे सिर्फ बाजार द्वारा इस्तेमाल के लिए पैदा किए गए जीव हैं जिनके लिए खुद से ऊपर जहान में न कुछ है और वे मानते हैं कि न कभी हो सकता है !...... नहीं .......हम अपना ध्यान झटक देते हैं !


तो इन नन्हों की जीवनी शक्ति पर रहेंगे हम सुरक्षित , देश की सीमाएं बनी रहेंगी ! ये पहाड को बचाए रखेगे ताकि हमारे मैदान बचे रहें ! इनमें से पता नहीं कौन कब बलिदान दे जाएगा अपना बिना हमारे जाने ....हम कभी पता नहीं जान पाएंगे कि आज हमारे लिए इनमें से कौन शहीद हो गया.......... ..हम जस -के -तस जिऎगे ........जीते जाऎगे........ जब तक कि किसी गंदी बिमारी , सडक दुर्धटना या फिर किसी आत्म हत्यारे खयाल का शिकार नहीं हो जाऎगे........हम जीते जाऎगे .........और ये हमारी चरसी लौंडे लौंडियों की खरपतवार..........इसे बढाते जाऎगे.........

Monday, April 09, 2007

.क्योंकि बिल्ली और बकरी इनकी टीचर हैं


आपका वास्ता कभी न कभी तो ऎसों से पडा ही होगा जिनके लिए दुनिया उन्हीं से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म होती है ! वैसे आप टालने के लिए कह सकते हैं कि नहीं जनाब कभी नहीं ,पर हम समझ जाएंगे कि आप हमें टरका रहे हो ! खैर आपका अनुभव चाहे जो हो हमारा तो यह साफ -साफ देखना रहा है कि जहां भी कोई छोटा सा स्ट्र्क्चर खडा होता है वहां आनुपातिक तौर पर कुछेक मैंवादी किस्म के जन अपने मवाद के साथ आ खडे होते हैं ! कोई नहीं जानता कि बकरी और बिल्ली से इनकी पहली मुलाकात कैसे हुई परंतु इनके मुख द्वारा उच्चरित ध्वनियां इन अनाम टीचरों की याद अवश्य दिलाती है! इन शिष्यों की पहचान यह होती है कि संरचना के हर कोने पर ये अपनी छाप बनाने के लिए किसी भी किस्म की जेहमत उठाते हैं ! ये मानकर चलते हैं कि इनके पास दुनिया का सबसे अकाट्य तर्क होता है और इनके कुतर्क-शास्त्र के हर पन्ने पे दुनिया के महान तर्कों को काटने की अचूक विधाओं का जिक्र रहता है !ये मवादी जन अपने नाजुक कंधों पर सारे जग का भार ढोए चलते हैं और चलते चलते बीच- बीच में गा उठते हैं- "न था कुछ तो मैं था कुछ न होगा तो मैं रहूंगा ' ....

वैसे हमारे सरकारी दफ्तरों में ऎसे जन बहुतायत में मिलते हैं आप काम पड्ने पर इन दफ्तरों में जाते हैं तो ये आपकी ओर इस भांति नजर उठा कर देखॆगे मानो आप दुनिया के दीनतम प्राणियों में से एक हों इनकी काम में व्यस्त आखें अपको इस कदर घूर सकती हैं मानो कह रहीं हों कि आप ही दुनिया के सबसे फालतू इंसान हो जिसे खुदा ने धरती के कामों में विघ्नकारी तत्वों के रूप में पैदा करके छोड दिया है ! इस प्रकार के जरूरी किस्म के इंसानों की सारी एनर्जी इस बात में खर्च होती है कि बढिया चीजों का क्रेडिट उन्हें ही मिले और लोग उनके होने को सिस्टम का एक बडा सौभाग्य मानें ! इन प्राणियों की टांगे जरूरत से ज्यादा लंबी और अनुभवी होती हैं यानि इन्हें पता होता है कि किस बात पर कहां कितनी लंबी टांग अडाए जाने से इच्छित फल की प्राप्ति होगी !

सरकारी महकमों के कमरों में बैठे कई छोटे बाबुओं ने हमें हमारी औकात बताई है और छोटे कामों के लिए इतने चक्कर कट्वाए हैं कि हम अंततः अपनी गफलत को दूर कर लें और मानने लगें कि किसी भी काम को छोटा नहीं समझना चाहिए ! यूं ही नहीं न बदीउज्जमां को खुद सरकारी अफसर होते हुए भी सरकारीतंत्र के चूहों पर , चूहेमारी पर और सारी संरचना में एक रचनात्मक - सीधे- सादे व्यक्ति की अदनी स्थिति पर लिखना पडा ! वे लिख गए कि कैसे सिस्टम में सिर्फ मैंवादी ही बचा रहता है चूहा बनकर और जिसने चूहेपन के खिलाफ जाकर लोहा लिया , बेनाम हो जाता है ! इसी से मैंवादियों का इतना बोलबाला दिखाई देता है और चारों ओर उनका मवाद भी सडांध पैदा करता है !

रचनात्मकता की भूमि पर भी एक से एक मैंपने के मुरीद आ बैठे हैं जिनका मानना है कि रचनात्मकता का सारा जिम्मा मां शारदा ने उनके कंधों पर ही डाल दिया है और अब वे यथाशक्ति इस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं प्रत्येक रात्रि को मां उनके स्वप्न आकर सृजनात्मक जगत की सारी खबरें लेती है जिससे सुबह उठकर वे साहित्य और कला जगत के मल को साफ कर अपने होने की सार्थकता पर सीना फुलाए डोलते हैं ! चिट्ठा जगत की वर्चुएलैटी में भी ऎसे "अगर हम न होते तो तुमहारा क्या होता ?" मार्का मैंवाद का फन फैलाए खडे स्वयंसिद्ध गिद्ध हो सकते हैं जिन्हें ये लग सकता है कि ये चिट्ठा जगत उनसे है ...... लेकिन यहां तो अंत तक वही होगा जो समर्पित रचनाकार होगा , अन्य कोई नहीं......

Wednesday, April 04, 2007

क्यों न करें हम चिट्ठा , क्योंकर करें विवाद

हम सब इस चिट्ठाजगत की संतानें हैं। ये चिट्ठाजगत हमारी कर्म- भूमि भी है और रंग (रण)–भूमि भी । यहां विवादों को पैदा करने का अपना मजा है(चाहे ये विवाद हमारी जारज संतानें ही क्यों न हों) । यदि विवाद न उठा पा रहे हों तो विवाद मे पडना भी कोई कम मजेदार नहीं है (यह आ बैल मुझे मार न प्लीज वाली कहावत को चरितार्थ करने वाला काम है जनाब!) और ऎसी बैलों की मार खाने का आनंद गूंगे के गुड के समान है ! अभी हाल में ही हुए _मुखौटा विवाद , मोहल्ला विवाद , रसोई विवाद , इरफान विवाद आदि विवादों में विवादकर्ताओं ने और इन विवादों में टांग अडाऊ टिप्पणीकारों ने बहुत-बहुत मजे लूटे हैं।

इन बहसी मसलों में नामी-गिरामी कमेंटकारों के अलावा बहुत से गुप्त रोगियों अ अ मुआफ करें गुप्त टिप्पणिकारों ने अफवाहों के तीतर लडवाए हैं अब यही वजह है कि मसिजीवी, आलेचक , खुद मैं ,निर्मल जी ,( काकेश जी का पता नहीं) आदि ने , जो कि बिंदास पोस्ट मारा करते हैं ( थोडी देर को मौजें लेना छोडकर) टिप्पणी बाधक-शोधक तकनीकों की शरण गही। निर्मल आनंद में बहते एक पोस्टकार को तो सेंत मेंत में अपने गिरेबान में झांकना पडा साहब।;);) (दो-दो इस्माइली चेपी हैं सर जी नोटपैड की सोहबत से अकल लेके)
हां तो हम कह रहे थे कि यह विवाद-भूमि हमें प्राणों से भी प्यारी है जब से हम इस विवाद रस को टेस्ट किए हैं घर –पडोस- दफ्तर के रगडे- झगडे बेमजा लगने लगे हैं। अब तो बाहर कोई टांट मारे या कि टांग खींचे हमें बिल्कुल परवाह नहीं होती ! यही सब से आजू – बाजू वाले सामाजिकों को यह अंदेशा हो गया है कि हम किंही बाबा या मां के चंगुल में फंस गए हैं जिससे हमारे सारे सांसारिक मोह सिमटते जा रहे हैं। हे हे हे। मूर्ख प्राणी सब- के –सब। भौतिक जगत के टंटों में पडे ये क्या जानें हमें किस स्वर्गिक आनंद की प्राप्ति होने लगी है आजकल कसम से ! यहां कइयों की पीठ में खुजली उठती है कइयों उसे खुजाते हैं ,कइयों के हाथ की अंगुलियों में चरपरी खुजली होती है , कोई गुप्त पीडा का सार्वजनिक प्रदर्शन करता है तो कोई( जिनकी बातों को बाहर कोई सीरियसली नहीं लेता) हास्य-व्यंग्य के बाण-पे-बाण मारके वहवाही लूटते नहीं अघाते----एक से एक यूनीक पीस ! ;)
सबकी अपनी डफ्ली अपना-अपना राग और तो और किसी की अपनी डफली फटी हुई है तो किसी आन की डफली पे दो - दो हाथ मारने की उतावली में हांफ रहा है ! अपन की कहानी अलग है ! हम तो अपने चिट्ठाबाज शिरीमान जी की चिट्ठाखोरी से उकता के त्रिलोचन की चंपा की तर्ज पे बोल बैठे -- चिट्ठाजगत पे बजर गिरे... पर फिर ठंडे दिमाग से सोचा इत्ती जल्दी भी क्या है जरा देखें तो क्या बला है ये जगह! एक दिन हम देख्ते हैं कि हम भी चिट्ठा बना रहे हैं - वाद-संवाद ....पर राम कसम वाद किया संवाद किया पर विवाद कभ्भी नहीं ! अब क्या हैं कि जैसे हमारे भारतीय शास्त्रीय संगीत में वादी संवादी विवादी तीनों स्वर होते हैं तो भाई जी यहां क्या न हों !

खैर छोडें जनाब चिट्ठाकारी का लुत्फ हो या अपने भाई बंदों की पोस्टों को आपरेशन टेबल पर लिटाकर उनकी चीराफाडी का मजा हो या विवादों की चिंगारियों को हवा देने का भीतरी सुख हो – चिट्ठाजगत में आए हैं तो इनके लिए ही तो ! तो फिर क्यों न करें हम अपनी इस चिट्ठा-भूमि को शत-शत नमन !

Monday, April 02, 2007

आप कितने किलो की हैं? उर्फ 34-24-36 जिंदाबाद

स्त्री की देह समाज के लिए सदा से कौतुहल का विषय रही है। सीमोन से लेकर जर्मेन ग्रीयर और मृणाल पांडेय से लेकर प्रभा खेतान के द्वारा स्त्री देह से जुडे शोषण के संरचनात्मक पहलुओं पर काफी लिखा जा चुका है लिखा जा रहा है। लेकिन स्त्री के आस पास की सामाजिक संस्थाएं इस स्त्री विमर्श और स्त्री के आडे आती रहीं हैं । यही कारण है कि एक आम भारतीय स्त्री को रसोई , सौंदर्य , सोना , घर ,रिश्ते अपने अस्तित्व से जुडे अभिन्न पहलू लगते हैं जिनके खिलाफ संधर्ष का ऎलान वह कभी नहीं कर पाती। आज बाजार स्त्री देह के नए नए उपमान गढ रहा है और जिस स्त्री छवि को वह समाज के सामने आक्रामक ढंग से परोस रहा है उसमें स्त्री स्वातंत्र्य और स्त्री के अस्तित्व के सारे विमर्श परिधि पर पहुंच गए हैं । स्त्री की रचनात्मकता, कोमलता, सुंदरता आदि के मिथों को गढकर स्त्री को मृग मारीचिकाओं में भटकते रहने के लिए छोड दिया गया है ...घर-बाहर दोनों जगह ही.....जिस तर्क से स्त्री का रसोई में रहना सिद्ध किया जाता है उसी तर्क के सहोदरधर्मी तर्कों से स्त्री का प्रदर्शनकारी भूमिकाओं में होना सिद्ध किया जाता है । खबर है कि इंडियन एयरलाइंस की विमानपरिचारिकाएं 200 ग्राम वजन ज्यादा होने पर विमान सेवाओं के अयोग्य हो जाती हैं तथा उन्हें इसके अतिरिक्त के कार्य सौंप दिए जाते हैं इस संबंध में कोर्ट का निर्देश है कि उन्हें ऎसे कार्यकाल में भत्तों के अतिरिक्त पूरा वेतन दिया जाना चाहिए । स्त्री की देह बाजार की सबसे बडी आय का माध्यम है। वह अन्यों के द्वारा बनाई गई अपनी छवि को पाने में रत समाज का हाशिए पर पडा नितांत अकेला कुनबा है...कौन है उसका सच्चा साथी... कोई तो होगा ही कभी न कभी.......

Saturday, March 24, 2007

रुकोगी नहीं क्‍या, इड़ा....

कभी कभी मन में प्रश्न उठता है कि जयशंकर प्रसाद की "कामायनी" क्या कभी अप्रासंगिक नहीं होगी और बदीउज्जमां का एक 'चुहे की मौत 'क पात्र 'वह,'ग' आदि क्या हम सब में सदा के लिए घर कर गए हैं? ....उफ बडे कडे और टेढ़े सवाल हैं.....दरअसल व्यव्स्था का अंग होकर जीना व्यक्ति के लिए आसान होता है । उसके ढेरों भौतिक फायदे होते हैं ।पर व्यवस्था से संवेदना की उम्मीद नहीं की जा सकती बल्कि व्यवस्था हमें सिखाती है स्वयं की तरह ही संवेदनहीन होना। व्यवस्था के लिए व्यक्ति मात्र उपकरण होता है--व्यवस्था रुपी मशीन का यंत्र मात्र ।यंत्र के लिए जरुरी है --यांत्रिकता। संवेदनाओं का यहां काम ही क्या?व्यवस्था के लिए व्यक्ति नामहीन है या यों कहें कि उसके लिए व्यक्ति एक नंबर भर है ।हमारे पास दो तीन तरह के ही रास्ते बच रहते हैं--इस संघर्ष के विरोध स्वरुप एक अन्य व्यवस्था खडी करना चाहते हैं या फिर व्यव्स्था को अपनी नियति मान बैठते हैं या फिर इस दुर्ग के भीतर के बजाए बाहर खडे होकर वार करना चाहते हैं! जो भी हो यह यांत्रिकता ,संवेदनशून्यता हमारे भीतर इतनी उतरती जाती है कि कोमल भावनाएं उपहास का विषय लगने लगती हैं! यही वजह है कि कला के स्थूल से लेकर सूक्ष्म माध्यम को भी सच्चे सहृदय बहुतायत में नहीं मिल पाते !दर्शक पर एक संवेदनाप्रधान फिल्म का प्रभाव सिनेमा घर के बाहर काफूर हो जाता है। उसके बाद यह तो हो सकता है कि दर्शक इस फिल्म को एक रोचक फिल्म के रूप में याद करें किंतु यह कलात्मक अनुभव उस दर्शक के जीवन में संवेदनात्मक पक्ष को समृद्ध बनाए -यह नहीं होने पाता।साहित्य की तो खैर इस संदर्भ में बात ही क्या की जाए .....बात ये कहां से कहां आ गई मैं दरअसल कह यह रही थी कि व्यवस्था व्यक्ति को आतंकित करती है और अभ्यस्त बनाती है । एक व्यक्ति के लिए इसकी विकरालता और जटिलता इतनी अबूझ होती है कि वह सहर्ष यांत्रिक हो जाता है..भावनाओं की सतरंगी दुनिया से परे,संवेदना के कोमल धरातल से दूर..वह होता है मात्र एक कलपुर्जा(कामायनी की सारस्‍वत सभ्‍यता...और इड़ा) ...इस अतिमशीनीकृत सभ्यता संस्करण में "आंसू "की नम धरती ,झरने सा उत्फुल्लित जीवन और मानव से मानव का मानवीय संबंध कब होगा ....?

Monday, March 12, 2007

चिट्ठोद्रेक से चिट्ठोन्‍माद......हमारा चिट्ठा वर्ल्‍ड, हमारे चिट्ठावर्ड

अफलातून जी,
आप चिट्ठाकारी में इस्‍तेमाल हो रहे नए शब्‍दों को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं...शायद।
रवीश जी ने ब्लॉगपत्य शब्द का इस्तेमाल किया है। मैंने भी ब्लॉगसभा शब्द का प्रयोग किया है, और आपका कहना है इस पर एक गंभीर बहस होनी चाहिए। भाषा बहता नीर है, जब जब जरूरत होती है हम नए शब्द गढते ढूंढते हैं खास तौर पर व्यंग्य का तो प्राण तत्व ही नवीन भाषा प्रयुक्तियां हैं। भाषा का अब तक का विकास भी मानव की भाषिक सृजनशीलता की पगडंडियों पर चलकर हुआ है। भाषा कोई जड वस्तु नहीं है, उसका निरंतर विकास ,परिमार्जन उसके प्रयोक्ता द्वारा किया जाता है। वह हमारे जीवन के साथ चलती है, जीवन उसको अपने साथ लेकर चलता है। विशेषकर तकनीक के साथ भाषा में निहित लचीलेपन का प्रयोग कर यदि हम अपनी अभिव्यक्ति कर पाते हैं तो हम अपनी भाषा के साथ कोई अन्याय नहीं कर रहे होते हैं। हम अभिव्यक्ति के लिए दूसरी भाषा की शरण में जाने से पूर्व अपनी भाषा की संभावनाओं को तलाशते हैं। यह हमारी सृजनशीलता और अपनी भाषा के प्रति हमारा प्रेम है इससे भाषा अशुद्ध नहीं होती वरन समृद्ध होती है। हिंदी चिट्ठाकारिता में हम सब नई राहों के अन्‍वेषी हैं साथ मिलकर भाषा के कारखाने में हमें काम करना होगा इस संबंध में कुबेरनाथ राय का निबंध भाषा बहता नीर बहुत प्रासंगिक हो जाता है, वे जब कहते हैं कि नए शब्दों के प्रयोग की कसौटी यह हो कि प्रयुक्त शब्‍द वाक्य संरचना में ऐसा न प्रतीत हो जैसे पूजा की थाली में अंडा ..शब्द वाक्य में खप जाए तथा निहितार्थ को व्यक्त करते हों। आने वाले समय में तकनीक हमारे जीवन का अभिंन्न अंग होगी तब हम क्या भाषा के बिना काम चलाएगॆं या किसी अन्य भाषा की शरण में जाएगें। जिन दिनों मैंने अपना चिट्ठा बनाया था मैं इस प्रश्न से जूझी थी फिर हमने चिट्ठाकारिता से जुडे नए शब्‍द युग्मों पर भी विचार किया था जैसे -रसाभास की तरह चिट्ठाभास, सगुणोपासना की तर्ज पर चिट्ठोपासना, ऐसे ही चिट्ठोन्‍माद, चिट्ठाशाली, चिट्ठोद्रेक, चिट्ठारत, चिट्ठामयी, चिट्ठाजीवी, चिट्ठाखोर, आदि ब्‍लॉगित और लिंकित तो मेरे शोध विषय में ही हैं।(.... और चिट्ठाजगत के लिए लगातार यह कौतुहल का विषय है कि मेरा मन 'लिंकित' क्‍यों है...पर उसका जबाव फिर कभी) कुल मिलाकर हमें तो लगता है कि चिट्ठाकारी के इस नीर को बहने दो, यह कूल तोड़ेगा भी और नए द्वीप भी रचेगा ..... हमें तो यही काम्‍य है।

Wednesday, March 07, 2007

नारद मामा का करें कि भेजा शोर करता है?

भाई हम तो अब वो बोलते बोलते थकाए गए है'जो हमसे बुलवाया जाता रहा है अब तक ।अब वो बोलना है जो हम बोलना चाहते हैं और बाकसम वही बोलेंगें भी ।चुपाए चुपाए बडे दिन हो लिए बातें भी एसी कि किससे कहें कोई तो मिले दिलदार सुननेवाला ।ये क्या कि पहले तो मुहं खोलिबे की हिम्मत न हो ,जैसे तैसे जुटाए रहें तो सैन-बैन, तीर तरकस ,तलवारन से लैस जन आजू- बाजू आ खडे हों ।अरे कुछ हम कहें कुछ तुम कहो बातन-बातन में नेक तो काम का विचारो -करो ।ये क्या कि दिल की दिल में र्रखे बैठे रहें,ऊपर ऊपर से मुंडी हिलाए -हिलाए हामी भरे- से दीखते रहें तुम्हारी कही पे ।वैसे बडी गजब सोच दीखे कुछेअक की-आचारसंहिता उचारसंहिता को लेकर कसम से ।अब कौन बनाएगा ये कौन के पास इत्ती सोच -बुद्धि रखी धरी है जरा हमें भी तो कराओ ओके दरसन। का है कि हैं तो अदने अभी पर खरी खरी दो - चार कभी- कभार कह बोल ही लेते हैं हम ।अच्छी सच्ची बात कहीं तो कही जाएगी चाहे जमाना लाख रोके । मन पंछी पे कित्ती भी रोक लगाओ वह तो फडफडाएगा ही । ये क्या कि कोई बोले मेरी सोच से तेरी सोच मेल नहीं खाती और ये सुनी के सोच का पंछी चुपा जाए । तुम्हारे खंडन करने ,हामी न भरने से डरिके हम वो सोच बैठें जो तुम चाहो सो तो होगा नहीं अब। कान तुम्हारे हैं चाहो तो बंद करि ल्यो या फिर अपनी बात रखो । वैसे दिल की कह देने ही तो हम आए थे यहां वरना तो जीते थे जैसे सब जीते हैं । तुम भी जरा कह लो सुन लो दो चार बातें ,काट -कूट के अपनी मति बताए ..दो अब का कहें कि भेजा शोर करता ही है मेरा हो या कि तुम्हारा......

Tuesday, March 06, 2007

बंदीघर में विचार

कविता जिंदगी को बयान करने का सबसे खूबसूरत अंदाज है जब सपाटबयानी से काम नहीं चलता कविता करने बैठ जाती हूं सुकून मिलता है ....कभी कभी तलधर के सामान को धूप भी चाहिए...खैर एक कविता यूं ही बाहर आ गई और मैंने यहां पोस्टित कर दी..



विचार का आना यों हुआ
विचारधारकों के यहां
मानो बंद दरवाजे के नीचे से
खिसका दिया गया हो कोई अखबार....
कुंदधार हथियार-सा विचार
प्रतीक्षा में लीन
म्यान में पडा
दुनियावी दबावों के बहाने
तहखानों में बैठ
दशकों तक सडा ......
जिनकी मोहक म्यानों में
आज ये हथियार है वे
बिना लडे झुक चुके
विचार की पूजा में थाली सजाए
अनुभव को दुरदुराते झुठलाते
अब चुक चके वे......
....बंदीघरों में महफूज विचार
संग्रहालयों में ही सजा दो
तो शायद बेहतर हो...