तो मैं आज जहां से चली थी फिर वहीं आ पहुंची हूं ! जाने क्यूं एक कवि लिख गए –पढिए गीता बनिए सीता , फिर किसी मूर्ख की हों परिणीता , भौंह कंटीली आंखें गीली , घर की सबसे बडी पतीली भर कर भात पसाइए........! सिर पर आंचल लिए दांत की पकड से उसे गिरने से बचाती घर बाहर के काम सवांरती आम भारतीय स्त्री ! जहां सब स्त्रियां एक सी हैं किसी का कोई अलग नाम नहीं अस्तित्व नहीं साडियां ही बताएंगी कि उनमें किसकी पत्नी या किसकी बहू लिपटी है.........साडी का अपना समाजशास्र है , सिर पर पडे पल्लू का अपना अलग..... पर्दे पर उघडी “स्त्री” देह घर में साडी में ढकी “नारी” ! कितनी विराट खाई दो छवियों में , उन छवियों के नियंता समाज के द्वंद्वों में ... वैसे द्वंद्व भी कहां हैं न ? ये समाज तो विरुद्धों का सामंजस्य करने में हमेशा से माहिर रहा है ! कैसा द्वंद्व ...? अलग –अलग मकसदों के लिए इस्तेमाल होती स्त्री छवि , जिसे बनाने - तोडने में जुटी थकती - हारती - जीतती करोडो भारतीय औरतों का बिखरा हुआ संघर्ष ! घर-बाहर दोंनो दुनियाओं की आदर्श छवियों के मायाजाल में फडफडाती ....
प्रतिभा जी , आपके सिर पर पडा साडी का आंचल देश के नागरिकों को आश्वस्त करने वाला है ! यह सदियों से पाले - पोसे गए पुरुष अहम की आग पर पानी के ठंडे छिडकाव सा दिलासा देता सा है ! शीर्ष पर स्त्री है पर है तो हमारी गढी हुई छवि के साथ ही न ! ममत्व , सहनशीलता , पुरुष के वरद हस्त के सम्मान की भावना जो इस स्त्री चित्र से उपजती है कैसा निराला सामाजिक प्रभाव होता है उसका – ये प्रभाव सामंतीय मन को ढांढस दिलाता है ! दूसरी ओर नएपन के चक्कर से उगे औरत की आजादी - बराबरी वाले खयाल भी उपजाता है कि “ हम एक आधुनिक समाज हैं " !समाज का ये अर्जित संतोष , ये ग्लानि भाव से मुक्ति केवल ऎसे ही तो संभव थी मेरी सखी ! हमारी ये छवि हमारी भी कितनी बडी सहायिका है ऎसे ही तो हम आश्वस्ति हासिल करती हैं कि “ नहीं हम लुच्ची नहीं हैं , आजादी के मानकों का ईमानदारी से इस्तेमाल कर रहीं हैं ....और देखो तुमने हमपर जो विशवास किया हम योग्य थीं उसके ..” !.... एक मर्दवादी समाज के मन को तुम ही संभाल - समझ सकती हो , समाज की भावना को , अहम को लगातार तुम ही बल देती चल सकती हो हे स्त्री ! यूं भी अपने इस रूप में तुम देवत्व का अहसास दिलाती हो इसी दैवीय रूप के सहारे ही तो तुम शोभा पाती हो हर जगह ..और शीर्ष पर भी अपने इसी रूप के आधार पर बुरी नहीं लग रही हो.......
छोडिए जाने दीजिए प्रतिभा जी, यह आपके सिर पर पडे पल्लू का राष्ट्र के नाम संदेश नहीं है .....यह तो मेरे खामखां के विचारों का बहाव भर है ! ये तो वह मुगलकालीन परंपरा है जिसका आप पालन कर रही हैं और यूं भी खुद को कडी धूप से बचाने के लिए भी तो सिर पर रखा जाता है न आंचल ! बाहर तो कडी धूप कहर बरसा रही है और सुना है कि राजनीति की धूप भी काफी तेज होती है...........