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Sunday, July 01, 2007

कौन है असल फुरसतिया ?

आजकल हिंदी ब्लॉग जगत परेशान है ! सब ब्लॉगियों की समस्या है कि लिखना बहुत कुछ है पर वक्त बडा कम है ! उसका ज्यादातर हिस्सा तो नौकरी, घर आदि-आदि पचडों में जाया जा रहा है फुरसत की घोर कमी के काल में ब्लॉग जगत की बादशाही की तमन्ना दम तोड रही है ! अब जायज है कि ऎसे विकट समय संकट में मजे से लिखते फुरसतमय ब्लॉग लेखक से जलन हो बैठे ! ऎसे में जले पर नमक के छिदकाव सा करते ब्लॉग एग्रीगेटरों का उदय होने से वाकई मैं भी परेशान हूं ! ये बिन चाहे ही आपको आपकी औकात बता दे रहे हैं और बिन “ मांगे मोती मिले ...वाले दोहे के सत्यापित मतलब को एक बार फिर से शक के घेरे में डाल रहे हैं ! उधर ब्लॉगिए धड़ाधड पोस्टें दाग रहे हैं _हिट होने के तरीके , दो मिनट में पोस्ट लिखने के तरीके , पंगा लेके हिट होने के तरीके , कम समय में टिपियाकर ग्राहक बटोरने के तरीके , लिंक दो लिंक लो वाले तरीके., गाली देके हिट होने के तरीके............एक से एक जालिम और खुराफाती आजमाए हुए ! समझ नहीं आता किसकी दुकान में जाऎ ! हमें तो लगता है ये सारा मामला इतना सीधा नहीं है होता तो फुरसतिया जी बता न देते कि उनकी इस फुरसत का राज क्या है ! अब कई ब्लॉगर उनको उकसा बैठे कि भी कभी तो फंसेंगे ---- इयत्ता वाले लिख रहे हैं असल फुरसतिया कौन है ! अनुराग जी पानी के बतासे खिलवाकर भुलावे में उगलवान चाह रहें कि जैसे ही तीखा लगे और फुरसतिया जी पानी मांगे तो पानी का गिलास दूर से दिखला- दिखला के कहें कि पहले बताओ फुरसत का राज क्या है ? आलम यह है कि उनके यहां टिप्पणी में में एक सज्जन कह रहे हैं कि --आज कि आपकी पोस्ट आपके नाम को सार्थक नहीं कर कर रही—मानो जवाब मॆं धोखे से वे गुप्त रहस्य पर से पर्दा उठा बैठेंगे !
अब वैसे फुरसतिया तो कम अरुण भाईसा भी नहीं हैं देखिए न इतनी फुरसत में कि प्यारे से डागी के सजीलेपन की ओर हम सब गैरफुरसतियों का ध्‍यान दिलवा रहॆं है! अब कुत्ते तो कई हमारी गली में भी घूमते हैं और उनमें से दो एक सजीले भी हैं पर हममें कभी इतना फुरसतियापा होता तो वे सजीले सुकुमार हमारी भी काव्य प्रेरणा बन पाते ! वैसे आलोक जी से बडा फुरसतिया कौन होगा – जिस चीज में हम ऎब निकाल- निकाल कर रोंते हैं वे हर उस चीज में मजा ढूंढ लेते हैं! हमें तो भएया रोने को भी वक्त कम पड जाता है और वे हैं कि हंसते हैं और हंसाते भी है ! अब प्रमोद भइया का फुरसतपना उनसे ससुर कुछ भी लिखवा बैठता है ! यहां तक कि बकरी की लॆंडी उनकी रचना प्रेरणा का मूल आधार ही है! वे जड- मूल पर लिखते हैं , गहरा और मौलिक ! बकरी जैसी निरीह और सुकुमार प्राणी का महत्व प्रतिपादन करने की फुरसत वह भी इस आपाधापी के युग में निश्चय ही वे सच्चे फुरसतिया होंगे ! मोहल्ला तो फुरसत में ही चलाया जा रहा सामूहिक प्रयास है वरना कौन अपने दरवाजे से निकलकर दो मिनट गली मोहल्ले में रुकता है आजकल ! हमारा तो हाल यह है कि अपने ही विचार इकट्ठे नहीं कर पाते और मोहल्ला इतने सारे विद्वानों की अमृतवाणी संजोकर आ घमकता है और वह भी बिना नागा ! अब ज्ञानदत्त जी को ही देखो बेहद बिजी भारतीय प्लेटफार्म पर बैठकर ही वे कितनी फुरसत से अपने मन में हलचल होने देते हैं !वैसे हलचल तो हमारे मन मंदिर में भी होती है बहुत , पर क्या करें जब तक फुरसत में आते हैं मन शांत हो चुका होता है और आप सब एक बेहतरीन- लाजवाब पोस्ट से वंचित रह जाते हैं! उत्तराखंडियों की फुरसत बहुत ही सामयिक है जिस दिन भी उन्हॆं फुरसत होती है भुगतना हमें पडता है जनाब और यदि उस दिन हमारा चिट्ठाचर्चा की ड्यूटी हुई तो भगवान ही जानता है कि हमें अपनी काहिली पर कितनी शर्मिंदगी होती है !
वैसे मुझे अब लग रहा है कि पोस्ट अब कुछ ज्यादा ही लंबा गई है क्या मैं भी फुरसतिया हो गई हूं ? बिलकुल मुमकिन है जनाब !फुरसत पर बात करना कोई हंसी ठट्ठा नहीं है और जिसके भीतर फुरसतिया नहीं है वह तो कभी फुरसत पर अपनी लेखनी चला ही नहीं सकता ! यह वक्त की कमी या ज्यादती का सवाल नहीं है यह तो मूल्य है जिसे आज बहुत कमतर समझने वाले समय मॆं हम जी रहे हैं और ब्लॉगरी कर रहे हैं ! नेतागिरी , चमचागिरी , भाईगिरी , गुंडागिरी सब बने बनाए सेट रास्तों को छोड ब्लऑगिरी – आह ! तो आइए न पूछें फुरतिया जी से उनकी फुरसत का राज और ढूंढें अपने- अपने भीतर -- फुरसतिया -----एक असल फुरसतिया !