Monday, June 09, 2008

डॉ पांगती - पंक्ति में नहीं खड़ॆ हैं जो

पिछली पोस्ट में मैंने अपनी मुनस्यारी यात्रा के कुछ छायाचित्र प्रस्तुत किए थे !  आज देखिए डॉ पांगती के निजी प्रयासों से बने हेरिटेज म्यूजियम की कुछ तस्वीरें ! डॉ पांगती मुनसियारी के मूल निवासी हैं जिन्होंने वहीं रहकर जोहर घाटी और भोटिया जनजाति पर अपना पी.ऎच.डी का काम पूरा किया !वे करीब एक दशक पहले मुनस्यारी के इंटरकॉलेज से रिटायर हुए हैं और आजकल दिल्ली में रहने वाले अपने बेटे के द्वारा लाए गए लैपटॉप पर वे लोकभाषा पर काम कर रहे हैं ! 


मुनस्यारी के छोटे से गांव में कच्चे रास्ते से होकर आप उनके पैतृक घर में बने इस म्यूज़ियम में पहुंच सकते हैं ! उनके अकेले और अथक प्रयासों से एक बडा सा कमरा संग्रहालय में तब्दील हो गया है ! पांगती जी के म्यूज़ियम में लोकजीवन की कई स्मृति चिह्न हैं -बर्तन , वस्त्राभूषण ,चीन और तिब्बत से स्वतंत्रतापूर्व की व्यापार संधियां ,नक्शे , किताबें , हिमालय पर हुआ नया शोध कार्य , जडी बूटियां , हथियार....! इस इलाके के लोकजीवन पर रचित कुछ दुर्लभ किताबों को आप यहां से खरीद सकते हैं ! यह म्यूज़ियम मुनस्यारी में मास्टर साब के म्यूज़ियम के नाम से जाना जाता है ! पांगती जी से बातचीत के दौरान उनकी काम के लिए खब्त का पता चला तो कई सवाल मन में पैदा हुए ! कुछेक पूछ भी डाले ! उनका मकसद क्या है ? उनकी यह धरोहर संभालने वाला कौन है ? धन का इंतजाम कैसे होता है ? ! डॉ पांगती का कहना था "यहां के बच्चे अपनी लोक संस्कृति को नहीं जानते ! लोक भाषा शैली सबको भूल रहे हैं ! अपनी सांस्कृतिक धरोहर के हिस्से मैं संजोने की कोशिश करता हूं ..हमारा जातीय इतिहास खो न जाए !" पुरानी पीढी और नए जमाने के बीच उगती गहराती खाई के कई सबूत हमने वहां के जीवन में महसूस किए ! डॉ पांगती के मन में भी इस सांस्कृतिक विस्मृति के लिए अस्वीकार था ! पर साथ ही एक आस्था और विश्वास भी उमके भीतर दिखा ! वे मानते हैं कि भविष्य में कभी न कभी इस काम को आगे बढाने वाला आस्थावादी लोक संस्कृति का प्रेमी जरूर पैदा होगा ! डॉ पांगती ने हमें आगंतुक पुस्तिका पर कुछ लिखने का आग्रह किया क्योंकि इस साल उन्हें राज्य से कुछ अनुदान मिल रहा है राज्य तो अनुदान से पहले आपके काम के सबूत देखता है न ! हमने हिमालय के इतिहास और लोकसंस्कृति पर लिखित कई किताबें उससे खरीदी! चलते हुए उन्होंने हमें अपना लिखा एक लेख दिया ! भाषा के सामाजिक पक्ष पर लिखा यह लेख एक आध जगह से बिना छपे वापस आ चुका था ! सो उन्हें संकोच था ,पर बातचीत में पैदा हुई सहजतावश उन्होंने वह लेख हमें थमा दिया !



 


Saturday, June 07, 2008

मुनस्‍यारी में हम

बहुत समय से मुनस्यारी जाने की कामना थी जो आखिरकार पूर्ण हुई ! उत्तरांचल की आखिरी सडक पर आखिरी मोटरऎबल गांव ! मिलम ,रलम ,पिंडारी और हीरामणि ग्लेशियरों से घिरा और पंचचुली पर्वतमाला के चरणों में अडा यह गांव दिल्ली की चहल पहल से 700 किलोमीटृर दूर है ! इस दूरी को हमने अपनी  नई नवेली ऎवियो युवा कार से की गई यात्रा से पाटा ! पेश हैं कुछ छायाचित्र -

Monday, May 26, 2008

ब्लॉग जगत के बलात्कारी ब्वायज़

कल से कठपिंगल नामक एक नव ब्लॉगर जो कि बडे मठाधीश भी होते हैं बहुत परेशान हैं ! उन्होंने एक साथी बलात्कारी ब्लॉगर की अपराध की दास्तान हम सब को सुनाई और फिर जी भर यहाँ जांचने में तुल गए कि कौन उसपर कितना रिऎक्ट कर रहा है ! यश्वंत के बलात्कारी व्यक्तित्व की निंदा में चोखेरबाली समाज चांय चांय नहीं कर रहा वे इस बात से भी आहत हैं ! अविनाश ने कल बलात्कार की कथा को बहुत दम से बयान किया ! उन्होंने हमेशा की तरह अपनी पत्नी को घर पर ही रखा और ब्लॉग जगत के सबसे सेंसेटिव और ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते सब ब्लॉगरों को उनके नैतिक ड्यूटी के लिए उकसाया ! पर जैसा कि प्रमोद ने कहा यश्वंत पकडा गया क्योंकि वह फिजिकल एब्यूज़ कर बैठा था ! पर यहां के कई थानेदार मठाधीश जो कि समाज के हर मुद्दे पर सबसे तेज और संवेदनशील राय रखते हैं आजाद हैं और तबतक रहेंगे जबतक कि कोई फिजिकल एब्यूज न कर बैंठें !

ब्लॉग जगत के मोहल्ला की चारपाई पर बैठा एक ब्वाय बलात्कार की खबर दे रहा है दूसरा ब्वाय जेल से छूटा ही है ! चारपाई वाले ब्वाय की पत्नी घर के अंदर और बलात्कारी की पत्नी गांव में है ! अब बचीं ब्लॉग जगत की औरतें जिनके लिए मोहल्लापति ने नए संबोधन बनाना ,उनको उनके कर्तव्य बताना , उनके सम्मान और हित में बोलने वाले पुरुषों को पुरुष समाज का विभीषण बताना जैसी कई बातें इस ब्वाय ने बताईं हैं ! इसमें से एक ब्वाय स्त्री विमर्श जैसे कई विमर्शों की रिले रेस चलवाता है और चाहता है कि उसे हिंदी ब्लॉग जगत का सबसे बौद्दिक और समझदार ब्वाय समझा जाए ( क्योंकि वह बलात्कारी भी नहीं है ) जबकि दूसरे ब्वाय के द्वारा बलात्कार की खबर देता हुआ यहाँ चारपाई ब्वाय अपनी एक परिचित ब्लॉगर को " सनसनी गर्ल " दूसरी को छुटे सांड की तरह सींग चलाने वाली माताजी कहकर ही अपनी बात आगे बढा पाता है ! हमारे पास यश्वंत के बलात्कारी रूप के कोई फोटो नहीं हैं ( हो सकता है कोई ब्वाय जारी कर दे आजकल में ..) पर हमारे पास चारपाई ब्वाय का लिखा है

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आप कहें गे कहेंगे क्या अनूप तो कह ही रहे हैं कि नीलिमा ने ही उनको उकसाया है तो फिर यहाँ सब तो लाजमी है ! यश्वंत का भी क्या कसूर रहा होगा उस पीडिता ने भी उसको उकसाया होगा !अब चारपाई ब्वाय को उकसाया जाएगा तो वह किसी स्त्री को पहले तो भूखी सांड की तरह हर जगह दौडती ही कहेगा माताजी भी कह लेगा पर इससे ज्यादा मत उकसाओ ....! जाहिर है अपनी हदों को पार करने वाली औरत या आपकी गलती दिखाने वली औरत माताजी ही कलाऎगी क्योंकि वह सुकुमारी वाले काम कहां कर रही है ! विरोध के स्वर में बोलने वाली औरत को बूढी पके बाल वाली माताजी कहने से कितना चिढ सकती है वह ! वह जाकर शीशे में ध्यान से अपने को निहारने पहुंचेगी कि ऎसा मेरे चेहरे में क्या था कि मैं माताजी लगने लगी हूं , छुटी भूखी सांड की तरह लगती हूं .....बस वह उदास हो जाएगी चेहरे पर लेप मलेगी और अपने आप से वादा करेगी कि कल से किसी भी मर्द को ऎसे नहीं कहेगी और उनकी तारीफ के योग्य करम करेगी !

वैसे जब चारपाई ब्वाय एक बलात्कार की खबर देते हुए स्त्री के बारे में इन संबोधनों को कह रहा है तो उसके मन में यही न चल रहा होगा कि छुटी सांड सी दौडती फिरोगी तो यही सुनोगी ! और फिर कुछ भी फिजिकल या लैंग्वेज एब्यूज़ हो सकता है ! माई डियर तैयार रहा करो तुम्हारे साथ आगे कुछ भी हो सकता है ! वह सोचता होगा हमारी वाली को देखो घर में बंधी रहती है मजाल है उसके साथ कोई कुछ कर जाए ...!

ऎसे चारपाई ब्वाय को मसिजीवी पत्नीवादी ,प्रमोद सिंह भी "बदचलन " लगेगा ! दोनों ही अपनी पत्नी को बांधकर नहीं रख सके ! एक की भूखे सांड सी दौडती रहती है दूसरे की भाग जाती है ! हे चारपाई ब्वाय तुम नीलिमा को कठघरे में खडा करने के लिए जितने उतावले हो अगर उतने ही उलावले अपनी काठ की संवेदना को गलाने के लिए होते तो बात थी !

तुम तो पहुंचे गाल बजाते देखो साला पकडा गया बलात्कार ऎसे नहीं किया जाता साले को कितनी बार समझाया था ! जो करो ऎसे करो कि पकडे न जाओ ! बोधि जी को देखो बोला भी बाद में पलट भी गए बच गए ! मुझे देखो सनसनी गर्ल कहा था तुरंत मिटा दिया साथ ही यह कहने के ऎतराज में आई टिप्पणी भी मिटा दी ! एकदम साफ कोई सबूत नहीं ! पर भूखी सांड सी पीछे पडेगी तो आगे का कुछ नहीं कह सकता ! मैं कहता था न मैं बडा बाप हूं मुझसे सीखो ! स्त्री विमर्श भी करो स्त्री का एब्यूज़ भी करो ! तरीका मुझसे सीखो -मैंने कई बार कहा था ! तुम ठहरे कच्चे खिलाडी और जल्दबाज ..खैर भुगतो !

तो हे चारपाई ब्वाय हिंदी व्लॉग जगत की मुझ सी भूखे सांड सी बेवजह जगह -जगह दौडती औरत जिसमें तुमने अपनी माताजी का रूप देखा , पत्रकार स्‍मृति दुबे जिनमें तुम्हें सनसनी गर्ल ( कॉल गर्ल ,बार गर्ल ,पिन अप गर्ल ,सिज़्लिंग गर्ल जैसी ही कोई चीज़ .....जो तुम औरतों में देखते होंगे ..) प्रत्यक्षा , सुजाता मनीषा पांडे जैसी तमाम औरतें बस अब तुम्हारी चारपाई की ओर देख रही हैं ! चारपाई पकडे रहना बलात्कारी ब्वाय को तो हम  और कानून मिलकर देख ही लेंगे ,साथ की कामना करेंगे कि और कोई बलात्कारी ब्वाय उगने न पाए !  आमीन !

Wednesday, April 09, 2008

इन औरतों का इंकलाब ज़िंदाबाद बंद कराओ

सुनिए आप सब अनाम सनाम महाशयों ! अब तो आप सब की ही तरह इस नारीवादी औरतवादी नारेबाजी - बहसबाजी से  मैं भी तंग आ चुकी हूं ! आप सब सही कह रहे हैं ये इंकलाबी ज़ज़्बा हम सब औरतों के खाली दिमागों और नाकाबिलिय़त का धमाका भर है बस ! हम बेकार में दुखियारी बनी फिर रही हैं ! सब कुछ कितना अच्छा ,और मिला मिलाया है ! पति घर बच्चे ! हां थोडी दिक्कत हो तो पति की कमाई से मेड भर रख लें तो सारी कमियां दूर हो जांगी ! फिर हम सब सुखी सुहागिनें अपने अपने सुखों पर नाज़ अकर सकेगीं ! सब रगडे झगडे हमारी गलतफहमियों या ऎडजस्टमेंट की आदत न होने से होते हैं !  पर एक बात बताओ -हम कितने सुखी हैं ये फहमी तभी तक क्यों बनी रहती है जब तक हम सारी घरेलू जिम्मेदारियां हंसते संसते उठाती रहतीं हैं ! काश जब हम पति की कमीज बटन न टांकें और फिर भी घर की खुशहाली बनी रहे और हमारे बारे में नाकाबिल औरत औरत का फतवा न जारी किया जाए !

बकवास है सब साली ! फेमेनिज़्म सब धरा रह जाएगा जब बटन न टांकने , समय पर रोटी न देने पर पति घूर कर देखेगा चांटा मारने को उसका हाथ उठेगा ! कमीना फेमेनिज़्म आपके रिश्ते की पैरवी में नहीं आएगा तब और आप सोचेगी हाय एक बटन टांक ही देती तो क्या हर्ज हो जाता ??

अब एक पति महाशय दलील दे रहे थे कि मैं अगर कमाकर लाने से इंकार कर दूं तो ? सारा दिन बाहर खटता हूं मैं भी तो खुद को मजदूर मान सकता हूं ? मुझे घर मॆं चैन की दो वक्त की रोटी भी न मिले तो क्यों मैं घर लौट के आना चाहूं ?बडा गंदा ज़माना आ गया है घरों की शांति खत्म हुए चली जा रही है ! हर बात में दमन ,शोषण देखने की आदत पद चुकी है इन औरतों को !

सही बात कहूं तो मैं अब सुधरने की सोच रही हूं - एक खुशहाल, पति सेविका परिवार की धुरी बन सब कुछ संभालने वाली औरत ! पर क्या करूं ये सब सोच ही रही कि  मृणाल पांडॆ का लिखा पाठ " मित्र से संलाप " पर स्लेबस के लिए लिखने का ज़िम्मा ले डाला ! अब उन्होंने आप सब के द्वारा नारीवाद पर लगाए आरोपों की लिस्ट बताई है ! आप भी गौर करें और हो सके तो अपनी अपनी दलीलें -आरोप आदि को लिस्ट करें ! वाकई अब निर्णायक दौर आ गया है इस फेमेनिज़्म पर कुछ फैसला लेने का --

औरत ही औरत की दुश्मन होती है !

सारी फेमेनिस्ट औरतें तर्क विमुख होती हैं !

फेमेनिज़्म एक पश्चिमी दर्शन है ! कोकाकोला की तरह     झागदार और लुभावना आयात भर है!

नारी संगठन बस नारेबाज़ी और गोष्ठियों का आयोजन भर करते हैं !गावों में इनकी कोई रुचि नहीं !

मध्यवर्गीय कामकाजी औरतें घर से बाहर कामकाज के लिए नहीं मटरगश्ती के लिए निकलती हैं !

पारिवारिक शोषण की शिकायत करने वाली स्त्रियां ऎडजस्ट करना नहीं जानती !

{ प्लीज़ अपनी राय या आरोप लिस्ट में  जोडना न भूलें }

Friday, April 04, 2008

सेक्सुअली वॉट आय ऎम ??

स्त्री और सेक्सुऎलिटी का आपसी संबंध क्या है ?यह सवाल अब स्त्री विमर्शों में यदा कदा उठने लगा है ! इस समाज में  औरत अपनी सेक्सुएलिटी पर अपना ही अधिकार खो देती हैं ! यह पितृसत्ता ही है जो हमारी सामाजिक आर्थिक राजनीतिक और सेक्सुअल आइडेंटिटी को काबू में रखती है ! किसी स्त्री या लडकी का अपनी सुक्सुएलिटी , शरीर और प्रजनन पर नियंत्रण समाज को ,पेट्रीआरकी को सबसे खुली चुनौती होता है ! इसीलिए हमारे समाज के सबसे वर्जित सवालों में से एक सवाल है - किसी स्त्री के द्वारा  अपनी यौनिक पहचान को जबरिया डिफाइन करने वाली संरचनाओं पर उठाया गया सवाल !

हमारे समाज में स्त्री का शरीर और उसकी आजादी पितृसत्ता का सबसे बडा हथियार भी हैं और उसके लिए सबसे बडा खतरा भी ! जिस समाज में पुरुष का सेक्सुअल सेल्फ हावी रहता है उसी समाज में औरत का सेक्सुल आत्म लगातार दबाया और कुंठित किया जाता है ! इसी समाज की ट्रेनिंग के फलस्वरूप स्त्री हमेशा अपनी इस आइडेंटिटी को पुरुष की थाती मान लेती है ! स्त्री के पास अपने सेक्सुअल आत्म को अभिव्यक्त करने के न अवसर हैं न भाषा और न ही आत्मविश्वास ! परिवार ,समाज संस्कृति ,नैतिकता ,मर्यादा का दायित्व एकमात्र उसके उउपर लादकर चल रही हमारी ये संरचनाऎ बेफिक्र हैं !

स्त्री अपने शरीर के प्रति कितनी सहज और सजग है  या फिर उसकी सेल्फ की परिभाषा में उसकी अपनी यौनिकता को क्या जगह देती है ? स्त्री अपनी यौनिक आइडेंतिटी की अभिव्यक्ति को लेकर कितनी कुंठित ,दमित या पराश्रित है ?-- आदि कुछ सवाल हैं जो हमारे पितृसंरचनात्मक समाज की देन हैं ! इन सवालों को सवाल की तरह देखा जाना अभी कहां शुरू हुआ है -?-केवल वृहद विमर्शों की सुलझी हुई तहों के भीतर ये दबे हुए हैं !

एक आम स्त्री की ज़िंदगी की तमाम उलझनों ,पीडाओं , समस्याओं से इन सवालों को क्या लेना देना --मैं जानती हूं आपमें से काई सुधी पाठकों के मन में यह सवाल उठ रहे होंगे ! आप स्त्री की जिंदगी और जिस्म को कई अलग-अलग टुकडों में देखने के आदी हो गए होंगे सो उसकी सामाजिक राजनीतिक और यौनिक आजादी ( और अभिव्यक्ति ) को आप अलग अलग संघर्षों के रूप में देख रहे होंगे ! ज़ाहिर है आपको यह भी लगता होगा को बेचारी स्त्री कहां कहां लडेगी ??465_2

Thursday, April 03, 2008

आखिर मैं इतने दिन से कहां थी ?

 

बहुत दिन तक  कोई भी पोस्ट न लिखने के क्या फायदे हैं इसका विश्लेषण करते हुए फुरसतिया जी ने बहुत सी राज की बातें बताई हैं ! वे हमसे बतियाते हुए बोले कि अच्छा है कि आपकी वजह से चिट्ठा पढने वाले लोग कम परेशान हुए ! बहरहाल उनकी बात सुनकर कई दिनों से न लिख पाने से परेशान मन को बहुत राहत मिली ! :)

दरअसल पिछले 3-4 सप्ताह से स्त्री विमर्श पर आयोजित एक पुनश्चर्या कार्यक्रम मॆं हिस्सा ले रही थी ! इस कार्यक्रम के तहत कई नामी विद्वानों और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं को सुनना हुआ ! कमला भसीन ,अपर्णा बासु ,विभा चतुर्वेदी ,कविता श्रीवास्तव ,निर्मला बैनर्जी ,ऎन स्टीवर्ट ,राकेश चन्द्रा , उमा चक्रवर्ती सरीखे कई वक्ताओं को सुनने का मौका मिला ! इस पूरे कार्यक्रम में दिल्ली विशवविद्यालय के  शिक्षकों के साथ साथ कई अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक भी थे !

इस कार्यक्रम में मैंने अपना पर्चा "हिंदी जनपद का ब्लॉगफेमेनिज़्म " पर तैयार किया और पढा !  यहां मौजूद श्रोताओं ने साइबर फेमेनिज़्म को एक बिल्कुल नये फिनामिमा के रूप में ग्रहण किया ! इस पर्चे में ब्लॉग जगत की सत्ता संरचना में पितृसत्तामकता के सबूतों की पडताल की ! चोखेरबाली के उदय के ऎतिहासिक दबावों पर बात हुई ,ब्लॉग जगत की स्त्री लेखिकाओं के लेखन पर विमर्श हुआ ! जो एक महत्वपूर्ण सवाल रामजस कॉलेज के इतिहास विभाग के वरिष्ठ और स्त्री संघर्षों के बहुत सक्रिय चिंतक मुकुल ने पूछा वह था -कि क्या इस साइबर स्त्री विमर्श एक पत्नीवाद या सुक्सुऎलिटी के विमर्श उठते हैं ?

यह रिफेशर कोर्स मेरे लिए बहुत अहम रहा ! स्त्री आंदोलनों ,स्त्री विमर्श , पितृसत्तामकता , जेंडर इक्वेलिटी और जेंडर जस्टिस , फेमिनिटी और मस्क्युलिनिटी ,स्त्री और मीडिया ,यौन उत्पीडन और स्त्री ,जेंडर और साइकॉलोजी ,फैमिली लॉ ,ट्रैफिकिंग एंड वुमेन लॉ अगेंस्ट डॉमेस्टिक वॉयलेंस --जैसे कई अहम मुद्दों पर वक्तव्य हुए !इन सब विमर्शों के प्रभावस्वरूप स्त्री विमर्श से जुडे कई आयामों पर एक समझ बनाने का मौका मिला !

यहां हुए कई अनुभव आपसे साझा करने का मन है ! खासकर सेक्सुऎलिटी पर हुई वर्कशॉप के कुछ गंभीर और कुछ हास्यास्पद अनुभव ! बिना इस डर के कि रियाज जी फिर न कह दें कि आप औरतें स्त्रियों और बच्चों के अलावा और कुछ नहीं लिख सकतीं क्या ?:)

Monday, March 03, 2008

उनका थूकशास्त्र आपपर कैसा बीतता है ?

अगर कोई बलगम का लोथडा गले में अटक गया हो उसे उगल दीजिए दिल हलका हो जाएगा !

भारत देश की जनता को इतनी थूक क्यों आती है माइलौड ? यहां की सडकें भारतवासियों के दिल में सूराख कर रहे टी.बी. रोग के सबूतों से अटी क्यों पडी रहती हैं ? इन रंग बिरंगी पीकों से रहित कब होंगी हमारी गलियां गमारी सडकें ?

आकथू...आकथू ..

दरअसल हमारे सीनों में बरसों से थूक पीक का संगम बवाल मचाए हुए है ! लिसलिसा हरा गीला पदार्थ हमारे दिल में आप्लावित होता रहता है हुजूर ! जबतब ये कमबख्त गले में उबल पडता है ! आप जाने जनाब हमारे मुंह से ठीक उसी समय कोई बढिया बात निकलने वाली होती है पर बलगम के लोथडे में उलझकर रह जाती है ! ऎसे में हम मुंह खोलते हैं तो बस वही लिसलिसे थक्के बेकाबू होकर बाहर निकला चाहते हैं ! अब सडक उडक पे चलते हुए किसी मैदान के बेंच पर बैठे हुए ,किसी जलसे में शिरकत करते हुए हमारा मुंह भर आए तो फोंकने कहां जाऎं ? लिहाजा हमें ये स्वाभाविक कर्म वहीं अंजाम देना पडता है ! अब इससे आपको बदमज़गी हो या आपका पैर उसपर पड जाए या फिर उसकी झींटें उडकर आपपर आ पडें तो इसमें हमारा क्या कुसूर !

आप हमपे नैतिकता न थोपें ! इस तरह सडकें चौराहे और पार्क रंग देने से हमारा दिल हलका होता है ! सुकून मिलता है ! हम तो उगलेंगे  ..दूसरों का दामन ,घर या सार्वजनिक सडक की सफाई का हमने क्या ठेका लिया हुआ है ! हम भोले- भाले हैं दिल के साफ हैं भावुक हैं बेबाक हैं नंग धडंग हैं  ! आप सब अपनी आंखों ,नाक कान सबको बंद रखने के लिए आजाद हैं ! हम अपनी थूक पेशाब ट्ट्टी जैसी स्वाभाविकताओं को लेकर शर्म नहीं मानते !  अगर आप अपनी सहज क्रियाओं को भी अकेले में करने का मौका देखने वाले बेचारे बने रहेंगे तब तो आप जरूर समझ लेंगे लोकतंत्र का मतलब !

अब हम सबसे मारे हुए , सीने में जहां भर का दर्द लिए हुए जमीनी लोग हैं ! इसलिए सबसे ज़्यादा बीमार रहते हैं और इसलिए हमारे  सीने में इमोशंस ,ईमानदारी शराफत हो न हो बेशुमार बलगम जरूर भरी रहती है जिसे उगल उगलकर हम दिल का बोझ हलका करते फिरते हैं ...! गले में उफनती पीक थूक मवाद सटकना हमारी नज़र से बेचारगी है सरजी !  और हां..इस बहाने आप हमसे खौफ भी तो खाऎगे  ! आप अपने कपडे अपना चेहरा बचाऎगे हमसे ! हम पूरा ज़ोर लगाकर थूकेंगे गली मोहल्ले पटे होंगे इस थूक की पिच पिच से ! आप पैर रखते हय हाय करेंगे  ! हो सकता है आपका जी मितलाए और आप कसम खाऎं कि आप दोबारा घर से बाहर कदम नहीं रखॆंग़े ! तो सरजी थूकने पीकने लिए ही तो भारतीय सडकें बनीं हैं आप अपने लिए तलाश क्यों नहीं लेते एक साफ सुथरी सडक या फिर पटरी ..?

  तो सरजी हनने तो डिसाइड किया है कि हमारी बिलबिलाते रोगाणुओं से लबालब लेसदार मोटी बलगम की पिचकारियां पच्च पच्च कररेंगी ही ! हमारी मर्दानगी, आज़ादी ,लोकतंत्र और बलगम के लोथडे उगलना -उडाना ....हमें तो सब एक सा ही लगता है जी !!

Thursday, February 07, 2008

कह लूं ज़रा दर्द आधी धरती का

दुनिया आधी है अधूरी है ! पूरी क्यों नहीं है का सवाल भी मेरा है और पूरी कैसे हो की सारी छटपटाहट भी मेरी है ! क्या आधी दुनिया में सिर्फ पानी है और बाकी की आधी दुनिया बनी है चट्टानों की बेलौस ताकत से, कैक्टसों शानदार अनगढता से ! बाकी की आधी दुनिया  क्या पाने को छटपटा रही है ?

वो हाट लगा के बैठे हैं मेरी छटपटाहट का ! यहां मेरा दर्द भी बिकेगा और मेरे दर्द की कहानी भी ! क्या करुं ?

मुझे नहीं होना चट्टान नही होना है कैक्टस ! तो क्या होना है मुझे ? मुझे सोच लेना होगा वरना वह सोच लेगा कि मैं क्या होना चाहती हूं ! देखो न वह मेरे दर्द से मतवाला हुआ जा रहा है ! वो कहता है कि वो जानता है मेरे मन को ...उसकी एक एक परत को उघाड लेना चाहता है वह ताकि वह रच सके कोई गीत !

मैं उसकी कहानी की नायिका हूं ! वही नायिका जिसे वह दर्द भी देता है और दवा भी देता है खुद ही ! वह मदमाता है कि वह कंटीला कैक्टस है और वह कहता है कि हे प्रिय तुम फूल हो फूल ही रहो !  वह मेरे पुष्पत्व का अकेला माली और रखवाला ! उसकी चट्टानता और उसकी महानता से दुनिया के सहमे हुए जलस्रोत खुद को अंजुली का पानी समझ रहे हैं ! वह मेरा दर्द मेरे अनगढ शब्दों में मुझसे नहीं सुन पाता पर मेरे दर्द पर लिखे गीतों किस्सों में खूब मन रमा पाता है !

मैं सिलसिलेवार नहीं , मैं कथाकार नहीं ! कैद है मेरी हंसी , मेरा दर्द , मेरा सपना तुम्हारी तिजोरी में ! तुम रचते हो ,पिरोते हो करीने से मेरे इस कैदी स्व को और सुनाते हो मुझी को ! कहते हो हे प्रिये ! पीडा का सृजन, सृजन की पीडा सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए ..

..मैं खामोश हूं अभी ....वहां ठीक उस चट्टान की तली से बह रहा है पानी.....

Saturday, February 02, 2008

मेरा उलझा फेमेनिज़्म और चुगली करती गोल रोटियां

क्या कभी कोई स्त्री खुद से यह सवाल पूछ्ती होगी कि अगर उसे दोबारा मौका मिले तो वह स्त्री ही होना चाहेगी ? पता नहीं ऎसा बेतुका प्रसंगहीन सवाल क्योंकर मेरे मन में उठता रहता है मैं अपना मन इसमें नहीं उलझाना चाहती पर कभी लगता है कि इसका कोई ठीक ठीक तार्किक जवाब ढूंढ ही लूं ! 

मुझे हमेशा से गोल रोटी बेलने से सख्त चिढ रही है और मैंने कभी कायदे से घर गृहस्थी के काम करना नहीं सीखा ! कभी कभी अपने इस खस्ता हाल से कुंठा होती है तो कभी यह किसी तमगे से कम नहीं लगता ! कभी लगता है मैं एक कंफ्यूज्ड स्त्री हूं जो अपनी जिम्मेदारियों में मन नहीं लगाती !कामकाजी हूं ! सो फुर्तीली और अपटूडेट बने रहने का प्रयास जरूर करती हूं ! मेरे कुलीग्स जब मेरी इस पर्स्नेलिटी की तारीफ करते हैं तो सोचती हूं कि काश मैं इन वाहवाहियों को पसंद कर पाती ,पर जानती हूं कि स्त्री को उसकी  अच्छी सामाजिक छवि का चक्कर महंगा भी पड सकता है ! मैं जानती हूं कि यह एक ट्रैप है ! मैं किसी भी छवि के ट्रैप में फंस जाने से डरती हूं ! मैं अपने आसपास ऎसी औरतों को बहुत हैरत से देखती हूँ जो यह दावा करती हैं कि वे एक बहुत सफल कुक ,ट्यूटर , मां ,पत्नी , मेजबान और बेहद जागरूक कामकाजी महिला हैं!   अचानक अपने स्त्रीत्व पर उठता प्रश्नवाचक चिह्न दिखाई देने लगता है !  मै सोचती हूं कि जब मैं प्रसव पीडा सह सकती हूं तो ये अच्छी स्त्री वाली छवि की पीडा से क्यों डरती हूं !

सडक पर अकेले चलना ,चलते जाना बिना किसी वजह के ! या कि फिर सडक पर चलते रुक कर किसी ऊंची शाख या बनते बिगडते बादलों के झुंड को देखना है मुझे ! पर नहीं अचानक लगता है कई आँखें देख रही हैं ! सडक पर चलते रिक्शे वालों , खोमचे वालों गुजरती कारों में बैठे लोंगों की कई जोडी आंखों का मैं लक्ष्य बन सकती हूं ! मैं बडी गुस्सैल ,बददिमाग और अडियल हूं !  कामकाज के माहौल के हर मुद्दे में अपनी टांग अडाती रहती हूं ! जबकि अक्सर कई कुलीग्स गोलमोल लहजे में मेरी इस गंदी आदत के बारे मॆं चिंतित होते हैं क्योंकि उनका मानना हैं कि कम उम्र की बाल बच्चॉं वाली औरतों को पंगों में नहीं पड़ना चाहिए ! मैं गालीबाज हूं पर वे कहते हैं -"अगर गाली देने का इतना ही शौक है तो साला या उल्लू का पट्ठा भी कोई गाली है थोडा और आगे बढो "! वे एक फार्वड ,बेलौस, वाचाल औरत के साथ मानकर चलते है कि इसके कंधे पर हाथ रखकर बतियाने जैसी उनकी हरकतें तो बहुत जायज हैं !

खैर ..जाने दें ! मेरा यह खिचडी आत्मालाप बोझिल हो रहा होगा आपके लिए ! यदि दोबारा मौका मिले तो मैं स्त्री ही होना चाहूंगी का जबाव ..उफ ..फिर कभी ! पर इतना तो है कि अब आपको अपनी पत्नी बहुत सुघड़, सुलझी हुई संस्कारी ,कर्तव्यशीला स्त्री लग रही होगी ! आप तो अपना टिफिन खोलिए गोल रोटियों को खाने का लुत्फ उठाइए !  आपके द्वारा खाई जा रहीं रोटियों का आकार आपके दांपत्य संबंधों की चुगली तो नहीं कर रहा है ....!

Wednesday, January 16, 2008

बटरफ्लाईज़ : डू दे फ्लाई ?

नाम : अनुज चौधरी ! उम्र : 20 साल ! पेशा :  दिल्ली में एक मंत्री के यहां अटेंडेंट ! जी मैं बात कर रही हूं अपने कॉलेज के प्रथम वर्ष के एक छात्र की ! दुबले पतले चमकती आंखों वाले इस छात्र को पढाते हुए उसे हमेशा हंसते- मुस्कुराते और पढाई में मन लगाते देखा है ! अक्सर हम प्राध्यापक लोग अपने छात्रों  की निजी जिंदगी की तकलीफों से अनजान रहते हैं !सो मैं भी उसे बाकी सभी छात्रों में से एक समझती रही ! पर कल उससे हुई बातचीत में मुझे उसकी जिंदगी की कडवी सच्चाइयों का पता चला ! मैं हतप्रभ हूं , गौरवांवित हूं कि मुझे एक बेहद जुझारू बहादुर बच्चे को पढाने का अवसर मिला है ! अनुज के माता पिता जब गुजरे तब वह मात्र 8 साल का था ! चाचा -चाची के अत्याचार से तंग आकर वह घर से भाग निकला और एक ट्रक  ड्राइवर के हाथ लग गया ! ड्राइवर ने उसे बम्बई पहुंचा दिया जहां एक होटल में बर्तन मांजने का काम उसने किया ! महज 8 साल का बच्चा वहां सॆ भी भाग निकला और दिल्ली पहुंचा दिया गया ! दिल्ली के एक मंदिर के बाहर रहते हुए अनुज को एक एन जी ओ बटरफ्लाईज़ ने गोद लिया .पाला और पढाया !

अनुज अपनी जिंदगी की कहानी ऎसे सुनाता है मानो किसी और की कहानी हो ! वह अपना वृत्तांत सुनाते हुए ज़रा भी जज़्बाती नहीं हुआ पर उसकी कहानी सुनते हुए मैं जज़्बाती हो गई ! बटरफ्लाईज़ में रहते हुए उसकी जिंदगी कैसी रही वह मुझे फिर कभी सुनाएगा ! पर उसने समाज सेवा के नाम पर भारी सरकारी अनुदान लेने वाली इन संस्थाओं की राजनीति और भ्रष्टाचार को नजदीक से न केवल देखा है बल्कि विरोध भी किया है ! इसी विरोध की वजह से उसे इस एन. जी. ओ. से निकाल बाहर किया गया था और उसे यह नौकरी करनी पडी !

आज अनुज खुश है कि वह बी.ए. कर रहा है ! आज वह सडक पर नहीं है !पर वह सडक पर रहने वाले बच्चों की जिंदगियों से बहुत गहरे जुडा हुआ है ! सडक पर रहकर मजदूरी कर जीने वाले तमाम बच्चों की दुर्दशा की कहानियां वह आपको सुना सकता है, उनकी जिंदगी को संवारने के लिए क्या हो यह बता सकता है ! आज वह इतना परिपक्व हो गया है कि एक बाल मजदूरों की दमित आवाज को आप तक पहुंचाना चाहता है ! इसके लिए उसने एक पेपर मैगज़ीन निकाली है -"बाल मजदूर की आवाज़ " ! अपनी इस मासिक पत्रिका के संपादकीय में उसने बटर्फ्लाईज़ की संस्थापक के प्रति नाराज़गी ज़ाहिर की है और सडक पर सोने वाले बाल मजदूरों के शारीरिक शोषण और   उनके अनुभवों को भी दर्ज किया है !

कल से अनुज का हंसता - चमकता चेहरा मेरी आंखों के सामने घूम रहा है ! न जाने इन 3 सालों में उसे पढाते हुए मुझे उससे क्या-क्या सीखने को मिल जाए ! प्रिय अनुज ! तुम्हारी जिजीविषा को तुम्हारी इस टीचर का शत शत नमन !!

Wednesday, January 09, 2008

पाठशाला भंग कर दो....

बहुत साल पहले मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग से बी.एड. किया था ! एक पर्चे के रूप में प्राइमरी एजुकेशन का भी अध्ययन करन था ! हमारे एक अध्यापक हमेशा कहा करते थे कि छोटे बच्चों को केवल वही पढाए जो स्वयं शिशु-हृदय हो ,जिसे बच्चों से प्रेम हो और जो बच्चों का समाजीकरण करने की प्रक्रिया में उनकी विशिष्टताओं को चोट न पहुंचाए ! पता नहीं तब पढ़ाया जा रहा सबक कितना समझ आता था और मैं स्वयं अपनी प्राइमरी कक्षाओं में शिक्षण अभ्यास करते हुए उन सबकों को कितना लागू कर पाती थी , पर आज जरूर मैं तहेदिल से यह महसूस करती हूं कि मैं अपने बच्चों के साथ पूरा न्याय नहीं कर रही हूं ! एक मां हो जाने के बाद बच्चों की दुनिया को ज्यादा नजदीक से देख और समझ पा रही हूं शायद ! अपने परिचितों में भी ज्यादातर का लेना देना इस या उस जरिये से शिक्षण से ही है ! सो अक्सर बच्चों की , उनके स्कूलों की , स्कूलों में अध्यापकों की हालत पर चर्चा -विवाद उठ खडे होते हैं और हम पाते हैं कि हम स्वयं शिक्षा से जुडे होने के बावजूद बच्चों को एक बेहतर शैक्षिक वातावरण नहीं दे पा रहे हैं ! हम शर्मिंदा हैं !
हमने अपने बच्चों को समाजीकृत होने के लिए कैसा माहौल दिया है यह समझने के लिए हममें से किसी को बहुत दूर देखने की जरूरत नहीं है ! अपने घर या पास के किसी भी बच्चे की जिंदगी को देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति इन नन्हों से सहानुभूति महसूस करेगा ! अपने बेटे को 3 साल की उम्र में मैंने स्कूल भेजना शुरू किया था ! अपने बहुत एक्टिव, बहुत नटखट और खुशमिजाज और स्पष्ट भाषिक अभिव्यक्ति करने वाले बेटे को स्कूल के हवाले करते हुए दिल बैठता था ! उसने अपनी टीचर की सिखाई हुई पहली कविता सीखी -'मम्मी डार्लिंग पापा डार्लिंग , आई लव यू , सी योर बेबी डांसिंग जस्ट फार यू " पर कक्षा में सुनाते हुए उसने कविता में अपनी ओर से दो पंक्तिया जोड दीं थी- मासी डार्लिंग ,नानी डार्लिंग..... ' ! शिक्षाशास्त्र जिस रचनात्मकता की पैरवी करता है वह यहां भरपूर थी पर शिक्षा के सिद्दांतों को लागू करने वाले तंत्र के लिए ये चिंताजनक हालात थे ! बच्चे की सृजनात्मकता और विषिष्टता को इस तंत्र के अनुसार इसलिए खत्म हो जाना चाहिए क्योंकि वह तंत्र यह मानता है उसका काम सभी बालकों को सामान्यीकृत कर देना है ! यह समाजीकरण करने वाला तंत्र बच्चों की रचनात्मकता और खास योग्यताओं को जिस बेरहमी से दमित करता है उससे साफ हो जाता है कि इस तंत्र {जिसमें कभी- कभी अभिभावक भी शामिल होते हैं} का उद्देश्य एक भीड का निर्माण करना है , एक संवेदनक्षम ,रचनात्मक मेधा से भरपूर मनुष्य नहीं ! एक आम अभिभावक अपने बच्चे की खासियत को न तो समझता है और न ही उसके स्कूल से ऎसी कोई अपेक्षा रखता है ! सो हम सब अपने बच्चों के व्यक्तित्व को हिंदी -इंगलिश ,मेथ्स ,साइंस के पीरियडों में बांट कर खींचतान कर उन्हें बडों की दुनिया के लायक बनाने में जुटे हैं....! कक्षाओं के बंद कमरों में नीरस केन्द्रीकृत शिक्षा देने वाला ,एक घंटी से दूसरी घंटी तक का समय - बस केवल यही सच है हमारे बच्चों की जिंदगियों का !

अपने आसपास के बच्चों की बातों में स्कूल को लेकर ऊब, डर, निराशा और तनाव का स्वर आपने भी अक्सर सुना होगा !मेरे एक दोस्त की5 साल की बेटी एक दिन अचानक ऊबकर बोली - कितना गंदा है आसमान जो रात को अचानक सुबह बना देता है और मुझे स्कूल जाना पडता है ! मेरा बच्चा कभी कभी यह कहता है कि - मम्मी ये दुनिया बच्चों के लिए नहीं बनी है यहां सब कुछ बडों जैसा है बच्चों की एक अलग दुनिया होनी चाहिए- या फिर यह है कि मैं सारे स्कूलों की दीवारों को मार मारकर तोड दूंगा - तब तब मेरा मन कह उठता है कि वाकई.... पाठशाला भंग कर दो ..!

Friday, November 16, 2007

न बुझे है किसी जल से ये जलन....

सब चुप ...कविजन -चिंतक -शिल्पकार क्या सब चुप हैं ! नहीं नहीं सब बोल रहे हैं ! जलती आग में जलते झोपडों को सब देख ही तो रहे हैं और बोल भी तो रहे हैं ! बुद्धदेव- युद्धदेव- क्रुद्धदेव हवन में समिधा डाल रहे हैं  लधुकाय दीन खडा है भीमकाय के सामने ! शांति - क्रांति - भ्रांति का गायन  हो रहा है ! स्वाहा - स्वाहा के दिशा भेदी मंत्रोच्चार में आर्तजन का हाहाकार मलिन पड रहा है ! लो किन्नरों के दल के दल मतवाला नाच कर रहे हैं ...!

वे करबद्ध खडे हैं.. अनेकों अनेकों जिह्वाहीन जन !  जीवन कितना और कितनी मृत्यु ...?  अब जीवन की गुणवत्ता के प्रश्न उन्हें छोटे लग रहे हैं ! ग्राम खेत घर यहां तक कुंए तक में लग गाई आग ! आग सिर्फ उन्हें ही जलाएगी ! इस आग की लपटॆं नहीं जलाऎगी भीमकाय यज्ञ नियंता को नहीं जलाऎगी ये हमारी थुलथुली कविता को..... न हमारे लंपट विमर्श को !

उजडे बिखरे लोग ही लोग ! हमारे दरवाजे पर ऎन सुबह पडे अखबार पर क्रंदन करते चेहरे !हम गिन रहे हैं कितने हैं मौत की तालिका को मिले अंक ! एक घटा दो या एक बढा दो क्या अंतर पडता है ...? अखबार अखबार ही रहेगा और दरवाजे के बाद उसे मेज या पलंग पर आना है !

जी ठीक कहा.. मसला सुलझ रहा है! तब तक कविता रचो नेता के कंधे पर बिलखते लाचार चेहरे फिल्माओ ,मौत की गिनती दुरुस्त करो  ! पिछ्ली बार उसका दोष था ..इस बार इसका दोष है.....

ओह उधर आग लग गई  और वो .. उधर गोली चल गई ....लहू बह रहा है मिट्टी पर ! पता नहीं किसका पर उनके जूते खराब हो रहे हैं ! हां ये वही जूते हैं घोडे की नाल ठुके ,लोकराज की चमडी से बने ! पर कोई गम नहीं.. सत्ता के दरवाजे पर बिछे कालीन पोंछ देंगे न जूतों पर लगा लहू...!

पानी के कटोरों सरीखी कई जोडी आंखॆं देख रही हैं हमारी ओर ! देखो हम धिक्कार रहे हैं भीमकाय ,नाल ठुके जूतेधारी को...!..... वो साला बर्बर है...लोकतंत्र का हत्यारा है....महा अमानवीय है ....नरपशु है.......सत्ता का जोंक है......नाश हो सत्यानाशी का...

........बस  बस बस ..अब हमारी गालियां चुक रही है.... ..हमारी जबान पथरा रही है...... जल रही है ..... कहीं जल नहीं है !... है तो बस सिकती- धधकती हुई रेत  और उसमें धू धू कर जलता मानव......!

Sunday, October 28, 2007

ओ$म सुपर सेक्सी कालाय नम:

आज जमाना सुपर फास्ट हो गया है ! जब से हमने उस सुप्रीम पावर वाले भगवान की सुपीरियोरिटी के भगोने में छिद्र कर दिया है तब से हम सुपर उन्मुक्त हो चले हैं ! सुपर बाजार से सामान खरीदते हैं , सुपर सफेद कपडे पहनते हैं ,सुपर्ब सुपर्ब कहकर अपने सौंदर्यबोध को जाहिर करते हैं ! अब किसी हिंदी फिंदी वाले से मत पूछ लिया जाए कि भैया मतलब समझत हो स्सुपर का ! बेचारा वह अपने सुपर साहित्यिक लहजे मॆं हडबडिया सुपरफिशियल जवाब दे डालेगा _सुपर माने सुन्दर पर !हे हे !! इस सुपर सांइंटिफिक जमाने  में ऎसे सुपर बेकवर्ड को कोई तो उबारो रे ! खैर हम तो कह यह रहे थे कि भैया आजकल सुपर सेल मॆं कुछ भी माल लगा दो और बेचो _बस ये ध्यान रखो कि माल के सुपर एट्रेक्टिव कवर पर सुपर लफ्ज जरूर लगा हो !

अब आजकल के गानों को ही देख लो ! हर सुपर सेड्यूसिव गाने मॆं सुपर सेक्सी नायक नायिका गण गा रहे होंगे "आय एम सुपर सेक्सी , य़ू आर सुपर सेक्सी " ! अब सेक्स भी सुपर की गारंटी के पैकेज में है जिससे मिले सुपर सेटिस्फेक्शन ! सेटिस्फेक्शन जो सुपर बाजार से सुपर शापिंग करने या सुपर रिन की चमकार मारते कपडों को पहनने के समतुल्य ही है ! ये वो सेटिस्फेक्शन है जो सुपर सेक्स काड्यूट गाते नायक नायिका वृंद से इतर हर दर्शक के सुपर कांप्लेक्सिटीज से भरे मन की आकुल व्याकुल पुकार है ! हर उघडी नायिका सुपर डांस के सुपर एक्टेव झटके मारती कह रही है सिर्फ मुझे ही पाओ क्योंकि मैं ही हूं सुपर सेक्सी !वात्स्यान मुंह सिकोडे खडे हैं रीतिकाल के कविगण अपने कथित अश्लील काव्य को सुच्चा साबित कर पा रहे हैं ! वहां सब कुछ शास्त्रीय था - पर नायक का परनायिका से प्रेममिलन या संभोग रस की कोटि का गायन ! ये सुपर कॉंवेश्नल काल बीत चुका ! अब जमान है हर गली मॆं सुपर सेक्स और सुपर सेक्सी की धूम का !  सुपर सेक्स का रसाभास करो और इस नाम की भूतनी या भूत से डसे जाओ ! अब सब कुछ सुपर हॉट है !  मौका हो हो या सेल हो गाना हो या खेल हो सब कुछ है सुपर सिजलिंग ! 

बाजार रूपी थाली में हरएक के लिए खास तौर पर सजा अर्ध्य _ 'भागो और भोग लो!   " कर्म का भोग भोग का कर्म "-  ये कौन बोला रे ? अब बोलो- भागकर भोग कर लो कर्म करो तो सिर्फ भोग का !  ओ सुपर सेक्सी युग के  सुपर नॉटी  बालक-बालिकाओ !! गांठ बांध लो सुपर टाइट क्यॉकि यही है आज का सुपर मंत्रा !!बोलो ओ$म सुपर सेक्सी कलाय नम: ..!!'

!

Saturday, October 27, 2007

अगर मुन्नी न हो तो?

मुन्नी मेरी बेटी या पास पडोस की किसी साफ सुथरी सी राज दुलारी का नाम नहीं है यह नाम है मेरे घर में काम करने वाली पन्द्रह सोलह साल की लडकी का ! मुन्नी अपने बहुत  काले रंग की आलोचना बहुत बेरहमी से करती है ! अपने खुरदरे हाथों बिवाइयों से भरे पैरों की ओर देखकर अक्सर हंसती हुई कहती है "वाह क्या किस्मत देकर भेजा है भगवान ने हमें " पर अगले ही पल कहने लगती है "पर भाभी दुनिया में सभी तो परेशान हैं ! पैसे वाले तो और भी ज्यादा हर समय डरते हैं मोटापे से ,गंदगी से कामवाली के छुट्टी कर लेने से -अजीब अजीब चीजों से परेशान रहते हैं "!  मुन्नी के जीवन दर्शन के आगे मैं अपनी थकावट और वक्त की कमी से हुई झंझलाहट को बहुत थुलथुली महसूस करने लगती हूं !मुन्नी महीने में सिर्फ चार दिन नहीं आती है! छुट्टी करने से पहले ही वह हर घर में बता देती है ! पर एक दो घरों में वह छुट्टी के दिन भी आकर कामकर जाती है! जब मैंने पूछा कि वह ऎसा क्यों करती है तो उसने बताया कि इससे उसे महीने के चार सौ रुपये और मिल जाते हैं ये उसके अपने होते हैं इसे मां को नहीं देना होता ..!  

मुन्नी हर सुबह अपनी मां के साथ ठीक 6 बजे आ जाती है !मां बेटी मिलकर कई घर निपटाते हैं _सफाई ,बरतन और कपडों की धुलाई ,गमलों को पानी देने ,फ्रिज साफ करने जैसे कई काम निपटाती हुई शाम को 7 बजे तक घर जाती है !मुन्नी के पिता दिनभर सोसाइटी के बाहर रिक्शा लेकर खडे रहते हैं और सोसाइटी की महिलाओं को आसपास के बाजारों तक पहुंचाने का काम करते हैं ! मुन्नी कई घरेलू महिलाओं के घरों का काम करती है !  मुन्नी अक्सर बुडबुडाती हुई काम करती है "फलां नंबर वाली आंटी मुझे नाश्ता क्या करा देती हैं अपमना गुलाम ही समझने लगती हैं ,जब चाहे बुला लेती हैं फालतू काम कराती हैं ! पर भाभी मैं मना नहीं कर पाती क्योंकि एक बार मेरे पेट में दर्द हुआ था तो उन्होंने अपने पैसो से इलाज कराया था अल्ट्रासाउंद के पैसे भी लगाए मुझपर.." !

मुन्नी अक्सर हंसती रहती है ! वह अखबार की सनसनीखेज खबरों पर बातें करते हुए झटपट काम निपटाती चलती है ! फिल्मों पर खासकर हाल ही में देखी फिल्म के सामाजिक संदेश पर अपनी राय देती बरतनों की जूठन हटाती चलती है ! वह अक्सर थकी होती है पर जब मेरी हडबडी और व्यस्तता और थकावट देखती है तो फौरन  आराम करने या दवा ले लेने की सलाह दे डालती है !मुझे पता है ,उसे भी पता है कि उसके एक दिन न आने पर मेरी दिनचर्या बुरी तरह प्रभावित हो जाती है -अखबार अधपढी रह जाती है या फिर कॉलेज के लिए क्लास की तैयारी पूरी नहीं हो पाती है या नेट देवता और ब्लॉग देवता के दर्शन तक नहीं हो पाते हैं या किसी एक वक्त का खाना खाने के लिए आसपास के भोजनालयों का मैन्यू टटोलना पडता है !   

कभी कभी मैं सोचती हूं कि अगर वह और अधिक समझदार हो गई तो धीरे धीरे वह समझने लगेगी कि बौद्दिक ,रचनाशील ,क्रंतिकारी और संधर्षशील स्त्रियों के इस समस्त कुनबे के बने रहने में उसका कितना हाथ है !

अक्सर वह मुझे कंप्यूटर पर काम करते देखती है और अक्सर जानना चाहती है कि मैं कंप्यूटर पर क्या करती रहती हूं !  सो पिछ्ले दिनों  मैंने उसे अपना ब्लॉग दिखाया और अपने काम के बारे में बताया ! उसने तारीफ के भाव से ब्लॉग को देखा , ब्लॉग पर लगी मेरी फोटो को सराहा ! फिर उसने बहुत रहस्य भरे लहजे में बताया कि उसका बडा भाई भी काफी समय से कंप्यूटर की एक दुकान पर काम कर रहा है और कंप्यूटर  काफी कुछ सीख चुका है ! उसकी आंखों में चमक और आवाज में उमंग थी वह बोली -"  भाभी मैं भी अपने भाई से कहकर अपनी फोटो कंप्यूटर पर लगवाउंगी ताकि मुझे भी दुनिया देख सके जैसे आपको देखती है पर क्या लिखूंगी कैसे लिखूंगी  ये नहीं पता ........."! मुन्नी काफी देर गहरी सोच में डूबी रही ......मेरे मन ने कहा कि मुन्नी जो तुम कह सकती हो वह मैं नहीं इसलिए तुम लिखो... .....मुन्नी ने अभी तक नहीं लिखा है पर मैंने लिख दिया है ...उसके बारे में !मैं अक्सर सोचती हूं कि अगर मुन्नी न हो तो.....?

Wednesday, October 24, 2007

क्या है जिंदगी क्या हो जिंदगी

जिंदगी कितनी एब्सर्ड हो चली है इसका अंदाजा कभी कभी ही लग पाता है ! नौकरी की भागमभाग ,सडकों का ट्रेफिक ,संबधों की उलझन ,भविष्य की चिंता ,पानी बिजली फोन के बिलों , बच्चों की पढाई और भी सैकडों कामों- तनावों -हडबडियों के बीच जीते हम ! वक्त पैसा और लगन की त्रयी के बिना कहां हो पाता है जीवन रूपी नाटक का एक भी अंक पूरा ! हम रोज सोचते हैं कि शायद आज का ही दिन ऎसी हडबडी और रेलमपेल का आखिरी दिन था -कल तो जरूर सुकून का दिन आएगा और हम अपने अधूरे छूट गए कामों को कर पाऎगें ! पर ऎसा सुकून का दिन तलाशना एक दिवास्वप्न सा लगने लगता लगता है ! तारे गिनने , उगते सूरज को देखने ,बादलों की बनती संवरती छवियों को निहारते चले जाने या कि खुद से बात करने के बीच शोर है बाजार है, घडी है , गाडियां और बिल्डिंगें हैं !

इस मोबाइल जीवी युग के प्रणेता हम लाभ-हानि, कर्म-अकर्म , अहमन्यता-सामाजिकता का व्याकरण बिना चूके रट लेना चाहते हैं ! मैं- मेरा -मुझे की लगन मॆं डूबा मन बाजार को अपना सबसे बडा हितैषी गुरू मानता है !  गडबडी ,जल्दबाजी ,ठेलमठाली के मंत्र के बिना भी क्या श्हर में रहा जा सकता है ?यहां हमेशा बेहतर चुनाव करना होता है ! यहां के गणित को हमेशा अन्यों से अधिक गहराई से समझते रहना होता है ! यहां प्रगति और विकास के व्यक्तिगत पाठों को लगातार पढते चलना होता है ! यहां समाज ,सामाजिकता ,सामाजिक नैतिकता , सामाजिक निष्ठा जैसे आउटडेटिड लफ्जों पर सिर्फ हंसना होता है ! जयशंकर प्रसाद की इडा का हर तरफ बोलबाला है ..कहां है श्रद्धा ? नहीं श्रद्धा को ढूंढना बेमानी है ! वह हमारे भीतर ही तो है ! पर हम नहीं सुनेंगे उसकी आवाज ,क्योंकि वह जो कुछ कहेगी उसे हम बहुत अच्छे से वाकिफ हैं पर वह वाकिफ नहीं इस सच से कि हम ट्रैप्ड हैं जिस सांस्कृतिक दुष्चक्र में वहां केवल वही सर्वाइव करेगा जो सबसे ज्यादा निष्ठुर होगा  ! श्रद्धा !! तुम्हारी आवाज सुनने के लिए जो दो पल ठहरे तो कुचले जाऎगे पीछे आने वाली भीड के पैरों तले..!

तो आज हमारे पास  बहाने हैं, वाजिब कारण हैं ,लधुता का बोध है , जिनके आगे हम लाचार हैं ! सो वही केवल वही कर पा  रहे हैं जिससे कि केवल जीवन चलता रहे सकुशल ! कोई बडा सपना कोई बडा संघर्ष ,कोई बडा जज्बा नहीं जिसके लिए हमारे भीतर बची रह गई हो थोडी निष्ठा ,थोडा सा समर्पण ..! क्या हम कभी नहीं चुन पाऎगे अपनी पसंद की हवा ..सांस लेने के लिए और क्या अब हम कभी नहीं महसूस पाऎगे अपने खंडित व्यक्तित्व को....!

जिंदगी की इस एब्सर्ड एकांकी का कोई तो सार्थक, ओजमय ,कर्ममय निष्कर्ष पाना होगा ...!!

Thursday, October 04, 2007

दिल दोस्ती ऎट्सेक्ट्रा ..वाया सेक्स दुश्मनी ऎट्सेक्ट्रा...

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"क्या तुम एक ही दिन में तीन लडकियों से कर सकते हो "--

-प्रकाश झा की फिल्म दिल दोस्ती ऎटसेक्ट्रा के पात्र संजय मिश्रा के द्वारा अपने मूल्य विभ्रमित जूनियर अपूर्व से पूछे गए इस सवाल से फिल्म शुरू होती है!

यह फिल्म दिल्ली युनिवर्सिटी की पृष्टभूमि में आज के नवयुवा की जिंदगी के पहलुओं को दिखाने का प्रयास है ! फिल्म में होस्टल लाइफ की उन्मुक्तता , भारतीय युवा की नव -अर्जित सेक्स फ्रीडम ,विश्वविद्यालयी राजनीति ,दोस्ती कुंठा सब कुछ है ! ये वह माहौल है जहां भारतीय युवा अपने क्लास कांसेप्ट से जूझने के दौरान अपने लिए किसी रास्ते की तलाश में जुटे हैं !  फिल्मकार ने दिल्ली के नवधनाढय और धनाढय तथा बिहार से आए छात्रों के बहाने आधुनिक भारतीय समाज की वर्ग संरचना और मूल्य संघर्ष को दिखाया है ! 

यह फिल्म अपनी बनावट में बहुत बडें लक्ष्‍य को लेकर नहीं चली है ! किसी भी पात्र से बहुत आदर्शात्मकता की dil2उम्मीद नहीं की गई है !  फिल्म की संवेदना को उभारने के लिए कोई बडा प्रतीक नहीं उठाया गया है ! अपूर्व और संजय मिश्रा इन दो चरित्रों के विपरीत जीवन दृष्टिकोणों के फिल्माकंन के बहुत सामान्य पर बहुत सटीक तरीके अपनाए हैं फिल्मकार ने !

अपूर्व अपने हाइक्लास पिता से पैसा लेकर कोठे पर जाता है ! वह कहता है कि   - "मेरे लिए कॉलेज और कोठे में फर्क करना मुश्किल हो गया है "  ! वह वैशाली नाम की वेश्या से जिस संबंध में स्वयं को पाता है  उसकी व्याख्या वह नहीं कर पाता है ! न ही स्कूली छात्रा किंतु से सेक्स संबंध स्थापित करने में वह प्यार जैसे किसी मूल्य की जरूरत को मानता है ! वेश्यालय में टंगी भगवान की मूर्ति को मोड कर सेक्स क्रिया में रत होता है जिसपर वेश्या वैशाली को बहुत ताज्जुब होता है !

dil3 संजय मिश्रा अपनी जातीय अस्मिता और अपनी मध्यवर्गीय मूल्य संरचना को संभाले रहने वाला पात्र है ! वह स्वंय को एक अति संपन्न सहपाठिनी प्रियंका से प्रेम और समर्पण की स्थिति में पाता है और अपने इस संबंध अपने भविष्य और लक्ष्‍य को लेकर एकाग्र है ! जबकि प्रियंका अपने पिता के संपर्कों के सहारे मॉडल बनना चाहती है !उसके लिए सेक्स शरीर की जरूरत है न कि कोई प्रेम का प्रतीक या मूल्य ! वह संजय से अपने प्रेम को लेकर श्योर है न ही वह अपने दोस्त अपूर्व से काम संबंध बना लेने को किसी भावना से जोडकर देखती है!

फिल्म अपने ट्रेजिक ऎंड में अपनी इस उत्तरआधुनिक स्थिति को दिखाती भर है - कोई मूल्य निर्णय नहीं थोपती ! संजय मिश्रा के लिए कॉलेज एलेक्शन जीतना प्रेम को समर्पण भाव से करना और कैरियर बनाना है जबकि अपूर्व को संजय के चुनाव के दिन तक तीन लडकियों से संभोग कर लेना है जिसकी शर्त वह अपने दोस्तों से पहले ही लगा चुका है !अपूर्व संभोग करता है संजय की प्रेमिका प्रियंका से ! संजय चुनाव जीतता है- दोस्ती और प्रेम के इस रूप को स्वीकार नहीं कर पाता और मृत्‍यु को प्राप्‍त होता है ! ....

यह फिल्म दो परिस्थितियों की टकराहट है दो वर्गों और उनकी मूल्य दृष्टि की टकराहट है ! यहां दिल प्रेम की वस्तु नहीं दोस्ती निभाने की वस्तु नहीं ! यहां अवसर , शरीर की जरूरत, सेक्स में भोग और दुश्मनी है !

अंतत: संजय नहीं रहता और कोठे पर जाने वाला और एक ही दिन कमें तीन लडकियों से सेक्स करने वाला अपूर्व जीता है और सेक्स और सेक्स मॆं नएपन की तलाश में डांसबारों और पार्टियों में भटकता है !.....

Wednesday, October 03, 2007

मेरी पहचान मुझे लौटा दो ब्‍लॉगवालो

ब्‍लॉगिंग की दुनिया के डाइनासोर तो नहीं हैं हम, पर एकदम नए भी नहीं रहे। साल भर होने को आया। बड़ा तो नहीं है पर गलतफहमी पाले रहते हैं कि छोटा सा नाम तो है ही। ब्‍लॉग शोधार्थी हैं, ब्‍लॉगर भी। पर एकाएक गड़बड़ हो गई लगता है। गड़बड़ यह है कि हमारा नाम चोरी हो गया है। साफ साफ समझाया जाए-

ये नारद पर नीलिमा की लिखी पोस्‍टों के लिए कैप्‍चर्ड छवि देखें-

name swap

देखा आपने ये हमारी तस्‍वीर जिन पोस्‍टों के साथ दिख रही है वे हमने नहीं लिखीं वे तो एक अन्‍य ब्‍लॉगर साथी  नीलिमा सुखिजा अरोरा ने लिखी हैं। ऐसा नहीं है कि केवल नारद से ही यह गड़बड़ हुई, चिट्ठाजगत पर नीलिमा लेखक की प्रविष्टियॉं के लिए छवि ये है-

name chittha

यानि वहॉं भी हम दो नीलिमाओं की पहचान गड्डमड्ड है। यूँ इसमें दोष किसी का नहीं है, सिवाय इस बात के कि तकनीक इन दो नामों से भ्रमित हो रही है। और नारद ने अति उत्‍साह में हमारी तस्‍वीर जो उनके पास हमारे दो ब्‍लागों के कारण पहले से ही थी, नीलिमा सुखिजा जी के ब्‍लॉग को हमारा तीसरा ब्‍लॉग मानकर चस्‍पां कर दी और फिर ईमेल किए जाने पर भी किसी कारण हटा नहीं पाए। इस प्रकरण में हमें वो स्‍कूली दिन याद आए जब एक ही कक्षा में कविता, सीमा जैसे नाम एक ये ज्‍यादा होने पर फर्स्‍ट, सेकेंड कहकर काम चलाते थे पर वो तो यहॉं शायद हो नहीं सकता पर जो हो सकता हो किया जाए पर पहचान के इस घालमेल को खत्‍म करो भई।

Tuesday, September 25, 2007

मुझे कदम कदम पर चौराहे मिलते हैं बाहें फैलाए

रोज कुंआ खोदो और पानी पियो -वाली कहावत का रचयिता हमारी नजरों में अब तक का सबसे बडा दूरदर्शी था जिसने बहुत पहले ही ब्लॉगिंग करने वालों की नियति का बहुत पहले ही अंदाजा लगा लिया था !यहां एक दिन भी नागा कर जाना आपका पेज रैंक गिरा सकता है ,श्रद्धालु पाठकों की भीड का रुख मोड सकता है , धडाधड महाराज की नजरों में आपकी इज्जत का फलूदा बना सकता है ! यहां बडे बडे लिखवैये बिना नागा लिख रहे हैं और हम हैं कि रोज परेशान रहते हैं कि आज क्या लिखॆंगे !बहुत काम का मसला न मिलने पर लगता है कि कम काम के मुद्दों को ही उठा लिया जाए ! हर समय काम के और खूबसूरत मसलों पर लिखना भी जरूरी नहीं है ! कभी कभी दिमाग के तंतुओं को आराम की छूट हम दे देंगे तो छोटे नहीं कहलाने लगेंगे ! क्या लिखॆं ? का जवाब जैसे ही पा लेते हैं क्यों लिखॆं  ? का सवाल सामने लहराने लगता है! क्या लिखॆं का जवाब खोजते हुए इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि बस कुछ भी लिख डालो ! और क्यों लिखें का सवाल हमॆं इन निष्कर्षों पर पहुंचा देता है कि लिखो शायद क्रंति हो जाए ,या कि किसी को आपका लिखा पसंद आ जाए और वह आपकी भाषा में अपने दिल की बात पढ पाए ,या हो सकता है कि आत्मसाक्षात्कार हो जाए ,या फिर कि आज तो बस लिख डालो पेज रैंक तो बच जाएगा -कल देखॆंगे कुछ बढिया सा लिख सके तो .....

ठीक इसी जद्दोजहद की वजह से कभी कभी हमें मुक्तिबोध की कविता "मुझे कदम कदम पर" बिलकुल भी समसामयिक नहीं लगती की लगती जिसमें वे कहते हैं कि आज के लेखक की दिक्कत यह नहीं कि कमी है विषयों की बल्कि विषयों की अधिकता उसे बहुत सताती है और वह सही चुनाव नहीं कर पाता है कि किस पर लिखे ! जब मुक्तिबोध लिखते हैं कि "मुझे कदम पर चौराहे मिलते हैं बाहें फैलाए -एक पैर रखता हूं सौ राहें फूटतीं " तब हम इसमें निहित समसामयिकता तभी देख पाते है जब हम यह मान लेते हैं कि भई यह तो बडे कवियों के लिए कही गई बात है हम छोटे कवियों पर कैसे लागू हो सकती है ! खुद को छोटा लिखवाडी मान लेने पर न कोई बंधन होता है न नैतिक बोझ का दबाव न विषय चयन की समस्या से ही गुजरना पडता है ! सो हम बच जाते हैं ,नागा भी कर पाते हैं महान विषयों पर कलम चलाने के जोखिम की संभावना का तो कोई सवाल ही नहीं उठता !

.... हां ठीक ऎसे में ही कलम चलती है अपनी मर्जी से हमारे भीतर के लेखक के इशारे पर नहीं ! कलम खुद कहती है कहानी बिना लागलपेट के साफगोई से ..! जहां हमारा महान लेखक अपने वजन के तले नहीं दबा पाता कलम को ! जहां कलम हल्की होकर चलती है !जहां कलात्मक मन देख पाता है वे राहें जिनपर अभी हम चले नहीं जो बीहडों से होकर गुजरती हैं और जो शायद बहुत बहुत लंबी हैं कि जिनपर चलते चलते पैरों में उठ आऎ फफोले ..घाव ! पर हम जब भी चलते हैं इन बीहडों से गुजरते रास्तों पार् तो होता है  सत्य सुंदर और शिव का कलात्मक अभिव्यंजन.....शाश्वत अभिव्यंजन...

Thursday, September 20, 2007

जरा हौले हौले चलो मोरे साजना हम भी पीछे हैं तुम्हारे....?

स्त्री का परंपरागत संसार बडा विचित्र भी है और क्रूर भी है -यहां उसकी सुविधा ,अहसासों , सोच  के लिए बहुत कम स्पेस है !गहने कपडे और यहां तक कि वह पांव में क्या पहनेगी में वह अपनी सुविधा को कोई अहमियत देने की बात कभी सोच भी नहीं पाई ! अपने आसपास की लडकियों महिलाओं के पहनावे की तरफ देखते हैं तो उनकी जिंदगी की विडंबना साफ दिखाई देती है ! घर बाजार ऑफिस हर जगह दौडती स्त्री पर भरपूर नजाकत लाने और पर-ध्यान को केन्द्रित करने की पुरजोर आशा में अपने पहनावे को सहूलियत के साथ बहुत बेरहमी से अलग करे दीखती है ! परंपरागत महौल में पली बढी यह स्त्री अपने दर्शन में स्पष्ट होती है --कि उसका जीवन सिर्फ पर सेवा और सबकी आंखों को भली लगने के लिए हुआ है ! छोटी बच्चियां घर- घर , रसोई -रसोई ,पारलर-पारलर खेलकर  इसी सूत्र को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेने की ट्रेनिंग ले रही होती हैं .......ठीक उसी समय जब उसकी उम्र के लडके गन या पिस्तौल से मर्दानगी के पाठ पढ रहे होते हैं या कारों की रेस या बेमतलब की कूद -फांद- लडाई -झगडे के खेल खेल रहे होते हैं  ! एक जगह घर रचा जा रहा है एक जगह बाहर !

कोई कह सकता है कि यही है गहरे संतुलित समाज की नींव ! वेलडिफाइंड ! गाडी के दो पहिए अपनी अपनी पटरी से बंधे ..! हम कहेंगे नहीं नहीं ! सौ बार नहीं ! अपनी कॉलेज की बच्चियों को भी कभी कभी समझाते हैं ! वे नहीं समझना चाहतीं !ज्यादातर निम्न या मध्य वर्गीय परिवारों से आई हुई ये छात्राऎं अपने लिए बेहद असुविधाजनक पहनावे में आती हैं ! गर्मी व उमस में सिंथेटिक कपडे , बेहद ऊंची हील के सैंडल बार बार फिसलते दुपट्टे में जडी तरह तरह की लटकनें ....

कभी कभी आसपास नवविवाहित जोडों को देखने पर भी अजूबा होता है !  रास्तों में बाजारों में काम की जगहों में चमकीले तंग कपडों में फंसी ,पल्ला और उसकी जगह जगह उलझती लटकनें संभालती रंगी पुती  स्त्रियां ! अपने आप संभलकर चल पाने में असमर्थ पति की बाहं का सहारा लिए लिए कभी कभी लुढकने को होती स्त्रियां ! अजीब अजीब प्लेटफार्म वाले सैंडलों की हीक को मेट्रो और उसके प्लेटफार्म की दरार से निकाल कर हडबाडाती स्त्रियां ! अपने फिसलने पल्लू को संभालकर कंधे पर डालते हुए अपने पीछे खडी सवारी के मुंह पर मारती स्त्रियां !

इनके लिए ये नजाकत है ..फिमिनिटी है ..मजबूरी है ...फैशन है ... पता नहीं ! पर इतना तो साफ है कि ये अब घर में बंद सजी धजी घर संवारती घरहाइन नहीं रहीं है ! रीतिकाल भी अब जा चुका ! ये तो निकली हैं पढने.....लडने ...जूझने....! बराबरी  पर आने .. !पर अपने संधर्ष में अपने ही साथ नहीं हैं ये पैरों की हील ,ये पल्लू ,ये लटकन , ये नजाकत ! कहां से आ जाएगी बराबरी ! कैसे चलेगी मर्द को पीछे छोडती ये आगे ! ..क्या यही कहना होगा कि आप जरा धीरे चलें क्योंकि हम आपसे तेज नहीं चल सकतीं या अपनी ही चाल को बनाना होगा दुरुस्त , तेज और दमदार .........तो बदलें खुद को .....? और करें शुरुआत पहनावे से ही .........?  .....और आओ कहें उससे कि तुम चलो अपनी चाल से अपनी गति से और अब हम चलेंगी अपनी चाल और गति से और तुम्हारे साथ चलेंगी ...आगे भी बढेंगी ....

Monday, September 10, 2007

दे आर BAD BAD गर्ल्स

स्त्री विमर्श वाले बहसते विमर्शते रह गये और उधर लडकियों ने घोषणा कर डाली कि अब उनके अच्छे बने रहने का जमाना गया ! वे गा उठी 'वी आर बैड बैड गर्ल्स....जमाने को सुनना पडा कि वे कह रही हैं कि वे गंदी लडकियां हैं...."चक दे इंडिया "फिल्म की हॉकी टीम की लडकियां उद्बबाहु धोषणा करते हुए जो गीत गाती हैं वह है -

ना तो रोटियां पकाऎगी

ना छ्त पे बुलाऎगी

ना नंगे पैर आऎगीं

ना हंस के रिझाऎंगी

ना सर पे बिठाऎंगी

ना गोरी होके आंऎंगी

ना नखरे उठाऎंगी.....उन्हें नहीं दिखना सुन्दर -नाजुक और गोरी ,उन्हें नहीं तैयारी करनी पूरा बचपन एक दूल्हे को रिझा लेने की ,वे नहीं करेंगी सेवा , उन्हें नहीं चाहिए तारीफ या आपकी छाया ,आपका नाम ! वे नहीं अपने सपने छोडकर बाकियों के सपनों को पूरा करने की मशीन बनेगीं वे आपकी दी हुई जिंदगी नहीं जिऎंगी ....ये जिद की पक्की ,बहुत खूंखार ,बेशर्म ,अडियल , बेखौफ लडकियां हैं...

आह...... भौंह कटीली -आंखे गीली- घर की सबसे बडी पतीली भरकर भात पसाने वाली परंपरागत भारतीय लडकियों की बुद्धि कैसे भ्रष्ट हो गई ? संरक्षणशील लज्जाशील कर्तव्यशील शीलवती भारतीय लडकियां अब घरबार को दुत्कारकर इतनी बेपरवाह होकर निकल पडेगीं अपनी पसंद के रास्ते पर ! परिवार का क्या होगा ? समाज का क्या होगा ? मर्दवादी संसचना का क्या होगा ?

उफ............. उफ ये छुट्टी लडकियां वह सब नहीं करेंगी जो अब तक करती आई हैं तो क्या करेंगी ? क्या पा लेंगी ? क्यों पा लेंगी ? वे साफ कह रही हैं कि वे अच्छी लडकियां नहीं हैं इसलिए उनसे कोई भी कोई उम्मीद न रखे ! वे अब वह करेंगी जो वे हमेशा से करना चाहती थी ! वे अब नहीं मानेगी किसी भी सत्ता को और न ही किसी संरचना से कोई भी उम्मीद करेंगी ! वे आपके बनाए खांचे को तोडकर बाहर निकल गई हैं और अब किसी भी खांचे को अपने आसपास नहीं बनने देगी ! वे खुद कह रहीं हैं और बहुत साफ साफ कह रही हैं कि वे गंदी लडकियां हैं ! गंदी इसलिए क्योंकि आपके लिए अच्छी लडकियां जैसी होनी चाहिए वैसी वे नहीं हो सकती अब ! गंदी लडकियां कहलाने में जो आजादी है उसका भरपूर इस्तेमाल कर वे आपको और आपके ढांचों को ठेंगा दिखा देंगी !..................तब आप केंद्र में बैठे रहते थे जनाब और उन्हें अपने आसपास उलझाऎ रखते थे अब वे आपमें नहीं उलझॆगी ! अपने रास्ते चुनेंगी और अपने भरोसे अपने तरीके से चलेंगी !

आप क्या सोच रहे हैं कि ये क्रांति है उनकी या कि जंग है ? नहीं जी ये आपका और आपके ढांचों का उपहास है जिन्हें आपने बडे जतन और चालाकी से बनाए रखा अबतक ! जिन जडों में आपने नापतोल कर सिंचाई की वे अब आपकी करतूत पहचान गईं हैं इसलिए वे फैलेग़ीं जी भर फैलेंगी ......उन्होंने गंदी लडकियां होने के रिस्क को चुना है जानते बूझते चुना है.....वे आपकी मूल्य व्यवस्था को धता बताकर चल पडी हैं और आप उन मूल्यों की पोटली सर पर धरे बीच बाजार खडे हैं कि अब आपका क्या होगा ....? नहीं उन्हें गंदी लडकियां कहलाने में कोई ऎतराज नहीं ये उनके लिए गाली नहीं ! अच्छेपन के बोझ तले दबे रहना अब और नहीं गंदेपन के खिताब का वे पुरजोर स्वागत कर रहीं हैं !लडकियां आपको चुनौती रहीं हैं खबरदार उनके रास्ते में मत आना ...उन्हें रोकने की कोशिश मत करना ...उन्हें बांधने का ख्वाब मत देख लेना ....

वो देखो ...वे चमक रहीं ..वे हंस रहीं हैं ...उनपर अब कोई भार नहीं है ..कोई नकली आवरण अब नहीं ढोना है उन्हें....वे अपने बूते उडेंगी डूबेंगी तैरेंगी आप रोक नहीं पाऎगे.....सिर्फ इतना कह पाऎंगे .....वो देखो वो रही ...,.गंदी लडकियां ......येस दे आर बैड बैड गर्ल्स....