Monday, March 03, 2008

उनका थूकशास्त्र आपपर कैसा बीतता है ?

अगर कोई बलगम का लोथडा गले में अटक गया हो उसे उगल दीजिए दिल हलका हो जाएगा !

भारत देश की जनता को इतनी थूक क्यों आती है माइलौड ? यहां की सडकें भारतवासियों के दिल में सूराख कर रहे टी.बी. रोग के सबूतों से अटी क्यों पडी रहती हैं ? इन रंग बिरंगी पीकों से रहित कब होंगी हमारी गलियां गमारी सडकें ?

आकथू...आकथू ..

दरअसल हमारे सीनों में बरसों से थूक पीक का संगम बवाल मचाए हुए है ! लिसलिसा हरा गीला पदार्थ हमारे दिल में आप्लावित होता रहता है हुजूर ! जबतब ये कमबख्त गले में उबल पडता है ! आप जाने जनाब हमारे मुंह से ठीक उसी समय कोई बढिया बात निकलने वाली होती है पर बलगम के लोथडे में उलझकर रह जाती है ! ऎसे में हम मुंह खोलते हैं तो बस वही लिसलिसे थक्के बेकाबू होकर बाहर निकला चाहते हैं ! अब सडक उडक पे चलते हुए किसी मैदान के बेंच पर बैठे हुए ,किसी जलसे में शिरकत करते हुए हमारा मुंह भर आए तो फोंकने कहां जाऎं ? लिहाजा हमें ये स्वाभाविक कर्म वहीं अंजाम देना पडता है ! अब इससे आपको बदमज़गी हो या आपका पैर उसपर पड जाए या फिर उसकी झींटें उडकर आपपर आ पडें तो इसमें हमारा क्या कुसूर !

आप हमपे नैतिकता न थोपें ! इस तरह सडकें चौराहे और पार्क रंग देने से हमारा दिल हलका होता है ! सुकून मिलता है ! हम तो उगलेंगे  ..दूसरों का दामन ,घर या सार्वजनिक सडक की सफाई का हमने क्या ठेका लिया हुआ है ! हम भोले- भाले हैं दिल के साफ हैं भावुक हैं बेबाक हैं नंग धडंग हैं  ! आप सब अपनी आंखों ,नाक कान सबको बंद रखने के लिए आजाद हैं ! हम अपनी थूक पेशाब ट्ट्टी जैसी स्वाभाविकताओं को लेकर शर्म नहीं मानते !  अगर आप अपनी सहज क्रियाओं को भी अकेले में करने का मौका देखने वाले बेचारे बने रहेंगे तब तो आप जरूर समझ लेंगे लोकतंत्र का मतलब !

अब हम सबसे मारे हुए , सीने में जहां भर का दर्द लिए हुए जमीनी लोग हैं ! इसलिए सबसे ज़्यादा बीमार रहते हैं और इसलिए हमारे  सीने में इमोशंस ,ईमानदारी शराफत हो न हो बेशुमार बलगम जरूर भरी रहती है जिसे उगल उगलकर हम दिल का बोझ हलका करते फिरते हैं ...! गले में उफनती पीक थूक मवाद सटकना हमारी नज़र से बेचारगी है सरजी !  और हां..इस बहाने आप हमसे खौफ भी तो खाऎगे  ! आप अपने कपडे अपना चेहरा बचाऎगे हमसे ! हम पूरा ज़ोर लगाकर थूकेंगे गली मोहल्ले पटे होंगे इस थूक की पिच पिच से ! आप पैर रखते हय हाय करेंगे  ! हो सकता है आपका जी मितलाए और आप कसम खाऎं कि आप दोबारा घर से बाहर कदम नहीं रखॆंग़े ! तो सरजी थूकने पीकने लिए ही तो भारतीय सडकें बनीं हैं आप अपने लिए तलाश क्यों नहीं लेते एक साफ सुथरी सडक या फिर पटरी ..?

  तो सरजी हनने तो डिसाइड किया है कि हमारी बिलबिलाते रोगाणुओं से लबालब लेसदार मोटी बलगम की पिचकारियां पच्च पच्च कररेंगी ही ! हमारी मर्दानगी, आज़ादी ,लोकतंत्र और बलगम के लोथडे उगलना -उडाना ....हमें तो सब एक सा ही लगता है जी !!

Thursday, February 07, 2008

कह लूं ज़रा दर्द आधी धरती का

दुनिया आधी है अधूरी है ! पूरी क्यों नहीं है का सवाल भी मेरा है और पूरी कैसे हो की सारी छटपटाहट भी मेरी है ! क्या आधी दुनिया में सिर्फ पानी है और बाकी की आधी दुनिया बनी है चट्टानों की बेलौस ताकत से, कैक्टसों शानदार अनगढता से ! बाकी की आधी दुनिया  क्या पाने को छटपटा रही है ?

वो हाट लगा के बैठे हैं मेरी छटपटाहट का ! यहां मेरा दर्द भी बिकेगा और मेरे दर्द की कहानी भी ! क्या करुं ?

मुझे नहीं होना चट्टान नही होना है कैक्टस ! तो क्या होना है मुझे ? मुझे सोच लेना होगा वरना वह सोच लेगा कि मैं क्या होना चाहती हूं ! देखो न वह मेरे दर्द से मतवाला हुआ जा रहा है ! वो कहता है कि वो जानता है मेरे मन को ...उसकी एक एक परत को उघाड लेना चाहता है वह ताकि वह रच सके कोई गीत !

मैं उसकी कहानी की नायिका हूं ! वही नायिका जिसे वह दर्द भी देता है और दवा भी देता है खुद ही ! वह मदमाता है कि वह कंटीला कैक्टस है और वह कहता है कि हे प्रिय तुम फूल हो फूल ही रहो !  वह मेरे पुष्पत्व का अकेला माली और रखवाला ! उसकी चट्टानता और उसकी महानता से दुनिया के सहमे हुए जलस्रोत खुद को अंजुली का पानी समझ रहे हैं ! वह मेरा दर्द मेरे अनगढ शब्दों में मुझसे नहीं सुन पाता पर मेरे दर्द पर लिखे गीतों किस्सों में खूब मन रमा पाता है !

मैं सिलसिलेवार नहीं , मैं कथाकार नहीं ! कैद है मेरी हंसी , मेरा दर्द , मेरा सपना तुम्हारी तिजोरी में ! तुम रचते हो ,पिरोते हो करीने से मेरे इस कैदी स्व को और सुनाते हो मुझी को ! कहते हो हे प्रिये ! पीडा का सृजन, सृजन की पीडा सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए ..

..मैं खामोश हूं अभी ....वहां ठीक उस चट्टान की तली से बह रहा है पानी.....

Saturday, February 02, 2008

मेरा उलझा फेमेनिज़्म और चुगली करती गोल रोटियां

क्या कभी कोई स्त्री खुद से यह सवाल पूछ्ती होगी कि अगर उसे दोबारा मौका मिले तो वह स्त्री ही होना चाहेगी ? पता नहीं ऎसा बेतुका प्रसंगहीन सवाल क्योंकर मेरे मन में उठता रहता है मैं अपना मन इसमें नहीं उलझाना चाहती पर कभी लगता है कि इसका कोई ठीक ठीक तार्किक जवाब ढूंढ ही लूं ! 

मुझे हमेशा से गोल रोटी बेलने से सख्त चिढ रही है और मैंने कभी कायदे से घर गृहस्थी के काम करना नहीं सीखा ! कभी कभी अपने इस खस्ता हाल से कुंठा होती है तो कभी यह किसी तमगे से कम नहीं लगता ! कभी लगता है मैं एक कंफ्यूज्ड स्त्री हूं जो अपनी जिम्मेदारियों में मन नहीं लगाती !कामकाजी हूं ! सो फुर्तीली और अपटूडेट बने रहने का प्रयास जरूर करती हूं ! मेरे कुलीग्स जब मेरी इस पर्स्नेलिटी की तारीफ करते हैं तो सोचती हूं कि काश मैं इन वाहवाहियों को पसंद कर पाती ,पर जानती हूं कि स्त्री को उसकी  अच्छी सामाजिक छवि का चक्कर महंगा भी पड सकता है ! मैं जानती हूं कि यह एक ट्रैप है ! मैं किसी भी छवि के ट्रैप में फंस जाने से डरती हूं ! मैं अपने आसपास ऎसी औरतों को बहुत हैरत से देखती हूँ जो यह दावा करती हैं कि वे एक बहुत सफल कुक ,ट्यूटर , मां ,पत्नी , मेजबान और बेहद जागरूक कामकाजी महिला हैं!   अचानक अपने स्त्रीत्व पर उठता प्रश्नवाचक चिह्न दिखाई देने लगता है !  मै सोचती हूं कि जब मैं प्रसव पीडा सह सकती हूं तो ये अच्छी स्त्री वाली छवि की पीडा से क्यों डरती हूं !

सडक पर अकेले चलना ,चलते जाना बिना किसी वजह के ! या कि फिर सडक पर चलते रुक कर किसी ऊंची शाख या बनते बिगडते बादलों के झुंड को देखना है मुझे ! पर नहीं अचानक लगता है कई आँखें देख रही हैं ! सडक पर चलते रिक्शे वालों , खोमचे वालों गुजरती कारों में बैठे लोंगों की कई जोडी आंखों का मैं लक्ष्य बन सकती हूं ! मैं बडी गुस्सैल ,बददिमाग और अडियल हूं !  कामकाज के माहौल के हर मुद्दे में अपनी टांग अडाती रहती हूं ! जबकि अक्सर कई कुलीग्स गोलमोल लहजे में मेरी इस गंदी आदत के बारे मॆं चिंतित होते हैं क्योंकि उनका मानना हैं कि कम उम्र की बाल बच्चॉं वाली औरतों को पंगों में नहीं पड़ना चाहिए ! मैं गालीबाज हूं पर वे कहते हैं -"अगर गाली देने का इतना ही शौक है तो साला या उल्लू का पट्ठा भी कोई गाली है थोडा और आगे बढो "! वे एक फार्वड ,बेलौस, वाचाल औरत के साथ मानकर चलते है कि इसके कंधे पर हाथ रखकर बतियाने जैसी उनकी हरकतें तो बहुत जायज हैं !

खैर ..जाने दें ! मेरा यह खिचडी आत्मालाप बोझिल हो रहा होगा आपके लिए ! यदि दोबारा मौका मिले तो मैं स्त्री ही होना चाहूंगी का जबाव ..उफ ..फिर कभी ! पर इतना तो है कि अब आपको अपनी पत्नी बहुत सुघड़, सुलझी हुई संस्कारी ,कर्तव्यशीला स्त्री लग रही होगी ! आप तो अपना टिफिन खोलिए गोल रोटियों को खाने का लुत्फ उठाइए !  आपके द्वारा खाई जा रहीं रोटियों का आकार आपके दांपत्य संबंधों की चुगली तो नहीं कर रहा है ....!

Wednesday, January 16, 2008

बटरफ्लाईज़ : डू दे फ्लाई ?

नाम : अनुज चौधरी ! उम्र : 20 साल ! पेशा :  दिल्ली में एक मंत्री के यहां अटेंडेंट ! जी मैं बात कर रही हूं अपने कॉलेज के प्रथम वर्ष के एक छात्र की ! दुबले पतले चमकती आंखों वाले इस छात्र को पढाते हुए उसे हमेशा हंसते- मुस्कुराते और पढाई में मन लगाते देखा है ! अक्सर हम प्राध्यापक लोग अपने छात्रों  की निजी जिंदगी की तकलीफों से अनजान रहते हैं !सो मैं भी उसे बाकी सभी छात्रों में से एक समझती रही ! पर कल उससे हुई बातचीत में मुझे उसकी जिंदगी की कडवी सच्चाइयों का पता चला ! मैं हतप्रभ हूं , गौरवांवित हूं कि मुझे एक बेहद जुझारू बहादुर बच्चे को पढाने का अवसर मिला है ! अनुज के माता पिता जब गुजरे तब वह मात्र 8 साल का था ! चाचा -चाची के अत्याचार से तंग आकर वह घर से भाग निकला और एक ट्रक  ड्राइवर के हाथ लग गया ! ड्राइवर ने उसे बम्बई पहुंचा दिया जहां एक होटल में बर्तन मांजने का काम उसने किया ! महज 8 साल का बच्चा वहां सॆ भी भाग निकला और दिल्ली पहुंचा दिया गया ! दिल्ली के एक मंदिर के बाहर रहते हुए अनुज को एक एन जी ओ बटरफ्लाईज़ ने गोद लिया .पाला और पढाया !

अनुज अपनी जिंदगी की कहानी ऎसे सुनाता है मानो किसी और की कहानी हो ! वह अपना वृत्तांत सुनाते हुए ज़रा भी जज़्बाती नहीं हुआ पर उसकी कहानी सुनते हुए मैं जज़्बाती हो गई ! बटरफ्लाईज़ में रहते हुए उसकी जिंदगी कैसी रही वह मुझे फिर कभी सुनाएगा ! पर उसने समाज सेवा के नाम पर भारी सरकारी अनुदान लेने वाली इन संस्थाओं की राजनीति और भ्रष्टाचार को नजदीक से न केवल देखा है बल्कि विरोध भी किया है ! इसी विरोध की वजह से उसे इस एन. जी. ओ. से निकाल बाहर किया गया था और उसे यह नौकरी करनी पडी !

आज अनुज खुश है कि वह बी.ए. कर रहा है ! आज वह सडक पर नहीं है !पर वह सडक पर रहने वाले बच्चों की जिंदगियों से बहुत गहरे जुडा हुआ है ! सडक पर रहकर मजदूरी कर जीने वाले तमाम बच्चों की दुर्दशा की कहानियां वह आपको सुना सकता है, उनकी जिंदगी को संवारने के लिए क्या हो यह बता सकता है ! आज वह इतना परिपक्व हो गया है कि एक बाल मजदूरों की दमित आवाज को आप तक पहुंचाना चाहता है ! इसके लिए उसने एक पेपर मैगज़ीन निकाली है -"बाल मजदूर की आवाज़ " ! अपनी इस मासिक पत्रिका के संपादकीय में उसने बटर्फ्लाईज़ की संस्थापक के प्रति नाराज़गी ज़ाहिर की है और सडक पर सोने वाले बाल मजदूरों के शारीरिक शोषण और   उनके अनुभवों को भी दर्ज किया है !

कल से अनुज का हंसता - चमकता चेहरा मेरी आंखों के सामने घूम रहा है ! न जाने इन 3 सालों में उसे पढाते हुए मुझे उससे क्या-क्या सीखने को मिल जाए ! प्रिय अनुज ! तुम्हारी जिजीविषा को तुम्हारी इस टीचर का शत शत नमन !!

Wednesday, January 09, 2008

पाठशाला भंग कर दो....

बहुत साल पहले मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग से बी.एड. किया था ! एक पर्चे के रूप में प्राइमरी एजुकेशन का भी अध्ययन करन था ! हमारे एक अध्यापक हमेशा कहा करते थे कि छोटे बच्चों को केवल वही पढाए जो स्वयं शिशु-हृदय हो ,जिसे बच्चों से प्रेम हो और जो बच्चों का समाजीकरण करने की प्रक्रिया में उनकी विशिष्टताओं को चोट न पहुंचाए ! पता नहीं तब पढ़ाया जा रहा सबक कितना समझ आता था और मैं स्वयं अपनी प्राइमरी कक्षाओं में शिक्षण अभ्यास करते हुए उन सबकों को कितना लागू कर पाती थी , पर आज जरूर मैं तहेदिल से यह महसूस करती हूं कि मैं अपने बच्चों के साथ पूरा न्याय नहीं कर रही हूं ! एक मां हो जाने के बाद बच्चों की दुनिया को ज्यादा नजदीक से देख और समझ पा रही हूं शायद ! अपने परिचितों में भी ज्यादातर का लेना देना इस या उस जरिये से शिक्षण से ही है ! सो अक्सर बच्चों की , उनके स्कूलों की , स्कूलों में अध्यापकों की हालत पर चर्चा -विवाद उठ खडे होते हैं और हम पाते हैं कि हम स्वयं शिक्षा से जुडे होने के बावजूद बच्चों को एक बेहतर शैक्षिक वातावरण नहीं दे पा रहे हैं ! हम शर्मिंदा हैं !
हमने अपने बच्चों को समाजीकृत होने के लिए कैसा माहौल दिया है यह समझने के लिए हममें से किसी को बहुत दूर देखने की जरूरत नहीं है ! अपने घर या पास के किसी भी बच्चे की जिंदगी को देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति इन नन्हों से सहानुभूति महसूस करेगा ! अपने बेटे को 3 साल की उम्र में मैंने स्कूल भेजना शुरू किया था ! अपने बहुत एक्टिव, बहुत नटखट और खुशमिजाज और स्पष्ट भाषिक अभिव्यक्ति करने वाले बेटे को स्कूल के हवाले करते हुए दिल बैठता था ! उसने अपनी टीचर की सिखाई हुई पहली कविता सीखी -'मम्मी डार्लिंग पापा डार्लिंग , आई लव यू , सी योर बेबी डांसिंग जस्ट फार यू " पर कक्षा में सुनाते हुए उसने कविता में अपनी ओर से दो पंक्तिया जोड दीं थी- मासी डार्लिंग ,नानी डार्लिंग..... ' ! शिक्षाशास्त्र जिस रचनात्मकता की पैरवी करता है वह यहां भरपूर थी पर शिक्षा के सिद्दांतों को लागू करने वाले तंत्र के लिए ये चिंताजनक हालात थे ! बच्चे की सृजनात्मकता और विषिष्टता को इस तंत्र के अनुसार इसलिए खत्म हो जाना चाहिए क्योंकि वह तंत्र यह मानता है उसका काम सभी बालकों को सामान्यीकृत कर देना है ! यह समाजीकरण करने वाला तंत्र बच्चों की रचनात्मकता और खास योग्यताओं को जिस बेरहमी से दमित करता है उससे साफ हो जाता है कि इस तंत्र {जिसमें कभी- कभी अभिभावक भी शामिल होते हैं} का उद्देश्य एक भीड का निर्माण करना है , एक संवेदनक्षम ,रचनात्मक मेधा से भरपूर मनुष्य नहीं ! एक आम अभिभावक अपने बच्चे की खासियत को न तो समझता है और न ही उसके स्कूल से ऎसी कोई अपेक्षा रखता है ! सो हम सब अपने बच्चों के व्यक्तित्व को हिंदी -इंगलिश ,मेथ्स ,साइंस के पीरियडों में बांट कर खींचतान कर उन्हें बडों की दुनिया के लायक बनाने में जुटे हैं....! कक्षाओं के बंद कमरों में नीरस केन्द्रीकृत शिक्षा देने वाला ,एक घंटी से दूसरी घंटी तक का समय - बस केवल यही सच है हमारे बच्चों की जिंदगियों का !

अपने आसपास के बच्चों की बातों में स्कूल को लेकर ऊब, डर, निराशा और तनाव का स्वर आपने भी अक्सर सुना होगा !मेरे एक दोस्त की5 साल की बेटी एक दिन अचानक ऊबकर बोली - कितना गंदा है आसमान जो रात को अचानक सुबह बना देता है और मुझे स्कूल जाना पडता है ! मेरा बच्चा कभी कभी यह कहता है कि - मम्मी ये दुनिया बच्चों के लिए नहीं बनी है यहां सब कुछ बडों जैसा है बच्चों की एक अलग दुनिया होनी चाहिए- या फिर यह है कि मैं सारे स्कूलों की दीवारों को मार मारकर तोड दूंगा - तब तब मेरा मन कह उठता है कि वाकई.... पाठशाला भंग कर दो ..!

Friday, November 16, 2007

न बुझे है किसी जल से ये जलन....

सब चुप ...कविजन -चिंतक -शिल्पकार क्या सब चुप हैं ! नहीं नहीं सब बोल रहे हैं ! जलती आग में जलते झोपडों को सब देख ही तो रहे हैं और बोल भी तो रहे हैं ! बुद्धदेव- युद्धदेव- क्रुद्धदेव हवन में समिधा डाल रहे हैं  लधुकाय दीन खडा है भीमकाय के सामने ! शांति - क्रांति - भ्रांति का गायन  हो रहा है ! स्वाहा - स्वाहा के दिशा भेदी मंत्रोच्चार में आर्तजन का हाहाकार मलिन पड रहा है ! लो किन्नरों के दल के दल मतवाला नाच कर रहे हैं ...!

वे करबद्ध खडे हैं.. अनेकों अनेकों जिह्वाहीन जन !  जीवन कितना और कितनी मृत्यु ...?  अब जीवन की गुणवत्ता के प्रश्न उन्हें छोटे लग रहे हैं ! ग्राम खेत घर यहां तक कुंए तक में लग गाई आग ! आग सिर्फ उन्हें ही जलाएगी ! इस आग की लपटॆं नहीं जलाऎगी भीमकाय यज्ञ नियंता को नहीं जलाऎगी ये हमारी थुलथुली कविता को..... न हमारे लंपट विमर्श को !

उजडे बिखरे लोग ही लोग ! हमारे दरवाजे पर ऎन सुबह पडे अखबार पर क्रंदन करते चेहरे !हम गिन रहे हैं कितने हैं मौत की तालिका को मिले अंक ! एक घटा दो या एक बढा दो क्या अंतर पडता है ...? अखबार अखबार ही रहेगा और दरवाजे के बाद उसे मेज या पलंग पर आना है !

जी ठीक कहा.. मसला सुलझ रहा है! तब तक कविता रचो नेता के कंधे पर बिलखते लाचार चेहरे फिल्माओ ,मौत की गिनती दुरुस्त करो  ! पिछ्ली बार उसका दोष था ..इस बार इसका दोष है.....

ओह उधर आग लग गई  और वो .. उधर गोली चल गई ....लहू बह रहा है मिट्टी पर ! पता नहीं किसका पर उनके जूते खराब हो रहे हैं ! हां ये वही जूते हैं घोडे की नाल ठुके ,लोकराज की चमडी से बने ! पर कोई गम नहीं.. सत्ता के दरवाजे पर बिछे कालीन पोंछ देंगे न जूतों पर लगा लहू...!

पानी के कटोरों सरीखी कई जोडी आंखॆं देख रही हैं हमारी ओर ! देखो हम धिक्कार रहे हैं भीमकाय ,नाल ठुके जूतेधारी को...!..... वो साला बर्बर है...लोकतंत्र का हत्यारा है....महा अमानवीय है ....नरपशु है.......सत्ता का जोंक है......नाश हो सत्यानाशी का...

........बस  बस बस ..अब हमारी गालियां चुक रही है.... ..हमारी जबान पथरा रही है...... जल रही है ..... कहीं जल नहीं है !... है तो बस सिकती- धधकती हुई रेत  और उसमें धू धू कर जलता मानव......!

Sunday, October 28, 2007

ओ$म सुपर सेक्सी कालाय नम:

आज जमाना सुपर फास्ट हो गया है ! जब से हमने उस सुप्रीम पावर वाले भगवान की सुपीरियोरिटी के भगोने में छिद्र कर दिया है तब से हम सुपर उन्मुक्त हो चले हैं ! सुपर बाजार से सामान खरीदते हैं , सुपर सफेद कपडे पहनते हैं ,सुपर्ब सुपर्ब कहकर अपने सौंदर्यबोध को जाहिर करते हैं ! अब किसी हिंदी फिंदी वाले से मत पूछ लिया जाए कि भैया मतलब समझत हो स्सुपर का ! बेचारा वह अपने सुपर साहित्यिक लहजे मॆं हडबडिया सुपरफिशियल जवाब दे डालेगा _सुपर माने सुन्दर पर !हे हे !! इस सुपर सांइंटिफिक जमाने  में ऎसे सुपर बेकवर्ड को कोई तो उबारो रे ! खैर हम तो कह यह रहे थे कि भैया आजकल सुपर सेल मॆं कुछ भी माल लगा दो और बेचो _बस ये ध्यान रखो कि माल के सुपर एट्रेक्टिव कवर पर सुपर लफ्ज जरूर लगा हो !

अब आजकल के गानों को ही देख लो ! हर सुपर सेड्यूसिव गाने मॆं सुपर सेक्सी नायक नायिका गण गा रहे होंगे "आय एम सुपर सेक्सी , य़ू आर सुपर सेक्सी " ! अब सेक्स भी सुपर की गारंटी के पैकेज में है जिससे मिले सुपर सेटिस्फेक्शन ! सेटिस्फेक्शन जो सुपर बाजार से सुपर शापिंग करने या सुपर रिन की चमकार मारते कपडों को पहनने के समतुल्य ही है ! ये वो सेटिस्फेक्शन है जो सुपर सेक्स काड्यूट गाते नायक नायिका वृंद से इतर हर दर्शक के सुपर कांप्लेक्सिटीज से भरे मन की आकुल व्याकुल पुकार है ! हर उघडी नायिका सुपर डांस के सुपर एक्टेव झटके मारती कह रही है सिर्फ मुझे ही पाओ क्योंकि मैं ही हूं सुपर सेक्सी !वात्स्यान मुंह सिकोडे खडे हैं रीतिकाल के कविगण अपने कथित अश्लील काव्य को सुच्चा साबित कर पा रहे हैं ! वहां सब कुछ शास्त्रीय था - पर नायक का परनायिका से प्रेममिलन या संभोग रस की कोटि का गायन ! ये सुपर कॉंवेश्नल काल बीत चुका ! अब जमान है हर गली मॆं सुपर सेक्स और सुपर सेक्सी की धूम का !  सुपर सेक्स का रसाभास करो और इस नाम की भूतनी या भूत से डसे जाओ ! अब सब कुछ सुपर हॉट है !  मौका हो हो या सेल हो गाना हो या खेल हो सब कुछ है सुपर सिजलिंग ! 

बाजार रूपी थाली में हरएक के लिए खास तौर पर सजा अर्ध्य _ 'भागो और भोग लो!   " कर्म का भोग भोग का कर्म "-  ये कौन बोला रे ? अब बोलो- भागकर भोग कर लो कर्म करो तो सिर्फ भोग का !  ओ सुपर सेक्सी युग के  सुपर नॉटी  बालक-बालिकाओ !! गांठ बांध लो सुपर टाइट क्यॉकि यही है आज का सुपर मंत्रा !!बोलो ओ$म सुपर सेक्सी कलाय नम: ..!!'

!

Saturday, October 27, 2007

अगर मुन्नी न हो तो?

मुन्नी मेरी बेटी या पास पडोस की किसी साफ सुथरी सी राज दुलारी का नाम नहीं है यह नाम है मेरे घर में काम करने वाली पन्द्रह सोलह साल की लडकी का ! मुन्नी अपने बहुत  काले रंग की आलोचना बहुत बेरहमी से करती है ! अपने खुरदरे हाथों बिवाइयों से भरे पैरों की ओर देखकर अक्सर हंसती हुई कहती है "वाह क्या किस्मत देकर भेजा है भगवान ने हमें " पर अगले ही पल कहने लगती है "पर भाभी दुनिया में सभी तो परेशान हैं ! पैसे वाले तो और भी ज्यादा हर समय डरते हैं मोटापे से ,गंदगी से कामवाली के छुट्टी कर लेने से -अजीब अजीब चीजों से परेशान रहते हैं "!  मुन्नी के जीवन दर्शन के आगे मैं अपनी थकावट और वक्त की कमी से हुई झंझलाहट को बहुत थुलथुली महसूस करने लगती हूं !मुन्नी महीने में सिर्फ चार दिन नहीं आती है! छुट्टी करने से पहले ही वह हर घर में बता देती है ! पर एक दो घरों में वह छुट्टी के दिन भी आकर कामकर जाती है! जब मैंने पूछा कि वह ऎसा क्यों करती है तो उसने बताया कि इससे उसे महीने के चार सौ रुपये और मिल जाते हैं ये उसके अपने होते हैं इसे मां को नहीं देना होता ..!  

मुन्नी हर सुबह अपनी मां के साथ ठीक 6 बजे आ जाती है !मां बेटी मिलकर कई घर निपटाते हैं _सफाई ,बरतन और कपडों की धुलाई ,गमलों को पानी देने ,फ्रिज साफ करने जैसे कई काम निपटाती हुई शाम को 7 बजे तक घर जाती है !मुन्नी के पिता दिनभर सोसाइटी के बाहर रिक्शा लेकर खडे रहते हैं और सोसाइटी की महिलाओं को आसपास के बाजारों तक पहुंचाने का काम करते हैं ! मुन्नी कई घरेलू महिलाओं के घरों का काम करती है !  मुन्नी अक्सर बुडबुडाती हुई काम करती है "फलां नंबर वाली आंटी मुझे नाश्ता क्या करा देती हैं अपमना गुलाम ही समझने लगती हैं ,जब चाहे बुला लेती हैं फालतू काम कराती हैं ! पर भाभी मैं मना नहीं कर पाती क्योंकि एक बार मेरे पेट में दर्द हुआ था तो उन्होंने अपने पैसो से इलाज कराया था अल्ट्रासाउंद के पैसे भी लगाए मुझपर.." !

मुन्नी अक्सर हंसती रहती है ! वह अखबार की सनसनीखेज खबरों पर बातें करते हुए झटपट काम निपटाती चलती है ! फिल्मों पर खासकर हाल ही में देखी फिल्म के सामाजिक संदेश पर अपनी राय देती बरतनों की जूठन हटाती चलती है ! वह अक्सर थकी होती है पर जब मेरी हडबडी और व्यस्तता और थकावट देखती है तो फौरन  आराम करने या दवा ले लेने की सलाह दे डालती है !मुझे पता है ,उसे भी पता है कि उसके एक दिन न आने पर मेरी दिनचर्या बुरी तरह प्रभावित हो जाती है -अखबार अधपढी रह जाती है या फिर कॉलेज के लिए क्लास की तैयारी पूरी नहीं हो पाती है या नेट देवता और ब्लॉग देवता के दर्शन तक नहीं हो पाते हैं या किसी एक वक्त का खाना खाने के लिए आसपास के भोजनालयों का मैन्यू टटोलना पडता है !   

कभी कभी मैं सोचती हूं कि अगर वह और अधिक समझदार हो गई तो धीरे धीरे वह समझने लगेगी कि बौद्दिक ,रचनाशील ,क्रंतिकारी और संधर्षशील स्त्रियों के इस समस्त कुनबे के बने रहने में उसका कितना हाथ है !

अक्सर वह मुझे कंप्यूटर पर काम करते देखती है और अक्सर जानना चाहती है कि मैं कंप्यूटर पर क्या करती रहती हूं !  सो पिछ्ले दिनों  मैंने उसे अपना ब्लॉग दिखाया और अपने काम के बारे में बताया ! उसने तारीफ के भाव से ब्लॉग को देखा , ब्लॉग पर लगी मेरी फोटो को सराहा ! फिर उसने बहुत रहस्य भरे लहजे में बताया कि उसका बडा भाई भी काफी समय से कंप्यूटर की एक दुकान पर काम कर रहा है और कंप्यूटर  काफी कुछ सीख चुका है ! उसकी आंखों में चमक और आवाज में उमंग थी वह बोली -"  भाभी मैं भी अपने भाई से कहकर अपनी फोटो कंप्यूटर पर लगवाउंगी ताकि मुझे भी दुनिया देख सके जैसे आपको देखती है पर क्या लिखूंगी कैसे लिखूंगी  ये नहीं पता ........."! मुन्नी काफी देर गहरी सोच में डूबी रही ......मेरे मन ने कहा कि मुन्नी जो तुम कह सकती हो वह मैं नहीं इसलिए तुम लिखो... .....मुन्नी ने अभी तक नहीं लिखा है पर मैंने लिख दिया है ...उसके बारे में !मैं अक्सर सोचती हूं कि अगर मुन्नी न हो तो.....?

Wednesday, October 24, 2007

क्या है जिंदगी क्या हो जिंदगी

जिंदगी कितनी एब्सर्ड हो चली है इसका अंदाजा कभी कभी ही लग पाता है ! नौकरी की भागमभाग ,सडकों का ट्रेफिक ,संबधों की उलझन ,भविष्य की चिंता ,पानी बिजली फोन के बिलों , बच्चों की पढाई और भी सैकडों कामों- तनावों -हडबडियों के बीच जीते हम ! वक्त पैसा और लगन की त्रयी के बिना कहां हो पाता है जीवन रूपी नाटक का एक भी अंक पूरा ! हम रोज सोचते हैं कि शायद आज का ही दिन ऎसी हडबडी और रेलमपेल का आखिरी दिन था -कल तो जरूर सुकून का दिन आएगा और हम अपने अधूरे छूट गए कामों को कर पाऎगें ! पर ऎसा सुकून का दिन तलाशना एक दिवास्वप्न सा लगने लगता लगता है ! तारे गिनने , उगते सूरज को देखने ,बादलों की बनती संवरती छवियों को निहारते चले जाने या कि खुद से बात करने के बीच शोर है बाजार है, घडी है , गाडियां और बिल्डिंगें हैं !

इस मोबाइल जीवी युग के प्रणेता हम लाभ-हानि, कर्म-अकर्म , अहमन्यता-सामाजिकता का व्याकरण बिना चूके रट लेना चाहते हैं ! मैं- मेरा -मुझे की लगन मॆं डूबा मन बाजार को अपना सबसे बडा हितैषी गुरू मानता है !  गडबडी ,जल्दबाजी ,ठेलमठाली के मंत्र के बिना भी क्या श्हर में रहा जा सकता है ?यहां हमेशा बेहतर चुनाव करना होता है ! यहां के गणित को हमेशा अन्यों से अधिक गहराई से समझते रहना होता है ! यहां प्रगति और विकास के व्यक्तिगत पाठों को लगातार पढते चलना होता है ! यहां समाज ,सामाजिकता ,सामाजिक नैतिकता , सामाजिक निष्ठा जैसे आउटडेटिड लफ्जों पर सिर्फ हंसना होता है ! जयशंकर प्रसाद की इडा का हर तरफ बोलबाला है ..कहां है श्रद्धा ? नहीं श्रद्धा को ढूंढना बेमानी है ! वह हमारे भीतर ही तो है ! पर हम नहीं सुनेंगे उसकी आवाज ,क्योंकि वह जो कुछ कहेगी उसे हम बहुत अच्छे से वाकिफ हैं पर वह वाकिफ नहीं इस सच से कि हम ट्रैप्ड हैं जिस सांस्कृतिक दुष्चक्र में वहां केवल वही सर्वाइव करेगा जो सबसे ज्यादा निष्ठुर होगा  ! श्रद्धा !! तुम्हारी आवाज सुनने के लिए जो दो पल ठहरे तो कुचले जाऎगे पीछे आने वाली भीड के पैरों तले..!

तो आज हमारे पास  बहाने हैं, वाजिब कारण हैं ,लधुता का बोध है , जिनके आगे हम लाचार हैं ! सो वही केवल वही कर पा  रहे हैं जिससे कि केवल जीवन चलता रहे सकुशल ! कोई बडा सपना कोई बडा संघर्ष ,कोई बडा जज्बा नहीं जिसके लिए हमारे भीतर बची रह गई हो थोडी निष्ठा ,थोडा सा समर्पण ..! क्या हम कभी नहीं चुन पाऎगे अपनी पसंद की हवा ..सांस लेने के लिए और क्या अब हम कभी नहीं महसूस पाऎगे अपने खंडित व्यक्तित्व को....!

जिंदगी की इस एब्सर्ड एकांकी का कोई तो सार्थक, ओजमय ,कर्ममय निष्कर्ष पाना होगा ...!!

Thursday, October 04, 2007

दिल दोस्ती ऎट्सेक्ट्रा ..वाया सेक्स दुश्मनी ऎट्सेक्ट्रा...

dil1

"क्या तुम एक ही दिन में तीन लडकियों से कर सकते हो "--

-प्रकाश झा की फिल्म दिल दोस्ती ऎटसेक्ट्रा के पात्र संजय मिश्रा के द्वारा अपने मूल्य विभ्रमित जूनियर अपूर्व से पूछे गए इस सवाल से फिल्म शुरू होती है!

यह फिल्म दिल्ली युनिवर्सिटी की पृष्टभूमि में आज के नवयुवा की जिंदगी के पहलुओं को दिखाने का प्रयास है ! फिल्म में होस्टल लाइफ की उन्मुक्तता , भारतीय युवा की नव -अर्जित सेक्स फ्रीडम ,विश्वविद्यालयी राजनीति ,दोस्ती कुंठा सब कुछ है ! ये वह माहौल है जहां भारतीय युवा अपने क्लास कांसेप्ट से जूझने के दौरान अपने लिए किसी रास्ते की तलाश में जुटे हैं !  फिल्मकार ने दिल्ली के नवधनाढय और धनाढय तथा बिहार से आए छात्रों के बहाने आधुनिक भारतीय समाज की वर्ग संरचना और मूल्य संघर्ष को दिखाया है ! 

यह फिल्म अपनी बनावट में बहुत बडें लक्ष्‍य को लेकर नहीं चली है ! किसी भी पात्र से बहुत आदर्शात्मकता की dil2उम्मीद नहीं की गई है !  फिल्म की संवेदना को उभारने के लिए कोई बडा प्रतीक नहीं उठाया गया है ! अपूर्व और संजय मिश्रा इन दो चरित्रों के विपरीत जीवन दृष्टिकोणों के फिल्माकंन के बहुत सामान्य पर बहुत सटीक तरीके अपनाए हैं फिल्मकार ने !

अपूर्व अपने हाइक्लास पिता से पैसा लेकर कोठे पर जाता है ! वह कहता है कि   - "मेरे लिए कॉलेज और कोठे में फर्क करना मुश्किल हो गया है "  ! वह वैशाली नाम की वेश्या से जिस संबंध में स्वयं को पाता है  उसकी व्याख्या वह नहीं कर पाता है ! न ही स्कूली छात्रा किंतु से सेक्स संबंध स्थापित करने में वह प्यार जैसे किसी मूल्य की जरूरत को मानता है ! वेश्यालय में टंगी भगवान की मूर्ति को मोड कर सेक्स क्रिया में रत होता है जिसपर वेश्या वैशाली को बहुत ताज्जुब होता है !

dil3 संजय मिश्रा अपनी जातीय अस्मिता और अपनी मध्यवर्गीय मूल्य संरचना को संभाले रहने वाला पात्र है ! वह स्वंय को एक अति संपन्न सहपाठिनी प्रियंका से प्रेम और समर्पण की स्थिति में पाता है और अपने इस संबंध अपने भविष्य और लक्ष्‍य को लेकर एकाग्र है ! जबकि प्रियंका अपने पिता के संपर्कों के सहारे मॉडल बनना चाहती है !उसके लिए सेक्स शरीर की जरूरत है न कि कोई प्रेम का प्रतीक या मूल्य ! वह संजय से अपने प्रेम को लेकर श्योर है न ही वह अपने दोस्त अपूर्व से काम संबंध बना लेने को किसी भावना से जोडकर देखती है!

फिल्म अपने ट्रेजिक ऎंड में अपनी इस उत्तरआधुनिक स्थिति को दिखाती भर है - कोई मूल्य निर्णय नहीं थोपती ! संजय मिश्रा के लिए कॉलेज एलेक्शन जीतना प्रेम को समर्पण भाव से करना और कैरियर बनाना है जबकि अपूर्व को संजय के चुनाव के दिन तक तीन लडकियों से संभोग कर लेना है जिसकी शर्त वह अपने दोस्तों से पहले ही लगा चुका है !अपूर्व संभोग करता है संजय की प्रेमिका प्रियंका से ! संजय चुनाव जीतता है- दोस्ती और प्रेम के इस रूप को स्वीकार नहीं कर पाता और मृत्‍यु को प्राप्‍त होता है ! ....

यह फिल्म दो परिस्थितियों की टकराहट है दो वर्गों और उनकी मूल्य दृष्टि की टकराहट है ! यहां दिल प्रेम की वस्तु नहीं दोस्ती निभाने की वस्तु नहीं ! यहां अवसर , शरीर की जरूरत, सेक्स में भोग और दुश्मनी है !

अंतत: संजय नहीं रहता और कोठे पर जाने वाला और एक ही दिन कमें तीन लडकियों से सेक्स करने वाला अपूर्व जीता है और सेक्स और सेक्स मॆं नएपन की तलाश में डांसबारों और पार्टियों में भटकता है !.....

Wednesday, October 03, 2007

मेरी पहचान मुझे लौटा दो ब्‍लॉगवालो

ब्‍लॉगिंग की दुनिया के डाइनासोर तो नहीं हैं हम, पर एकदम नए भी नहीं रहे। साल भर होने को आया। बड़ा तो नहीं है पर गलतफहमी पाले रहते हैं कि छोटा सा नाम तो है ही। ब्‍लॉग शोधार्थी हैं, ब्‍लॉगर भी। पर एकाएक गड़बड़ हो गई लगता है। गड़बड़ यह है कि हमारा नाम चोरी हो गया है। साफ साफ समझाया जाए-

ये नारद पर नीलिमा की लिखी पोस्‍टों के लिए कैप्‍चर्ड छवि देखें-

name swap

देखा आपने ये हमारी तस्‍वीर जिन पोस्‍टों के साथ दिख रही है वे हमने नहीं लिखीं वे तो एक अन्‍य ब्‍लॉगर साथी  नीलिमा सुखिजा अरोरा ने लिखी हैं। ऐसा नहीं है कि केवल नारद से ही यह गड़बड़ हुई, चिट्ठाजगत पर नीलिमा लेखक की प्रविष्टियॉं के लिए छवि ये है-

name chittha

यानि वहॉं भी हम दो नीलिमाओं की पहचान गड्डमड्ड है। यूँ इसमें दोष किसी का नहीं है, सिवाय इस बात के कि तकनीक इन दो नामों से भ्रमित हो रही है। और नारद ने अति उत्‍साह में हमारी तस्‍वीर जो उनके पास हमारे दो ब्‍लागों के कारण पहले से ही थी, नीलिमा सुखिजा जी के ब्‍लॉग को हमारा तीसरा ब्‍लॉग मानकर चस्‍पां कर दी और फिर ईमेल किए जाने पर भी किसी कारण हटा नहीं पाए। इस प्रकरण में हमें वो स्‍कूली दिन याद आए जब एक ही कक्षा में कविता, सीमा जैसे नाम एक ये ज्‍यादा होने पर फर्स्‍ट, सेकेंड कहकर काम चलाते थे पर वो तो यहॉं शायद हो नहीं सकता पर जो हो सकता हो किया जाए पर पहचान के इस घालमेल को खत्‍म करो भई।

Tuesday, September 25, 2007

मुझे कदम कदम पर चौराहे मिलते हैं बाहें फैलाए

रोज कुंआ खोदो और पानी पियो -वाली कहावत का रचयिता हमारी नजरों में अब तक का सबसे बडा दूरदर्शी था जिसने बहुत पहले ही ब्लॉगिंग करने वालों की नियति का बहुत पहले ही अंदाजा लगा लिया था !यहां एक दिन भी नागा कर जाना आपका पेज रैंक गिरा सकता है ,श्रद्धालु पाठकों की भीड का रुख मोड सकता है , धडाधड महाराज की नजरों में आपकी इज्जत का फलूदा बना सकता है ! यहां बडे बडे लिखवैये बिना नागा लिख रहे हैं और हम हैं कि रोज परेशान रहते हैं कि आज क्या लिखॆंगे !बहुत काम का मसला न मिलने पर लगता है कि कम काम के मुद्दों को ही उठा लिया जाए ! हर समय काम के और खूबसूरत मसलों पर लिखना भी जरूरी नहीं है ! कभी कभी दिमाग के तंतुओं को आराम की छूट हम दे देंगे तो छोटे नहीं कहलाने लगेंगे ! क्या लिखॆं ? का जवाब जैसे ही पा लेते हैं क्यों लिखॆं  ? का सवाल सामने लहराने लगता है! क्या लिखॆं का जवाब खोजते हुए इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि बस कुछ भी लिख डालो ! और क्यों लिखें का सवाल हमॆं इन निष्कर्षों पर पहुंचा देता है कि लिखो शायद क्रंति हो जाए ,या कि किसी को आपका लिखा पसंद आ जाए और वह आपकी भाषा में अपने दिल की बात पढ पाए ,या हो सकता है कि आत्मसाक्षात्कार हो जाए ,या फिर कि आज तो बस लिख डालो पेज रैंक तो बच जाएगा -कल देखॆंगे कुछ बढिया सा लिख सके तो .....

ठीक इसी जद्दोजहद की वजह से कभी कभी हमें मुक्तिबोध की कविता "मुझे कदम कदम पर" बिलकुल भी समसामयिक नहीं लगती की लगती जिसमें वे कहते हैं कि आज के लेखक की दिक्कत यह नहीं कि कमी है विषयों की बल्कि विषयों की अधिकता उसे बहुत सताती है और वह सही चुनाव नहीं कर पाता है कि किस पर लिखे ! जब मुक्तिबोध लिखते हैं कि "मुझे कदम पर चौराहे मिलते हैं बाहें फैलाए -एक पैर रखता हूं सौ राहें फूटतीं " तब हम इसमें निहित समसामयिकता तभी देख पाते है जब हम यह मान लेते हैं कि भई यह तो बडे कवियों के लिए कही गई बात है हम छोटे कवियों पर कैसे लागू हो सकती है ! खुद को छोटा लिखवाडी मान लेने पर न कोई बंधन होता है न नैतिक बोझ का दबाव न विषय चयन की समस्या से ही गुजरना पडता है ! सो हम बच जाते हैं ,नागा भी कर पाते हैं महान विषयों पर कलम चलाने के जोखिम की संभावना का तो कोई सवाल ही नहीं उठता !

.... हां ठीक ऎसे में ही कलम चलती है अपनी मर्जी से हमारे भीतर के लेखक के इशारे पर नहीं ! कलम खुद कहती है कहानी बिना लागलपेट के साफगोई से ..! जहां हमारा महान लेखक अपने वजन के तले नहीं दबा पाता कलम को ! जहां कलम हल्की होकर चलती है !जहां कलात्मक मन देख पाता है वे राहें जिनपर अभी हम चले नहीं जो बीहडों से होकर गुजरती हैं और जो शायद बहुत बहुत लंबी हैं कि जिनपर चलते चलते पैरों में उठ आऎ फफोले ..घाव ! पर हम जब भी चलते हैं इन बीहडों से गुजरते रास्तों पार् तो होता है  सत्य सुंदर और शिव का कलात्मक अभिव्यंजन.....शाश्वत अभिव्यंजन...

Thursday, September 20, 2007

जरा हौले हौले चलो मोरे साजना हम भी पीछे हैं तुम्हारे....?

स्त्री का परंपरागत संसार बडा विचित्र भी है और क्रूर भी है -यहां उसकी सुविधा ,अहसासों , सोच  के लिए बहुत कम स्पेस है !गहने कपडे और यहां तक कि वह पांव में क्या पहनेगी में वह अपनी सुविधा को कोई अहमियत देने की बात कभी सोच भी नहीं पाई ! अपने आसपास की लडकियों महिलाओं के पहनावे की तरफ देखते हैं तो उनकी जिंदगी की विडंबना साफ दिखाई देती है ! घर बाजार ऑफिस हर जगह दौडती स्त्री पर भरपूर नजाकत लाने और पर-ध्यान को केन्द्रित करने की पुरजोर आशा में अपने पहनावे को सहूलियत के साथ बहुत बेरहमी से अलग करे दीखती है ! परंपरागत महौल में पली बढी यह स्त्री अपने दर्शन में स्पष्ट होती है --कि उसका जीवन सिर्फ पर सेवा और सबकी आंखों को भली लगने के लिए हुआ है ! छोटी बच्चियां घर- घर , रसोई -रसोई ,पारलर-पारलर खेलकर  इसी सूत्र को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेने की ट्रेनिंग ले रही होती हैं .......ठीक उसी समय जब उसकी उम्र के लडके गन या पिस्तौल से मर्दानगी के पाठ पढ रहे होते हैं या कारों की रेस या बेमतलब की कूद -फांद- लडाई -झगडे के खेल खेल रहे होते हैं  ! एक जगह घर रचा जा रहा है एक जगह बाहर !

कोई कह सकता है कि यही है गहरे संतुलित समाज की नींव ! वेलडिफाइंड ! गाडी के दो पहिए अपनी अपनी पटरी से बंधे ..! हम कहेंगे नहीं नहीं ! सौ बार नहीं ! अपनी कॉलेज की बच्चियों को भी कभी कभी समझाते हैं ! वे नहीं समझना चाहतीं !ज्यादातर निम्न या मध्य वर्गीय परिवारों से आई हुई ये छात्राऎं अपने लिए बेहद असुविधाजनक पहनावे में आती हैं ! गर्मी व उमस में सिंथेटिक कपडे , बेहद ऊंची हील के सैंडल बार बार फिसलते दुपट्टे में जडी तरह तरह की लटकनें ....

कभी कभी आसपास नवविवाहित जोडों को देखने पर भी अजूबा होता है !  रास्तों में बाजारों में काम की जगहों में चमकीले तंग कपडों में फंसी ,पल्ला और उसकी जगह जगह उलझती लटकनें संभालती रंगी पुती  स्त्रियां ! अपने आप संभलकर चल पाने में असमर्थ पति की बाहं का सहारा लिए लिए कभी कभी लुढकने को होती स्त्रियां ! अजीब अजीब प्लेटफार्म वाले सैंडलों की हीक को मेट्रो और उसके प्लेटफार्म की दरार से निकाल कर हडबाडाती स्त्रियां ! अपने फिसलने पल्लू को संभालकर कंधे पर डालते हुए अपने पीछे खडी सवारी के मुंह पर मारती स्त्रियां !

इनके लिए ये नजाकत है ..फिमिनिटी है ..मजबूरी है ...फैशन है ... पता नहीं ! पर इतना तो साफ है कि ये अब घर में बंद सजी धजी घर संवारती घरहाइन नहीं रहीं है ! रीतिकाल भी अब जा चुका ! ये तो निकली हैं पढने.....लडने ...जूझने....! बराबरी  पर आने .. !पर अपने संधर्ष में अपने ही साथ नहीं हैं ये पैरों की हील ,ये पल्लू ,ये लटकन , ये नजाकत ! कहां से आ जाएगी बराबरी ! कैसे चलेगी मर्द को पीछे छोडती ये आगे ! ..क्या यही कहना होगा कि आप जरा धीरे चलें क्योंकि हम आपसे तेज नहीं चल सकतीं या अपनी ही चाल को बनाना होगा दुरुस्त , तेज और दमदार .........तो बदलें खुद को .....? और करें शुरुआत पहनावे से ही .........?  .....और आओ कहें उससे कि तुम चलो अपनी चाल से अपनी गति से और अब हम चलेंगी अपनी चाल और गति से और तुम्हारे साथ चलेंगी ...आगे भी बढेंगी ....

Monday, September 10, 2007

दे आर BAD BAD गर्ल्स

स्त्री विमर्श वाले बहसते विमर्शते रह गये और उधर लडकियों ने घोषणा कर डाली कि अब उनके अच्छे बने रहने का जमाना गया ! वे गा उठी 'वी आर बैड बैड गर्ल्स....जमाने को सुनना पडा कि वे कह रही हैं कि वे गंदी लडकियां हैं...."चक दे इंडिया "फिल्म की हॉकी टीम की लडकियां उद्बबाहु धोषणा करते हुए जो गीत गाती हैं वह है -

ना तो रोटियां पकाऎगी

ना छ्त पे बुलाऎगी

ना नंगे पैर आऎगीं

ना हंस के रिझाऎंगी

ना सर पे बिठाऎंगी

ना गोरी होके आंऎंगी

ना नखरे उठाऎंगी.....उन्हें नहीं दिखना सुन्दर -नाजुक और गोरी ,उन्हें नहीं तैयारी करनी पूरा बचपन एक दूल्हे को रिझा लेने की ,वे नहीं करेंगी सेवा , उन्हें नहीं चाहिए तारीफ या आपकी छाया ,आपका नाम ! वे नहीं अपने सपने छोडकर बाकियों के सपनों को पूरा करने की मशीन बनेगीं वे आपकी दी हुई जिंदगी नहीं जिऎंगी ....ये जिद की पक्की ,बहुत खूंखार ,बेशर्म ,अडियल , बेखौफ लडकियां हैं...

आह...... भौंह कटीली -आंखे गीली- घर की सबसे बडी पतीली भरकर भात पसाने वाली परंपरागत भारतीय लडकियों की बुद्धि कैसे भ्रष्ट हो गई ? संरक्षणशील लज्जाशील कर्तव्यशील शीलवती भारतीय लडकियां अब घरबार को दुत्कारकर इतनी बेपरवाह होकर निकल पडेगीं अपनी पसंद के रास्ते पर ! परिवार का क्या होगा ? समाज का क्या होगा ? मर्दवादी संसचना का क्या होगा ?

उफ............. उफ ये छुट्टी लडकियां वह सब नहीं करेंगी जो अब तक करती आई हैं तो क्या करेंगी ? क्या पा लेंगी ? क्यों पा लेंगी ? वे साफ कह रही हैं कि वे अच्छी लडकियां नहीं हैं इसलिए उनसे कोई भी कोई उम्मीद न रखे ! वे अब वह करेंगी जो वे हमेशा से करना चाहती थी ! वे अब नहीं मानेगी किसी भी सत्ता को और न ही किसी संरचना से कोई भी उम्मीद करेंगी ! वे आपके बनाए खांचे को तोडकर बाहर निकल गई हैं और अब किसी भी खांचे को अपने आसपास नहीं बनने देगी ! वे खुद कह रहीं हैं और बहुत साफ साफ कह रही हैं कि वे गंदी लडकियां हैं ! गंदी इसलिए क्योंकि आपके लिए अच्छी लडकियां जैसी होनी चाहिए वैसी वे नहीं हो सकती अब ! गंदी लडकियां कहलाने में जो आजादी है उसका भरपूर इस्तेमाल कर वे आपको और आपके ढांचों को ठेंगा दिखा देंगी !..................तब आप केंद्र में बैठे रहते थे जनाब और उन्हें अपने आसपास उलझाऎ रखते थे अब वे आपमें नहीं उलझॆगी ! अपने रास्ते चुनेंगी और अपने भरोसे अपने तरीके से चलेंगी !

आप क्या सोच रहे हैं कि ये क्रांति है उनकी या कि जंग है ? नहीं जी ये आपका और आपके ढांचों का उपहास है जिन्हें आपने बडे जतन और चालाकी से बनाए रखा अबतक ! जिन जडों में आपने नापतोल कर सिंचाई की वे अब आपकी करतूत पहचान गईं हैं इसलिए वे फैलेग़ीं जी भर फैलेंगी ......उन्होंने गंदी लडकियां होने के रिस्क को चुना है जानते बूझते चुना है.....वे आपकी मूल्य व्यवस्था को धता बताकर चल पडी हैं और आप उन मूल्यों की पोटली सर पर धरे बीच बाजार खडे हैं कि अब आपका क्या होगा ....? नहीं उन्हें गंदी लडकियां कहलाने में कोई ऎतराज नहीं ये उनके लिए गाली नहीं ! अच्छेपन के बोझ तले दबे रहना अब और नहीं गंदेपन के खिताब का वे पुरजोर स्वागत कर रहीं हैं !लडकियां आपको चुनौती रहीं हैं खबरदार उनके रास्ते में मत आना ...उन्हें रोकने की कोशिश मत करना ...उन्हें बांधने का ख्वाब मत देख लेना ....

वो देखो ...वे चमक रहीं ..वे हंस रहीं हैं ...उनपर अब कोई भार नहीं है ..कोई नकली आवरण अब नहीं ढोना है उन्हें....वे अपने बूते उडेंगी डूबेंगी तैरेंगी आप रोक नहीं पाऎगे.....सिर्फ इतना कह पाऎंगे .....वो देखो वो रही ...,.गंदी लडकियां ......येस दे आर बैड बैड गर्ल्स....

Friday, September 07, 2007

मुझे भी चांद चाहिए

ये आम औरतें भागती दौडती सी हरदम

इन्हें क्यूं चांद चाहिए

मैंने बहुत बार सुना है इन हांफती दौडती औरतों के मुंह से

हां किसी दिन चांद चाहिए

पर अभी तो नहीं

अभी तो अभी का झमेला ही बहुत है

और चांद भी तो दूर है बहुत

यह भी कि--अभी तो पैरों की जमीन ही नहीं पा सकीं पूरी

अभी तो चांद को देखने  भर का मौका नही

घर और बाहर बस बनाए रखने की जंग में लगी हूं अभी !

चांद चाहिए पर किसी मुनासिब वक्त पर

जब लगे कि हां पा ली जमीन भी

ये औरतें बातें करती हैं अक्सर एक दूसरे से

ऑफिस के रास्ते में ,बस के सफर में ....

बाजार के रास्ते में दो पल रुककर बतियाती ये औरतें अक्सर

बातचीत के बीच में शर्मिंदा हो रही होती हैं

कि इस चुराये हुए वक्त में वे फलां काम

कर लेतीं तो शायद सबके लिए अच्छा होता

आंचल संभाले भागती  जूझती ये औरतें

अपना हर जरूरी काम कर रही होतीं हैं

कोई और जरूरी काम छोड कर....

अक्सर दिखती हैं आसपास हाथ बढाकर

 चांद को छूने की तमन्ना पाले औरतें

सपनों में ये बुनती हैं पुल

और हकीकत में सोच रही होतीं हैं अक्सर चांद.....

Tuesday, September 04, 2007

मैं यार बनाणा नी चाहे लोग बोलियां बोलें ...


आजकल अपना ईमेल बाक्स खोलते ही एक दो ऎसे मेल जरूर दिख जाते हैं जिनमें पूछा गया होता है-- "इज फलां युअर यार ..." और आगे एक्सेप्ट या रिजेक्ट करने के उदार ऑप्शंस भी दिए गए होते हैं ! ऎसे रार- वादी युग में यार बनाने के इतने मौके हम सब को मिल रहे हैं और हम राग अलापते हैं कि समय बडा खराब आ गया है.... दोस्तों की कमी हो गई है ...भाईचारा खत्म हो रहा है ! भई हम तो अब ऎसे यारी के ऑफर पाकर इन दकियानूसी प्रलापी खयालों को तज चुके हैं ! दोस्ती के नए वर्चुअल कांटेक्स्ट में जीने का समय आ गया है और हम सब हैं कि अपने आस पास ओल्ड फैशंड मित्रता टाइप बातों की उम्मीद कर रहे हैं ! यार ये ग्लोबल युग है ! यहां बहुत दिल मिला कर पते के मित्र बनाने में लगे रहोगे , दोस्ती निभाने ..दोस्त के सुख दुख के साथी बनने या मित्र धर्म के पैमाने पर अपने और अपने मित्र को कसने के फेर में पडोगे तो बच्चू मारे जाओगे ! देखते नहीं टाइम कहां भाग रहा है ! अब दो चार दोस्तों से काम नहीं चल सकता दोस्त हों तो इतने कि सबों के नाम याद रखने मुश्किल हों जाऎं ....बनो तो इतनों के दोस्त बनो कि आपके नेट नाम के साथ लिखा दिखाई दे -'' फलां (220) या " ढिमकां (305) !ऎसे धांसू च फांसू (आलोक जी चोरी का इल्जाम न लगाऎ और कोई फेंकू च कैचू मुहावरा नहीं न मिला ) नाम - नंबर वाले, हममें हीन भावना की उत्पत्ति कर देने में सक्षम यार की दोस्ती ऎक्सेप्ट न करें तो और क्या करें.....बस आप फंस ही जाते हैं आकाश दिशा की ओर उठे हुए अंगूठे को क्लिक कर अपनी यारी लिस्ट भी बढा डालते हैं ! वैसे इस प्रेशर में ना भी आऎ तो आपकी नैतिकता आपकी इंसानियत (जिसका आप दम भरते रहे हैं ) आपको परेशान करेगी क्योंकि यारी के ऑफर को ठुकरा देने पर ऑफरकर्ता के लटके मुंह की कल्पना भी आप :( के माध्यम से कर पा रहे होंगे !


अब दिल की बात कहें--- ये दोस्ती, मित्रता सब बेकार के हिप्पोक्रेटिक लफ्ज हैं असल मजा तो "यारी" में है ! यारी के नए ग्लोबल मायनों में यह लफ्ज --मजे , टाइम पास और ,टेंशनलेस, फर्जलेस फर्जी दोस्ती के भाव से चिरकाल के लिए नत्थी हो चुका है !ये फर्जी नाम के साथ मर्जी की दोस्ती का अनंत विस्तार है ! यहां टाइम एंड स्पेस मोल्डेबल और रिवर्सऎबल हैं ! मिनी -माइक्रो--स्लिम के जमाने में दोस्ती का मोटा लबादा ओढे कौन घूमे ? वैसे भी टाइम क्राइसिस की टॆंशन में नेट की यारी फायदे का सौदा है !करना ही क्या है कोई भी यार सिलेक्ट करके दोस्ती का ऑफर ही तो भेजना है या आए हुओं को उनकी फ्रोफाइल और थोबडा देखकर हां या ना करना है !


हमारे घर के सामने वाले मंदिर में बहु बेटों पोतों की ठुकराई हुई बुजुर्गवार औरतें हर दोपहर बाद फिल्मी गानों पर बने भजन माइक पर गाती हैं ! कल उन्होंने कृष्णजन्माष्टमी के आने की खुशी में जो भजन गाए उनमें एक था _नी मैं यार बनाणा नी चाहे लोग बोलियां बोलें ...नी मैं बाज न आना नी.....! उनकी कृष्णोपासना में भी गोपियों की ही तरह लोक- कुल की निंदा- आलोचना का डर नदारद था , अंदाज नया था ! वे भी निर्गुण निराकार की यारी में डूबी थीं ( वैसे हम कृष्ण को सगुण साकार के रूप में ही पढाते हैं ) और अपने जीवन के सूनेपन को कृष्ण की यारी से आबाद कर रही थीं ...सो हमारा यह फायदा हुआ कि अपने लिखे हुए इस खामखाह के विलापी लेख के लिए बहुत कैची सा टाइटल मिल गया !खैर वैसे अब आप फंस ही गए हैं तो बताते भी जाऎ -


"इज नीलिमा युअर यार "!

Monday, September 03, 2007

आंगन के भीतर .... आंगन के बाहर

आंगन के भीतर वसंत है

आंगन के बाहर पतझड आ बैठा है..

मैं नहीं चाहती कि देखें पतझड

मेरे बच्चे या कि पूछें सवाल

झडे पत्तों की ढेरी को देख

जिसे बनाया है अभी अभी किसी

सडक बुहारती मजदूरिन ने..

मैं नहीं चाहती कि उठे मेरे भीतर दर्द

और मैं उठा लूं लपककर उसका

दुधमुंहा बालक तपती जमीन से

मैं नहीं चाहती देखना उस ओर के पतझड को

मेरे लिए मेरा आंगन ही मेरा सत्य़ है...

पर क्या करूंगी उन सवालों का

उठे हैं जो मेरे नन्हों के भीतर

हैरान हैं वे एकसाथ दो ऋतुएं देख

अभी वे नहीं जानते कि सत्य क्या है

आंगन के भीतर का वसंत या कि

बाहर पसरा पडा पतझड

--

Thursday, August 16, 2007

गुजरिए भूख, वासना और गंदगी के बाजार से - जरा दामन बचाके

गरीबी और शरीर की भूख की बैकग्राउंड में मेट्रो का नई दिल्ली स्टेशन ! एक का मैलापन और एक का उजलापन ! नहीं नहीं.... कोई दिक्कत नहीं होती हमें अपने साहित्य के विद्यार्थियों को विरोध और विरोधाभास अलंकार को समझाने में !

ये मेट्रो का नई दिल्ली स्टेशन है जहां से आप भारतीय रेल सेवा की कोई भी ट्रेन पकडकर पूरे भारत में कहीं भी जा सकते हैं ! नहीं जाना कहीं  ...? तो जनाब कोई हर्ज नहीं क्नॉट प्लेस की लकदक के साक्षी तो बन ही सकते हैं ! ..तो जनाब हाइटेकनीक और एयरकंडीशंड स्टेशन से बाहर की दुनिया में कदम रखना बडा जिगर का काम है दिल्ली घूमने वालों या दिल्ली में नए नए आए के लिए ! पर हमारा तो रोज का काम है यहां ! आप यहां आऎं ये भारत की राजधानी की भी राजधनी को घेरे एक अजब इलाका है ! इलाका क्या है विरुद्धों का सामंजस्य है !.... काले -सफेद का गैर आभिजात्य-आभिजात्य का हाशिए और केन्द्र का .... यहां मेट्रो के कर्मचारी आपको हर समय इसकी टाइलों -शीशों को चमकाते मिलेंगे ! कहीं गंदगी- धूल का कोई निशान नहीं....स्टेशन से बाहर निकलते ही आप एकदम उलट जहान में खडे पाऎगे खुद को .....! दिल्ली आपका स्वागत करेगी ...मूत्र की बदबू से बचने के लिए आप मुंह पर फटाफट रूमाल रख लेंगे  ,अपने कपडे बचाने की फिक्र में लग जाऎगे ... आप नाक कान मुंह सब बंद कर लेंगे पर आंख तो नहीं न बंद कर सकते ! आपकी आंखें देखेंगी सडक पर उलटे सीधे तरीके से रुके चलते वाहनों की भीड ,मैल में डूबे सैंकडों रिक्शे वाले , दीवार पर किए गए मूत्र की बहती धारों से अटी पडी पटरी पर मृत्यु की सी निंद्रा में सोए लावारिस नंगे लोग , कहीं कोई भूखी बेहद मैली विकृत चेहरे वाली रोती पछ्ताती बुढिया आपको शिकायत और एतराज से देखती होगी ...............!! भई ये सब आप देखॆगे हम तो रोज देखकर ये सबक लें चुके हैं कि बच्चू अगर देखा अटके भी और भटके भी ...और फिर ठीक 5 मिनट बाद शुरू होने वाली क्लास में क्या खाक पढा पाओगे.....,सो हमारी आंखें देखती हैं पर देखती नहीं ....पर कभी कभी रिक्शे वाले के फफोले भरे हाथों में पांच रुपये के सिक्के थमाते हुए उसके लाचार बीमार हारे हुए चेहरे और  उसकी मैल के मानवीकरण अलंकार हो जाने के साक्षी बन जाना पडता है !

..तो आप सोच लें कि आप यहां से निकलकर कहां मुडेंगे एक तरफ चमक की दुनिया दूसरी तरफ पहाडगंज के तंग इलाके और दिल्ली का "गंदा" इलाका जी बी रोड है ! आप नहीं सोचेंगे तो रिक्शे वाला आपकी आंख में आंख डालकर इशारों में ही पूछेगा ! यदि आप स्त्री हैं तो आपका पूरा हुलिया कई कई आंखों द्वारा जांचा जा रहा होगा1.,.... ये आंखें आपके पहनावे और चालढाल से आपके भीतर नगरवधू और कुलवधू के फर्क के सबूतों को खोज रहीं होंगी ! आप कुछ भी हों ये अंदाज लगाने में क्या जाता है कि आपका रेट क्या होगा एक बार का 10- 20 या 50 या 100 ....!!

उफ ...नहीं ...हम रोज दुखी नहीं हो सकते ...रोज रोज नहीं रो सकते ..हर वक्त सोचते भी नहीं रह सकते ...पर पढाना तो है हमें आधुनिक भारत का यथार्थ बारास्ता कविता ,उपन्यास ,कहानी........! यहां बच लेंगे, आंख मूंद लेंगे ,पक्के हो लेंगे.. पर क्लास में ये साहित्य पढाते हुए जब उसकी भावपूर्ण व्याख्या पर जाएगे .....तब कहां जाऎगे ....नहीं बच सकते .....फंस ही जाऎगे भाई ......!

....हां हां  ... ठीक वैसे ही जैसे मेट्रो से निकलकर क़ोलेज तक जाने में नहीं बच सकते ! ये सच जो आंखों के आगे पसरा पडा है ऎसे नहीं तो वैसे ..अब नहीं तो तब ...गलाऎगा ही...तपाऎगा भी ... सिर्फ मुझे ही क्यों ....आप सब को भी तो ...!!

 

( आगे भी पर बाद में )

Wednesday, August 15, 2007

ठीक नहीं आपका इतना मुस्कुराना

मुकुराना हमारे लिए कितना घातक हो सकता है यह बात कई बार हमें बहुत देर से पता चलती है और तब तक हम बहुत मुस्कुरा चुके होते हैं ! खास तौर पर स्त्री के लिए उसकी मुस्कुराहट के नतीजे अक्सर उसके खुद के लिए बहुत कडु़वे होते है ! कल अविनाश ने हंसी पर बात की थी ,पर हम तो अभी तक मुस्कुराहट पर ही अटके हैं और जान रहे हैं कि कहां मुस्कुराऎं ,कहां नहीं मुस्‍कुराऎं ,कितना मुस्कुराऎं  ...? अक्सर बस या रेल में यात्रा करते हुए किसी अनजान से नजर मिले और वह मुस्कुरा दे तो हमारी व्यावहारिक बुद्धि बहुत देर में जवाब देती है कि हमें क्या करना है दिमाग में सवालों की लहरें दौड जाती हैं कि कहीं पहले मिले तो नहीं ?कहीं यह पड़ोस का व्यक्ति ही तो नहीं? कहीं लंपट या सिरफिरा तो नहीं ?

 एक हमारी बडी उम्र की  जानकार हैं ,वे कहती हैं स्त्री को बेमतलब पुरुषों के सामने हंसना मुस्कुराना नहीं चाहिए  क्योंकि मर्द मानते हैं "लडकी हंसी तो फंसी" !पर  हमारी समझ में नहीं आता कि हंसी या मुस्कुराहट पर पुरुषों का पेटेंट  खुद स्त्री ही क्यों करती है ! पर वे मानती हैं कि स्त्री की हंसी या मुस्कुराहट पुरुष को एक खुला निमंत्रण होती है जिसके बाद वह आपके बारे में कुछेक धारणाऎं बनाने के लिए स्वतंत्र होता है जैसे कि-- आप बहुत भोली हैं ,आप कमसमझ हैं ,आपके अनुभव कम हैं, आपको बरगलाया जा सकता है, आप मुस्कुराहट के पात्र के सामने आत्मसमर्पणात्मक भंगिमा के साथ है !वैसे अक्सर हमने अपने मुस्कुराने के अतीत में झांककर देखा है तो पाया है कि बहुत मंहगा पडा हमें हमारा अंदाज ! जिस स्पेस में हम खुद को सबके बराबर मानकर मुस्कुरा रहे हैं वहां हमारी मुस्कुराहट को हमारी विनम्रता, और कमजोरी समझा गया  !  हमारा मुस्कुराना सहज मानवीय भंगिमा होता है यह वह भाव है जो मुलाकात या बातचीत में मन की निष्कपटता को बयान करता है !यह सामने वाले व्यक्ति के वजूद की स्वीकारोक्ति है! बेमतलब के संजीदापन की चादर गलत मौके पर भी ओढे रहना तो जरूरी नहीं ! अपने कार्यस्थल पर पुरुषों के साथ काम करती स्त्री का यह मानवीय हक है कि वह अपने मनोभावों को पुरुषों की ही तरह जाहिर होने दे ! अभी हाल ही में अखबार में एक शोध के नतीज़ों का सार यह था कि स्त्री यदि अपने वर्कप्लेस पर अपनी नाराजगी या गुस्सा जाहिर करती है तो वह चिडचिडी, असंतुलित और घरेलू दिक्कतों से परेशान मानी जाती है ! हमारे तो अनुभव कहते हैं कि इन "मानने वालों" में खुद महिलाऎं भी शामिल होती हैं वे महिलाऎं जो मर्दों की सत्ता को अंतिम सत्य मानकर खुद भी उनकी सत्ता बनने में थोडी सी सत्ता का सुख पा लेना चाहती हैं !

एक बार आप क्या मुस्कुराईं आपकी कोमल छवि की स्थायी इमेज ग्रहण कर ली गईं और लीजिए आप हो गईं उसमें ट्रैप !~आप अब सहिए जुमलेबाजी ,छींटाकशी , बिनमांगी सरपरस्ती , जबरिया रहनुमायी और " बेचारी स्त्री"  के भावों की बौछार! और जब आप इस छवि को तोडता- सा कोई प्रतिरोध भरा  कदम उठाएगीं तो कहलाऎंगी सिरफिरी ,किसी मर्द के द्वारा भडकायी गई या पति के द्वारा सताई गई या सास से परेशान या कि कुंठिता... उफ ....!

हमारा मुस्कुराने का अनुभव ज्यादातर तो बुरा ही रहा है पर हमने अभी हार नहीं मानी है ! हम तो यह मानकर अब तक मुस्कुराते आए हैं कि हम खुद को ऎसे ही मुस्कुराते देखना चाहते हैं और यह कि यह किसी भी इंसान की सहज वृत्ति है, और यह कि किसी और की वजह से हम क्यों छोडें मुस्कुराना !

अब आप ही बताइए कि हम क्यों न मुस्कुराएं ?

Monday, August 13, 2007

149 में से 112 गए

हर गर्मी की छुट्टियों में एक बहुत गैरपुण्‍य का काम करना पड्ता है - दिल्ली विश्वविद्यालय की उत्तरपुस्तिकाए जांचने का काम ! हमें पता नहीं होता कि किस कॉलेज की ये कॉपियां हैं ! हमें बस सवालों को देखकर जवाबों को आंकना होता है ! हर बार बडी आशा से हम कापियां लाते हैं और सबसे बचकर मनोयोग से उन्हें जांचने बैठते हैं और हर बार हमारे हाथ से कईयों की जिंदगी स्वाहा हो जाती है - मतलब कम से कम हमें तो यही लगता है ! हर बार मनौती मानते हैं कि भगवान अगर तू है तो इस बार कॉरेस्पॉंडेंस की कापियां न मिलें रेग्युलर वालों की मिलें वो बहुत बेहतर होती है ! पर लगता है भगवान है ही नहीं क्योंकि कभी भी मन की मुराद पूरी नहीं होती ! खैर जब ओखली में सर दे ही देते हैं तो मूसल से भी नहीं डरते हम ! लग जाते हैं काम पे लाल पेन और सवालों का पर्चा उठाके ! कसम से ऎसे ऎसे ओरिजनल आन्सर मिलते हैं कि हम अपने हिंदी साहित्य के अधूरे ज्ञान और अपनी कल्पना की कमजोर शक्ति पर मन मसोस कर रह जाते हैं ! प्रतिपाद्य लिखो ,निम्न की व्याख्या करो ,फलां का चरित्र- चित्रण करो ,फलां उपन्यास की उपन्यास के तत्वों के आधार पर चर्चा करो, शृंगार रस का उदाहरण दो या फिर फलां छंद के लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत करो......!

अब हमारे सवाल तो फिक्स्ड होते हैं पर भएया जवाबों में गजब का वेरिएशन ,फेंटेसी, बहादुरी ,गल्पात्मकता ,ओरिजनैलिटी क्रएटिविटी कूट कूट के भरी रहती है ! हमारे एक सहयोगी को उत्तर की कॉपी में दो बार पचास के नोट मिल चुके हैं (वैसे वे जनाब इकोनॉमिक्स पढाते हैं ) जबकि हमें हमारी प्यारी हिंदी की कॉपी के आखिर में लिखा मिलता है---

"सर/मैडम मुझे पास कर देना ! मैं बीमार थी इसलिए पढ नहीं पाई ! मैं आगे पढना चाहती हूं प्लीज" !

एसे में एक तो अपनी हिंदी का मारकेट रेट साफ दिखाई देकर भी हम अनदेखा करते रहते हैं बेबात फ्रस्टेशन मोल लेने का का फायदा ? एक कॉपी में नकल करने वाले/वाली ने नकल की बारीक सी पुर्जी जल्दी जल्दी में कॉपी के अंदर ही छोड दी तो कई कॉपियों में ऊपरी पन्ने पर एग्जामिनर के साइन के लिए छोडे गए खाली स्थान पर उत्तर देने वाले/वाली का साइननुमा नाम लिखा मिल जाएगा जैसे सुनीता , शेफाली वगैरहा....! ये नाम हमेशा लडकियों के क्यों होते हैं - जब सोचते हैं तो साफ दिखता है कि उत्तर देने वाला /वाली यह मानकर चल रहे हैं यदि उनकी कॉपी महिला एग्जामिनर के हाथ पडेगी तो "औरत ही औरत का दर्द समझ सकती है वाला मामला जम जाएगा ! यदि किसी पुरुष एग्जामिनर के हाथ से चेक हो रही है तो उसका सॉफ्ट कार्नर लडकी के नाम मात्र से जग जाएगा !

खैर जब आपको इतना झेलाया है तो हिंदी साहित्य को लेकर आपकी जानकारियों का वर्धन करना भी तो हमारा ही फर्ज बनता है ! इसलिए ये अमूल्य बातें जो हमारे होनहार बच्चों की अपनी सूझ बूझ का नतीजा हैं - पढकर ही जाऎ-

1 व्याख्या के लिए कविता कोई भी आए उसका रचयिता कालीदास या तुलसीदास ही होता है !

2 कविता या गद्य किसी भी कृति से उद्धृत हो "ये पंकतिया हमारी पाठेपुस्तक मे से ली गई होती है "

3 दोहा छंद का उदाहरण -"जो बोले सोणिहाल ससरियाकाल"

4व्याख्या में ज्यादा कुछ नहीं करना होता बस दी हुई लाएनों को आगे पीछे करके उन्हें बडा करके दिखाना होता है !

5 "शिंगार रस वहां होता है जहां कोई औरत सज धज के अपने प्रेमि से मिलने जाती है जिसमे प्यार का बहुत सा रस दिखाए देता है और उनके बहुत प्यार करने से ये बडता है ! इससे पडने वाले को आंनद मिलता है ...."

6 अनुप्रास अलंकार अनु +परास से बनता है इसमे एक ही शबद बार बार आता जाता है जिससे पडने में अच्छा लगता है कानो में भी अच्छा लगता है !

7 "सूरज का सातवा घोडा" प्रेम चंद ने लिखा है जिसका नायक बहुतों से प्यार करता है पर शादी एक से भी नहीं करता ! और इसमें ऎसी औरतओं की कहानी है जिनका चाल चलन ठीक नहीं है !

8 राज भाशा हिनदी हमारे राजाओं की भाशा है जिसका सारे देश में खूब विस्तार करना है ताकि भारत में एकता की जो कमी आ गई है वो दूर हो सके ! इसमें सारे शब्द बहुत मुस्किल होते हैं पर पदते रहने से आसान भी हो जाते है?

9 (किसी भी कवि का जीवन परिचय पूछा जाए वह लगभग एक सा होगा )

" नागार्जन कवि बहउत बडे कवि थे !उनका बचपन बहुत गरीबी में बीता पर उन्होने हार नही मानी ! वे लिखते गए सब तकलीफों में डरे नहीं ! उनकी कविता हमारे लिए बहुत जरूरी है ! वे बहुत ईमानदार और अच्छे कवी थे जिनको सब प्यार करते थे ! उनकी माता भ्चपन में ही मर गई थी इसलिए उनका पालन पोसन नीरू और नीता नामके जुलाहे ने किया ! वे उत्तरपदेश के लमही गांव में पैदा हुए थे ! उनकी पहली कविता उन्होंने बहुत बचपने में ही लिख ली थी बाद में वो लगातार लिखते गए उनकी भाशा में बहोत जादु है क्योंकि उनकी बाते मार्मस्पर्शी होती है जो की हिर्दय से निकलती हे ........!

10 बाबा बटेसरनात" उपनयास बहुत से तत्वों से भरा है जैसे चरित चित्रन , भाशा , संवाद , कथानाक ,देशकाल और वातावरन ! उसके सभी लोग एक दूदरे से बहुत अच्छे संवाद करते हैं जिनसे उपनयास का कथानाक आगे बडता है ! इसमे बहुत से पात्र हैं जिलका चरित चितरन बहुत गहरा है ! ये एसे पेड की कहानी है जो बहुत बुडा और समजदार है जिसको सब काटना चाहते हैं पर वो देश के लिए समाज के लिए जान दे देता है !....

इसलिए तो कह रहे हैं जनाब कि 149 में से 112 गए ! बाकी कितने बचे ?