मेरे शहर में शाम हर रोज आती है ! रोज उतनी ही बासी, उतनी ही भागदौड भरी और उतनी ही उदासीन !अब शाम कवि की काव्य प्रेरणा उस तरह से नहीं रही है शायद जैसी पहले हुआ करती थी ! संझा का झुटपुट, चिडिया की टुट-टुट वाली कविता भावना उपजाने में नाकाम शहरी शाम ! ये शामें ललाती सी , लुभाती सी कहां रही हैं, न कवि का मन अब कहने को करता होगा---मेघमय आसमान से उतर रही संध्या -सुंदरी परी - सी- धीरे धीरे धीरे..! भीडे लालडोरे इलाकों या फिर ऊंची सोसायटियों की ऊंची बिल्डिंगों के ऊपर के आकाश में कब शाम रात से समझौते का सौदा कर बैठती है और कब डूब जाती है शहराती नहीं जान पाता ,न जानना चाहता है
!मेरे शहर में दोपहर ढलने का नोटिस हाथ में लिए उजास निर्वासित सा निकल पडता है ! शाम बडकुंवरिया की सी पथरीली भंगिमा लिए आन खडी होती है बेकली का भाव अपने चेहरे पर लिए , बेकली अंधेरे की भीमकाया में खो जाने की.... !
मेरे शहर की धमनियों में बहती है मेट्रो मेरी शान ! इस छोर से उस छोर !उडेलती चलती है तरल शहराती झुंड--छोटे छोटे क्षुद्र कटोरों जैसे घरों में ! ऊपर आकाश में लाल और काले रंग का पारंपरिक मिलन और उसकी छाया में यमुना के पुशतों पर दौडता साइकिलों का रेला ...रोज रोज के लिए यूं ही प्रोग्रांड है ये दृष्य..मेरे शहर के केनवास पर ! यहां हर शाम थका - मांदा सा सूरज दिन भर की ड्यूटी से पसीज जाता है पर इन साइकिलों पर सवार कामगरों का मेला दस -दस घंटों की काम की पारी से भी क्या नहीं थकता ?....कम से कम साइकिलों के पैडलों पर पडते उनके पैरों की गति तो यही कहती है ....शाम के बेतरतीबे कोलाज में बेमेली से चिपके निरर्थक हिज्जे से चिपके जीते जन ...लाकों जन....
दिन में हल्की शर्म का झीना नकाब ओढे मेरा शहर हर शाम मॉलों में नंगा होने पर उतारू सा लगता है ! चमक, यौवन मूड और मौके का अद्भुत हाट !नया मूल्य , नया तेवर लिए शाम वहां बाजारू सी होने पर आमादा हर सकुचाये को निमंत्रण देती है....नए नेह का निशा निमंत्रण...
कैसे ठुकरा दिया जाए ये निमंत्रण....बहुत संयम की बात है..
ऊपर आकाश मॆं विरोधी रंगों का कितनी कुशलता से किया गया मिश्रण और यहां शहर की जमीन पर अंधेरे और चमक का साफ साफ बंटवारा.....यहां शाम जानती है दोनो छोरों की परिभाषा ......हम जाने या न जाने .....और जानना चाहें या न चाहें...