Sunday, December 14, 2014

शब्दों के  यायावर हम

कभी लगता है कि
शब्द सोहबत हैं
कभी महसूस होती है
इनके व्यामोह की तंग गिरफ्त
कभी दिखाई देता है 
इनसे रचा जाता व्यूह

कभी ये लगते हैं वहम जैसे
कभी इनके आदर्शों के
ताने बाने में जितने उलझती हूं
उतनी ही तीखी वंचना
छल जाती है
भर जाती है विषाद 

शापित अर्थों के साये
रात दिन पीछा करते हैं
पुरानी ऊन की उधेड़ बुन से
अंगुलियों की सिकाई करते शब्द
इनकी ढाल में छिपकर हारी हुई
हर लड़ाई खोलती है तिलिस्म
और हर शब्द बन जाता है
विस्मृत इतिहास की पीड़ा सा

शब्द की खोह में
एक अनवरत अंतर्यात्रा
और इन सूनी यात्राओं में
नहीं मिलता साथी कोई
इन अंध यात्राओं के
अकेले यायावर हम .........

Sunday, December 07, 2014

आपकी पैट्रीआर्की को खतरा बढ़ रहा है भाई जी

मैडम अपने पति और ससुराल से परेशान रहती हैं ।
अरे फ्रस्टेटिड लेडी है।
झगड़ालू नेचर है शुरू से इसका तो हम तो कबसे जानते हैं ।
ब्यूटी का घमंड है इसको ।
किसी के भड़काने पर चल रही है वरना इसका न इतना दिमाग है न इतनी हिम्मत ।
शक्की और डिप्रेस्ड है पर्सनल लाइफ में ।
खुद कइयों पे लाइन मारती है ! तब कुछ नहीं होता ।
औरत को जी औरत की तरह ही रहना चाहिए सोफेस्टिकेटिड बनके । चालू औरतें हमें नहीं पसंद आतीं ।
अजी ज़रा कुछ कह क्या दिया इसने तो बवाल ही मचा दिया कौन सा इसके ब्लाउज़ में हाथ धुसेड़ा था ।
अजी वैसे तो बड़ा रस लेती है पर इस बार ऊपर चढ़्ने के लिए बेचारे को फंसा रही है
अजी हमें पता है कैसे इसकी नौकरी लगी कॉम्प्रोमाइज़ कर कर के आज सती सावित्री बन रही है ।
यार इससे बचके रहना किसी पर भी केस बा सकती है ये तो \
सीधे सीधे नौकरी करे सबको खुश रखे अपना घर जाए पर इसे तो अड़ंगेबाजी करनी है न ।
यार मैं बताउं सब सेक्सुअली डिप्राइव्ड औरतें ऎसी ही होती हैं । ज्यादा प्राब्लम है तो घर क्यों नहीं बैठती भई ?
अपने कामकाजी जीवन में एक बार कोई स्त्री अपने खिलाफ किए गए हैरास्मेंट पर आवाज़ उठा भर दे । मैं अपने अनुभव से कह रही हूं उस स्त्री को यही और ऎसा ही बहुत कुछ सुनने को मिलेगा । वर्क प्लेस पर स्त्री - उत्पीड़न का भी अपना एक समाजशास्त्र है । मर्यादामर्दोत्तम सब जगह समान रूप से पाए जाते हैं और सब जगह समान रूप से ही विरोध के स्वरों को दबाने के लिए तत्पर रहते हैं ।
लड़के रेप जैसा जधन्य अपराध कर दें तब भी आप कहते हैं कि लड़के हैं गलती हो ही जाती है और लड़कियां अपने बचाव में मारपीट भी करें तो आप उनकी संघर्ष के पीछे महान कारण की खोज करते हैं और कारण आपको कनविंस होने लायक न लगे तो आप अपनी अपनी अदालतों में लड़कियों के खिलाफ फतवे जारी करने बैठ जाते हैं । दोगले हैं आप । डरपोक हैं आप । लड़कों के लक्षण अख्तियार करती लड़कियों से आपको अपने सपनों तक मॆं डर लगता है । आपको तो लड़की के बलात्कार के कारण भी लड़की के शरीर में ही खोजने की आदत हो गई है । और अगर लड़कियां हिंसा कर दें लड़कों के साथ तो भी कारण उन लड़्कियों के भीतर ही दिखाते हैं आप । यारों पिट लेने दो छोकरों को भी थोड़ा बहुत । सारा सोशल जस्टिस इसी हाथापाई पर एप्लाई मत कर डालो । आवाज उठाती लड़कियां आपको क्यों भाएंगी । ये उनके बढ़ते हौसलों का सबूत है जिससे आपके समाज की बुनियादी सेटिंग को भरपूर खतरा है । सारा समाज जब एक तरफ हो जाता है असल लड़ाई तो तब शुरु होती है । चुप चाप प्रताड़ित होती रहतीं वे तो सहानुभूति पातीं बलात्कृत हो जातीं तो टुच्चा सा केस बनता और लड़के ऎड़ी चोटी का जोर लगाके , सोशल प्रेशर एप्लाई करके बरी हो लेते , मारी जातीं तो आप इंडिया गेट पर दिये लगाते , खबर बनाते , कैंदिल मार्च करते । आपकी जरा दिनों की हाय हाय से मृतक लड़कियों की आत्मा को शांति मिल जाती । और बाकी की लड़कियां कोई न कोई सबक पातीं और अपने लिए इसी सड़ी गली सोसाएटी में कोई कोना तलाश कर चुप हो लेतीं । 

संभाल लीजिए ! आपकी पैट्रीआर्की को खतरा बढ़ रहा है भाई जी !!

Wednesday, October 01, 2014


पतनशील पत्नियों के नोट्स
नीलिमा चौहान

अब मैं सुधरने की सोच रही हूं ! घर ,परिवार ,पति ,बच्चे बस इन्हीं के लिए जीना ! अचार मुरब्बे डालने और रायते के लिए बूंदी तक खुद घर में तलने वाली ,पति के आगे जवाबतलब न करने वाली ममतामयी मां और आज्ञाकारी सेविका बनकर सबका दिल जीत लेने वाली औरत बनूंगी ! ईश्वर ने साफ - साफ तौर पर अलग -अलग भूमिकाएं देकर हमें धरती पर भेजा है हम नाहक ही एक दूसरे की फील्ड में टांग अडाते रहते हैं ! अपनी बाउंडरी डिफाइन जितनी महीनता से करूंगी उतना ही पति को अपने कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को निभाने के लिए मजबूर कर पाउंगी ! मुझे तरस आता है उन औरतों पर जो बेफिजू़ल एक बटन पति की कमीज़ पर न टांकने या थाली देर से परोसने पर पति से लताड़ी जाती हैं ! उनपर भी रहम खाने का मन करता है जो औरतें आदमियों की फील्ड में पैर जमाने की जद्दोजहद में न घर की रहती हैं न घाट की ! जितना पति पर निर्भर रहोगी व पति को खुद पर निर्भर रखोगी उतना ही तुम्हारी शादी व प्यार प्रगाढ होगा ! हम सुधर जाएं बस पति तो खुद ब खुद सुधर जाएगा !
अब तो आप सब की ही तरह इस नारीवादी औरतवादी नारेबाजी - बहसबाजी से मैं भी तंग आ चुकी हूं ! सब सही कह रहे हैं ये इंकलाबी ज़ज़्बा हम सब औरतों के खाली दिमागों और नाकाबिलिय़त का धमाका भर है बस ! हम बेकार में दुखियारी बनी फिर रही हैं ! सब कुछ कितना अच्छा, और मिला मिलाया है ! पति घर बच्चे ! हां थोडी दिक्कत हो तो पति की कमाई से मेड भर रख लें तो सारी कमियां दूर हो जाएंगी ! फिर हम सब सुखी सुहागिनें अपने अपने सुखों पर नाज़ कर सकेगीं ! सब रगडे झगडे हमारी गलतफहमियों या ऎडजस्टमेंट की आदत न होने से होते हैं ! बस कभी - कभी एक सवाल मन में उठता है वो यह कि - हम कितने सुखी हैं ये खुशफहमी तभी तक क्यों बनी रहती है जब तक हम सारी घरेलू जिम्मेदारियां हंसते हंसते उठाती रहतीं हैं ! काश जब हम पति के मोजे ,बनियान जगह पर टाइम पर न रखें और सुबह की चाय देरी से दें और फिर भी घर की खुशहाली बनी रहे साथ ही हमारे बारे में नाकाबिल औरत का फतवा न जारी किया जाए ! आस -पास की बराबरी -बराबरी चिल्लाने वाली औरतों का उलझाउ -पकाउ फेमिनिज़्म आपके दाम्पत्य जीवन के रिश्ते की पैरवी में नहीं आएगा तब और आप सोचेगी हाय एक बटन टांक ही देती तो क्या हर्ज हो जाता ??हम पत्नियों को अपना ध्यान गोल रोटियां बनाने ,रसोई के रास्ते पति का दिल जीतने और घर की स्वामिनी कहलाने के योग्य बनने में लगाना चाहिए ताकि हम पति को यह अहसास दिला सकें कि उनका कर्म है ज्यादा कमाना तथा पत्नी को घर व समाज में एक दर्जा दिलाना ! सोचिए अगर पति कमाकर लाने से इंकार कर दे तो सारा दिन बाहर खटता है वह भी तो खुद को मजदूर मान सकता है उसे घर मॆं चैन की दो वक्त की रोटी भी न मिले तो क्यों वह घर लौट के आना चाहे? निहायत ही बुरा ज़माना आ गया है घरों की शांति खत्म हुए चली जा रही है ! हर बात में दमन ,शोषण देखने की आदत पड़ चुकी है कुछ औरतों को ! ये विवाह नाम का रिश्‍ता बहुत समझदार समझौतों से चलता है जो हम पत्नियों को ही करने आने चाहिए ताकि अपने द्वारा बनाए गए सलीकेदार घर में सुव्यवस्था से रहने वाले पति को इस सुख की लत डाल सकें ! ये लत ही उसकी मजबूरी बन जाए यह हमारी स्त्री सुलभ सदिच्छा होनी चाहिए ! बाकी पुरुष की सत्ता को चुनौती की जरूरत ही नहीं पडेगी जब हम विरोध का मौका ही नहीं आने देंगी ! यूं भी पति पत्नी के संबध सब जन्नत में पहले से तय होते हैं उनको निभाने की जिद होनी चाहिए बस !
इसलिए मेरा तो मानना है कि ये बस बददिमागी फितूर है, बदजमानाई हवा है और निखालिस बदजुबानी है कि औरतों की जिंदगी में कोई जुल्‍म पेशतर है। सच बस इतना है कि गोल रोटियॉं, मुरब्‍बे पापड. तक बनाने में नाकाबिल औरतों की काहिली के चलते शादी के इस खूबसूरत रिश्‍ते पर संकट आन पड़ा है जिसे थोड़ी सी तैयारी और मजबूत इरादे से निपटा जा सकता है।  अब मैंने बस इसी इरादे को पूरा करने का हलफ उठाया है। ऊपरवाला मुझे मेरे इरादे में सफल करे ।  आमीन । 

Tuesday, September 30, 2014

अभी साथ था अब खिलाफ है 
वक्त का भी आदमी सा हाल है

आईना घर में रहा बरसों मगर
आज उसकी आंख में क्यू्ं सवाल है

खत में लिखा आएंगे अबके बरस
धीमी कर दी वक्त ने क्यूं चाल है

मुद्ओं की भीड़ में क्यों खो गया
मुददई को बस रह गया मलाल है

आदमी को आदमी का वास्ता
आदमी ही आदमी की ढाल है



Friday, September 26, 2014

स्त्री  यौनिकता  के आईने  में



कौन जानता था कि शेफाली जरीवाला के 'कांटा लगा' वाले गाने से जिस स्त्री सेक्सुएलिटी का आगाज हुआ वह अंतत: पोर्न अभिनेत्री सनी लियोन के स्टारत्व के खुले उत्सवीकरण तक जा पहुंचेगी और इतनी खुली यौनिक अभिव्यक्ति को सहर्ष स्वीकारने वाले हमारे समाज में स्त्री की सेक्सुएलिटी एक हश हश टॉपिक ही रहेगी !दरअसल हमारे समाज में स्त्री स्वातंत्रय और स्त्री की सेक्सुएलिटी को एकदम दो अलग बातें मान लिया गया है ! पुरुष की सेक्सुएलिटी हमारे यहां हमेशा से मान्य अवधारणा रही है ! चूंकि पुरुष सत्तात्मक समाज है इसलिए स्त्री की सेक्सुएलिटी को सिरे से खारिज करने का भी अधिकार पुरुषों पास है और और अगर उसे पुरुष शासित समाज मान्यता देता भी है तो उसको अपने तरीके से अपने ही लिए एप्रोप्रिएट कर लेता है ! 

जिस दैहिक पवित्रता के कोकून में स्त्री को बांधा गया है वह पुरुष शासित समाज की ही तो साजिशा है ! यह पूरी साजिश एक ओर पुरुष को खुली यौनिक आजादी देती है तो दूसरी ओर स्त्री को मर्यादा और नैतिकता के बंधनों में बांधकर हमारे समाज के ढांचे का संतुलन कायम रखती है ! स्त्री दुहरे अन्याय का शिकार है- पहला अन्याय प्राकृतिक है तो दूसरा मानव निर्मित ! गर्भ और योनि की ढोने वाली स्त्री पुरुष पर निर्भर स्त्री कैसे कैसे और किन किन तरीकों से और किस किस से हक के लिए लड़े ! कोई भी सामाजिक संरचना उसके फेवर में नहीं है क्योंकि सभी संरचनाओं पर पुरुष काबिज है ! उसके अस्तित्व की लड़ाई तो अभी बहुत बेसिक और मानवीय हकों के लिए है सेक्सुअल आइसेंटिटी और उसको एक्स्प्रेस करने की लड़ाई तो उसकी कल्पना तक में भी नहीं आई है ! अपनी देह और उसकी आजादी की लड़ाई के जोखिम उठाने के लिए पहले इसकी जरूरत और इसकी रियलाइजेशन तो आए ! हमारा स्त्री-समाज तो इस नजर् से अभी बहुत पुरातन है ! स्त्री के सेक्सुअल सेल्फ की पाश्चात्य अवधारणा अभी तो आंदोलनों के जरिए वहां भी निर्मिति के दौर में ही है हमारा देश तो अभी अक्षत योनि को कुंवारी देवी बनाकर पूजने में लगा है ! एसे में शेफाली जरीवाला अपनी कमर में पोर्न पत्रिका खोंसे ब्वाय प्रेंड के साथ डेटिंग करती दिखती है तो इससे हमारे पुरुष समाज का आनंद दुगना होता है उसे स्त्री की यौन अधिकारों और यौन अस्मिता की मांग के रूप में थोड़े ही देखा जाता है ! सनी लियोन को अभिनय करते देख भी हमारा लिंग पूजक समाज अपनी ग्रंथि को ही सहलाता पाया जाता है और सुनहले पर्दे की ऐसी बड़ी परिघटनाएं स्त्री समाज को आजादी और अस्मिता की पहली सीढी भी फ्रर्लांघने लायक संदेश नहीं दे पातीं !

Tuesday, September 23, 2014

देवता के विरुद्ध

मेरी आस्था ने गढ़ॆ देवता , 
विश्वासों ने उनको किया अलंकृत 
मेरी लाचारगी के ताप से 
पकती गई उनकी मिट्टी 
मेरे स्मरण से मिली ताकत से वे
जमते गए चौराहों पर
मैंने जब जब उनका किया आह्वान 
आहूत किया यज्ञ किये
रक्तबीज से उग आए वे यहां वहां 
काठ में ,पत्थर में , पहाड़ में , कंदराओं में
मेरे वहम ने उनकी लकीरों को
धिस धिस के किया गाढा
मेरे अह्म ने भर दिया
असीम बल उसकी बाहुओं में ,
मुझे दूसरे के देवता पर हंसी आती
मुझे हर तीसरे की किस्मत पे आता रोना
मुझे सुकून मिलता अपने देवता के
पैदा किए आतंक से

एक देवता क्या गढा मैंने
मैं इंसान से शैतान हो गया

Monday, September 22, 2014

उसे  हम  अपराजिता  नहीं  बना  पाए ...


उसकी कथा सुनकर और उसकी दशा देखकर अपने संतुलन को बनाए रखना एक चुनौती हो गया मेरे लिए .... वह 17 - 18 साल की लड़की एनीमिया ,गरीबी ,लाचारगी का जीवंत उदाहरण लग रही थी । वजन उसका इतना कि जिससे ज्यादा अब घट नहीं सकता था और विषाद इतना कि जीने की उसकी ललक उसे हरा ही नहीं पा रही थी । मैं अब अपनी जिंदगी बनाना चाहती हूं मैं अब कुछ करके दिखाना चाहती हूँ जैसे वाक्य वह खुद को दिलासा देते हुए बार - बार दोहराती, मानो वह चाहती हो कि उसके इन वाक्यों को हर वह व्यक्ति सुन ले जो उसकी वजह से शर्मिंदा हुए हैं । उसकी मां और नानी खास तौर पर जिन्होंने अपनी बेटी को क़ॉलेज पढने भेजा, और उसके जीवन को बनाने के लिए अपनी खाली जेबों और आशीषों भरे दिल को उड़ेल दिया। मां उंचे घरों में खाना बनाती , पिता ऑटो चलाते ,नानी सरकारी अस्पताल में सफाई का काम करती ,और रात भर घर के बच्चे उँचे ब्रांडों की जींस के मोटे कपडे को खाकों पर रखकर कैंची से कटाई करते ताकि सुबह कैंची के जोर से सूज गई हथेलियां खाली न हों उनपर चँद रुपये हों ,परिवार के खस्ता हाल महौल को उनका योगदान ..! 
गरीब परिवार की पुनर्वास कालोनी के तंग गरीब घर की बेहद काली बेटी से कौन शादी करेगा ये दुख मां व नानी के अपराधबोध में बदल रहा था। अपने कालेपन और बदसूरती के अहसास की पीडा और उसपर गरीबी के अंधकार से भरा भविष्य । समाज के आवारा शिकारियों के लिए ऐसे घरों की बेटियां सबसे आसान शिकार होती हैं ! पडोस के घर में रहने वाले एक लड्के ने प्रेम और शादी का यकीन दिलाकर उस लड्की का शारीरिक शोषण किया। मां व नानी ने इस पर यह सोच कर कोई ऐतराज नहीं किया कि वह लडका अपना वादा निभाएगा ,उनकी बेटी की जिंदगी बन जाएगी ! घर के अन्य लोगों से छिपकर यह विडम्बनापूर्ण व्यापार कुछ दिन चला और बाद में लड्के दृश्‍य से गायब हो गया। लड्की को एक ऎसा शारीरिक रोग संक्रमित कर गया कि कई महीनों नानी के अस्पताल में इलाज चला , सेहत और गिरी , मन की बची खुची ताकत जाती रही। पर तीनों औरतों ने हार नहीं मानी। वे फिर से अपनी ताकत जुटाने लगीं ! बच्ची ने छूटी हुई पढाई को फिर से शुरू किया । जीवन को एक लास्ट चांस देने के लिए , मांओं के सीनों को ठंडक देने के लिए। पर उसकी दोबारा उठने की उसकी उतावली , उसके पीछा न छोडने वाले दुर्भाग्य ,और उसके दुर्जेय हालातों ने मिलकर फिर से एक खेल खेल डाला ! उसने परीक्षा में नकल की और यूनिवर्सिटी की टीम के हाथों पकडी गई । अपने भयों ,दबावों ,और असुरक्षा के प्रभाव में उसने जो गलती की उसके कारण यूनिवर्सिटी से निकाल दी गई। 
उसका गरीब अभागिन और बदसूरत बेटी होने का अपराध बोध अब और अधिक बढ गया था ! अपनी जुझारू मां व नानी को निराश करने पर अब वह पूरी तरह से इस धरती पर खुद को बोझ मान रही थी। इतनी सी उम्र में उसने जीवन के साथ कई समझौते कई वादे कई प्रयोग कर डाले। उसे नहीं पता था कि वह क्या बनना चाहती थी या क्या करना चाहती थी। पर उसे लगता था कि जब मां व नानी का इतना विश्वास है तो वह जरूर कुछ न कुछ कर सकेगी। कुछ ऎसा कि उसके कालेपन पर उसे चिढाने वाला समाज उसको कम नफरत से देखेगा। उस दलदल में जिसे सब समाज कहते हैं किसी ठूंठ को पकडकर वह भी पैर जमाकर डटे रहना चाहती थी। उदासीन पिता और सुन्दर छोटी बहनों की नजर में एक जगह की दरकार उसके मन में टीस की तरह पनप रही थी। और वो लडका जिसने उसकी सेहत ,दिल और शरीर के साथ खिलवाड किया उसको चाहे वह जहां कहीं भी हो उसकी औकात बताना चाहती थी। पर अब कुछ नहीं हो सकता था अब वह टूट रही थी , पांव कांप रहे थे मन दुनिया से उठ चुका था , मां व नानी की हिम्मत का तिनके बराबर सहारा इतना मजबूत नहीं था कि तेज थपेडों में उसे बचा ले जाए ! निराशा की उस सीमा पर वह थी कि अब मुत्यु ही उसे वह  होना लग रही थी। क्योंकि उसके हिसाब से अब यही  सबसे सरल रास्ता था ।
मैं उसकी बीते साल की एक लाचार अध्यापिका अपने सारे फलसफों, सारे दिलासों सारे स्नेह के बावजूद समाज व हालात की शिकार उस निरीह् को उसकी पीडा से नहीं उभार पा रही थी। क्योंकि दरअसल मैं खुद कटघरे में खडा अपराधी थी ।

Tuesday, August 26, 2014


उन उंचाइयों  की  गिरावट 

पांच - छह साल की थी तो अक्सर ऊंची मंजिल से जमीन पर आकर धड़ाम गिरती थी सपने में और जब झटके से आंख खुलती तो खुद को जिंदा पाकर हैरानी व खुशी होती ! तब खत्म हो जाना या नहीं रहना क्या है शायद ही पता था पर जिंदा होना क्या है यह अवश्य अच्छे से पता चल चुका होगा ! स्कूली जीवन में गणित में फेल हो जाने का सपना अक्सर आ जाता था और उस दिन सुबह आंख खोलकर उठते हुए जिल्लत का काहिली का तीखा अहसास होता ! लगता जिसे हिसाब नहीं आता उसके लिए दुनिया का कौन सा दरवाजा खुल पाएगा ? बाद में समझ आने लगा कि ये दोनों ही तो सपने एक ही सा डर बयान करते हैं ! कैल्कुयुलेश्न और जीवन  का गहरा नाता अगर आप नहीं समझना चाहते तो जमाने की ठोकरे आपको मजबूर कर देती हैं कि आप भी इस गहरे नाते के नाते के महत्त्व को मानें वरना जीवन भर ऊंचाई से गिरने और गणित में फेल हो जाने के सपने देखते रहें ! 
कभी कभी जीवन के अनुभव यह अहसास कराने के कोशिश करते हैं कि व्यक्ति के कर्म व पुरुषार्थ जीवन  के उधर्वमुखी विकास के नियामक तत्त्व  नहीं हैं वरन वास्तविक नियंत्रण तो उस प्रयोजनवादी और उपयोगितावादी प्रवृत्ति का है जिसको अर्जित करने की प्रेरणा के उदाहरण चारों ओर बिखरे हुए हैं ! इस अवसरवादी समीकरणजीवी  युग में लाभ-हानि, कर्म-अकर्म , व्यष्टि -समिष्टि का व्याकरण मानो हमारे समाजीकरण  के हर अनुभव से मिल रहा है !  मनुष्य के भीतर के संघर्ष को जयशंकर  प्रसाद ने इड़ा व  श्रद्धा के बीच का  आदिम  संघर्ष कहा है ! बुद्धि और भावना के इस आदिम विरोध को साधने की पीड़ा न उठाकर मनुष्य बुद्धि के माहात्म्य के  आगे  एकनिष्ठ समर्पण करने को  तत्पर है ! बिना भावना के  निरंकुश बुद्धि प्रतियोगिता व  प्रतिस्पर्धा  के लिए उकसाती है ! इस दौड़ में आगे निकलने  के लिए खड़ी भीड में  भी केवल वही सफलता की  तथाकथित उंचाइयां पाएगा जो  सबसे  अधिक  निर्मम ,प्रयोजनवादी , लक्ष्यकेन्द्रियत यानि कुल  मिलाकर सभी समीकरणों का सबसे सटीक हिसाब लगाने  योग्य  होगा ! दरअसल व्यक्ति की यह विडम्बनापूर्ण स्थिति  सफलता व  प्रगति  की फर्जी व लकीरबद्ध परिभाषाएं  अपनाने के कारण उत्पन्न हुई है ! इस  प्रगति  व उंचाई के लिए व्यक्ति इसी उपरोक्त दृष्टिकोण के कारण  नीच  साधनों और शैलियों को  अपनाने से भी कोई गुरेज  नहीं  करता ! साधन व साध्य की उत्कृष्टता व पवित्रता का  कोई परस्पर  सहसंबंध आज  हम  स्वीकार नहीं  करना चाहते क्योंकि हमारे  लिए मात्र परिणाम ही  मायने  रखता  है ! उस परिणाम तक  पहुंचने  के  लिए  कितनी निकृष्टता , कितने समझौते या कैसे भी समीकरणों को अपनाने पड़ॆं - जीवन की जंग  में विजयश्री का महत्त्व  है ! इस प्रतिस्पर्धात्मक परिवेश में जीवन केवल गणित बन  जाता है आस्थाविहीन और श्रद्धाविहीन ! गणित के सूत्र रटना और अमल में  लाना ! जीवन  के गणित में इतनी महारत हासिल  हो  जाना  कि कोई संवेदना  या  मूल्य उस कैल्क्युलेश्न के मार्ग  को  बाधित  न  कर  पाए ! मस्तिष्क , बुद्धि और इड़ा मिलकर मानवता के विकास के पैमाने भी  तय  करें  व मार्ग  भी ! भावना  , संवेदना मनुष्य  की समस्त  कोमल  वृत्तियां भीतर के  अज्ञातवास में ही  रहें !
किंतु इस जीवन  दृष्टि से ,  इस गणित से और प्रयोजनवाद से हासिल उंचाइयां खोखली व एकांगी होती  हैं ! इन उंचाइयों पर चढ़ते हुए व्यक्ति अपना समस्त सफलता ,  योग्यता और श्रेष्ठता के बने - बनाए खांचों में अपने मौलिक व्यक्तित्व को ढालने  की चुनौती में  उलझा  रह  जाता है जो अक्सर  एक डर का  रूप ले  लेती  है ! ये डर जीवन को लगातार नियंत्रित करने का प्रयास करता है ! परंतु जिस  क्षण हम  इस  भेड़्चाल की  संस्कृति  के  पाश  से  खुद  को  मुक्त  करने   का  साहस  करते  हैं  हम  पर  रखा  समस्त  बोझ तत्क्षण  उतर  जाता  है !  हम  स्प्ष्ट देख  पाते  हैं अपना  मार्ग  और  अपना  लक्ष्य ! बिना  गणितीय जटिलताओं  वाला सहज  संगीतमय आस्थामय जीवन जिसमें अपराधबोध ,आत्मा का  दमन या नैतिक दुविधा नहीं ! उंचाइयों का  कोई व्यामोह या तथाकथित विकास  की कोई  मृगमारीचिका  नहीं , कोई  विकृति भी  नहीं  ! आज मुझे वे बचपन  के भयावह  सपने नहीं आते तो इसलिए नहीं कि मैंने हिसाब-  किताब सीख लिया है बल्कि इसलिए नहीं आते कि मैंने ऎसी केल्क्युलेशंस से हासिल होने वाली ऊंचाइयों और उनसे पैदा होने वाली गिरावट को समझ लिया - ' मुझे नहीं चाहिए उन शिखरों की ऊंचाई , मुझे उन ऊंचाइयों से डर लगता है,.... 

Saturday, August 02, 2014



खुद की परछाइयों के हवाले क्यूं मैं खुद को करूं
खुद की खुद से खुदाई से मुलाकात अभी बाकी है 

उन्हें क्या मिल गया ये रंजो रश्क क्यों हो मुझे
रुह के अमन चैन के सवालात अभी बाकी हैं

उन इमारतों में इन इबारतों में बहुत खोजा तुझको
ढल गया दिन यूं ही पर वस्ल की रात बाकी है

ठहर गए पानियों में ये जो अक्स दिखता है
ग़ुज़री होंगी किश्तियां जज़्बात अभी बाकी हैं

आ गले मिल कि ये मौसम न बदल जाए कहीं
आ लगा लौ कि ये कायनात अभी बाकी है

Friday, July 25, 2014

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

मैंने देखा कि उनकी आंखें विस्मय और कौतुहल से चमक रही हैं ....!!... कॉलेज में अपने पहले दिन अपनी अध्यापिका से उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि वह उनसे कहे कि आप परीक्षा में अंक लाने के लिए ना पढें... और न मैं उस पद्धति से आपको पढाउंगी जिससे विद्यार्थी परीक्षा में अंक तो ले आते हैं लेकिन अपने और अपने समाज के खिलाफ हो रही साजिशों को समझने और उनका विरोध करने की कुव्वत पैदा नहीं कर पाते !
हर नए साल कॉलेज में पप्पू पाठाशालाओं से पास होकर आने वाले विद्यार्थियों की इस जमात के दिमाग की खिड़कियों को अब नहीं तो कब खोलेंगे ? बेहतर है कि ये बच्चे जान लें कि व्यवस्थाएं सदैव व्यक्ति विरोधी होती हैं वहां केवल चूहेमारी चलती है ! कोई भी व्यवस्था, विरोध को नहीं उगने देना चाहती इसलिए ये सुनिश्चित किया जाता है कि शिक्षा के दुश्चक्र से एक भी क्रांतिकारी ना पैदा होने पाए ! व्यवस्थाएं कोई प्रश्न या असुविधाजनक स्थिति नहीं चाहतीं वे केवल भक्त चाहती हैं ...अंधभक्त ...जी हुजूर ..लिजलिजे गिलगिले चूहेमार.....! व्यवस्थाएं सारे कायदे -कानून और फैसले ताकतवर पूंजीपतियों के हक में बनातीं हैं ! ....व्यवस्थाएं सीसैट और फोर यीयर सिस्ट्म जैसे हथियार अपनाकर हमें ज्ञान और विकास के पहले पायदान पर भी पहुंचने देना नहीं चाहतीं ! वे हमारे बौद्धिक संसाधनों का विदेशी औपनिवेशिक ताकतों के हित में इस्तेमाल करती हैं....

.....मैंने उन्हें बताया कि एक '"कोड ऑफ प्रोफेश्नल एथिक्स "नाम की चीज विश्वविद्यालय में लागू की गई थी ताकि कोई भी टीचर विद्यार्थियों को सिर्फ सतही  और सूचनात्मक ज्ञान ही दे सके, उन्हें चिंतनशील प्राणी ना बना सके.... उन्हें आलोचनात्मक ज्ञान और विवेक ना दे सके !मैं इस आचरण संहिता का तहेदिल से विरोध करती हूं जो मेरे व मेरे विद्यार्थियों के शिक्षण - अधिगम के रास्ते में आए ! शिक्षक व्यवस्था का गुलाम ना होता है ना बनाया जा सकता है ! वह चाण्क्य हो सकता है वह गांधी हो सकता है ताकि कोई हिट्लर ना पैदा हो सके !.....
मैं साहित्य पढ़ाती हूं और साहित्य का काम ही है आइना दिखाना अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना ! अन्याय और कुव्यवस्था के प्रति विरोध करने की प्रेरणा देना ..जब व्यवस्थाएं मनमानी करें तो उन्हें पलट देना ..क्रांति के जरिए एक समतामूलक समाज की स्थापना करने की पहल करना ..मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखने का धैर्य उत्पन्न करने की शक्ति का आह्वान करना ..अपनी सम्प्रभुता को हर कीमत पर बचाए रखने का हौसला देना ...!! मैंने अपने प्रिय नए विद्यार्थियों से हूबहू यही संवाद करते हुए उनमें यह विश्वास जगाया कि भले ही वे अति साधारण वर्ग के बच्चे हैं लेकिन वे इस देश का उज्जवल भविष्य हैं नए समाज की आधारशिला हैं नई क्रांति के अग्रदूत हैं और उनसे ही अब कोई उम्म्मीद बची है ..!!... इस व्यवस्था की सभी वंचनाओं , षड्यंत्रों ,अन्याय की परम्परा के लिए हम बड़ी पीढ़ी उत्तरदायी है जिसके लिए हो सके तो हमें क्षमा कर देना ! पता नहीं अपने इस संवाद में मैं कितनी सफल हुई होंगी पर अगर इनमें से एक भी विद्यार्थी जग गया तो विरोध और क्रांति की आग जलती रह सकेगी -

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

Monday, July 07, 2014

गुलामी का ग्रेंड-डिज़ाइन

सारा मामला ग्रेंडडिजाइन का है जनाब ! चाहे हमारे विश्वविद्यालयों पर चार साला शिक्षा नीति को थोपने की साजिश हो या उच्च - शिक्षा में सतही ज्ञान परोसेने वाले पाठ्यक्रमों के निर्माण की घटना हो या सिविल सर्विसिज में भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के आगे हीन बना देने का दुष्चक्र हो ...सब एक ही मास्टर प्लैनिंग का हिस्सा हैं ! ये उत्तर औपनिवेशिक इरा के अपने चरम रूप की झांकियां ही तो हैं जब हमारी भाषा , संस्कृति और ज्ञान पर "उनका ' नियंत्रण बनता जा रहा है ! ह्मारी भाषाओं को सरलीकृत करके उनको दीन- हीन और अनुपयोगी घोषित कर किया जा रहा है ! धीरे- धीरे हमें भाषिक पंगुता की ओर लेजाकर "वे" हमें अपनी भाषा की बैसाखियां पकडाना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यदि मन को गुलाम बनाना है , सोच को अगुवा करना है तो पहले अभिव्यक्ति के तरीकों को और आवाज को छीनना होगा ! दासता के महान डिजाइन की संकल्पना करने वाले जानते हैं कि तोपों से और बाहरी बल से गुलाम बनाने की बजाय टार्गेट को मन से सोच से गुलाम बनने के लिए प्रेरित करना कारगर और चिरस्थायी तरीका होता है !
हमारे विश्वविद्यालयों में भी ज्ञान को अपग्रेडिड और आधुनिक रूप में पेश करने के नाम पर जो पाठ्यक्रम और उसके प्रारूप लागू किए गए वे इसी साजिश का नतीजा थे ! ज्ञान का सतही और स्तरहीन , ढांचाविहीन ,परिकल्पना विहीन डिजाइन !


इस डिजाइन को मिलिट्री रूल के रूप में लागू किया गया, असंसदीय तरीके थोपा गया और उसके लिए सभी लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया गया ! साफ था यह पाठ्यक्रम इस बात को सुनिश्चित करता था कि छात्र सतही ज्ञान ही हासिल कर पाए और वह इस सिस्ट्म में केवल कल्रपुर्जा बनकर रहे !वह सोचने- समझने और सवाल करने के काबिल न बचे और अंतत: परफेक्ट गुलाम पैदा किये जा सकें !
आज हमें देश में अलग अलग रूपों में जो लड़ाईयां लडनी पड रही हैं वो सब आखिरकार एक ही हैं ! अपनी भाषा और ज्ञान की सम्प्रभुता की ये लड़ाईयां हमारे अस्तित्व के लिए किया जाने वाला हमारा संघर्ष हैं ! पर इनको एक करके देखने और मिलकर जूझने की कुव्वत अभी हम पैदा नहीं कर पाए हैं ! सिविल सर्विसिज के अभ्यर्थियों द्वारा किया जाने वाला आंदोलन बहुत छोटे तबके का ही ध्यान खींच पा रहा है ! हमारे यहां दूसरे की लड़ाई में अपनी टांग न फंसाने की जो नीति है उसका खामियाजा हर आंदोलन को उठाना पड़्ता है जबकि इसका पूरा फायदा सत्ताधारियों को मिल जाता है ! वरना क्या वजह थी कि एक स्तरहीन पाठ्यक्रम: इतने तानाशाह तरीके से देश की सबसे बड़े विश्वविद्यालय पर रातोंरात थोप दिया जाए और देश को उसकी सूंघ तक ना लगने पाए ! उत्तर औपनिवेशिकता की  जटिल अवधारणा  आसानी से समझ  में आ  जाती है जब हम बड़े चिंतकों और विचारकों और साहित्यकारों को पढ़ते हैं ! प्रसिद्ध अफ्रीकी साहित्यकार  चेख हामिदू अपने उपन्यास "एम्बिगुअस एड्वेंचर" में लिखते हैं - " काले उपमहाद्वीप को देखें तो यह बात समझ में आने लगती है कि ' उनकी' तोपों की असली ताकत उस दिन महसूस नहीं होती जिस दिन वे पहली बार गोले उगलती हैं ...इन तोपों के पीछे नए स्कूलों की नींव होती है ! नए स्कूलों की प्रकृति में दो चीजें हैं - तोपों के गुण भी हैं और चुंबक के भी ! तोपों के जोर से इसने फतह हासिल की लेकिन अपनी इस फतह को टिकाऊ  रूप देने के लिए इसने शिक्षा का सहारा लिया ! तोपों से शरीर पर अधिकार किया और स्कूलों से आत्मा पर ! "
जब देश की शिक्षा नीति बाहरी ताकतों के अनुसार बनाई जा रही हो और मातृभाषाओं की हत्या की योजनाएं बनाई जा रही हों : ऐसे में बुद्धिजीवी तबके का दायित्व और बढ जाता है क्योंकि देश का एक बड़ा तबका इतनी दूरअंदेशी से देखने योग्य नहीं बनने दिया गया होता और दूसरा छोटा पर शक्तिशाली तबका "उनके" साथ मिली भगत में है ! आश्चर्य कि भाषाओं के दमन की नीति और अंग्रेजी के प्रभुत्व को आरोपित करने के खिलाफ चल रही लड़ाई अपने ही घर में अपने ही लोगों से है !अंग्रेजी की अनिवार्यता का फर्जी नियम लागू करके , देश की सर्वोच्च सेवा करने वाले तंत्र में अंग्रेजी भाषा और उसी के हितों की पूर्ति करने वाले तबके को काबिज करके -- हम दासता के परम शिकंजों में फंसने जा रहे हैं ! जाहिर है जिसकी भाषा होगी उसी के हित और अधिकार होंगे ! बेजुबान और शब्दहीन की क्या बिसात होगी ! इसी प्रक्रिया में भारतीयता, राष्ट्रीयता, संस्कृति , अस्मिता और विकास जैसे शब्द हाशिए पर पहुंचकर अपना अर्थ खो देंगे और केवल शब्दकोश में सुप्त पड़े पाए जाएंगे !

Wednesday, May 07, 2014

कोई लौटा दे मुझे मेरी नासमझी और बेफिक्री के दिन

समझदारी आने पर यौवन सचमुच चला जाता है और पैसा और स्थायित्व आ जाने पर साहस - हिम्मत रूपी टायर की हवा निकल जाती है ! जैसे मायके से बुलावा आने पर तंग करने वाले ससुरालियों को छोडकर नवेली बहू भागती है वैसे ही दो दिन की भी छुट्टियां आ जाने पर ह्म दिल्ली छोड पहाडों की ओर भाग खडे होते थे ! ना कोई डर ना कोई आशंका ना कोई योजना ...सिर्फ स्पिरिट के बल पर..
.....रात के ग्यारह बारह बजे हमारी और नोट्पैड वाली सुजाता जी की अल्लसुबह में 4 बजे ही गली मुहल्ले को टाटा बाय बाय बाय कर देने की योजना बनती ...नक्शे पर सबसे दूर के निर्जन पहाडी इलाके का लक्ष्य बनाया जाता ......जल्दबाजी में घर में ही एकआध बैग छूट जाता तो दिल को ये भरोसा देकर चुप कराते चलो बच्चे तो गिनके चारों गाडी में हैं ना वो नहीं छूट्ने चाहिए थे ! रास्ते में वहम होता भाई रसोई में गैस तो शायद जलती रह गई है ...सौ किलोमीटर दूर आके ऐसा वह्म ..उधर हमें वादियां और पहाड बुला रहे होते ...तब सोचते परिसर के प्लंबर को फोन करते हैं वह लकडी की सीढियों को छ्ज्जों पर टिकाकर ऊपर चढ लेगा और रसोई की खिडकी में से झांककर सही हालात का पता दे देगा अगर जल रही होगी तो खिड्की से लंबा डंडा डालकर गैस बुझा देगा ..तीसरे ही माले का तो घर है उन्हें तो कई कई मालों पर चढ्ने का काम होता है !
एक बार तो निकलते हुए जल्दबाजी में हमारी हथेली कट गई थी खून काफी बह रहा था उधर सुजाता जी के पेट में तेज दर्द रात से ही उठ रहा था .....पर क्या करते पहाडों की हसीन वादियों की याद चुंबक बनी हमें खींच रही थी और दिल्ली से दो दिन की कुट्टा कर ही चुके थे ! सो मैं आधा लीटर खून लुटाकर और सुजाता जी कराह रूपी ट्रॉल को इगनोर करते मंजिल पर पहुंच ही गए !

......दस साल पुरानी सेकेंड हैंड मारूति ऐट हंड्रड , चिलचिलाती धूप के थपेडे, कम बजट ,दो दो चार चार साल के बच्चॉं की तंग गाडी में होती आपसी लडाइयां जिनकी गंभीरता भारत पाक सीमा विवाद से कतई कम लैवल की ना होती............एक बार हम चौपटा -तुंगनाथ की चोटी पर बैठे थे और घर में पानी की लाइन फट्ने से घर के दरवाजे की गौमुखी से गंगा और जमुना की तेज धारा बह रही थी फोन का संपर्क पहाडों पर कम ही हो पाता है सो दो दिन बाद पता चला अब क्या करें ...हम तो 6 दिन की यात्रा पर आए थे दो दिन में कैसे लौट जाते ...सो दिमाग के धोडे गधे सब दौडा डाले ..हल निकला कि मित्र जाकर घर का ताला तोडें, प्लंबर से लाइन जुड़वाकर नया ताला लगवा दें और दोस्ती का फर्ज निभाएं ........

..हाय क्यों और कहां चली गई वो अल्हडता और बेफिक्री ..वो तंगहाली...वो नासमझी ....! आज अपनी ही उस कैफियत की खुद ही मुरीद हूं ! पर कुछ भी कर लूं नहीं लौटते वे दिन ! जैसे नर्सरी एड्मीशन से पहले मां बाप बच्चे को केजी तक का स्लेबस रटा के ही दम लेते हैं कहीं कोई अच्छा स्कूल ना हाथ से निकल जाए .. वैसे ही महीने दो महीने पहले सफर की योजनाएं बनने लगती हैं...साफ सुथरा चकाचक होटल सर्च करके ऑनलाइन बुक कराकर, पावती हाथ में लेकर, हेल्थ कार्ड लेकर ,इलाके की पूरी जानकारी पहले ही हासिल करके कहीं निकलते हैं कि कहीं कोई अच्छा टूरिस्ट प्वाइंट ना छूट जाए रास्ते में कोई संकट ना पड जाए पूरी तैयारी होनी चाहिए....!! क्या करें दिमाग दिल से ज्यादा चालू हो गया है क्लास के सबसे मेधावी व हाजिर जवाब बच्चे की तरह ! क्लास पर उसी का कंट्रोल है ...बाकी सब भावनाएं घर से पढकर ना आने वाले बच्चों जैसी बैक बेंचर बनीं रह जाती हैं ......

आह नहीं चाहिए ऐसी समझदारी और पैसा ! कोई लौटा दे मुझे मेरी नासमझी और बेफिक्री के दिन !!

Tuesday, March 09, 2010

हे भगवान ! हमें मोटी होने का हक दो !

प्रार्थना - हे भगवान हमें मोटी होने का हक दो ! हमें अपनी छाती और बाहों पर बाल उगाने का हक और हिम्मत दो ! हमें देह को सजाने और न भी सजाने का फैसला लेने की बुद्धि दो ! हमें हिम्मत दो कि हमसे आइना जब सवाल करे हम उसे उलट दें ! हमें हिम्मत दो कि हम छाती को छिपाती न फिरें ! हे भगवान हमें हमारी देह ऊपर उठा दो !

पिछले साल जिम जाकर हुलिया और सेहत सुधारने का भूत सर पर सवार हुआ ! वजन में दो चार किलो का इजाफा मुझे नाकाबिले बर्दाश्त था ! मैं सोचती उम्र बढ रही है शरीर ढल रहा है स्टेमिना कम हो रहा है ! शायद जिम का व्यायाम मुझे कोई लाभ पहुंचाए ! मुझे लगता था एक लंबी उम्र परिवार के लिए दौड दौडकर बिता दी , खुद को खपा दिया ! सीढियां चढने में हांफना , वर्क लोड से सांसों का तेज हो जाना , शरीर में भारीपन महसूस होना.....अब कुछ समय खुद को और अपने स्वास्थ को भी दूं ! जिम में जाकर पता चला मैं बहुत पतली और स्वस्थ थी ! वहां पतली होने आई कई महिलाएं अपने 80 , 100 और 120 किलो के शरीर से युद्ध कर रही थीं ! सोनिया ,मोना , अनीता ..कोई विवाहित तो कोई अविवाहित ! ट्रेडमिल पर ,साइकिल पर, ऎलिप्टेकल पर पसीने से लथपथ ,बिना नाश्ता किए घर का बहुत सा काम निपटाकर , पति और बच्चों को भेज कर 2 से ढाई घंटे शरीर से कडी मेहनत करवाने वाली उन स्त्रियां से जब बातचीत होती स्त्री समाज की नियति पर क्रोध आता !

अनीता की उम्र अभी 22 साल है और वजन 80 किलो ! ऊपर से गालों पर फुंसिया और वह कमाती तक नहीं ! उसके पापा अपनी बेटी की बदसूरती और नाकाबिलितय से परेशान होकर रातों को सोते तक नहीं ! एक दिन वह बोली कि ' मैंने नर्सरी टीचर का एग्ज़ाम दिया हुआ है अगर उसमें मेरा नाम नहीं आया तो मैं सुसाइड कर लूंगी ! वह बोली पापा कहते रहते हैं कि तू पतली तो हो ही सकती है कि नहीं ! इतना तो मेरे पर उपकार कर ही सकती होगी ! मैं कहां से हो जाऊं पतली सब कुछ करके देख लिया ! "- जब वह मुझे अपनी बिखरी कहानियां सुन रही होती मैं सोच रही होती ये कोई उपन्यास या कहानी में से उडकर आई हुई घटनाएं हैं ! इनकी जिंदगियों में कोई रोशनी कोई चमक नहीं ,कोई लडाई का भाव भी नहीं ! काश ये सोती न होती जाग जातीं !

सोनिया से साइकिल चलाते हुए अक्सर बात होती ! वह बेहद पढी लिखी पिता की लाडली बेटी है ! उसके पिता और उसने 34 लडके रिजेक्ट किए ! उसके पिता को अपनी बेटी के मेंटल प्रोफाइल से मैच करता लडका नहीं मिला !आखिर में पडोस के बचपन के साथी से शादी की ! हाईली क्वालिफाइड ,बारीक समझ वाली सोनिया अपनी आधी अधूरी आपबीती सुनाते हुए कभी रो पडती तो कभी गुस्से से आंख लाल करके फदकते होंठों से कहती कि आज तो मन किया कि अपने हस्बेंड के पेट में चक्कू मार दूं ! कॉर्पोरेट जगत के उस पति को बच्चे की पैदाइश के बाद मोटी हो गई पत्नी नहीं चाहिए ! दोनों के बीच लडाई के ढेर सारे मुद्दे हैं नौबत तलाक तक आई हुई है पर असल बात आकर मोटापे तक पहुंच जाती है ! पति पर्फेक्शनिस्ट है इगोइस्टिक ,मैनेजमेंट गुरू - जिसे अपनी पत्नी बच्चा जनते ही मोटी ,भद्दी ,गंवार और जंगली लगने लगी है ! साल छ महीने में आने वाली सास और कुंवारी ननद के साथ मिलकर पति उसके गंवारपन का मातम मनाते हैं ! उसने अपनी पत्नी को हर साल तोहफों में पतले होने की मशीनें लाकर दी हैं !45000 वाला ट्रेडमिल , स्टेशनरी साइकिल , टमी ट्रेनर , तरह तरह के वेट्स ..... ! वह कहता है " ..बाकी सब तो तू छोड 5 साल से तू पतली तक तो हो नहीं सकी ! "
सोनिया रोज बिना खाए 3 घंटे की कडी एक्सरसाइज करती है उसने 3 महीने की पेमेंट जिम में की है उतना समय खुद को पतला होने के लिए रखा है और साथ साथ स्कूलों में नौकरी के लिए इंटरव्यू भी दे रही है ! शायद उसके बाद वह पति को छोडने या न छोडने के बारे में कोई फैसला ले पाएगी ! ( सोनिया से माफी पिछ्ले सितम्बर में उसने मुझसे मेरे ब्लॉग में अपनी आपबीती लिखने के लिए कहा था पर मैं आज जाकर लिख रही हूं ! )


ऎसी ही और भी कहानियां हैं जो दुख देती हैं ! सोनिया की तरह " चक्कू मार देने जितना गुस्सा पैदा करती हैं ! पर कहीं कुछ नहीं बदलता ! न प्यार से न ही क्रोध से ! और अंत में मेरे हाथ प्रार्थना में खुद -ब खुद उठ जाते हैं - हे भगवान ! हमें खुद को समझने और खुद के लिए जीने का मौका दो ! हमें हमारे हिस्से की खाद दो , हवा दो , पानी दो ! हमें भी इंसानों की पंक्ति में जगह दो !

आमीन !



Tuesday, December 01, 2009

मेरी नाप की चप्पलें

मजबूत , आरामदेह और हल्की चप्पलें मैं हमेशा से खोजती रही हूं ! एक आध बार बाज़ार में ऎसी चप्पल मुझे मिली भी और उसे पाकर मुझे लगा कि मानो मैंने कोई मैदान मार लिया हो !

चप्पल और  कामकाजी औरत का नाता बहुत गहरा होता है ! यदि चप्पल साथ न दे तो बस के पीछे भागकर उसमें चढना , मेट्रो की बहती भीड को चीरकर आगे बढकर उसमें चढना , ऑफिस की सीढियां जब देर हो हो रही हो तो भागते फलांगते चढना ( वैसे देर तो अक्सर ही हो रही होती है ) बाजार से दूध ,सब्जी दवाई दालें और मेहमानों के लिए बिस्कुट नमकीन खरीदते हुए घर की ओर भागना ,.....अगर चप्पल  भी आजकल के प्रेमियों की तरह साथ देने से इंकार कर दे तो क्या हो ?

बाजार में कई तरह की अजीब - अजीब चप्पलें देखकर मुझे हमेशा से हैरानी होती रही है - रंग बिरंगी ,पतली-पतली ऊंची ऊंची एडी वाली , चिलकनी , लटकन, डोरी शीशा ,फर ,झूमर , कढाई जबतक न हो मानो औरतों के लिए चप्पल सैडिलें बन ही नहीं सकती ! जाहिर है कि कि इन चप्पलों की सूरत और सीरत में ओई तालमेल नहीं होगा ! इन्हें पहनकर कोई भी स्त्री दौड भाग तो दूर ठीक से खडी भी कैसे होती होगी मुझे ताज्जुब होता है ! फिर भी ये चप्पलें बन भी रही हैं और बिक भी रही हैं ! पतली कमर के साथ पतली लंबी हील के सैंडिल जबतक न हों - बलखाई  नजाकत भरी चाल और अदा कहां से आएगी ? शायद दुनिया की जूता कंपनियां फेमिनिटी के पोषक तत्वों पर काफी शोध कर चुकी हैं ! मजबूती टिकाऊपने और सहूलियत के तत्वों को गायब करके हमारे पांव के लिए सबसे दुर्गम डिजाइन वाली चप्पलें ही बनाई जाती हैं ! आपके लिए अच्छी चप्पल के मायने जूता कंपनियों की "अच्छी" की परिभाषा से उलट होंगें ! हमें घीमी , मदमाती गजगामिनी चाल इन्हीं चप्पलों की बदौलत ही तो मिल सकती है !image

हमारे सौंदर्य के मानदंडों में कद और सुंदरता का गहरा नाता है सो अच्छे लंबे कद के प्रदर्शन के फेर में स्त्री अपने लिए ऊंची से ऊंची हील की चप्पलों को पहनती हैं ! अक्सर इस तरह की चप्पलों से उनके पैरों के तकलीफ होती है , थकान बहुत होती है ,गिर पडने का खतरा बढ जाता है नोकदार ऎडी किसी गड्ढे, नाली के जालीदार ढक्कन या सीढी चढते हुए अटक जाती हैं - पर स्त्री को पीडा सहने की आदत होती है ! ब्यूटी और स्टाइल ही नहीं यहां अपने भीतर पनपी हीनता ग्रंथी को भी सवाल है ! कष्ट तो सहना ही होगा ! कष्ट तो शरीर पर वैक्सिंग करवाने , भौहें बनवाने और बच्चा जनने में भी होता है ! पीडा सहना तो हमारी आदत में शुमार है ! शायद पीडा सहने की प्रौक्टिस करते रहना हमारी विवशता है ... !

जब कभी स्पोर्ट्स जूतों में और आरामदेह चप्पलों में घूमती लडकियों को देखती हूं तो काफी राहत मिलती है ! स्त्री अपने शरीर को जब समाज और पुरुषों के नजरिये दसे न देखकर अपनी नज़रों से देखना शुरु करेगी तब उसे संज्ञान होगा कि उसने अपने और अपने शरीर के साथ कितना अन्याय किया है !

मुझे अपने लिए जैसे तैसे अपनी नाप की आरामदेह चप्पलें बहुत ढूंढ के बाद मिल ही जाती हैं ! उन्हें पहनकर आत्मविश्वास, तेज़ी  निर्भीकता से चलती हूं ! पर मेरी साथी औरतों को कैसे कहूं कि बस स्वयं को और कष्ट देना अब वे बंद करें ! साथिनों की क्या कहूं मैं तो अपनी छात्राओं तक को नहीं कह पाई !

एक बार अपने कॉलेज में परीक्षा कक्ष में मैंने बहुत मोटे और लंबे प्लेटफार्म वाली चप्पलों को पहने एक लडकी को देखा ! अति साधारण घर की लडकी ने जैसे तैसे समय और फैशन के साथ कदमताल मिलाए हुई थी ! फिल्मी तारिकाएं मानो उसका आदर्श थीं जिनकी नकल के बेहद सस्ते कपडे पहने हुए थी वह लडकी ! उसकी चप्पलें मानो मेरे पैरों में घाव किए दे रही थीं ! मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने उससे कहा कि उसे ऎसी चप्पलें नहीं पहननी चाहिए इससे तबीयत खराब हो जाएगी ! उस लडकी ने बडे सपाट और ठंडे तरीके से  जवाब दिया - " मैडम अगर ऎसी चप्पलें नहीं पहनूंगी तो तबीयत खराब हो जाएगी " !

Wednesday, September 02, 2009

हाउस , फ्राउऎन , सेक्स - मार्गिट श्राइनर

अपनी पिछली पोस्ट में मैंने एक अनोखे तेवर वाले उपन्यास "  घर ,घरवालियां ,सेक्स "का नामोल्लेख  किया था !  कई मित्रों ने इस उपन्यास के बारे में जानना चाहा है ! इसका हिंदी अनुवाद अमृत मेहता ने किया है तथा इतिहास बोध प्रकाशन द्वारा यह प्रकाशित है !  एक अक्खड , मर्दवादी , बकवादी और  स्त्री और घर के चक्कर में खुद को लुटा पिटा  मानने वाले पुरुष के अंदरूनी गुबार को पेश करती है ! उसने पत्नी से मांगा प्यार , सेक्स खुशी , सुरक्षा  ! जिसके लिए उसने अपना सबकुछ कुर्बान किया - दिमाग , वक्त , आज़ादी ! किंतु उसने जितना इंवेस्ट किया इतना उसे मिला नहीं !  उसे मिली -एक ठंडी , घर और बच्चों के नैपी और रसोई की बास से भरी ,कामकाजों में उलझी धोखेबाज, बहानेबाज और पति की कमाई पर जीने वाली स्वार्थी औरत !

यह एक  " कुशल चातुर्यपूर्ण गद्य रचना है जिसमें पत्नी द्वारा त्याग दिए जाने के बाद कथक अपना मरदाना बकवादी चेहरा दिखाता है !"

इसकी रचना एक  स्त्री ने की है !  मारी थेरेज़े - सुपरमार्केट की खजांची ,अपनी बीवी को संबोधित करते इस उपन्यास के पीडित पुरुष का दर्द पेश है   ---

" ...तुम देख सकते हो ,लुगाइयां हमारा क्या हाल कर देती हैं ! बिना पलक झपकाए वो हमारी ज़िंदगी बर्बाद कर देती हैं !चट्टान की चटनी बना देती हैं !तुम लोग हो तो बुनियादी तौर पर निर्मम ! और कठोर ! जानती हो मेरा धीरे-धीरे मेरा क्या खयाल बनता जा रहा है ? मेरा यह खयाल बनता जा रहा है कि तुम्हारी यह तथाकथित रहस्यात्मकता एक धोखा है : नारी की रहस्यात्मकता, नारी , एक रहस्यमय जीव , नारी हिरणी , परी , जादूगरनी ! कई बार जब तुम स्वप्निल नेत्रों से खिडकी के बाहर देख रही होती हो और तुम्हारे नेत्र दमक रहे होते हैं तो मुझे लगता है कि तुम्हें महावारी हो रही है , और कुछ नहीं !यदि इसके पीछे कोई सिद्दांत जोडना है तो उसको यथार्थनिष्ठ सिद्ध करना होगा! मेरा मतलब कोई तो सबूत होना चाहिए , जो तुम्हारे बारे में जानकारी दे : कोई दूरदृष्टि हो , कोई दर्शन हो साहसकर्म का कोई सपना हो ! लेकिन है कहां महिला दार्शनिक , दूरदृष्टि रखने वालीयां , या दुस्साहसी स्त्रियां ? शोधकर्ता ? तुम लोगों ने अभी तक एक ही गहरा शोध किया है - बंदरों की कामक्रियाओं पर ! तुम लोग तो ठीक से कोई नारी आंदोलन भी नहीं चला सकीं !

.......एक बार औरत बच्चा पैदा कर दे तो सेक्स तो उसके बाद ज़्यादातर खत्म हो जाता है ! उसे बच्चा मिल गया, अर्थात सुरक्षा मिल गई , प्यार की अमानत , गारंटी और फिर उसे सेक्स में दिलचस्पी नहीं रहती ! हम मर्द वैसे नहीं हैं, इसलिए तुम लोग चाहती हो कि हमारी दिलचस्पी न सिर्फ अपनी बीवियों में न रहे बल्कि दूसरी औरतों में भी न रहे ! खैर यह बात तो सब अच्छी तरह से जानते हैं: पहले तो तुम हमेशा बच्चे के साथ व्यस्त होती हो, फिर तुम थकी होती हो तुम्हॆं आधासीसी का दर्द होता है आदि ! हमेशा जब हम तुम्हारे नजदीक आने की कोशिश करते हैं तो कोई न कोई गडबड तुम्हारे साथ रहती है ! या तुम्हें महावारी होती है , या बच्चे अभी नहीं सोए या तुम्हें इच्छा नहीं है , क्योंकि हम तुमसे कभी बात नहीं करते या क्योंकि हम बहुत उंचा बोले हैं और या क्योंकि हमने कुछ पी रखी है , और तुम शराबी के साथ नहीं करना चाहती और या क्यॉंकि हमने कुछ नहीं पिया और इस कारण चिडचिडे हैं और क्योंकि तुम ऎसे आदमी के साथ नहीं करना चाहती जो हमेशा चिडचिडा रहता है और चूमाचाटी नहीं करता इत्यादि ! यह सब कुछ स्वभावत: लुके छिपे अपरोक्ष ढंग से ! ऎसा कभी नहीं होगा कि कोई बीवी अपने मियां से सीधे -सीधे कहाँ देकि वह उसके साथ नहीं लेटेगी! सवाल ही पैदा नहीं होता ! तुम लोग ऎसे दिखावा करती हो कि तुम तो चाहती हो ! सिर्फ हालात ही इसके खिलाफ हैं !................समस्या सिर्फ बंदे की नहीं है ! समस्या सिर्फ प्रेम की नहीं है ! समस्या औरतों की है ! वे वास्तव में होती ही प्रेमहीन हैं ! ऊपर ऊपर से ! सतही ! बस दिखना चाहिए , असली चीज़ वही है ! बस असुरक्षा नहीं चाहिए , जोखिम नहीं चाहिए , स्वयं को सुरक्षित रखना है बस , और फिर वे सद्वभावपूर्ण दांपत्य जीवन भी चाहती हैं ! लेकिन सेक्सहीन ! क्योंकि इससे तो अशांति उत्पन्न होती है न ! और पुरुष बरसों इस स्थिति के साथ निभाता रहता है ! परिवार की खातिर , ज़िम्मेदारी की खातिर , फर्ज की खातिर ! और औरतों को देखना बंद कर देता है सेक्सहीन प्राणी बन जाता है  जो सिर्फ पैसा कमाता है और अपने हॉबी कक्ष में बैठकर बढईगिरी करता है................. "

Tuesday, August 25, 2009

घर , घरवालियां और सेक्स

पिछले दिनों अफगानिस्तान में घोषित नए कानून के द्वारा मानवीयता की सारी हदें पार कर दी गईं ! इसके मुताबिक अपनी पत्नी द्वारा सेक्स से वंचित पति उसे खाना देने से इंकार कर सकता है !  इसके अनुसार पत्नी को चार दिन में कमसे कम एक बार अपने पति की शारीरिक इच्छा की पूर्ति करनी होगी ! इससे विवाह की परिधि में पत्नी से बलात्कार को कानूनी मान्यता दी गई ! इसे घोषित करने वाले  अफगान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई का समर्थन अफगान के रुढिवादी संगठनों ने किया जिनके बल पर चुनावी राजनीति का निकृष्टतम दांव खेला गया ! इस कानून का पश्चिमी नेताओं और अफगानी स्त्री संगठनों ने विरोध और निंदा की !

नो वर्क नो सैलरी -  नो सेक्स नो फूड ! अफगानी समाज में स्त्री की पारिवार में स्थिति कामगार की तरह है ! जिसका काम पति की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना और उसके बच्चों को पालना मात्र है ! उसके एवज में पति उसे खाना और रहने की जगह देकर इस घरेलू कामगार के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री करता है !

अफगान समाज तो बहुत सभ्य निकला ! उसने विवाह ,परिवार, स्त्री की बराबरी से जुडी कई वैश्विक समस्याओं को इतने सहज तरीके से सुलटा दिया ! इसने विश्व को समझा दिया कि कि सभ्य समाज में स्त्री और पुरुष के संबंध तो कबीलाई ही रहेंगे ! कितनी भी कवायदें आप कर लें कितना भी आप विमर्श कर लें ! स्त्री का जन्म एक घरेलू मजदूर के रूप में हुआ है इस सच से मुंह नहीं मोड सकते !

दिहाडी मजदूरी को हम आज तक नहीं खत्म कर सके ! मजदूर संगठन बनते टूटते रहते हैं पर मजदूरों की बेबसी बनी रहती है ! स्त्री के साथ भी यही स्थिति है ! अफगान हमसे ज़्यादा दो टूक है ! उसने बराबरी , हकों और सम्मान के सारे भ्रमों को तोडते हुए जो बात साफ साफ कही विश्व के बडे - बडे स्ट्रेट फार्वर्ड समाज नहीं कह पाए !

दरअसल स्त्री की देह तो एक कॉलोनी मात्र है ! जिसका इसपर कब्ज़ा है वही उसका मालिक है ! अपने श्रम से औपनिवेशिक ताकतों की इच्छाओं की पूर्ति करते जाना और बदले में भोजन ताकि जीवित रहा जा सके और अगले दिन की बेगारी के लिए तैयार रहा जा सके !

अगर ज़्यादा कडवा सच पचा पाएं तो - स्त्री की योनि एक कॉलोनी मात्र है ! जिसके शोषण की एवज में स्त्री जीवित रहने की हकदार होती है ! प्रतिबंधित समाज इस सच को कहने में नहीं झिझकते ! खुले समाजों में शब्दों की चाशनी , विचारों और विमर्शों की तहों में यह धारणा लिपटी रह जाती है !

स्त्री का अस्तित्व राजनीति के लिए बहुत बढिया पैंतरा  है ! सभ्य कहे जाने वाले समाजों में स्त्री की मुक्ति और बंद  समाजों में उसकी दासता के एलान के बल पर राजनीतिक ताकतें सत्ता का खेल खेलतीं हैं ! स्त्री की गुलामी और आज़ादी दोनों  का राजनीतिक इस्तेमाल सबसे भारी दांव होता है ! स्त्री विमर्श की बडी लेखिका मृणाल पांडे मानतीं हैं कि स्त्री- आंदोलनों को राजनीतिक पार्टियां अपने फायदें में ऎप्रोप्रिएट कर लेतीं हैं ! ऎसे में स्त्री के पारिवारिक - सामाजिक अधिकार और बराबरी एक ऎसा समीकरण होता है जिसका जितना उलझाव होगा उतना ही फायदा पुरुष समाज का होगा !

घर की चौखट में सुरक्षित दिखने वाली स्त्री उसके भीतर कितने शोषण और समझौतों के बावजूद ही रह पा रही है इसका अंदाज़ा शायद उन विवाहिताओं बनाम पीडिताओं को भी नहीं होता ! स्नेह , कर्तव्य ,आदर्श ,नैतिकता, प्रेम ..जैसे कई छलावों में लिपटा सच यही है कि विवाह स्त्री के लिए एक समझौता और करार है ! क्या विवाह एक यौन पशु के लिए चारे और सुविधा का इंतज़ाम है जिसके जरिए वह सत्ताधीश कहलाता है और उसका वंश भी आगे बढता रहता है ?

मार्ग्रेट श्राइनर का उपन्यास - घर , घरवालियां और सेक्स पढकर समाज की मुख्य बुनियाद विवाह और परिवार पर ही अनेक शक पैदा होते है ! स्त्री और पुरुष के संबध विवाह के बाहर और भीतर दोनों ही जगह  शोषक - शोषित   और मालिक - मजदूर के हैं !  सामाजिक विकास के चरणों में कबीलाई समाज की मूल प्रवृत्तियां बदल नहीं पाईं !

Monday, June 15, 2009

शास्त्री फिलिप जी से मुलाकात : सारथी ही तो हैं वे

बीते महीने की पंद्रह तारीख को सपरिवार मैं केरल और लक्ष्यद्वीप की यात्रा पर थी ! दिल्ली से हवाई जहाज की मात्र चार घंटे की यात्रा के बाद जिस ज़मीन पर हम थे उसका रंग हरा था और नाम था देवभूमि केरल - गॉड्स ओन कंट्री ! कोचीन हवाई अड्डा ! बस कंवेयर बेल्ट से आता हुआ अपना सामान उठाना था और बाहर स्वागत में खडे ट्रेवल एजेंट के साथ गाडी तक जाना था ! बाकी सब इंतज़ाम पहले से ही तय थे !

गाडी में बैठते ही हमने शास्त्री जी को फोन किया और अपने पहुंच जाने की इत्तला दी ! मिलने की जगह तय हुई हमारे ठहरने की जगह होटल सी लॉर्ड ! रात आठ बजे का समय तय हुआ था - ठीक दो घंटे बाद का ! दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर उस जगह पर हमारे कोई परिचित रहते हैं और उनसे पहली बार वर्चुअल स्पेस से बाहर मुलाकात होगी - हम रोमांचित थे ! ठीक आठ बजे होटल की लॉबी में दरवाज़ा खोल कर प्रवेश करते हुए शास्त्री जी ने हमें और हमने शास्त्री जी को पहली ही नज़र में पहचान लिया ! मसिजीवी से जीभर गले मिलते हुए और मुझसे आत्मीय अभिवादन का आदान -प्रदान करते हुए शास्त्री जी बेहद चिर -परिचित लगे ! अचंभित और रोमांचित होते हुए उन्होंने दो तीन बार इस बात को अलग अलग अंदाज़ में दोहराया " तुम लोग तो बहुत छोटे हो , बिल्कुल बच्चे हो , जैसे फोटो में दिखते हो उससे दस साल छोटे लगते हो ... " ! मैंने कहा कि लेकिन आप जैसे फोटो में दिखते हैं वैसे ही दिखते हैं - उत्साह , जीवंतता, तेज और फुर्ती से भरे हुए !

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शीशे की तरह आर-पार देखे जा सकने वाला उनका दिल और चेहरा ! ज़िदगी को लेकर सकारात्मक नज़रिया , विवादित मुद्दों और अपनी बेहद मौलिक मान्यताओं पर उठाए गए मसिजीवी के सवालों का बेहद ईमानदार ,साफ और सहज उत्तर ! न थकने वाले , और सक्रियता में जीवन का सार ढूंढने वाले शक्स हैं शास्त्री जी !

लॉबी  के चिकने फर्श पर तेज़ी से भाग भागकर फिसलने और शोर मचाने वाले हमारे दोनों बच्चों से शास्त्री जी की बातचीत में उनका बालसुलभ हृदय झलक रहा था ! ज़िदगी की व्यर्थ राजनीति , संसाधनों को जुटाने की मारामारी और खोखली चमक से दूर सादगी और निष्टा का जीवन जीने वाला व्यक्ति ही पहली मुलाकात में छोटे बच्चों के इतने नज़दीक पहुंच सकता है !  उनके भेंट किए ऎतिहासिक महत्व के चांदी सिक्के मेरे बच्चों की अब तक की सबसे अमूल्य निधि हैं जिन्हें वे दिन में कई बार देखते और सहेजते हैं  ! बारह दिन के घूमने जाने की भागदौड में हम शास्त्री जी के लिए कोई भेंट नहीं ले जा सके ! शास्त्री जी को पुराने ऎतिहासिक सिक्कों के संग्रह का शौक है !  पुरातत्वीय महत्व के पांच सिक्के शास्त्री जी ने बहुत श्रम से जुटाए थे ! इनमें से एक उन्होंने अपने पास रखा तथा एक-एक सिक्का अपने बेटे आनंद तथा आशा को और हमारे बच्चों प्रभव तथा मिष्टी को दिया है !

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जिस अपनत्व को शास्त्री जी में पाया वह इतना सहज और गहरा था कि मैं मुग्ध थी ! उनकी पत्नी शांता जी से मुलाकात नहीं हो सकी पर लगा उनसे भी हम मिल लिए हों !  शास्त्री जी ने कहा कि शांता जी जी कि इच्छा थी कि हम उनके घर पर ही जाते पर उन्होंने हमारे कार्यक्रम में समय, दूरी और घंटों का हिसाब लगाकर देखा पर मुलाकात उनके यहां संभव नहीं हो पा रही थी ! हम कोचीन शाम पांच पहुंचे थे अगली सुबह हमें अगाती ( लक्षयद्वीप) के लिए हवाई जहाज़ में सवार होना था ! हमें काफी खेद हुआ क्योंकि इस मुलाकात और कोचीन को देखने के लिए हमारे पास बहुत कम समय था !

शास्त्री जी ने बताया कि उनके बेटे आनंद को बहुत दुख हुआ जब उन्हें पता चला कि हम होटल सी लॉर्ड में ठहर रहे हैं ! किसी समय कोचीन का सबसे शानदार होटल अब व्यसन करने वाले ग्राहकों की वजह से अपनी गरिमा में गंवा चुका है ! यदि उन्हें पहले पता होता कि हम वहां ठहर रहे हैं तो वे हमें कोई अन्य सुझाव दे पाते !

शास्त्री जी से देर रात ग्यारह बजे तक बातें होती रहीं ! मैंने हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा ही पढा था ! आज उनसे मिलने का गौरव प्राप्त हो रहा था ! मैं ज़्यादा मुखर नहीं थी ! मसिजीवी और शास्त्री जी की गर्मजोशी ,आत्मीयता से चल रहे संवादों को एक मुग्ध श्रोता की तरह सुन रही थी ! मानो एक दिव्य अनुभव से गुज़र रही हूं ! मैं एक कैमरा हो गई थी !  उस अविस्मरणीय बातचीत के तालमेल ,लय और उत्साह में एक चमक थी ! जब मैंने कहा कि " आसपास जब टुच्चेपन की बहार हो ऎसे में आप जैसे व्यक्तित्व से मिलना बहुत सुखकारी है ' तो शास्त्री जी उन्मुक्त हंसी हंसे ! IMG_2134

ईसाईत्व , धर्म ,मनुष्यत्व ,  हिंदी भाषा के प्रति प्रेम , उनकी गहरी देश -निष्ठा , राष्ट्रीय संस्कृति के लिए प्रतिबद्धता ,ब्लॉगरी में आस्था ,उनका अध्यवसाय , केरल की जलवायु , आगे का कार्यक्रम ..अनेक बातें हुईं ! सबका पता दे पाना यहां एक पोस्ट में कठिन है ! प्राणपण से इन उद्देश्यों के लिए लगे हुए इस कर्मठ योद्धा से मिलकर लगा कि नौकरी और निजता के उद्देश्यों से ऊपर उठकर किसी महत सामाजिक उद्देश्य के लिए जीना ही असली जीना है ! उनके सिद्धांत और जीवन में जैसी गहरी एकता दिखी वैसी एकता आज के ज़माने में मिलना बहुत कठिन है ! उनसे बातचीत दिल से दिल की बातचीत थी ! पुराने सगे मित्रों सी ! खोट , दुराव ,      छिपाव , दुराग्रह राजनीति   नहीं केवल निश्चल आत्मीय संवाद ! IMG_2136IMG_2137

शास्त्री जी ने दो अच्छी सूचनाएं दीं ! पहली यहाँ कि उनका चिट्ठा आज से सारथी.इंफो पर चला गया है और दूसरा यह कि जल्द ही उनकी बिटिया का ब्याह होने वाला है ! वे कहने लगे कि ' अब तो जल्द ही उनका घोंसला सूना हो जाएगा ..किंतु तुरंत ही प्रभव और मिष्टी की ओर देखकर बोले कि कोई बात नहीं इन बच्चों की उमर अभी बहुत छोटी है ये और ज़रा से बडे हो जाएं तो अकेले ही यहां हमारे घोंसले में आ जाया करेंगे .मैं हवाई अड्डे से इन्हें ले लिया लूंगा..! वे कह रहे थे कि आगे जब कभी हमें केरल आना हो तो उनके घोंसले में ही रुकें ,होटल में नहीं !'

पिछ्ले दो तीन महीने से ब्लॉगिंग से मन उठा सा गया था लग रहा था कि क्या पाते हैं हम यहां अपने को नष्ट करके  ....केवल व्यक्तिगत जीवन पर प्रहार ..और कटुता और राजनीति के गर्द में सनना ही होता है क्या ! पर शास्त्री जी जैसे व्यक्तित्व से मिलकर लगा कि यहां रहना व्यर्थ कहां रहा बहुत कुछ तो मिल रहा है जो अन्यथा कैसे मिलता.... ?

 

Thursday, March 26, 2009

आपके शहर के सुनसान और खतरनाक रास्ते कौन से हैं ?

अगर आप स्त्री हैं तो अंधेरे ,सुनसान रास्तों पर अकेले न जाएं ! आप बलात्कार , हत्या , लूटपाट का शिकार हो सकतीं हैं ! ............आप रोज़ वहां से गुजरतीं हैं ? हो सकता है किसी रोज़ आपकी सडी गली लाश ही मिले....

जाहिर है हममें से कोई भी कामकाजी या घरेलू स्त्री अपनी किसी छोटी -सी ज़िद ,ज़रूरी काम या आपात से आपात स्थिति में भी रात में घर से बाहर अकेले नहीं निकलना चाहेगी ! न ही दिन के उजाले में सुनसान सड्कों से गुज़रना चाहेंगी ! स्त्री के लिए बदलता समाज और बदलते समाज में सशक्त होती स्त्री, पुरुष से बराबरी पर दिखाई देती है ! पर वास्तव में यह ऎसा सामाजिक मिथक हैं जिसका चेहरा यथार्थ से काफी मिलता जुलता है !

यदि आज कोई स्त्री या लडकी इस सबसे बड़ी सामाजिक मिथकीय संरचना को जानना चाहे तब भी वह क्या रात के बारह -एक बजे अपने घर की चाहरदीवारी को लांघकर सडक पर निकल सकती है !  समाज में अपनी बराबरी को जानने के लिए कोई भी स्त्री सौम्या या जिगीशा का सा हश्र नहीं चाहेगी ! दिल्ली की सडकों पर रात में इंडिया गेट के आगे से अगुवा कर बलात्कार का शिकार बनाई गई  लडकी , दिल्ली के साउथ कैंपस में रात में भरी रिंग रोड पर चाय की दुकान के आगे से अगुवा कर सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई छात्रा  - जैसी अनेक घटनाएं हैं जिनसे बार बार असुरक्षित स्त्री समाज की विडंबना उभर कर आती है !

एक बडे अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुख्य पन्ने पर स्त्रियों के लिए खतरनाक दिल्ली के दस  स्ट्रेचिज़ की पहचान की गई है ! आप अगर स्त्री हैं तो आप इनमें और भी कई एसे रास्ते जोड सकती हैं जहां आपने खुद को असुरक्षित महसूस किया हो ! आप वहां से न गुज़रें ! क्योंकि इन रास्तों से गुजरती स्त्री एक आसान शिकार हो सकती है यह सब अपराधियों को पता है ! वे यह भी जानते हैं कि वहां आपको बचाने वाला कोई मर्द भी नहीं होगा न ही आपकी चीखों पुकार किसी के कानों तक पहुंच पाएगी !  यूं तो कई बार अपने घर के आगे टहलती लडकियों को अगुवा कर बलात्कार की घटनाए भी होती रहतीं हैं और अपने घर में भी वे अपराध का शिकार बनाई जा सकती हैं परंतु घर के बाहर कामकाज के लिए रोजाना निकलने वाली स्त्री जिस असुरक्षा और रिस्क के साए तहत काम करती है वह मेरी दृष्टि में स्त्री का प्रतिक्षण का मानसिक शोषण है ! कामकाज के लिए बराबरी की स्पर्धा सहती स्त्री के मन में प्रतिक्षण  बसा यह डर कि उसे कहां कहां से कब कब नहीं गुज़रना उसकी कार्य - क्षमता को बाधित करता है !

किसी सभ्य समाज में पुलिस द्वारा कामकाजी स्त्रियों की अपने ऑफिस तक की यात्रा के संबंध में निकाले गए हिदायत वाले विज्ञापन हों या अखबारों में असुरक्षित जगहों की पहचान की कवायद हो - सबसे यही सिद्ध होता है कि और कुछ तो बदल नहीं सकता इसलिए आप यदि अपराधों का शिकार होने से बचना चाहती हैं तो कई सारी सावधानियों से काम लें - शायद आप बच जाएं !  समाज वही रहेगा सडकें वही रहेंगी,  अपराधी बलात्कारी रहेंगे , अकेलापन अंधेरा सब होगा - आपको बचने के तरीके आने चाहिए ! न आते हों सीख लें जिससे आज आप बचकर यह सोच लें कि आज आप बचीं हैं तो आपकी जगह ज़रूर कोई और हुई होगी शिकार !

मेरी बडी तमन्ना रही है बचपन से कि किसी सडक किनारे की चाय वाली गुमटी के बाहर पटरी पर अकेले ही ढली शाम तक बैठकर चाय पी जाए पर एक चाय और उस सुकून का रिस्क मैं कभी ले नहीं पाई ! और अब तो यही शुक्र मनाती हूं कि मैं किसी कॉल सेंटर , मीडिया कपंनी या ऎसे मल्टी नेश्नल में नहीं काम करती जहां से आधी रात को काम से लौटना होता !

आप सब भी सुकून मनाइए कि आपकी पत्नियां बेटियां और बहनें दिन दिन में ही अपने काम काज से  घर लौट आती हैं और आपके शहर के उन सुनसान रास्तों से उनको कभी गुजरना नहीं होता !

चित्र के लिए आभार

Saturday, February 21, 2009

दिल्ली विश्वविद्यालय ; एक नज़र यह भी

दिल्ली विश्वद्यालय के हाईटेक संस्थान - "इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ लॉंग लर्निंग" के आधुनिकतम भवन के दरवाजे के बाहर देश और उसका भविष्य


दिल्ली विश्वविद्यालय का मुख्य दरवाजा और विवेकानंद प्रतिमा के पास सपने बुनता बच्चा



Tuesday, February 17, 2009

सही काम का सही नतीजा उर्फ मारे गए गुलफाम

कल अपने बेटे की वैल्यू ऎजुकेशन की नोटबुक से उसे परीक्षा की तैयारी कराते हुए मुझे पहली बार पता चला कि गांधी जी ,इंदिरा गांधी और अब्राहिम लिंकन के मारे जाने के क्या कारण थे ! इस जानकारी का उत्स बच्चे को नैतिक ज्ञान का एक पाठ- राइट एंड रांग पढाते हुए हुआ ! इस पाठ में बताया गया था कि

  • जो बच्चा सही काम करता है गॉड उसे बहुत पसंद करते हैं !
  • सही काम करने के लिए करेज चाहिए !
  • गलत काम करने वाले से समाज और गॉड नाराज हो जाते हैं !
  • कोई भी कभी भी सही काम कर सकता है !
  • सही काम का सही अंजाम होता है !
  • सही काम करने के लिए करेज चाहिए इसके कुछ उदाहरण दीजिए -

गांधी जी वॉज़ शॉटडेड

इंदिरा गांधी वॉज़ ऑल्सो शॉट डेड

अब्राहिम लिंकन वॉज़ मर्डरड

वैल्यू या मॉरल ऎज्यूकेशन के नाम पर आठ नौ साल के बच्चे को परोसा गया यह माल भाषिक नैतिक शैक्षिक किस उद्देश्य की पूर्ति करता है ? एक बच्चे के लिए अच्छाई और बुराई की समाज निर्धारित परिभाषाओं को इस कुरूप और भयावह तरीके से पेश करना बच्चे की मानसिकता संरचना के साथ की गई आपराधिक कोटि की छेडछाड नहीं तो और क्या है ?

ईश्वर , धर्म ,सही -गलत , विनम्रता ,सहिष्णुता के सबकों को पढाने के लिए स्कूलों के पास तो समय है न ही सामर्थ्य ! पढाई के घंटों अलग -अलग विषयों में बंटा टुकडा -टुकडा सा समय , एक ही कमरे में पैंतालीस -पचास बच्चे , बच्चों की भीड झेलते शिक्षक ...! सिस्टम ही ऎसा है किसको दोष दें ! ले दे के सारा दोष हम अपने ऊपर ही ले लेते हैं ! चूंकि हम एक असमर्थ ,मध्यवर्गीय अभिभावक हैं जो सिस्टम की आलोचना तो कर सकते हैं पर उसको बदल डालने की हिम्मत और हिमाकत नहीं कर सकते !

एक हमारे सपूत हैं ! पक्के नास्तिक और शंकालु ! बेटे को भगवान और ड्रामाई बातों पर यकीन भी नहीं ,नंबर भी चाहिए ! नैतिक ज्ञान के अनूठे सवालों के हमारे द्वारा सुझाए जवाब भी नहीं वे लिख सकते क्योंकि मैडम की झाड पड सकती है ! नैतिकता की अवधारणाओं की रटंत से उकताया बच्चा सचमुच बडा निरीह जान पडता है !

सही क्या है ये तो आजतक बडों की दुनिया तक में भी अनिर्णीत , परिस्थिति सापेक्ष और गडमगड है ! बच्चा ऎसे सही -गलत के निर्णय की दुविधा को कैसे पार कर पाऎगा ! वे "सही " काम एक बच्चा कैसे कर पाएगा जिनका अंजाम मौत होती हो ! घर देश समाज की नज़रों में उठने के लिए और भगवान को प्यारे लगने के लिए नन्हे बच्चे को दिया गया यह करेज घुले सदाचार का पाठ तो बडे बडों को भी सदाचार से डराने वाला है ! बच्चे की रंगीन कल्पनाओं भरी दुनिया के ठीक कॉंट्रास्ट में हम ये क्या दुनिया पैदा कर रहे है ?

मृत्यु और नैतिकता से इतनी सहजता और क्रूरता से साक्षात्कार करवाने स्कूलों को हमारा शत-शत नमन !

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Friday, February 13, 2009

गुलाबी अंतर्वस्त्र आखिर किसको लजाएगा

आज सुजाता ने अपनी पोस्ट में मोस्ट चर्चित पिंक चड्डी अभियान के बारे में बात करते हुए बहस का फोकस तय करने की बात की है ! कुछ समय पहले अंतर्वस्त्रों में सडक पर मार्च पास्ट करती पूजा का विद्रोह एक उद्धत बहस का कारण बन गया था !  देखकर लगा कि जब स्त्री विमर्श किताबों और बहसों की दुनिया से बाहर पैर फैलाता है तो वह डराता है !

विद्वत समाजों में स्त्री की अस्मिता से जुडे सवालों पर सैद्धांतिक नजरिये से खूब बातें होती हैं ! स्त्री शोषित है यह भी मान लिया जाता है और उसके विक्टिमाइजेशन को रचनात्मकता के फोकस से देखकर उसे अलग अलग कला रूपों में भी ढाल लिया जाता है ! लेकिन स्त्री के पास अपने साथ हो रहे अन्याय के विरोध का क्या तरीका है इसपर  गोष्ठियां खुद को मूक पाती हैं !

मैं पेशे से प्राध्यापक हूं ! वक्तव्य सुनना सुनाना इस पेशे का ही एक हिस्सा है ! कई बार तीन या चार हफ्तों वाले रिफ्रेशर कोर्स किए हैं ! साहित्य,भाषा ,समाज संस्कृति, स्त्री और दलित विमर्श पर बहसों में शिरकत की है !  ऎसी गोष्ठियों में स्त्री विमर्श पर  बहस सुनी हैं ! यहां तक कि पिछ्ले साल विमेन स्टडीज पर हुए तीन हफ्ते के सम्मेलन में देश के विख्यात विद्वानों को सुना ! लेकिन उन स्त्री द्वारा विरोध के औजारों की पडताल और खोज पर चुप्पी दिखाई दी !

मर्दवादी देश में स्त्री की आत्मकथाएं उसकी सेक्सुअलिटी के उद्घाटन की पाठकीय समीक्षा में डूबती उतराती रह जाती हैं ! पूजा का विरोध सिनिकल या स्वयंसेवी संगठनों के द्वारा प्रायोजित लगता है ! मंग्लूर में पीटी गई लडकियों के हक में गुलाबी चड्डी अभियान में विरोध के कारण जायज और तरीके नाजायज लगने लगते हैं !

मुझे लगता है जिस समाज में पुरुषत्व बहुत् गहराई तक रचा बसा हुआ हो उस समाज को झंकझोरने के लिए अपनाए जाने तरीके सतही हों तो काम नहीं चलेगा ! जिस समाज में स्त्री -पुरुष की अवस्थिति बाइनरी ऑपोज़िट्स की तरह हो उस समाज में स्त्री और पुरुष द्वारा अपनाए गए विरोध के तरीके समान हों यह कैसे हो सकता है ! हाशिए पर खडी स्त्री विरोध के जमे जमाए औजारों को अपनाकर जड समाज में संवेदना पैदा नहीं कर पाएगी !

हम साफ देख सकते हैं कि हमारे समाज में पुरुष बेहतर स्थिति में है और उसके पास स्त्री समाज की संवेदना को उदबोधित करने के लिए न तो कोई कारण हैं और न ही चड्डी पहनकर और मशाल लेकर सडक पर निकल पडने की ज़रूरत ही है !

ब्रा बर्निंग आंदोलन की प्रतीकात्मकता के बरक्स गुलाबी चड्डी आंदोलन को देखें ! दोनों ही गैरबराबरी वाले समाज के अवचेतन को चोट पहुंचाने का काम करते हैं !

Wednesday, November 12, 2008

काले हैवान और गोरे फरिश्ते

मेरी बेटी स्कूल जा रही थी और एक गाना गुनगुना रही थी - नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए बाकी जो बचा था काले चोर ले गए ! बेटी ने अचानक गाना रोककर सवाल दागा - ये चोर काले क्यों , गोरे चोर क्यों नहीं ! सवाल औचक था , स्कूल की बस छूट जाने का भय था जवाब लंबे और मुश्किल थे सो मैंने बेटी से कह दिया की शाम को बात करॆंगे !

भाषा ,संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता ( न्गुगी वा थ्योंगो ) पढते हुए नस्लभेद और रंगभेद की औपनिवेशिक विरासत पर तीखे सवाल मन में पैदा होते हैं  ! न्गुगी अपने लेखन में जातीय हीनता को पैदा करने वाली पोस्टकोलोनियल ताकतों  और प्रकियाओं पर बात करते हैं ! आज राजनितिक आजादी हासिल किए हुए हमें एक लंबा अरसा हो गया है पर आज भी हम मानसिक रूप से गुलाम हैं !  अंग्रेजियत और अंग्रेजी भाषा केछिपे हुए औजारों के ज़रिए हम गुलाम मानसिकता को  अपने बच्चों को सौंप रहे हैं !

हम एक काली भूरी नस्ल की जाति हैं पर हमारा आदर्श है - सफेदी ! वाइट हाउस ,वाइट स्किन  ! बाकी सब काला है ब्लैक डे , ब्लैकलिस्ट , ब्लैक मार्किट !  सब नकारात्मक भावों के लिए कालापन एक सार्थक प्रतीक बनाए बैठे हैं हम !

हमारी कहानियों में निन्म वर्ग ,गरीब ,अपराधी ,सर्वहारा काला ही होगा ! कालापन क्रूरता , असभ्यता , गरीबी , अज्ञानता और दुख का प्रतीक है ! हम हमेशा अपनी प्रार्थनाओं में अज्ञान की कालिमा से ज्ञान के उजालों की ओर जाने के गीत गाते आ रहे हैं ! मुंह पर कालिख पोतना - जैसी भाषिक अभिव्यक्तियों का इस्तेमाल करते रहे हैं ! किसी व्यक्ति खासकर किसी स्त्री का परिचय  बताते हुए हमारा पहला या दूसरा  परिचयात्मक जुमला रंग पर ही होता है -- "... आप लतिका को खोज रहे हैं अच्छा वही काली सी ठिगनी सी औरत ? " किसी आपराधिक दास्तान को हम  इतिहास के पन्नों पर काले अक्षरों में ही दर्ज करते हैंracism

काले राक्षसों और गोरी परियों की कहानी सुनाने वाले हम अपने बच्चों को भाषा के संस्कारों के साथ ही  रंगभेद की विरासत भी दे डालते हैं ! हम सिखाते हैं कि काला रंग विकलांगता और गैरकाबिलियत का प्रतीक है ! यह एक प्रकार की बीमारी है जिसकी वजह से हीनता का अहसास होना चाहिए !

सारे वैचारिक विमर्श एक तरफ .....! मैं खुश हूं कि मेरी 6 साल की बेटी अपने समाज परिवेश और सांस्कृतिक विरासत पर तीखे आलोचनात्मक सवाल उठा पा रही है ! आज शायद मैं उसे काली परियों की प्यारी सी कहानी भी सुनाउं !

चित्र के लिए आभार -

 

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