Saturday, June 06, 2015

मातृदिवस के बहाने बेटियों को पतनशील सीख 

 मातृदिवस के अवसर पर स्त्री को मातृत्व की प्रतिमूर्ति के रूप में महिमामंडित किए जाने के उत्सवपूर्ण माहौल में एक मां होकर भी असहज महसूस कर रही हूं । जब भी स्त्री को अतिरिक्त सम्मान देने के पारम्परिक या इस प्रकार के नए उत्सव मनाए जाते हैं तो न चाहते हुए भी  मेरा ध्यान  उन उत्सवों,  मान्यताओं ,आयोजनों की पृष्ठभूमि में सक्रिय निहितार्थों की ओर चला जाता है । आज  मातृत्व के  ऎसे प्रबल उत्सवीकरण पर स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता से संबद्ध् यह सवाल मन में उठ रहा है कि  क्यों धरती की हर स्त्री को मां बनने की बाध्यता का बोझ सहना चाहिए..क्यों हर स्त्री को संतानोत्पत्ति को एक पुनीत कर्तव्य मानना चाहिए. ।  मातृत्व जैसी प्राकृतिक स्थिति पर सामाजिक दबावों का सक्रिय होना एक स्त्री के लिए अस्वीकार्य बात होना चाहिए । स्त्री को इस परम्परागतता से मुक्त होने की शुरुआत करनी चाहिए कि   मातृत्व और स्त्रीत्व परस्पर पूरक हैं । ...

 संतानोत्पत्ति के यंत्र  होने से से इतर भी स्त्री का अस्तित्व है इस बात की कल्पना  को ही  भयावह बना दिया गया है |   हर स्त्री अपने लिए सबसे पहले संतानवती होने की कामना करती है ।   घर परिवार और समाज में बच्चों की उपस्थिति के बावजूद प्रत्येक  स्त्री को अपनी कोख को उर्वर सिद्ध  करने के लिए ओढ़ी हुई मातृत्व की इच्छा के वशीभूत हो जाना बहुत सहज व स्वाभाविक बात लगती है । कोई स्त्री स्वयं भी यह मानने के लिए तैयार नहीं होती कि संतानोत्तपत्ति के विचार को लेकर वह दुविधा में है  !  प्राय: स्त्री यह जान ही नहीं पाती  कि संतानोत्पत्ति और उत्तराधिकार के लिए , प्रकृति की अपने प्रति अनुकूलता को सिद्ध करने के लिए , समाज में सम्मान पाने के लिए , व विवाह संस्था में स्वयं को बनाए रखने के लिए वह अक्सर  यह निर्णय स्वेच्छा  से नहीं ले रही होती  । और सच तो यह है कि मातृत्व के निर्णय को वह अपना अधिकार मानती भी नहीं है । विवाह , ससुराल की मांग , सामाजिक दबाव  उसे मातृत्व की ओर धकेलते हैं  ।  मां बनने की शारीरिक योग्यता भर से मां बन जाने की विवशता  स्त्री को अपने अस्तित्व के विरुद्ध ही नहीं मानवाधिकार के विरुद्ध बात भी लगनी चाहिए । 
गुड़िया से घर घर् खेलती बच्चियों को हम बचपन से ही मां होने की ट्रेनिंग देते हैं दरअसल हम अपने सामाजिक संस्कारों को बच्चियों पर सगर्व लादते हैं , मेरी पड़ोसन कहती थी कि आस पास जब भी कोई गाय बछड़ा देती है मैं बेटियों को जरूर दिखाती हूं ताकि वह बचपन से ही मां बनने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाए.. ।  मुझे याद है कि सोलह सत्रह साल की उम्र में ही मैं डरने लगी थी कि अब बस कुछेक सालों में मुझे इस अनचाही यातना से दिखावटी खुशी के साथ गुज़रना पड़ेगा ...मुझे मां बनने व बच्चा पालने की प्रक्रिया बहुत बड़ा दबाव लगती थी । उस उम्र में मुझे यह लगा करता था कि पढ़ाई और जीवन में कुछ नया करने की कामना के आड़े यही दबाव सबसे बड़ी अड़चन है । इसी दबाव के चलते मुझे विवाह भी एक बहुत भयावह विचार लगता था । उन दिनों मैंने अपनी एक अध्यापिका को यह कहते सुना कि उसके फौजी पति ने पहली रात उनके तत्काल मां नहीं बनने की इच्छा के बारे में सुनकर यह उत्त दिया कि तब तो तुमको अपने मातापिता के घर से खुद ही परिवार नियोजन के लिए सामान लाना चाहिए था ऎसे कैसे आ गईं । 
कॉलेज में प्रथम वर्ष  की पतली दुबली गर्भवती बच्चियों को देखकर मैं गहरी पीड़ा व आवेश से भर जाती हूं और बाकी बच्चियों को यह सीख देने का मन करता है कि मातृत्व ही एकमात्र तुम्हारी पहचान नहीं है  । मां बनने से पहले इंसान होने का दर्जा तो हासिल जरूर कर लेना मेरी बच्चियों । यह जो शरीर तुम्हें मिला है तुम्हारा ही है । इसे और अपनी कोख को कभी गुलाम मत बने देना । अपने स्त्रीत्व को , अपने मां बनने की काबिलियत सुहागन होने या बहू होने की काबिलियत से कभी मत आंकना । तुम अपने पैरों पर खड़ी होना ताकि तुम अपने गर्भ और उससे पैदा बच्चे को अपनी पूंजी मानकर गुलाम की जिंदगी ,आश्रित की ज़िंदगी जीने के परम्परागत खयाल से नफरत कर सको । तुम इस्मत चुगताई की कहानी पढती हो न ? बस उस कहानी की छुईमुई मत बनना ।  और हां बांझ या निपूती होने की धमकियों में कभी मत आना । तुम बस कोख नहीं हो मेरी प्यारी बच्चियों बहुत कुछ हो । अपने होने की संभावनाओं को खोजो ।  अपनी आजादी को महसूस करो । मातृत्व तो स्त्रीत्व का एक पक्ष भर  ही है और उसे बस  उतना ही मह्त्त्व देना। 
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आज मातृ दिवस पर हर स्त्री को मां बनने के अपने फैसले को अपनी इच्छा ,आवश्यकता , क्षमता ,ऊर्जा व हर्ष के साथ स्वाधिकार की तरह समझना शुरू करना चाहिए! भूमि और सम्पत्ति के वारिस पैदा कर सामंती व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह समाज उतावला है ।  स्त्री के गर्भ को साधन के रूप में देखने वाले भाव की निर्लज्जता को छिपाकर उसे   महिमापूर्ण्और दैवीय सिद्ध करने  के पीछे   तमाम सामंती ताकतें काम करती हैं और मां बनकर स्त्री  समझती हैं कि उसने स्त्रीत्व की पूर्णता का  निहायत ही अनिवार्य मेडल समाज से जीत लिया ! स्त्री को इस प्रपंचपूर्ण परम्परा की गुलामी से मुक्त महसूस करना शुरू करना चाहिए । 

Tuesday, May 12, 2015

क्या बताउं एक अधखिंची हैंडब्रेक ने क्या क्या गुल खिला दिए.... smile emoticon
मेरे हाथ से लगी गाड़ी की हैंडब्रेक लगी न लगी बराबर ही होती है । अक्सर यह बात इसलिए छिपी रह जाती है कि गाड़ी जहां पार्क की वहां की ज़मीन समतल निकली वरना एक दो बार गाड़ी धीमे धीमे बहते हुए ' जीले अपनी ज़िंदगी सिमरन ' वाली अंतर्चेतना से काम लेती पाए गई है और अक्सर किसी भलेमानस के द्वारा पहिए के नीचे लगाए गए पत्थर की बदौलत गाड़ी की और न जाने किस किस की जान बची है ।
कल गाड़ी जहां पार्क की पता नहीं था कि वहां की जमीन ऎसी ढलुवां निकलेगी । और हुआ वही जो हो सकता था । मेरे गाड़ी से उतरते ही अधलगी हैंडब्रेक से तुरंत रिवोल्ट करते हुए गाड़ी आगे को बहते हुए एक स्टॆशनरी दुपहिया को गिराकर शांत हुई । जूस की दूकान की भीड़ के कानों और आंखों को भिडंत के नाद् से उम्मीद जगी कि अब कहासुनी होगी और हमें काटो तो खून नहीं पर । मुझे लगा गाड़ी का मालिक इनमें से न हो बाकी तो संभाल लेंग़े पर उसी पल जूस पीते हुए गाड़ीवाला युवक अवतरित हो ही गया और मुझे लाड भरे शब्द सुनाई दिए " ओहोहोहो मैम कोई बात नहीं " और दिखाई दिया मेरे घबरा गए चेहरे को तसल्ली देता निहारता और गाडियों की गुत्थमगुत्थी को भी छुड़ाता एक शांत और प्यार भारा चेहरा । लगा यकीनन इन जनाब की कल्पना में दोनों गाड़ियां नहीं भिड़ीं बल्कि गाड़ियों के मालिक लतावेष्टित आलिंगन में बंधे हैं । उसकी कल्पना की कल्पना करते हुए मेरे मन ने शायद कहा कि अब जाने भी दीजिए "इतनी भी खूबसूरत नहीं हूं मैं " और उनका धराशायी हो गया बैग उनको थमाते हुए न अपना लजाना छिपा सकी न अपनी घबराहट । नज़रें मिलाई थीं ' आए एम वेरी वेरी सॉरी ' कहने के लिए पर जनाब की आंखों में बिल्कुल अनेक्स्पेक्टिड सा जवाब तैर रहा था " इट्स माय प्लैज़र ' । मैंने पूछा कहीं लगी तो नहीं तो जवाब में बस चमकती हुई आंखें देखीं और धड़कता हुआ दिल ही सुनाई दिया कि 'लगी तो ज़रूर है ' । दिल तो मेरा भी धड़क रहा था कि जाने आज क्या क्या होता होता रह गया पर छिपाने का हुनर मेरे पास उसके मुकाबले ज़्यादा था ।
घर जाकर बढ़ी हुई धड़कनों की कहानी कहते ही यही सुनने को मिलेगा कि' तुम भी न कितनी केयरलेस हो यार चलो अब एक सिपलार टेन ले लो वरना हांफती फिरोगी ' । पर मैं कहूंगी कि ' दिल का तेजी से धड़कना हर बार किसी बीमारी का ही नतीजा हो ज़रूरी नहीं जानू ' । और ज़रूर कहूंगी कि ' आप जो इतनी बेरहमी से कसी हुई हेंडब्रेक लगा देते हो कि मुझे अक्सर बहुत जद्दोजहद करनी पड़ती है और आखिरकार बगल से गुजरते किसी भलेमानस को बुलवाकर नीचे करवानी पड़ती है ' वगैरह वगैरह ... । ...खैर घर जाकर क्या बताना है क्या नहीं बताना है कैसे बताना है यह तो घर पहुंचने पर ही डिसाइड होगा रास्ते भर् तो दिल की चहक को सुन लूं ।

Wednesday, April 08, 2015


लाखों प्रकाशवर्ष दूर टिमटिमाते तारे 
इन काले चमकदार कैमरों में
दर्ज हो रहा है परत दर परत
हमारी बेशर्म नस्लों की कारगुजारियों का गंदला इतिहास
ये सफेद काली आंखें 
कोई सवाल नहीं पूछ्ती
कोई शिकायत भी नहीं करती
किसी को तलाश भी नहीं करतीं
ये सिर्फ देखती हैं चुपचाप
और फिर भेदती हैं अंदर तक हमारी जमी जमाई जिंदगियों के सुकून को
ये आंखें तमाम अनाथ सीरियाई बच्चों की आंखों से मेल खाती हैं
पेशावरी बच्चों की भून दी गई आंखें भी तो ऎसी ही रही होंगी
क्या कालाहांडी के अकाल से मरते बच्चों की आंखों से कोई अलग हैं ये आंखें
इन आंखों से असर से कैसे बचूंगी मैं
इनकी धार के चिर गए अपने कलेजे को कैसे सियूंगी मैं
बचपन को निगल जाने को बेताब जमाने के आगे
सरेंडर से पहले की फड़फड़ाहट से भरे गोल गोल चक्कर काटते पंछी जैसी
या फिर
अंधेरों में यात्रा करते करते अंगिनत शापित आकाशीय पिंडों की तरह
किसी बिग बैंग के इंतजार में किस पृथ्वी की परिक्रमा करती हैं ये आंखें
मुझे इन आंखों से डर लगता है
मुझे उस विस्फोट की कल्पित आवाजों से डर लगता है
मुझे आकाश में टूट्कर बेआवाज़ बिखर रहे तारों की आखिरी चमक से डर लगता है
मुझे कई सौ प्रकाश वर्ष पहले मर चुके तारों के हाहाकार से डर लगता है
देखो हमारे सिर पर मर चुके अनंत अनंत तारे कैसे टिमटिमा रहे हैं
मुझे इस भ्रम भरी दिपदिपाहट से डर लगता है
मुझे नींद में भी इन आंखों से डर लगता है

Thursday, March 12, 2015





एक जननेता के मंचीय स्त्री  विमर्श की दिक्कतें 

अरविंद केजरीवाल का महिला दिवस वाला संदेश असावधानीपूर्ण शब्द चयन के कारण  स्त्री विमर्श करने वालों के हत्थे चढ़ गया । स्त्री की  सहनशीलता के लिए चट्टानी  ताकत और उफ्फ तक न करने की बात से और अपने परिवार की  दो स्त्रियों को अपने होने का क्रैडिट देकर वे दरअसल अपनी  स्त्री के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय देना चाहते थे । अपने संदेश के उत्तरार्ध में उन्होंने अपनी  बात को संभालने की कोशिश भी  की  । 
यदि मुझे भी उनके इस वक्तव्य की बखिया उधेड़नी  हो तो उनके इन्हीं शब्दों का आसरा लेकर मैं भी  उन्हें स्त्री विरोधी  सिद्ध कर सकती  हूं । लेकिन  भाषा के अध्येता के नाते , मंशा और शब्दों के बीच की  फांक  को आसानी  से पकड़ सकती  हूं  ।  इसी  वजह से  मैं उनपर यह आरोप नहीं लगा सकती । अरविंद पर्याप्त विद्वत्तापूर्ण  भाषा बोल सकते होंगे । पर लोक सम्मत भाषा  बोलने की  उनकी  जिद  के पीछे  उनकी  शायद  कई  पूर्वधारणाएं काम करती  हैं । अबतक भी  उन्होंने इसी  अतिसाधारण भाषा के बल पर अपने लिए बहुत बड़ा जन समर्थन जुटाया ही  है । पर कभी  कभी  बेहद संवेदनशील मसलो और विमर्शों पर बोलते हुए हमें भाषा को  कुछ हद तक विद्वत्तापूर्ण भी बना लेना होता है । स्त्री  विमर्श जैसे मसले पर किसी   बोलना वह भी एक पुरुष जननेता के लिए  चुनौतीपूर्ण काम है । वैसे ही जैसे दलित मुद्दों पर किसी  सवर्ण को संवेदनशीलता से बात करनी  हो तो भी  वह किसी न किसी शब्द या वाक्यव्यंजना के आधार पर बहुत आसानी  से असंवेदनशील  घोषित किया जा सकता है । 
अरविंद ने जिस प्राकृतिक सहनशीलता की  बात की  वह दरअसल समाजीकरण  के जरिए जेंडर ट्रेनिंग  के जरिए स्त्री  में जबरन आरोपित गुणावली  का हिस्सा मात्र है ।  स्त्री  को अपने हिस्से आई  शोहरत और कामयाबी  का क्रेडिट देकर वे मोदी के स्थापित मूल्यों का विस्थापित करना चाह रहे होंगे  ।  आज के समय में स्त्री और पुरुष की बराबर भागीदारी  से समाज आगे बढ़ रहा है पर परिवार को दोनों में से किसी  एक व्यक्ति की  उर्जा चाहिए होती  है । यही सवाल बस स्थापित स्त्रियों से भी पूछा  जाना बनता है कि क्योंकि उनकी  कामयाबी और शोहरत के पीछे भी  पति या कामवाली  बाई या अन्य किसी  सहायक  का हाथ जरूर होता है ।  स्त्री जब अपने पति या परिवार के पुरुष को क्रेडिट दे तो वह हमें पितृसत्ता  से प्रभावित परतंत्र स्त्री  लगती  है । पुरुष जब अपनी  पत्नी  या परिवार की स्त्री  को क्रेडिट दे तो हम उसे उत्पीडक और  अति महत्वाकांशी  मान लेते हैं । इसलिए विमर्शों  को भी अपनी  प्रकृति में उदार होना होता है । आलोचनाओं  की  मंशा से  भी  मिनिमम सदाशयता की  उम्मीद तो की  ही  जानी  चाहिए । बेरहम कुतर्कों , भाषिक समझ की उदारता  और सदाशयता के अभाव में किया गया  स्त्री  विमर्श  हमारे लिए किसी  काम का नहीं  हो सकता ।  एक आम स्त्री  के लिए उनका यह वक्तव्य सम्मान और बराबरी के अर्थ  देने वाला रहा होगा पर किसी  स्त्री  विमर्शकार के लिए इसका सकारात्मक अर्थ होना  विमर्शकार की उदार समझ के स्तर पर ही निर्भर होकर रह जाएगा । वैसे भी जननेता मंच से या तो जनसमर्थन जुटा सकता है या फिर बेहतर विमर्शों को अंजाम दे सकता है । दोनों को एक साथ साध्य बनाने लायक भाषिक और वैचारिक योग्यता फिलवक्त किसी राजनेता में नहीं  दिखती ।

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Thursday, February 12, 2015


  दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 ; डायरी से 


आइ एडमिट कि मुझमें बदलाव और विरोध की तड़प है पर हिम्मत नहीं । आई एप्रिशिऎट कि उसमें बदलाव और विरोध की तड़प के साथ हिम्मत भी है । इसलिए अपनी ताकत मैं उसमें देखती हूं । बस चेक रखती हूं खुद पर कि जिंदगी में कभी बौद्धिकता के बोझ से झुका नौटंकीबाज बर्जुआ न बन जाउं । 
ज्ञान के लोड से टूटी कमर वाले बौद्धिक बुर्जुआ की दिक्कत है कि बहुत अल्ट्रा च्यूज़ी , ओवर सोफेस्टिकेटिड , एक्स्ट्रा क्रिटिकल , एनालिटिकल होकर क्रांति के वक्त खुद को सेव कर जाता है । उसके लिए क्रांति करने आसमान से देवता आएगा न जब वो हरकत में आएंग़ें । भाई लोगों आजकल भगवान ने अवतार लेना बंद कर दिया है इसलिए आप चादर तानकर सोवो या फिर सिगरेट के छ्ल्ले उड़ाते हुए अपनी आने वाली किताब पर और क्रांति के लूपहोल्स पर गप्प चेपो । वी लेट यू रेस्ट इन पीस ।
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वुडलैंड का सेल में खरीदा हुआ मेरा नया सैंडिल पच्च से ढेर सारे पाखाने में सन गया । जिस दरवाजे को हमने खटखटाया था उसमें से निकली महिला ने सहानूभूति जताते हुए कहा कि "यहां तो जी जानवर वगैरह का मल मूत्र और सीवरों से निकली हुई गंदगी ऎसे ही बिखरी रहती हैं , हम तो इसमें जीना जानते हैं ,आप जरा देखदाख के चलो बिटिया "। पता नहीं वह कौन सी चेतना थी भीतर कि न हीं कैसे मुंह से न छी निकला न ही आउच्छ ।
चुनाव प्रचार के लिए निकली हुए हमारी टोली जिसमें विश्वविद्यालय के कई शिक्षक , वकील , डॉक्टर वक रोजाना शहर से इसी तरह रूबरू हो रहे हैं । ऎसे कई नए लोगों से रोज परिचित होने का मौका मिलता है जो बस अपनी अंदर की आवाज़ के पीछे खिंचे चले आए हैं । हम घूमते हैं एक एक खुले दरवाजे को खटखटाते हुए । ....तंग बस्तियां बेहद तंग गलियां , तमाम तरह की गंदगी , ढेर सारी मुसीबतों के पहाड । किसी बुजुर्ग महिला या पुरुष से बात करने लगो तो गले लगाने से लेकर सरकारों को कोसने और अपनी किस्मत पर रोने तक सब कुछ गवाह बनना ; और अगर युवा वोटर है तो उसकी सलाहें और जोश और गुस्से को उम्मीद में बदलते देखना । आप तो जी बेफिक्र रहो . और किसे वोट देंगे , सब चोरों ने मिलकर देश को लूटा है अबतक , हां बेटा जी आप कह रहे हो तो जरूर वोट करेंगे ।
गलियों में घूमती एक टीम रोजाना हमसे टकरा जाती है रेवाड़ी से आई इस टीम में योगेन्द्र यादव जी की बहन अपने कई डॉक्टर्स , पेशेवर वकील और मीडिया व इकोनोमिक्स के विद्वान के साथ दिखती हैं । शक्ल मिलती लगी तो पूछ्ने पर पता चला कि वे तो यादव जी की बहन हैं ...।
सुविधा सम्पन्न , विकसित और जागरूक वर्ग का बदहाल और समाज के सताए हुए लोगों के साथ संवाद होता देखने भर से रोज रोज मुझमें नई उम्मीद जागती है । कई दिनों से मुझपर जम रही काई जैसे साफ हो रही हो । जंग खाए दिमाग की रिपेयरिंग हो रही हो मानो । फ्लसफों और निचुड़ी हुई संवेदनाओं से थका हारा क्रिऎटिव पीस उपजाने की शर्मिंदगी जरा जरा कम सी होती जाती है । आवाज बुलंद कर नारे लगाते हुए सीवर की बगल में पड़े शहर के मवाद से नफरत कम होती है क्योंकि मैं यह महसूस कर पा रही होती हूं कि ये वही मवाद और मल ही तो है जिसे हम सुविधाभोगियों ने इधर ट्रांस्फर कर दिया है ।
मुझ सफाई पसंद , नाजुक मिज़ाज को जमीन पर चलने के लिए मजबूर कर देने वाली इस उम्मीद को सलाम ।
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इस ऐतिहासिक जीत का अर्थ यही है कि लोकतंत्र में बडे से बडे तानाशाह को परास्त करने की ताकत होती है । लोक की शक्ति को किसी भी धन बल या विज्ञापन से जीतने की कोशिश करने का इतना तीखा प्रतिरोध कर जनता ने लोकतत्र की शक्ति प्रदर्शन का नमूना भर पेश किया है अभी तो ।
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अपने पैंरों में पड़े एक एक छाले पर प्यार आ रहा है उन सारी आंखों पर प्यार आ रहा है जो पांच साल कहने पर जवाब में केजरीवाल कहकर लाड बरसाती मिलीं . लपककर टोपी मांग लेने वाले मेहनतकश हाथों पर प्यार आ रहा है . मतलब आप सबके प्यार पर प्यार आ रहा है .
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अरविंद तो केवल एक प्रतीक भर हैं । आज वह हैं कल कोई और होगा । परिवर्तनविरोधी ताकतों का विरोध होते रहना चाहिए बस । इसका अगुवा संयोग से अरविंद हैं या हम उनमे यह क्षमता देख लेते हैं । निर्भय के कमेंट का केवल यही मतलब है शायद । या होना चाहिए । बाकी हम सब मित्र हैं और दिल से अच्छे हैं 
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यानि यह कि साहित्य की ही तरह राजनीति की भी साधनावस्था ही उद्वेलित करती है मुझे..राजनीति की सिद्दवस्था नहीं । ..
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Friday, January 09, 2015

अर्चना  तुम  तो अपराजिता  थीं ..

पिछले बारह सालों से 31 दिसम्बर की रात और 1 जनवरी की सुबह मेरे भीतर गहरे अवसाद को पैदा करती आ रही हैं । वह 1 जनवरी 2002 की वह स्याह सुबह । दिल्ली यूनिवर्सिटी की रीडस लाइन के सरकारी मकान के पंखे से झूलती तुम्हारी देह । जब गई रात पूरा शहर और तुम्हारा सूरज अपने दोस्तों के साथ जश्न में डूबा था तुम अपने दर्द की गहरी नदी में डूब रही थीं । एकदम अकेली ।
और बार बार यह सब एक बदशकुन सपना लग रहा था । पर ये सच था कि सपनीली आंखों वाली ,मंद मंद मुस्काने वाली खामोश सी लड़की अर्चना अब अपने परास्त मन की कहानी कहने से बेहतर आइ क्विट की शैली में हमें छोड़कर जा चुकी थी । दुनिया को नहीं पता था कि युनिवर्सिटी की आर्ट्स लाइब्रेरी के आहातों में एक दलित लड़के सूरज् से एक ब्राहमण लड़की का प्रेम गुपचुप पनप रहा था । पर तुम्हारे जानने वाले जानते थे कि यह चुपचाप सी दिखने वाली लड़की कितना बड़ा कदम उठाने जा रही है । परम्परा से , जाति से , परिवार से , तुम्हारे शांत विद्रोह के हम चंद गवाह आज तुम्हारे बहुत बड़े गुनहगार हैं ।
जो तुम्हारे लिए प्रेम था वह उस लड़के के लिए उपलब्धि थी । जिसे तुम भावना समझती रही वह उस लड़के के लिए गणित था । जिसे तुम विद्रोह और क्रांति समझ रही थी वह उस लड़के के लिए सदियों पुरानी कुंठा की जीत से ज्यादा कुछ नहीं था ।
ओह ! तुमने कभी भी तो नहीं बताया ।
तुम तो हर बार मिलती और बस धीमे से मुस्कुरा जाती थीं बस ।
हम दोस्त तुम्हें डोली में बैठाकर लौट गए थे कि चलो आज समाज की दूरियों को कुछ तो कम कर पाए हम । हम जिस सपनों भरी दुनिया में जी रहे थे वहां बस प्यार जायज था बाकी के सब बंधन नाजायज , बेमानी और फालतू थे ।
काश तुम परम्परा और सामती दीवारों में घुटते प्रेम के बारे में कुछ तो बताती हमें । शायद तुम्हें अंत तक कोई उम्मीद रही होगी । शायद तुम्हें अंत तक बंजर में ओई कोंपल फूटने की आस बंधी होगी । शायद तुम हर दिन मौत को कायरता और हार मानकर दुरदुराती रही होंगी ।
जिस जमाने से तुम नहीं डरी थीं वह जमाना तुम्हारा उपहास बनाने के लिए तैयार बैठा था कहीं तुम्हें यह तो नहीं लगा अर्चना ? ........काश कि तुम कभी तो कुछ कहतीं ।
अब बस घिसटते हुए कोर्ट केस की फाइलों में दफ्न कुछ पन्ने बचे हैं पास हमारे ।
फोटोस्टेट पन्ने ।
तुम्हारी किताबों और एम .ए के नोट्स के हाशिए पर तुम्हारे लिखे वाक्य ।
इन शब्दों में कैद तुम्हारी तकलीफ ,तुम्हारी अंत तक जूझने की कहानी ।
हमारे लिए ये सब कथाएं बोतल में बंद जिन्न की तरह हैं । इनके कैद से छूटते ही न मालूम कितने भयावह सवाल आसपास् बिखर जाएंगे ।
............. नए साल की जो सुबह दुनिया के लिए नई उम्मीदें और सपने लाने वाली होती है वह तुम्हारे लिए अंधियारी ,डारावनी और आखिरी -अकेली रात बनकर क्यों रह गई।
एक अंतहीन रात ।
12 साल से किसी नए साल की नई सुबह ने यह जवाब नहीं दिया ! मैं शर्मिंदा हूं अर्चना ।
किसी नई सुबह की किसी पहली किरण के मिल जाने के इंतजार में.................. ।

Tuesday, December 30, 2014

एक बुझे  हुए  वक्त  में  कविता 

जैसे किसी माटी सने बच्चे को छूकर
दरवाजे से आ लगी हो हवा
जैसे देता हो दस्तक कोई लगातार
खुले दरवाज़े की चौखट पर
जैसे आंगन में मुरझाए पौधों को 
सींचती मां का उड़ता हो आंचल
जैसे कारा की मोरी से झांकता
नीला टुकड़ा देता हो दिलासे
जैसे अंधेरे की उदासी को चीरता
गुनगुनाता हो कोई आदिम राग
ऎसे ही बुझे हुए वक्त में
कौंध जाती है कविता कोई
जब - जब जिंदगी की बेकाबू चाल
देती है पटखनी और जब कभी
हारती सी लगने लगती हैं सांसे
मेरी घबराई सी चेतना
तलाशती है कविता को
और कविता में तुमको

Monday, December 29, 2014


कोहरे के कफन में लिपटी  लाशें 
ये लाशें किनकी हैं
कोहरे की सुफेद चादर में
लिपटे हुए इन शवों का
कौन है मालिक कहां है दावेदार
भूख जिनसे हो गई पराजित
ठंड जीत गई उनसे
पास में जलाकर लकडियां चार
चिथड़े कपड़े में लिपटे वे शरीर
हर रात एक जंग झेल जाते जो
गरीबी और सर्द रात के बीच
गरीबी और किस्मत बीच
भूख और ठिठुरन में से
कौन ज्यादा निर्मम है ?
हर सुबह ज़िंदा पाकर खुद को
यही सोचते होंगे कि
जिंदगी कितनी बेशरम है
ताउम्र ज़माने की मार
मौसम के बदमिजाज नखरे
खुदगर्ज शहर के लफड़े
झेल गया ये शरीर आज जो
अकड़ी हुई लावारिस लाश है
अपने गर्म लहू के ताप से
उम्र दर उम्र शहर को सेंकने वाले
ये नहीं तो कोई और सही
बहुतेरे मिलेंगे हाड- मांस के पुतले
चमचमाते शहर को तो बस चाहिए गर्मी
ठठरियों से सोखी हुई गर्मी
लाशें किसकी हैं क्या अंतर पड़्ता है
शहर का तो दावा है गर्मी पर

Sunday, December 14, 2014

शब्दों के  यायावर हम

कभी लगता है कि
शब्द सोहबत हैं
कभी महसूस होती है
इनके व्यामोह की तंग गिरफ्त
कभी दिखाई देता है 
इनसे रचा जाता व्यूह

कभी ये लगते हैं वहम जैसे
कभी इनके आदर्शों के
ताने बाने में जितने उलझती हूं
उतनी ही तीखी वंचना
छल जाती है
भर जाती है विषाद 

शापित अर्थों के साये
रात दिन पीछा करते हैं
पुरानी ऊन की उधेड़ बुन से
अंगुलियों की सिकाई करते शब्द
इनकी ढाल में छिपकर हारी हुई
हर लड़ाई खोलती है तिलिस्म
और हर शब्द बन जाता है
विस्मृत इतिहास की पीड़ा सा

शब्द की खोह में
एक अनवरत अंतर्यात्रा
और इन सूनी यात्राओं में
नहीं मिलता साथी कोई
इन अंध यात्राओं के
अकेले यायावर हम .........

Sunday, December 07, 2014

आपकी पैट्रीआर्की को खतरा बढ़ रहा है भाई जी

मैडम अपने पति और ससुराल से परेशान रहती हैं ।
अरे फ्रस्टेटिड लेडी है।
झगड़ालू नेचर है शुरू से इसका तो हम तो कबसे जानते हैं ।
ब्यूटी का घमंड है इसको ।
किसी के भड़काने पर चल रही है वरना इसका न इतना दिमाग है न इतनी हिम्मत ।
शक्की और डिप्रेस्ड है पर्सनल लाइफ में ।
खुद कइयों पे लाइन मारती है ! तब कुछ नहीं होता ।
औरत को जी औरत की तरह ही रहना चाहिए सोफेस्टिकेटिड बनके । चालू औरतें हमें नहीं पसंद आतीं ।
अजी ज़रा कुछ कह क्या दिया इसने तो बवाल ही मचा दिया कौन सा इसके ब्लाउज़ में हाथ धुसेड़ा था ।
अजी वैसे तो बड़ा रस लेती है पर इस बार ऊपर चढ़्ने के लिए बेचारे को फंसा रही है
अजी हमें पता है कैसे इसकी नौकरी लगी कॉम्प्रोमाइज़ कर कर के आज सती सावित्री बन रही है ।
यार इससे बचके रहना किसी पर भी केस बा सकती है ये तो \
सीधे सीधे नौकरी करे सबको खुश रखे अपना घर जाए पर इसे तो अड़ंगेबाजी करनी है न ।
यार मैं बताउं सब सेक्सुअली डिप्राइव्ड औरतें ऎसी ही होती हैं । ज्यादा प्राब्लम है तो घर क्यों नहीं बैठती भई ?
अपने कामकाजी जीवन में एक बार कोई स्त्री अपने खिलाफ किए गए हैरास्मेंट पर आवाज़ उठा भर दे । मैं अपने अनुभव से कह रही हूं उस स्त्री को यही और ऎसा ही बहुत कुछ सुनने को मिलेगा । वर्क प्लेस पर स्त्री - उत्पीड़न का भी अपना एक समाजशास्त्र है । मर्यादामर्दोत्तम सब जगह समान रूप से पाए जाते हैं और सब जगह समान रूप से ही विरोध के स्वरों को दबाने के लिए तत्पर रहते हैं ।
लड़के रेप जैसा जधन्य अपराध कर दें तब भी आप कहते हैं कि लड़के हैं गलती हो ही जाती है और लड़कियां अपने बचाव में मारपीट भी करें तो आप उनकी संघर्ष के पीछे महान कारण की खोज करते हैं और कारण आपको कनविंस होने लायक न लगे तो आप अपनी अपनी अदालतों में लड़कियों के खिलाफ फतवे जारी करने बैठ जाते हैं । दोगले हैं आप । डरपोक हैं आप । लड़कों के लक्षण अख्तियार करती लड़कियों से आपको अपने सपनों तक मॆं डर लगता है । आपको तो लड़की के बलात्कार के कारण भी लड़की के शरीर में ही खोजने की आदत हो गई है । और अगर लड़कियां हिंसा कर दें लड़कों के साथ तो भी कारण उन लड़्कियों के भीतर ही दिखाते हैं आप । यारों पिट लेने दो छोकरों को भी थोड़ा बहुत । सारा सोशल जस्टिस इसी हाथापाई पर एप्लाई मत कर डालो । आवाज उठाती लड़कियां आपको क्यों भाएंगी । ये उनके बढ़ते हौसलों का सबूत है जिससे आपके समाज की बुनियादी सेटिंग को भरपूर खतरा है । सारा समाज जब एक तरफ हो जाता है असल लड़ाई तो तब शुरु होती है । चुप चाप प्रताड़ित होती रहतीं वे तो सहानुभूति पातीं बलात्कृत हो जातीं तो टुच्चा सा केस बनता और लड़के ऎड़ी चोटी का जोर लगाके , सोशल प्रेशर एप्लाई करके बरी हो लेते , मारी जातीं तो आप इंडिया गेट पर दिये लगाते , खबर बनाते , कैंदिल मार्च करते । आपकी जरा दिनों की हाय हाय से मृतक लड़कियों की आत्मा को शांति मिल जाती । और बाकी की लड़कियां कोई न कोई सबक पातीं और अपने लिए इसी सड़ी गली सोसाएटी में कोई कोना तलाश कर चुप हो लेतीं । 

संभाल लीजिए ! आपकी पैट्रीआर्की को खतरा बढ़ रहा है भाई जी !!

Wednesday, October 01, 2014


पतनशील पत्नियों के नोट्स
नीलिमा चौहान

अब मैं सुधरने की सोच रही हूं ! घर ,परिवार ,पति ,बच्चे बस इन्हीं के लिए जीना ! अचार मुरब्बे डालने और रायते के लिए बूंदी तक खुद घर में तलने वाली ,पति के आगे जवाबतलब न करने वाली ममतामयी मां और आज्ञाकारी सेविका बनकर सबका दिल जीत लेने वाली औरत बनूंगी ! ईश्वर ने साफ - साफ तौर पर अलग -अलग भूमिकाएं देकर हमें धरती पर भेजा है हम नाहक ही एक दूसरे की फील्ड में टांग अडाते रहते हैं ! अपनी बाउंडरी डिफाइन जितनी महीनता से करूंगी उतना ही पति को अपने कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को निभाने के लिए मजबूर कर पाउंगी ! मुझे तरस आता है उन औरतों पर जो बेफिजू़ल एक बटन पति की कमीज़ पर न टांकने या थाली देर से परोसने पर पति से लताड़ी जाती हैं ! उनपर भी रहम खाने का मन करता है जो औरतें आदमियों की फील्ड में पैर जमाने की जद्दोजहद में न घर की रहती हैं न घाट की ! जितना पति पर निर्भर रहोगी व पति को खुद पर निर्भर रखोगी उतना ही तुम्हारी शादी व प्यार प्रगाढ होगा ! हम सुधर जाएं बस पति तो खुद ब खुद सुधर जाएगा !
अब तो आप सब की ही तरह इस नारीवादी औरतवादी नारेबाजी - बहसबाजी से मैं भी तंग आ चुकी हूं ! सब सही कह रहे हैं ये इंकलाबी ज़ज़्बा हम सब औरतों के खाली दिमागों और नाकाबिलिय़त का धमाका भर है बस ! हम बेकार में दुखियारी बनी फिर रही हैं ! सब कुछ कितना अच्छा, और मिला मिलाया है ! पति घर बच्चे ! हां थोडी दिक्कत हो तो पति की कमाई से मेड भर रख लें तो सारी कमियां दूर हो जाएंगी ! फिर हम सब सुखी सुहागिनें अपने अपने सुखों पर नाज़ कर सकेगीं ! सब रगडे झगडे हमारी गलतफहमियों या ऎडजस्टमेंट की आदत न होने से होते हैं ! बस कभी - कभी एक सवाल मन में उठता है वो यह कि - हम कितने सुखी हैं ये खुशफहमी तभी तक क्यों बनी रहती है जब तक हम सारी घरेलू जिम्मेदारियां हंसते हंसते उठाती रहतीं हैं ! काश जब हम पति के मोजे ,बनियान जगह पर टाइम पर न रखें और सुबह की चाय देरी से दें और फिर भी घर की खुशहाली बनी रहे साथ ही हमारे बारे में नाकाबिल औरत का फतवा न जारी किया जाए ! आस -पास की बराबरी -बराबरी चिल्लाने वाली औरतों का उलझाउ -पकाउ फेमिनिज़्म आपके दाम्पत्य जीवन के रिश्ते की पैरवी में नहीं आएगा तब और आप सोचेगी हाय एक बटन टांक ही देती तो क्या हर्ज हो जाता ??हम पत्नियों को अपना ध्यान गोल रोटियां बनाने ,रसोई के रास्ते पति का दिल जीतने और घर की स्वामिनी कहलाने के योग्य बनने में लगाना चाहिए ताकि हम पति को यह अहसास दिला सकें कि उनका कर्म है ज्यादा कमाना तथा पत्नी को घर व समाज में एक दर्जा दिलाना ! सोचिए अगर पति कमाकर लाने से इंकार कर दे तो सारा दिन बाहर खटता है वह भी तो खुद को मजदूर मान सकता है उसे घर मॆं चैन की दो वक्त की रोटी भी न मिले तो क्यों वह घर लौट के आना चाहे? निहायत ही बुरा ज़माना आ गया है घरों की शांति खत्म हुए चली जा रही है ! हर बात में दमन ,शोषण देखने की आदत पड़ चुकी है कुछ औरतों को ! ये विवाह नाम का रिश्‍ता बहुत समझदार समझौतों से चलता है जो हम पत्नियों को ही करने आने चाहिए ताकि अपने द्वारा बनाए गए सलीकेदार घर में सुव्यवस्था से रहने वाले पति को इस सुख की लत डाल सकें ! ये लत ही उसकी मजबूरी बन जाए यह हमारी स्त्री सुलभ सदिच्छा होनी चाहिए ! बाकी पुरुष की सत्ता को चुनौती की जरूरत ही नहीं पडेगी जब हम विरोध का मौका ही नहीं आने देंगी ! यूं भी पति पत्नी के संबध सब जन्नत में पहले से तय होते हैं उनको निभाने की जिद होनी चाहिए बस !
इसलिए मेरा तो मानना है कि ये बस बददिमागी फितूर है, बदजमानाई हवा है और निखालिस बदजुबानी है कि औरतों की जिंदगी में कोई जुल्‍म पेशतर है। सच बस इतना है कि गोल रोटियॉं, मुरब्‍बे पापड. तक बनाने में नाकाबिल औरतों की काहिली के चलते शादी के इस खूबसूरत रिश्‍ते पर संकट आन पड़ा है जिसे थोड़ी सी तैयारी और मजबूत इरादे से निपटा जा सकता है।  अब मैंने बस इसी इरादे को पूरा करने का हलफ उठाया है। ऊपरवाला मुझे मेरे इरादे में सफल करे ।  आमीन । 

Tuesday, September 30, 2014

अभी साथ था अब खिलाफ है 
वक्त का भी आदमी सा हाल है

आईना घर में रहा बरसों मगर
आज उसकी आंख में क्यू्ं सवाल है

खत में लिखा आएंगे अबके बरस
धीमी कर दी वक्त ने क्यूं चाल है

मुद्ओं की भीड़ में क्यों खो गया
मुददई को बस रह गया मलाल है

आदमी को आदमी का वास्ता
आदमी ही आदमी की ढाल है



Friday, September 26, 2014

स्त्री  यौनिकता  के आईने  में



कौन जानता था कि शेफाली जरीवाला के 'कांटा लगा' वाले गाने से जिस स्त्री सेक्सुएलिटी का आगाज हुआ वह अंतत: पोर्न अभिनेत्री सनी लियोन के स्टारत्व के खुले उत्सवीकरण तक जा पहुंचेगी और इतनी खुली यौनिक अभिव्यक्ति को सहर्ष स्वीकारने वाले हमारे समाज में स्त्री की सेक्सुएलिटी एक हश हश टॉपिक ही रहेगी !दरअसल हमारे समाज में स्त्री स्वातंत्रय और स्त्री की सेक्सुएलिटी को एकदम दो अलग बातें मान लिया गया है ! पुरुष की सेक्सुएलिटी हमारे यहां हमेशा से मान्य अवधारणा रही है ! चूंकि पुरुष सत्तात्मक समाज है इसलिए स्त्री की सेक्सुएलिटी को सिरे से खारिज करने का भी अधिकार पुरुषों पास है और और अगर उसे पुरुष शासित समाज मान्यता देता भी है तो उसको अपने तरीके से अपने ही लिए एप्रोप्रिएट कर लेता है ! 

जिस दैहिक पवित्रता के कोकून में स्त्री को बांधा गया है वह पुरुष शासित समाज की ही तो साजिशा है ! यह पूरी साजिश एक ओर पुरुष को खुली यौनिक आजादी देती है तो दूसरी ओर स्त्री को मर्यादा और नैतिकता के बंधनों में बांधकर हमारे समाज के ढांचे का संतुलन कायम रखती है ! स्त्री दुहरे अन्याय का शिकार है- पहला अन्याय प्राकृतिक है तो दूसरा मानव निर्मित ! गर्भ और योनि की ढोने वाली स्त्री पुरुष पर निर्भर स्त्री कैसे कैसे और किन किन तरीकों से और किस किस से हक के लिए लड़े ! कोई भी सामाजिक संरचना उसके फेवर में नहीं है क्योंकि सभी संरचनाओं पर पुरुष काबिज है ! उसके अस्तित्व की लड़ाई तो अभी बहुत बेसिक और मानवीय हकों के लिए है सेक्सुअल आइसेंटिटी और उसको एक्स्प्रेस करने की लड़ाई तो उसकी कल्पना तक में भी नहीं आई है ! अपनी देह और उसकी आजादी की लड़ाई के जोखिम उठाने के लिए पहले इसकी जरूरत और इसकी रियलाइजेशन तो आए ! हमारा स्त्री-समाज तो इस नजर् से अभी बहुत पुरातन है ! स्त्री के सेक्सुअल सेल्फ की पाश्चात्य अवधारणा अभी तो आंदोलनों के जरिए वहां भी निर्मिति के दौर में ही है हमारा देश तो अभी अक्षत योनि को कुंवारी देवी बनाकर पूजने में लगा है ! एसे में शेफाली जरीवाला अपनी कमर में पोर्न पत्रिका खोंसे ब्वाय प्रेंड के साथ डेटिंग करती दिखती है तो इससे हमारे पुरुष समाज का आनंद दुगना होता है उसे स्त्री की यौन अधिकारों और यौन अस्मिता की मांग के रूप में थोड़े ही देखा जाता है ! सनी लियोन को अभिनय करते देख भी हमारा लिंग पूजक समाज अपनी ग्रंथि को ही सहलाता पाया जाता है और सुनहले पर्दे की ऐसी बड़ी परिघटनाएं स्त्री समाज को आजादी और अस्मिता की पहली सीढी भी फ्रर्लांघने लायक संदेश नहीं दे पातीं !

Tuesday, September 23, 2014

देवता के विरुद्ध

मेरी आस्था ने गढ़ॆ देवता , 
विश्वासों ने उनको किया अलंकृत 
मेरी लाचारगी के ताप से 
पकती गई उनकी मिट्टी 
मेरे स्मरण से मिली ताकत से वे
जमते गए चौराहों पर
मैंने जब जब उनका किया आह्वान 
आहूत किया यज्ञ किये
रक्तबीज से उग आए वे यहां वहां 
काठ में ,पत्थर में , पहाड़ में , कंदराओं में
मेरे वहम ने उनकी लकीरों को
धिस धिस के किया गाढा
मेरे अह्म ने भर दिया
असीम बल उसकी बाहुओं में ,
मुझे दूसरे के देवता पर हंसी आती
मुझे हर तीसरे की किस्मत पे आता रोना
मुझे सुकून मिलता अपने देवता के
पैदा किए आतंक से

एक देवता क्या गढा मैंने
मैं इंसान से शैतान हो गया

Monday, September 22, 2014

उसे  हम  अपराजिता  नहीं  बना  पाए ...


उसकी कथा सुनकर और उसकी दशा देखकर अपने संतुलन को बनाए रखना एक चुनौती हो गया मेरे लिए .... वह 17 - 18 साल की लड़की एनीमिया ,गरीबी ,लाचारगी का जीवंत उदाहरण लग रही थी । वजन उसका इतना कि जिससे ज्यादा अब घट नहीं सकता था और विषाद इतना कि जीने की उसकी ललक उसे हरा ही नहीं पा रही थी । मैं अब अपनी जिंदगी बनाना चाहती हूं मैं अब कुछ करके दिखाना चाहती हूँ जैसे वाक्य वह खुद को दिलासा देते हुए बार - बार दोहराती, मानो वह चाहती हो कि उसके इन वाक्यों को हर वह व्यक्ति सुन ले जो उसकी वजह से शर्मिंदा हुए हैं । उसकी मां और नानी खास तौर पर जिन्होंने अपनी बेटी को क़ॉलेज पढने भेजा, और उसके जीवन को बनाने के लिए अपनी खाली जेबों और आशीषों भरे दिल को उड़ेल दिया। मां उंचे घरों में खाना बनाती , पिता ऑटो चलाते ,नानी सरकारी अस्पताल में सफाई का काम करती ,और रात भर घर के बच्चे उँचे ब्रांडों की जींस के मोटे कपडे को खाकों पर रखकर कैंची से कटाई करते ताकि सुबह कैंची के जोर से सूज गई हथेलियां खाली न हों उनपर चँद रुपये हों ,परिवार के खस्ता हाल महौल को उनका योगदान ..! 
गरीब परिवार की पुनर्वास कालोनी के तंग गरीब घर की बेहद काली बेटी से कौन शादी करेगा ये दुख मां व नानी के अपराधबोध में बदल रहा था। अपने कालेपन और बदसूरती के अहसास की पीडा और उसपर गरीबी के अंधकार से भरा भविष्य । समाज के आवारा शिकारियों के लिए ऐसे घरों की बेटियां सबसे आसान शिकार होती हैं ! पडोस के घर में रहने वाले एक लड्के ने प्रेम और शादी का यकीन दिलाकर उस लड्की का शारीरिक शोषण किया। मां व नानी ने इस पर यह सोच कर कोई ऐतराज नहीं किया कि वह लडका अपना वादा निभाएगा ,उनकी बेटी की जिंदगी बन जाएगी ! घर के अन्य लोगों से छिपकर यह विडम्बनापूर्ण व्यापार कुछ दिन चला और बाद में लड्के दृश्‍य से गायब हो गया। लड्की को एक ऎसा शारीरिक रोग संक्रमित कर गया कि कई महीनों नानी के अस्पताल में इलाज चला , सेहत और गिरी , मन की बची खुची ताकत जाती रही। पर तीनों औरतों ने हार नहीं मानी। वे फिर से अपनी ताकत जुटाने लगीं ! बच्ची ने छूटी हुई पढाई को फिर से शुरू किया । जीवन को एक लास्ट चांस देने के लिए , मांओं के सीनों को ठंडक देने के लिए। पर उसकी दोबारा उठने की उसकी उतावली , उसके पीछा न छोडने वाले दुर्भाग्य ,और उसके दुर्जेय हालातों ने मिलकर फिर से एक खेल खेल डाला ! उसने परीक्षा में नकल की और यूनिवर्सिटी की टीम के हाथों पकडी गई । अपने भयों ,दबावों ,और असुरक्षा के प्रभाव में उसने जो गलती की उसके कारण यूनिवर्सिटी से निकाल दी गई। 
उसका गरीब अभागिन और बदसूरत बेटी होने का अपराध बोध अब और अधिक बढ गया था ! अपनी जुझारू मां व नानी को निराश करने पर अब वह पूरी तरह से इस धरती पर खुद को बोझ मान रही थी। इतनी सी उम्र में उसने जीवन के साथ कई समझौते कई वादे कई प्रयोग कर डाले। उसे नहीं पता था कि वह क्या बनना चाहती थी या क्या करना चाहती थी। पर उसे लगता था कि जब मां व नानी का इतना विश्वास है तो वह जरूर कुछ न कुछ कर सकेगी। कुछ ऎसा कि उसके कालेपन पर उसे चिढाने वाला समाज उसको कम नफरत से देखेगा। उस दलदल में जिसे सब समाज कहते हैं किसी ठूंठ को पकडकर वह भी पैर जमाकर डटे रहना चाहती थी। उदासीन पिता और सुन्दर छोटी बहनों की नजर में एक जगह की दरकार उसके मन में टीस की तरह पनप रही थी। और वो लडका जिसने उसकी सेहत ,दिल और शरीर के साथ खिलवाड किया उसको चाहे वह जहां कहीं भी हो उसकी औकात बताना चाहती थी। पर अब कुछ नहीं हो सकता था अब वह टूट रही थी , पांव कांप रहे थे मन दुनिया से उठ चुका था , मां व नानी की हिम्मत का तिनके बराबर सहारा इतना मजबूत नहीं था कि तेज थपेडों में उसे बचा ले जाए ! निराशा की उस सीमा पर वह थी कि अब मुत्यु ही उसे वह  होना लग रही थी। क्योंकि उसके हिसाब से अब यही  सबसे सरल रास्ता था ।
मैं उसकी बीते साल की एक लाचार अध्यापिका अपने सारे फलसफों, सारे दिलासों सारे स्नेह के बावजूद समाज व हालात की शिकार उस निरीह् को उसकी पीडा से नहीं उभार पा रही थी। क्योंकि दरअसल मैं खुद कटघरे में खडा अपराधी थी ।

Tuesday, August 26, 2014


उन उंचाइयों  की  गिरावट 

पांच - छह साल की थी तो अक्सर ऊंची मंजिल से जमीन पर आकर धड़ाम गिरती थी सपने में और जब झटके से आंख खुलती तो खुद को जिंदा पाकर हैरानी व खुशी होती ! तब खत्म हो जाना या नहीं रहना क्या है शायद ही पता था पर जिंदा होना क्या है यह अवश्य अच्छे से पता चल चुका होगा ! स्कूली जीवन में गणित में फेल हो जाने का सपना अक्सर आ जाता था और उस दिन सुबह आंख खोलकर उठते हुए जिल्लत का काहिली का तीखा अहसास होता ! लगता जिसे हिसाब नहीं आता उसके लिए दुनिया का कौन सा दरवाजा खुल पाएगा ? बाद में समझ आने लगा कि ये दोनों ही तो सपने एक ही सा डर बयान करते हैं ! कैल्कुयुलेश्न और जीवन  का गहरा नाता अगर आप नहीं समझना चाहते तो जमाने की ठोकरे आपको मजबूर कर देती हैं कि आप भी इस गहरे नाते के नाते के महत्त्व को मानें वरना जीवन भर ऊंचाई से गिरने और गणित में फेल हो जाने के सपने देखते रहें ! 
कभी कभी जीवन के अनुभव यह अहसास कराने के कोशिश करते हैं कि व्यक्ति के कर्म व पुरुषार्थ जीवन  के उधर्वमुखी विकास के नियामक तत्त्व  नहीं हैं वरन वास्तविक नियंत्रण तो उस प्रयोजनवादी और उपयोगितावादी प्रवृत्ति का है जिसको अर्जित करने की प्रेरणा के उदाहरण चारों ओर बिखरे हुए हैं ! इस अवसरवादी समीकरणजीवी  युग में लाभ-हानि, कर्म-अकर्म , व्यष्टि -समिष्टि का व्याकरण मानो हमारे समाजीकरण  के हर अनुभव से मिल रहा है !  मनुष्य के भीतर के संघर्ष को जयशंकर  प्रसाद ने इड़ा व  श्रद्धा के बीच का  आदिम  संघर्ष कहा है ! बुद्धि और भावना के इस आदिम विरोध को साधने की पीड़ा न उठाकर मनुष्य बुद्धि के माहात्म्य के  आगे  एकनिष्ठ समर्पण करने को  तत्पर है ! बिना भावना के  निरंकुश बुद्धि प्रतियोगिता व  प्रतिस्पर्धा  के लिए उकसाती है ! इस दौड़ में आगे निकलने  के लिए खड़ी भीड में  भी केवल वही सफलता की  तथाकथित उंचाइयां पाएगा जो  सबसे  अधिक  निर्मम ,प्रयोजनवादी , लक्ष्यकेन्द्रियत यानि कुल  मिलाकर सभी समीकरणों का सबसे सटीक हिसाब लगाने  योग्य  होगा ! दरअसल व्यक्ति की यह विडम्बनापूर्ण स्थिति  सफलता व  प्रगति  की फर्जी व लकीरबद्ध परिभाषाएं  अपनाने के कारण उत्पन्न हुई है ! इस  प्रगति  व उंचाई के लिए व्यक्ति इसी उपरोक्त दृष्टिकोण के कारण  नीच  साधनों और शैलियों को  अपनाने से भी कोई गुरेज  नहीं  करता ! साधन व साध्य की उत्कृष्टता व पवित्रता का  कोई परस्पर  सहसंबंध आज  हम  स्वीकार नहीं  करना चाहते क्योंकि हमारे  लिए मात्र परिणाम ही  मायने  रखता  है ! उस परिणाम तक  पहुंचने  के  लिए  कितनी निकृष्टता , कितने समझौते या कैसे भी समीकरणों को अपनाने पड़ॆं - जीवन की जंग  में विजयश्री का महत्त्व  है ! इस प्रतिस्पर्धात्मक परिवेश में जीवन केवल गणित बन  जाता है आस्थाविहीन और श्रद्धाविहीन ! गणित के सूत्र रटना और अमल में  लाना ! जीवन  के गणित में इतनी महारत हासिल  हो  जाना  कि कोई संवेदना  या  मूल्य उस कैल्क्युलेश्न के मार्ग  को  बाधित  न  कर  पाए ! मस्तिष्क , बुद्धि और इड़ा मिलकर मानवता के विकास के पैमाने भी  तय  करें  व मार्ग  भी ! भावना  , संवेदना मनुष्य  की समस्त  कोमल  वृत्तियां भीतर के  अज्ञातवास में ही  रहें !
किंतु इस जीवन  दृष्टि से ,  इस गणित से और प्रयोजनवाद से हासिल उंचाइयां खोखली व एकांगी होती  हैं ! इन उंचाइयों पर चढ़ते हुए व्यक्ति अपना समस्त सफलता ,  योग्यता और श्रेष्ठता के बने - बनाए खांचों में अपने मौलिक व्यक्तित्व को ढालने  की चुनौती में  उलझा  रह  जाता है जो अक्सर  एक डर का  रूप ले  लेती  है ! ये डर जीवन को लगातार नियंत्रित करने का प्रयास करता है ! परंतु जिस  क्षण हम  इस  भेड़्चाल की  संस्कृति  के  पाश  से  खुद  को  मुक्त  करने   का  साहस  करते  हैं  हम  पर  रखा  समस्त  बोझ तत्क्षण  उतर  जाता  है !  हम  स्प्ष्ट देख  पाते  हैं अपना  मार्ग  और  अपना  लक्ष्य ! बिना  गणितीय जटिलताओं  वाला सहज  संगीतमय आस्थामय जीवन जिसमें अपराधबोध ,आत्मा का  दमन या नैतिक दुविधा नहीं ! उंचाइयों का  कोई व्यामोह या तथाकथित विकास  की कोई  मृगमारीचिका  नहीं , कोई  विकृति भी  नहीं  ! आज मुझे वे बचपन  के भयावह  सपने नहीं आते तो इसलिए नहीं कि मैंने हिसाब-  किताब सीख लिया है बल्कि इसलिए नहीं आते कि मैंने ऎसी केल्क्युलेशंस से हासिल होने वाली ऊंचाइयों और उनसे पैदा होने वाली गिरावट को समझ लिया - ' मुझे नहीं चाहिए उन शिखरों की ऊंचाई , मुझे उन ऊंचाइयों से डर लगता है,.... 

Saturday, August 02, 2014



खुद की परछाइयों के हवाले क्यूं मैं खुद को करूं
खुद की खुद से खुदाई से मुलाकात अभी बाकी है 

उन्हें क्या मिल गया ये रंजो रश्क क्यों हो मुझे
रुह के अमन चैन के सवालात अभी बाकी हैं

उन इमारतों में इन इबारतों में बहुत खोजा तुझको
ढल गया दिन यूं ही पर वस्ल की रात बाकी है

ठहर गए पानियों में ये जो अक्स दिखता है
ग़ुज़री होंगी किश्तियां जज़्बात अभी बाकी हैं

आ गले मिल कि ये मौसम न बदल जाए कहीं
आ लगा लौ कि ये कायनात अभी बाकी है

Friday, July 25, 2014

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

मैंने देखा कि उनकी आंखें विस्मय और कौतुहल से चमक रही हैं ....!!... कॉलेज में अपने पहले दिन अपनी अध्यापिका से उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि वह उनसे कहे कि आप परीक्षा में अंक लाने के लिए ना पढें... और न मैं उस पद्धति से आपको पढाउंगी जिससे विद्यार्थी परीक्षा में अंक तो ले आते हैं लेकिन अपने और अपने समाज के खिलाफ हो रही साजिशों को समझने और उनका विरोध करने की कुव्वत पैदा नहीं कर पाते !
हर नए साल कॉलेज में पप्पू पाठाशालाओं से पास होकर आने वाले विद्यार्थियों की इस जमात के दिमाग की खिड़कियों को अब नहीं तो कब खोलेंगे ? बेहतर है कि ये बच्चे जान लें कि व्यवस्थाएं सदैव व्यक्ति विरोधी होती हैं वहां केवल चूहेमारी चलती है ! कोई भी व्यवस्था, विरोध को नहीं उगने देना चाहती इसलिए ये सुनिश्चित किया जाता है कि शिक्षा के दुश्चक्र से एक भी क्रांतिकारी ना पैदा होने पाए ! व्यवस्थाएं कोई प्रश्न या असुविधाजनक स्थिति नहीं चाहतीं वे केवल भक्त चाहती हैं ...अंधभक्त ...जी हुजूर ..लिजलिजे गिलगिले चूहेमार.....! व्यवस्थाएं सारे कायदे -कानून और फैसले ताकतवर पूंजीपतियों के हक में बनातीं हैं ! ....व्यवस्थाएं सीसैट और फोर यीयर सिस्ट्म जैसे हथियार अपनाकर हमें ज्ञान और विकास के पहले पायदान पर भी पहुंचने देना नहीं चाहतीं ! वे हमारे बौद्धिक संसाधनों का विदेशी औपनिवेशिक ताकतों के हित में इस्तेमाल करती हैं....

.....मैंने उन्हें बताया कि एक '"कोड ऑफ प्रोफेश्नल एथिक्स "नाम की चीज विश्वविद्यालय में लागू की गई थी ताकि कोई भी टीचर विद्यार्थियों को सिर्फ सतही  और सूचनात्मक ज्ञान ही दे सके, उन्हें चिंतनशील प्राणी ना बना सके.... उन्हें आलोचनात्मक ज्ञान और विवेक ना दे सके !मैं इस आचरण संहिता का तहेदिल से विरोध करती हूं जो मेरे व मेरे विद्यार्थियों के शिक्षण - अधिगम के रास्ते में आए ! शिक्षक व्यवस्था का गुलाम ना होता है ना बनाया जा सकता है ! वह चाण्क्य हो सकता है वह गांधी हो सकता है ताकि कोई हिट्लर ना पैदा हो सके !.....
मैं साहित्य पढ़ाती हूं और साहित्य का काम ही है आइना दिखाना अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना ! अन्याय और कुव्यवस्था के प्रति विरोध करने की प्रेरणा देना ..जब व्यवस्थाएं मनमानी करें तो उन्हें पलट देना ..क्रांति के जरिए एक समतामूलक समाज की स्थापना करने की पहल करना ..मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखने का धैर्य उत्पन्न करने की शक्ति का आह्वान करना ..अपनी सम्प्रभुता को हर कीमत पर बचाए रखने का हौसला देना ...!! मैंने अपने प्रिय नए विद्यार्थियों से हूबहू यही संवाद करते हुए उनमें यह विश्वास जगाया कि भले ही वे अति साधारण वर्ग के बच्चे हैं लेकिन वे इस देश का उज्जवल भविष्य हैं नए समाज की आधारशिला हैं नई क्रांति के अग्रदूत हैं और उनसे ही अब कोई उम्म्मीद बची है ..!!... इस व्यवस्था की सभी वंचनाओं , षड्यंत्रों ,अन्याय की परम्परा के लिए हम बड़ी पीढ़ी उत्तरदायी है जिसके लिए हो सके तो हमें क्षमा कर देना ! पता नहीं अपने इस संवाद में मैं कितनी सफल हुई होंगी पर अगर इनमें से एक भी विद्यार्थी जग गया तो विरोध और क्रांति की आग जलती रह सकेगी -

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

Monday, July 07, 2014

गुलामी का ग्रेंड-डिज़ाइन

सारा मामला ग्रेंडडिजाइन का है जनाब ! चाहे हमारे विश्वविद्यालयों पर चार साला शिक्षा नीति को थोपने की साजिश हो या उच्च - शिक्षा में सतही ज्ञान परोसेने वाले पाठ्यक्रमों के निर्माण की घटना हो या सिविल सर्विसिज में भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के आगे हीन बना देने का दुष्चक्र हो ...सब एक ही मास्टर प्लैनिंग का हिस्सा हैं ! ये उत्तर औपनिवेशिक इरा के अपने चरम रूप की झांकियां ही तो हैं जब हमारी भाषा , संस्कृति और ज्ञान पर "उनका ' नियंत्रण बनता जा रहा है ! ह्मारी भाषाओं को सरलीकृत करके उनको दीन- हीन और अनुपयोगी घोषित कर किया जा रहा है ! धीरे- धीरे हमें भाषिक पंगुता की ओर लेजाकर "वे" हमें अपनी भाषा की बैसाखियां पकडाना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यदि मन को गुलाम बनाना है , सोच को अगुवा करना है तो पहले अभिव्यक्ति के तरीकों को और आवाज को छीनना होगा ! दासता के महान डिजाइन की संकल्पना करने वाले जानते हैं कि तोपों से और बाहरी बल से गुलाम बनाने की बजाय टार्गेट को मन से सोच से गुलाम बनने के लिए प्रेरित करना कारगर और चिरस्थायी तरीका होता है !
हमारे विश्वविद्यालयों में भी ज्ञान को अपग्रेडिड और आधुनिक रूप में पेश करने के नाम पर जो पाठ्यक्रम और उसके प्रारूप लागू किए गए वे इसी साजिश का नतीजा थे ! ज्ञान का सतही और स्तरहीन , ढांचाविहीन ,परिकल्पना विहीन डिजाइन !


इस डिजाइन को मिलिट्री रूल के रूप में लागू किया गया, असंसदीय तरीके थोपा गया और उसके लिए सभी लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया गया ! साफ था यह पाठ्यक्रम इस बात को सुनिश्चित करता था कि छात्र सतही ज्ञान ही हासिल कर पाए और वह इस सिस्ट्म में केवल कल्रपुर्जा बनकर रहे !वह सोचने- समझने और सवाल करने के काबिल न बचे और अंतत: परफेक्ट गुलाम पैदा किये जा सकें !
आज हमें देश में अलग अलग रूपों में जो लड़ाईयां लडनी पड रही हैं वो सब आखिरकार एक ही हैं ! अपनी भाषा और ज्ञान की सम्प्रभुता की ये लड़ाईयां हमारे अस्तित्व के लिए किया जाने वाला हमारा संघर्ष हैं ! पर इनको एक करके देखने और मिलकर जूझने की कुव्वत अभी हम पैदा नहीं कर पाए हैं ! सिविल सर्विसिज के अभ्यर्थियों द्वारा किया जाने वाला आंदोलन बहुत छोटे तबके का ही ध्यान खींच पा रहा है ! हमारे यहां दूसरे की लड़ाई में अपनी टांग न फंसाने की जो नीति है उसका खामियाजा हर आंदोलन को उठाना पड़्ता है जबकि इसका पूरा फायदा सत्ताधारियों को मिल जाता है ! वरना क्या वजह थी कि एक स्तरहीन पाठ्यक्रम: इतने तानाशाह तरीके से देश की सबसे बड़े विश्वविद्यालय पर रातोंरात थोप दिया जाए और देश को उसकी सूंघ तक ना लगने पाए ! उत्तर औपनिवेशिकता की  जटिल अवधारणा  आसानी से समझ  में आ  जाती है जब हम बड़े चिंतकों और विचारकों और साहित्यकारों को पढ़ते हैं ! प्रसिद्ध अफ्रीकी साहित्यकार  चेख हामिदू अपने उपन्यास "एम्बिगुअस एड्वेंचर" में लिखते हैं - " काले उपमहाद्वीप को देखें तो यह बात समझ में आने लगती है कि ' उनकी' तोपों की असली ताकत उस दिन महसूस नहीं होती जिस दिन वे पहली बार गोले उगलती हैं ...इन तोपों के पीछे नए स्कूलों की नींव होती है ! नए स्कूलों की प्रकृति में दो चीजें हैं - तोपों के गुण भी हैं और चुंबक के भी ! तोपों के जोर से इसने फतह हासिल की लेकिन अपनी इस फतह को टिकाऊ  रूप देने के लिए इसने शिक्षा का सहारा लिया ! तोपों से शरीर पर अधिकार किया और स्कूलों से आत्मा पर ! "
जब देश की शिक्षा नीति बाहरी ताकतों के अनुसार बनाई जा रही हो और मातृभाषाओं की हत्या की योजनाएं बनाई जा रही हों : ऐसे में बुद्धिजीवी तबके का दायित्व और बढ जाता है क्योंकि देश का एक बड़ा तबका इतनी दूरअंदेशी से देखने योग्य नहीं बनने दिया गया होता और दूसरा छोटा पर शक्तिशाली तबका "उनके" साथ मिली भगत में है ! आश्चर्य कि भाषाओं के दमन की नीति और अंग्रेजी के प्रभुत्व को आरोपित करने के खिलाफ चल रही लड़ाई अपने ही घर में अपने ही लोगों से है !अंग्रेजी की अनिवार्यता का फर्जी नियम लागू करके , देश की सर्वोच्च सेवा करने वाले तंत्र में अंग्रेजी भाषा और उसी के हितों की पूर्ति करने वाले तबके को काबिज करके -- हम दासता के परम शिकंजों में फंसने जा रहे हैं ! जाहिर है जिसकी भाषा होगी उसी के हित और अधिकार होंगे ! बेजुबान और शब्दहीन की क्या बिसात होगी ! इसी प्रक्रिया में भारतीयता, राष्ट्रीयता, संस्कृति , अस्मिता और विकास जैसे शब्द हाशिए पर पहुंचकर अपना अर्थ खो देंगे और केवल शब्दकोश में सुप्त पड़े पाए जाएंगे !

Wednesday, May 07, 2014

कोई लौटा दे मुझे मेरी नासमझी और बेफिक्री के दिन

समझदारी आने पर यौवन सचमुच चला जाता है और पैसा और स्थायित्व आ जाने पर साहस - हिम्मत रूपी टायर की हवा निकल जाती है ! जैसे मायके से बुलावा आने पर तंग करने वाले ससुरालियों को छोडकर नवेली बहू भागती है वैसे ही दो दिन की भी छुट्टियां आ जाने पर ह्म दिल्ली छोड पहाडों की ओर भाग खडे होते थे ! ना कोई डर ना कोई आशंका ना कोई योजना ...सिर्फ स्पिरिट के बल पर..
.....रात के ग्यारह बारह बजे हमारी और नोट्पैड वाली सुजाता जी की अल्लसुबह में 4 बजे ही गली मुहल्ले को टाटा बाय बाय बाय कर देने की योजना बनती ...नक्शे पर सबसे दूर के निर्जन पहाडी इलाके का लक्ष्य बनाया जाता ......जल्दबाजी में घर में ही एकआध बैग छूट जाता तो दिल को ये भरोसा देकर चुप कराते चलो बच्चे तो गिनके चारों गाडी में हैं ना वो नहीं छूट्ने चाहिए थे ! रास्ते में वहम होता भाई रसोई में गैस तो शायद जलती रह गई है ...सौ किलोमीटर दूर आके ऐसा वह्म ..उधर हमें वादियां और पहाड बुला रहे होते ...तब सोचते परिसर के प्लंबर को फोन करते हैं वह लकडी की सीढियों को छ्ज्जों पर टिकाकर ऊपर चढ लेगा और रसोई की खिडकी में से झांककर सही हालात का पता दे देगा अगर जल रही होगी तो खिड्की से लंबा डंडा डालकर गैस बुझा देगा ..तीसरे ही माले का तो घर है उन्हें तो कई कई मालों पर चढ्ने का काम होता है !
एक बार तो निकलते हुए जल्दबाजी में हमारी हथेली कट गई थी खून काफी बह रहा था उधर सुजाता जी के पेट में तेज दर्द रात से ही उठ रहा था .....पर क्या करते पहाडों की हसीन वादियों की याद चुंबक बनी हमें खींच रही थी और दिल्ली से दो दिन की कुट्टा कर ही चुके थे ! सो मैं आधा लीटर खून लुटाकर और सुजाता जी कराह रूपी ट्रॉल को इगनोर करते मंजिल पर पहुंच ही गए !

......दस साल पुरानी सेकेंड हैंड मारूति ऐट हंड्रड , चिलचिलाती धूप के थपेडे, कम बजट ,दो दो चार चार साल के बच्चॉं की तंग गाडी में होती आपसी लडाइयां जिनकी गंभीरता भारत पाक सीमा विवाद से कतई कम लैवल की ना होती............एक बार हम चौपटा -तुंगनाथ की चोटी पर बैठे थे और घर में पानी की लाइन फट्ने से घर के दरवाजे की गौमुखी से गंगा और जमुना की तेज धारा बह रही थी फोन का संपर्क पहाडों पर कम ही हो पाता है सो दो दिन बाद पता चला अब क्या करें ...हम तो 6 दिन की यात्रा पर आए थे दो दिन में कैसे लौट जाते ...सो दिमाग के धोडे गधे सब दौडा डाले ..हल निकला कि मित्र जाकर घर का ताला तोडें, प्लंबर से लाइन जुड़वाकर नया ताला लगवा दें और दोस्ती का फर्ज निभाएं ........

..हाय क्यों और कहां चली गई वो अल्हडता और बेफिक्री ..वो तंगहाली...वो नासमझी ....! आज अपनी ही उस कैफियत की खुद ही मुरीद हूं ! पर कुछ भी कर लूं नहीं लौटते वे दिन ! जैसे नर्सरी एड्मीशन से पहले मां बाप बच्चे को केजी तक का स्लेबस रटा के ही दम लेते हैं कहीं कोई अच्छा स्कूल ना हाथ से निकल जाए .. वैसे ही महीने दो महीने पहले सफर की योजनाएं बनने लगती हैं...साफ सुथरा चकाचक होटल सर्च करके ऑनलाइन बुक कराकर, पावती हाथ में लेकर, हेल्थ कार्ड लेकर ,इलाके की पूरी जानकारी पहले ही हासिल करके कहीं निकलते हैं कि कहीं कोई अच्छा टूरिस्ट प्वाइंट ना छूट जाए रास्ते में कोई संकट ना पड जाए पूरी तैयारी होनी चाहिए....!! क्या करें दिमाग दिल से ज्यादा चालू हो गया है क्लास के सबसे मेधावी व हाजिर जवाब बच्चे की तरह ! क्लास पर उसी का कंट्रोल है ...बाकी सब भावनाएं घर से पढकर ना आने वाले बच्चों जैसी बैक बेंचर बनीं रह जाती हैं ......

आह नहीं चाहिए ऐसी समझदारी और पैसा ! कोई लौटा दे मुझे मेरी नासमझी और बेफिक्री के दिन !!

Tuesday, March 09, 2010

हे भगवान ! हमें मोटी होने का हक दो !

प्रार्थना - हे भगवान हमें मोटी होने का हक दो ! हमें अपनी छाती और बाहों पर बाल उगाने का हक और हिम्मत दो ! हमें देह को सजाने और न भी सजाने का फैसला लेने की बुद्धि दो ! हमें हिम्मत दो कि हमसे आइना जब सवाल करे हम उसे उलट दें ! हमें हिम्मत दो कि हम छाती को छिपाती न फिरें ! हे भगवान हमें हमारी देह ऊपर उठा दो !

पिछले साल जिम जाकर हुलिया और सेहत सुधारने का भूत सर पर सवार हुआ ! वजन में दो चार किलो का इजाफा मुझे नाकाबिले बर्दाश्त था ! मैं सोचती उम्र बढ रही है शरीर ढल रहा है स्टेमिना कम हो रहा है ! शायद जिम का व्यायाम मुझे कोई लाभ पहुंचाए ! मुझे लगता था एक लंबी उम्र परिवार के लिए दौड दौडकर बिता दी , खुद को खपा दिया ! सीढियां चढने में हांफना , वर्क लोड से सांसों का तेज हो जाना , शरीर में भारीपन महसूस होना.....अब कुछ समय खुद को और अपने स्वास्थ को भी दूं ! जिम में जाकर पता चला मैं बहुत पतली और स्वस्थ थी ! वहां पतली होने आई कई महिलाएं अपने 80 , 100 और 120 किलो के शरीर से युद्ध कर रही थीं ! सोनिया ,मोना , अनीता ..कोई विवाहित तो कोई अविवाहित ! ट्रेडमिल पर ,साइकिल पर, ऎलिप्टेकल पर पसीने से लथपथ ,बिना नाश्ता किए घर का बहुत सा काम निपटाकर , पति और बच्चों को भेज कर 2 से ढाई घंटे शरीर से कडी मेहनत करवाने वाली उन स्त्रियां से जब बातचीत होती स्त्री समाज की नियति पर क्रोध आता !

अनीता की उम्र अभी 22 साल है और वजन 80 किलो ! ऊपर से गालों पर फुंसिया और वह कमाती तक नहीं ! उसके पापा अपनी बेटी की बदसूरती और नाकाबिलितय से परेशान होकर रातों को सोते तक नहीं ! एक दिन वह बोली कि ' मैंने नर्सरी टीचर का एग्ज़ाम दिया हुआ है अगर उसमें मेरा नाम नहीं आया तो मैं सुसाइड कर लूंगी ! वह बोली पापा कहते रहते हैं कि तू पतली तो हो ही सकती है कि नहीं ! इतना तो मेरे पर उपकार कर ही सकती होगी ! मैं कहां से हो जाऊं पतली सब कुछ करके देख लिया ! "- जब वह मुझे अपनी बिखरी कहानियां सुन रही होती मैं सोच रही होती ये कोई उपन्यास या कहानी में से उडकर आई हुई घटनाएं हैं ! इनकी जिंदगियों में कोई रोशनी कोई चमक नहीं ,कोई लडाई का भाव भी नहीं ! काश ये सोती न होती जाग जातीं !

सोनिया से साइकिल चलाते हुए अक्सर बात होती ! वह बेहद पढी लिखी पिता की लाडली बेटी है ! उसके पिता और उसने 34 लडके रिजेक्ट किए ! उसके पिता को अपनी बेटी के मेंटल प्रोफाइल से मैच करता लडका नहीं मिला !आखिर में पडोस के बचपन के साथी से शादी की ! हाईली क्वालिफाइड ,बारीक समझ वाली सोनिया अपनी आधी अधूरी आपबीती सुनाते हुए कभी रो पडती तो कभी गुस्से से आंख लाल करके फदकते होंठों से कहती कि आज तो मन किया कि अपने हस्बेंड के पेट में चक्कू मार दूं ! कॉर्पोरेट जगत के उस पति को बच्चे की पैदाइश के बाद मोटी हो गई पत्नी नहीं चाहिए ! दोनों के बीच लडाई के ढेर सारे मुद्दे हैं नौबत तलाक तक आई हुई है पर असल बात आकर मोटापे तक पहुंच जाती है ! पति पर्फेक्शनिस्ट है इगोइस्टिक ,मैनेजमेंट गुरू - जिसे अपनी पत्नी बच्चा जनते ही मोटी ,भद्दी ,गंवार और जंगली लगने लगी है ! साल छ महीने में आने वाली सास और कुंवारी ननद के साथ मिलकर पति उसके गंवारपन का मातम मनाते हैं ! उसने अपनी पत्नी को हर साल तोहफों में पतले होने की मशीनें लाकर दी हैं !45000 वाला ट्रेडमिल , स्टेशनरी साइकिल , टमी ट्रेनर , तरह तरह के वेट्स ..... ! वह कहता है " ..बाकी सब तो तू छोड 5 साल से तू पतली तक तो हो नहीं सकी ! "
सोनिया रोज बिना खाए 3 घंटे की कडी एक्सरसाइज करती है उसने 3 महीने की पेमेंट जिम में की है उतना समय खुद को पतला होने के लिए रखा है और साथ साथ स्कूलों में नौकरी के लिए इंटरव्यू भी दे रही है ! शायद उसके बाद वह पति को छोडने या न छोडने के बारे में कोई फैसला ले पाएगी ! ( सोनिया से माफी पिछ्ले सितम्बर में उसने मुझसे मेरे ब्लॉग में अपनी आपबीती लिखने के लिए कहा था पर मैं आज जाकर लिख रही हूं ! )


ऎसी ही और भी कहानियां हैं जो दुख देती हैं ! सोनिया की तरह " चक्कू मार देने जितना गुस्सा पैदा करती हैं ! पर कहीं कुछ नहीं बदलता ! न प्यार से न ही क्रोध से ! और अंत में मेरे हाथ प्रार्थना में खुद -ब खुद उठ जाते हैं - हे भगवान ! हमें खुद को समझने और खुद के लिए जीने का मौका दो ! हमें हमारे हिस्से की खाद दो , हवा दो , पानी दो ! हमें भी इंसानों की पंक्ति में जगह दो !

आमीन !