Friday, July 13, 2007

मेरे शहर में शाम


मेरे शहर में शाम हर रोज आती है ! रोज उतनी ही बासी, उतनी ही भागदौड भरी और उतनी ही उदासीन !अब शाम कवि की काव्य प्रेरणा उस तरह से नहीं रही है शायद जैसी पहले हुआ करती थी ! संझा का झुटपुट, चिडिया की टुट-टुट वाली कविता भावना उपजाने में नाकाम शहरी शाम ! ये शामें ललाती सी , लुभाती सी कहां रही हैं, न कवि का मन अब कहने को करता होगा---मेघमय आसमान से उतर रही संध्या -सुंदरी परी - सी- धीरे धीरे धीरे..! भीडे लालडोरे इलाकों या फिर ऊंची सोसायटियों की ऊंची बिल्डिंगों के ऊपर के आकाश में कब शाम रात से समझौते का सौदा कर बैठती है और कब डूब जाती है शहराती नहीं जान पाता ,न जानना चाहता है


!मेरे शहर में दोपहर ढलने का नोटिस हाथ में लिए उजास निर्वासित सा निकल पडता है ! शाम बडकुंवरिया की सी पथरीली भंगिमा लिए आन खडी होती है बेकली का भाव अपने चेहरे पर लिए , बेकली अंधेरे की भीमकाया में खो जाने की.... !


मेरे शहर की धमनियों में बहती है मेट्रो मेरी शान ! इस छोर से उस छोर !उडेलती चलती है तरल शहराती झुंड--छोटे छोटे क्षुद्र कटोरों जैसे घरों में ! ऊपर आकाश में लाल और काले रंग का पारंपरिक मिलन और उसकी छाया में यमुना के पुशतों पर दौडता साइकिलों का रेला ...रोज रोज के लिए यूं ही प्रोग्रांड है ये दृष्य..मेरे शहर के केनवास पर ! यहां हर शाम थका - मांदा सा सूरज दिन भर की ड्यूटी से पसीज जाता है पर इन साइकिलों पर सवार कामगरों का मेला दस -दस घंटों की काम की पारी से भी क्या नहीं थकता ?....कम से कम साइकिलों के पैडलों पर पडते उनके पैरों की गति तो यही कहती है ....शाम के बेतरतीबे कोलाज में बेमेली से चिपके निरर्थक हिज्जे से चिपके जीते जन ...लाकों जन....


दिन में हल्की शर्म का झीना नकाब ओढे मेरा शहर हर शाम मॉलों में नंगा होने पर उतारू सा लगता है ! चमक, यौवन मूड और मौके का अद्भुत हाट !नया मूल्य , नया तेवर लिए शाम वहां बाजारू सी होने पर आमादा हर सकुचाये को निमंत्रण देती है....नए नेह का निशा निमंत्रण...


कैसे ठुकरा दिया जाए ये निमंत्रण....बहुत संयम की बात है..




ऊपर आकाश मॆं विरोधी रंगों का कितनी कुशलता से किया गया मिश्रण और यहां शहर की जमीन पर अंधेरे और चमक का साफ साफ बंटवारा.....यहां शाम जानती है दोनो छोरों की परिभाषा ......हम जाने या न जाने .....और जानना चाहें या न चाहें...

9 comments:

काकेश said...

वो शाम कुछ अजीब थी,ये शाम भी अजीब है.
तब कविता की चाह थी,अब ब्लॉगरी नसीब है.

:-)

अरुण said...

"काश मै भी ऐसा लिख पाता
गौधूली की बेला मे
ये रस मै भी ले पाता
पर मुझे इतना चैन कहा,
जो इतना रस मै ले पाऊ
हर रोज नई इक दौड मे हू
जीवन जीने की होड मे हू
जब रुक कर मै कुछ गौर करू
दिखता रात का साया गहराता"

Kavi Kulwant said...

ढ़लते सूर्य का दृष्य सुहावना है..
डूबते सूर्य को देखा!
सुर्ख लाल,
रक्त आभा।
जैसे जैसे डूबता-
और रक्तिम होता जाता।

शायद अहसास दिलाता
अपनी उपस्थिति का।
डूबते दूबते भी -
रश्मियां बिखराता जाता।
महापुरुषों सा -
कुछ दे कर जाता।
कवि कुलवंत

Pratyaksha said...

शहर के स्काईलाईन में इतनी इमारतें ! सूरज को ढलने के लिये मयस्सर नहीं एक अदद होराईज़न ।

Udan Tashtari said...

हर नेह निमंत्रण स्विकार करना कोई आवश्यक नहीं. कुछ तो अपनी भी शर्तें होती हैम जीने की. हाँ, यह सही है कितने संयम की जरुरत होती है.

--बधाई, अब आपके दोनों ब्लॉग के ब्लॉगरोल सुंदर दिखने लगे. :) हम भी मेहनत करते हैं.

Tarun said...

फोटो देखकर तो यही कहने को जी करता है कि आपके शहर की शाम बड़ी सुंदर लगती है लेकिन हमें दिल्ली की शामों क खूब पता है इसलिये ऐसा भी कह नही सकते।

yunus said...

उस शहर की शाम से हमें इस शहर की शाम याद आई ।
जहां समंदर की लहरें किनारे पर पछाड़ खाती हैं । कोई नहीं देखता समंदर को, सिवाय उदास लोगों के ।
हर शाम बदहवास भागता है शहर ।
ठस्‍समठुस्‍सा होती हैं इस शहर की लोकल ट्रेनें, बसें और शहरें ।
स्‍टॉक मार्केट से मुनाफा बटोरते हैं दिन के सौदागर ।
दुकानें बंद करते हैं तिजारती लोग ।
सब्‍ज़ी खरीदकर लोकल ट्रेन में ही काट रही होती हैं कामकाजी औरतें, तय कर रही होती हैं गृहस्‍थी में लौटने का सफर ।
छोकरे चौराहों पे बेचते हैं शाम के अख़बार ।
स्‍ट्रग्‍लर वड़ा पाव खाकर खाली हाथ चल पड़ता है घर की तरफ, ये सोचते हुए कि एक दिन टी.वी. कैमेरों के सामने बयान करेगा वो अपने संघर्ष के किस्‍से ।
और हर शाम कुछ सजी धजी लड़कियां फोर्ट के अंधेरे कोनों में खड़ी होती हैं अपना सौदा करने । मुंबई की शाम, उदासी और विडंबना का विंध्‍याचल है । क्‍या हर शहर की शाम ऐसी ही है ।

Neelima said...

यूनुस जी आपने तो एक चिट्ठे को जन्म दे दिया है टिप्पणी में ही ! बहुत बढिया कहा है!

अरुण जी, कुलवंत जी ,आपकी कविताएं बहुत बढिया हैं :)
तरुण जी धन्यवाद हां शाम फोटो में शायद सुंदर लग रही हो!
समीर जी सराहना के लिए धन्यवाद आप भी मेहनत कर अपना ब्लॉगरोल सजाएं न :)

प्र्त्यक्षा जी , काकेश जी शुक्रिया !

Pushpa Tripathi said...

Neelima ji,

Mumbai ki is bhagdaud mein ugte aur dhalte suraj ko kabhi dekha hi nahin,kum se kum in tasweeron mein to darshan ho gaye.