Monday, July 16, 2007

समीर जी, दिल्ली ब्लॉगर मीट में साधुवाद वर्सिस असहमति पर हुआ द्वंद्व

यहां तो बहुत गडबडझाला हुआ जा रहा है! हमारे अतिप्रिय समीर जी को मैं स्पष्ट करना चाहूंगी कि दिल्ली ब्लॉगर मीट में उठे जुमले --'साधुवाद युग का अंत "--केवल एक शाब्दिक प्रतीक भर था जिसका प्रचलन आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणियों में आने वाले साधुवाद शब्द मात्र से हुआ है!
समीर जी ,आपका ब्लॉग लेखन हिंदी ब्लॉग जगत में जो भूमिका रखता है उसे जाहिर करने के लिए एक टिप्पणी मात्र काफी नहीं होगी ! मैं यहां इतना ही कहना चाहती हूं कि उपरोक्त जुमले का पूरे प्रसंग में उद्देश्य यही था कि हिंदी ब्लॉगिंग मेच्योर हो रही है और हम असहमतियों और विवादों को बढता देख रहे हैं ! वहां यह कहा गया था कि अब परस्पर उत्साह बढाने वाले माहौल के स्थान पर विरोधी विचारों को रखने की परंपरा की नींव पड रही है ! यह भी कहा गया कि नए ब्लॉगरों को उत्साह वर्धन की जरूरत हमेशा रहेगी लेकिन एक सीमा के बाद हर चिट्ठाकार अपने विचार रखेगा जो जाहिराना तौर पर आपस में मेल नहीं खाते होंगे और विमर्श को जन्म दॆंगे! ब्लॉग जगत के हालिया बदलावों के मद्देनजर इस बात की और भी ज्यादा पुष्टि होती है ! फुरसतिया जी के यहां सृजन जी की टिप्पणी में भी इस संबंध में बातें रखी गई हैं !
आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का इरादा वहां मौजूद किसी भी ब्लॉगर का नहीं था ! मसिजीवी ने अपने लेख में जो बात रखी वह उस मीट में पैदा हुए विमर्श से जुडी थी !यूं तो आपके पदचिन्हों पर चलकर हम सब भी साधुवाद के जुमले को बहुत इस्तेमाल करते हैं , लेकिन नए असहमतियों के दौर में इस साधुवाद करने की प्रवृत्ति के स्थान पर सार्थक विरोधी विचार रखने की प्रवृत्ति के बलवती होने की संभावनाओं पर विचार किया गया था! यहां लक्षय ----"हम सभी ब्लॉगरों की प्रवृत्ति पर था '!----आप के लेखन की सार्थकता या इस जगह पर आपकी उपस्थिति को कट्घरे में डालने का विचार कमसे कम मै जितना उक्त लेख के लेखक को जानती हूं सबसे आखिरी विचार होगा!आप से मौज की आप द्वारा ही दी हुई छूट का अगर यह अर्थ होना था तो वाकई यह एक कमजोर शैली के लेख के कारण ही हुआ होगा !

2 comments:

Udan Tashtari said...

अरे निलिमा जी, आप तो अब हमें आहत कर रहीं हैं. मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि न तो मुझे भाई मसिजीवी की बात का बुरा लगा है और न ही मैं आहत हुआ हूँ.

मैं तो बस साधुवाद को मैं किस नजरिये से देखता हूँ, वही स्पष्ट करना चाह रहा था और सारी भूमिका उसी बिन्दु के स्पष्टीकरण के इर्द गीर्द निर्मित की गई थे. मसिजीवी भाई का लेख प्रासंगिक था तो उद्धरण दे दिया. आप मेरी तरफ से पूर्णतः निश्चिंत रहें और भाई मसिजीवी भी. जिस दिन आपकी कोई बात सीधे आहत करेगी, आप दोनों को सबसे पहले सूचित करुँगा, यह वादा है.

लेखनी थोड़ी कमजोर है इसी वजह से पूरी बात मेरे लेख में स्पष्ट नहीं हो पाई शायद. आपने अनजाने में ही मुझे आहत जान जो बातें स्पष्ट की, अच्छा लगा कि आपने और मसिजीवी जी ने, अभी अभी प्राप्त भाई मसिजीवी जी की टिप्पणी, चिन्ता की. बहुत साधुवाद और आभार. अब खुश हो जायें. :)

साधुवाद का इस्तेमाल करते रहें, खुशी होगी. हा हा-कोई कॉपी राईट नहीं है इस जुमले पर. :)

अनूप शुक्ल said...

हमें तो यह पढ़-पढ़कर मजा आ रहा है। करे कोई भरे कोई| हम गलत नहीं कहते हैं कि मसिजीवी आदतन शरारती लेखन करते हैं। इसके लिये उनको कोई अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती।
वैसे हम आपको सलाह दें अगर आप उचित समझें तो मसिजीवी की पोस्ट का ड्राफ़्ट अप्रूव किया करें प्रकाशन करने के पहले। :)

 
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