Monday, April 02, 2007

आप कितने किलो की हैं? उर्फ 34-24-36 जिंदाबाद

स्त्री की देह समाज के लिए सदा से कौतुहल का विषय रही है। सीमोन से लेकर जर्मेन ग्रीयर और मृणाल पांडेय से लेकर प्रभा खेतान के द्वारा स्त्री देह से जुडे शोषण के संरचनात्मक पहलुओं पर काफी लिखा जा चुका है लिखा जा रहा है। लेकिन स्त्री के आस पास की सामाजिक संस्थाएं इस स्त्री विमर्श और स्त्री के आडे आती रहीं हैं । यही कारण है कि एक आम भारतीय स्त्री को रसोई , सौंदर्य , सोना , घर ,रिश्ते अपने अस्तित्व से जुडे अभिन्न पहलू लगते हैं जिनके खिलाफ संधर्ष का ऎलान वह कभी नहीं कर पाती। आज बाजार स्त्री देह के नए नए उपमान गढ रहा है और जिस स्त्री छवि को वह समाज के सामने आक्रामक ढंग से परोस रहा है उसमें स्त्री स्वातंत्र्य और स्त्री के अस्तित्व के सारे विमर्श परिधि पर पहुंच गए हैं । स्त्री की रचनात्मकता, कोमलता, सुंदरता आदि के मिथों को गढकर स्त्री को मृग मारीचिकाओं में भटकते रहने के लिए छोड दिया गया है ...घर-बाहर दोनों जगह ही.....जिस तर्क से स्त्री का रसोई में रहना सिद्ध किया जाता है उसी तर्क के सहोदरधर्मी तर्कों से स्त्री का प्रदर्शनकारी भूमिकाओं में होना सिद्ध किया जाता है । खबर है कि इंडियन एयरलाइंस की विमानपरिचारिकाएं 200 ग्राम वजन ज्यादा होने पर विमान सेवाओं के अयोग्य हो जाती हैं तथा उन्हें इसके अतिरिक्त के कार्य सौंप दिए जाते हैं इस संबंध में कोर्ट का निर्देश है कि उन्हें ऎसे कार्यकाल में भत्तों के अतिरिक्त पूरा वेतन दिया जाना चाहिए । स्त्री की देह बाजार की सबसे बडी आय का माध्यम है। वह अन्यों के द्वारा बनाई गई अपनी छवि को पाने में रत समाज का हाशिए पर पडा नितांत अकेला कुनबा है...कौन है उसका सच्चा साथी... कोई तो होगा ही कभी न कभी.......

15 comments:

Aditya Kumar Tiwari said...

वर्तमान समय में नारी की इस दशा का मुख्य कारण जो समझ में आता है, वो शायद पश्चिम की भोगवादी संस्कृति का ही प्रभाव है। जब तक आधुनिकता की दौड़ में पश्चिम से कदम-ताल मिलाने के लिये उनकी संस्कृति के दोषों को हम ऐसे ही स्वीकारते रहेंगे, तब तक तो इस दिशा में कुछ भी सुधार नही होने वाला। हाँ नारी को समाज में उसका यथेष्ट स्थान दिलाने के लिये स्वयं नारी को ही आगे आना होगा और साथ ही पुरुष समाज से प्रतिस्पर्धा की बजाय सहयोग की भावना को आगे रखना होगा। तभी इन समस्याओं का कुछ समाधान सम्भव है।

Anonymous said...

Kshma karna, hindi mein type nahin kar sakta apne PC se isliye Roman mein hindi likh raha hoon, Shayad samajh mein aa jaye.
Har baat mein paschim ko aur paschim ko dosh dena achhi baat nahin. Paschim mein bahut si achhiyan bhi hai aapko unhe lene se kisne roka hai. Pashim mein nari sab kaam karne ke liye swatantra hai. Vo ghar bhi smahalti hai, train, bus, truck, taxi bhi chalati hai. Doctor, engineer bhi hai. vo vaishya bhi hai par ye kaam chunti bhi vo khud hai.
Jis din hum hindustan mein nari ko poori swatnatrata de denge aur tab unhe sweekar karenge jab samaj mein barabari aayegi tab nari in samaj dwara baney hue pratimanon ko khud hi tod degi.
To nari ko ythesht sthaan mat dilane ki koshish kariye use bas us pinjre se mukt kar dijiye jo aapne bana rakha hai, shesh vo khud hi kar legi.

Jitendra Chaudhary said...

मेरे विचार से भारतीय समाज में नारी की स्थिति काफी कुछ तक बदली है। नारी आज स्वतन्त्र, स्वावलम्बी , आत्मनिर्भर है। हो सकता है पुराने समय मे यह बात सच थी कि नारी को आगे आने से रोका जाता था, तरह तरह के बन्धन लगाए जाते थे। लेकिन आज स्थिति वैसी नही है, लेकिन एक लम्बा रास्ता तय करना बाकी है। हाँ नारी को समाज मे यथोचित स्थान पाने के लिए संघर्ष स्वयं करना होगा, कोई दूसरा नही करेगा उसके लिए।

रही बात नारी देह की, ये तो मानव स्वभाव है। काल बदलते रहे, पुरातन काल से आज तक, पुरुष की, नारी देह के प्रति आसक्ति रही है और हमेशा रहेगी। बाजारवाद के इस युग मे, जो चीज डिमांड मे होती है उसका विज्ञापनों मे इस्तेमाल बढचढ कर होता ही है। मुझे हरिशंकर परसाई जी का एक कथन याद आया :
मैं ने कोई विज्ञापन ऐसा नहीं देखा जिसमें पुरुष स्त्री से कह रहा हो कि यह साड़ी या स्नो खरीद ले। अपनी चीज़ वह खुद पसंद करती है मगर पुरुष की सिगरेट से लेकर टायर तक में वह दखल देती है। - हरिशंकर परसाई

Anonymous said...

इंडियन एयरलाईंस की विमान परिचारिकाओं के मोटा होने से ज्यादा बडी समस्या है उनमें से अधिकतम में व्यवसायिकता की कमी! इनके सरकारी ढर्रों का क्या कहना.

पश्चिम की नारी को कोसना छोड दो उनके जितना शारीरिक और बौद्धिक काम करते हुए भी खूबसूरत दिखना इंडिया की किसी भी उम्र की आंटिजियों के बस में नहीं है.

तीन तीन बाईयां रख कर भी "बीजी हूं" "टेंशन है" आदी रोती-झीकतीं रहती हैं.

notepad said...

अनानिमस जी आपने लिखा--Jis din hum hindustan mein nari ko poori swatnatrata de denge --
देने वाला कौन है ।पुरुष??अगर यही मतलब है तो इसमे निहित है कि वह मानता है कि स्त्री के अधिकार ,स्वतन्त्रता उसके ही हाथ मे है।
बाकी सब बात सब की सही है अंशत:।
जो भी उपभोग्य है,वह बाज़ार के लिए है .
जो भी उत्पाद है वह बाज़ार के लिए है।
स्त्री उपभोग्य उत्पाद है बाज़ार का।

Mired Mirage said...

अच्छा लिखा है। किन्तु कभी सोचा कि कुछ सीमा तक जो आप कह रही हैं वह सच है किन्तु पूर्ण सत्य नही। बहुत बार कोई हमें मजबूर नहीं करता कि हम सुन्दर दिखें किन्तु हमें सौन्दर्य पसन्द होता है। सुन्दर चादर, सुन्दर परदे,सुन्दर बर्तन, क्रोकरी,सुन्दर नाइटी, तब भी जब हम अकेले होते हैं। अब इन सब के लिये कौन हमें मजबूर करता है।
पश्चिम में की गयी एक रिसर्च कहती है कि अकेले रहने वाली स्त्रियाँ अकेले रहने वाले पुरुषों से अधिक समय गृह कार्य को देती हैं। शायद यह बात यह दर्शाती है अधिकतर स्त्रियाँ सुन्दर घर पसन्द करती हैं। वैसे ही जैसे शायद वे हर तरह के सौन्दर्य को पसन्द करती हैं।
हर बात के लिये पश्चिम को दोष देना गलत है। पुराने जमाने में भी भारतीय स्त्रियाँ सोलह शृन्गार करती थीं।

घुघूती बासूती

Amit said...

नीलिमा जी, विषय की सार्थकता इसी में देख लीजिए कि नारद पर आपकी पोस्ट को काफ़ी हिट्स मिले हैं!! ;)

अनानिमस जी आपने लिखा--Jis din hum hindustan mein nari ko poori swatnatrata de denge --
देने वाला कौन है ।पुरुष??अगर यही मतलब है तो इसमे निहित है कि वह मानता है कि स्त्री के अधिकार ,स्वतन्त्रता उसके ही हाथ मे है।


डॉक्टरनी जी, नारी के दमन और शोषण में केवल पुरुषों का हाथ नहीं रहा है, यह बात कदाचित्‌ आपको पता होगी। :)

अनूप शुक्ला said...

लेख अच्छा है। लेकिन छोटा है! :) आगे लिखती रहें। घुघुती बासाती जी की बात पर मुझे यही लगता है कि सौन्दर्य/खूबसूरती आदि के प्रतिमान सालों में तय होते हैं। सर्वे आदि भी इस बात पर निर्भर करते हैं कि वे किन लोगों के बीच हुये/ पूछे गये सवाल की मंशा क्या थी?

मोहिन्दर कुमार said...

नारी सौन्दर्य को हमेशा ही हथियार के तौर पर इस्तमाल किया गया है...स्व‍ंय स्त्रीयों द्वारा भी.
परन्तु स्वंय स्त्रीयां भी इस शोषण के लिये दोषी हैं..प्रशन्सा, प्रसिद्धी व धन के लोभ में अपनी मान मर्यादा को दांव पर लगाना कितना उचित है...वह शोषित होने वाला स्वंय भी जानता है..

आपके विचार निश्चय ही सम्मान जनक हैं..परन्तु बदले परिवेष में किसे दोष दे यह समझ से बाहर है

Anonymous said...

"Jis din hum hindustan mein nari ko poori swatnatrata de denge"
se mera matlab hai ki jis din hum sab jinse ye samaj bana hai, purush(kisi bhi roop mein) aur nari (nari ke vibhinn roop jaise maa, bahin, padosi etc.) nari ko vo karne se nahin rokenge jo vo karna chahte hai. use faaltoo ki maryada aur natikita ki duhai dekar rokne ki koshish nahin karenge. aur use uske har roop mein sweekar karenge, vo roop jaisa vo khud ke liye chahati hai.

notepad said...

बेनाम जी आपने मेरी ओर से उठाए प्रश्न का उत्तर दिया,धन्यवाद!

Anonymous said...

aap ek nari hain, to bata sakti hain ki kya uttar vakai mein sahi hai.

Anonymous said...

aap sabhi ka kahna thik hi hoga. mein ek bahut hi kam umra ka pathak hoon kahana chahunga ki agar nari na hoti to hum na hote. dhanyawad...

Anonymous said...

me notepad ji ki baat se sahmat hoon.

बालसुब्रमण्यम said...

जिस देश में 60 प्रतिशत महिलाएं एनेमिया (खून की कमी) की शिकार हों, वहां स्लिम फिगर की बात होनी चाहिए या स्वस्थ फिगर की?

यह विज्ञापनकर्ताओं की असामाजिकता है कि वे महिलाओं में स्लिमनेस (एनोरेक्सिक होने की हद तक) थोपते हैं, और भोली-भाली भारतीय महिलाएं (जो टीवी, समाचारपत्र पढ़ती हैं, वे) इसी को बिना सोच-समझे, सौदर्य की कसौटी मान बैठती हैं, और अनेमिक होने के बावजूद डायटिंग, व्रत आदि में उलझती हैं, जबकि उन्हें आवश्यकता है ज्यादा खाने की, ज्यादा पौष्टिक भोजन खाने की और अपना वजन बढ़ाने की।

गुमनाम, क्या आपने यह भी सोचा है कि अगर तीन-तीन बाइयों के बावजूद भी स्त्री रोती-झींकती है, तो इसका कारण यह भी हो सकता है वह कुपोषण की शिकार है (भले ही वह समृद्ध की गोद में पल रही हो)।