Friday, February 13, 2009

गुलाबी अंतर्वस्त्र आखिर किसको लजाएगा

आज सुजाता ने अपनी पोस्ट में मोस्ट चर्चित पिंक चड्डी अभियान के बारे में बात करते हुए बहस का फोकस तय करने की बात की है ! कुछ समय पहले अंतर्वस्त्रों में सडक पर मार्च पास्ट करती पूजा का विद्रोह एक उद्धत बहस का कारण बन गया था !  देखकर लगा कि जब स्त्री विमर्श किताबों और बहसों की दुनिया से बाहर पैर फैलाता है तो वह डराता है !

विद्वत समाजों में स्त्री की अस्मिता से जुडे सवालों पर सैद्धांतिक नजरिये से खूब बातें होती हैं ! स्त्री शोषित है यह भी मान लिया जाता है और उसके विक्टिमाइजेशन को रचनात्मकता के फोकस से देखकर उसे अलग अलग कला रूपों में भी ढाल लिया जाता है ! लेकिन स्त्री के पास अपने साथ हो रहे अन्याय के विरोध का क्या तरीका है इसपर  गोष्ठियां खुद को मूक पाती हैं !

मैं पेशे से प्राध्यापक हूं ! वक्तव्य सुनना सुनाना इस पेशे का ही एक हिस्सा है ! कई बार तीन या चार हफ्तों वाले रिफ्रेशर कोर्स किए हैं ! साहित्य,भाषा ,समाज संस्कृति, स्त्री और दलित विमर्श पर बहसों में शिरकत की है !  ऎसी गोष्ठियों में स्त्री विमर्श पर  बहस सुनी हैं ! यहां तक कि पिछ्ले साल विमेन स्टडीज पर हुए तीन हफ्ते के सम्मेलन में देश के विख्यात विद्वानों को सुना ! लेकिन उन स्त्री द्वारा विरोध के औजारों की पडताल और खोज पर चुप्पी दिखाई दी !

मर्दवादी देश में स्त्री की आत्मकथाएं उसकी सेक्सुअलिटी के उद्घाटन की पाठकीय समीक्षा में डूबती उतराती रह जाती हैं ! पूजा का विरोध सिनिकल या स्वयंसेवी संगठनों के द्वारा प्रायोजित लगता है ! मंग्लूर में पीटी गई लडकियों के हक में गुलाबी चड्डी अभियान में विरोध के कारण जायज और तरीके नाजायज लगने लगते हैं !

मुझे लगता है जिस समाज में पुरुषत्व बहुत् गहराई तक रचा बसा हुआ हो उस समाज को झंकझोरने के लिए अपनाए जाने तरीके सतही हों तो काम नहीं चलेगा ! जिस समाज में स्त्री -पुरुष की अवस्थिति बाइनरी ऑपोज़िट्स की तरह हो उस समाज में स्त्री और पुरुष द्वारा अपनाए गए विरोध के तरीके समान हों यह कैसे हो सकता है ! हाशिए पर खडी स्त्री विरोध के जमे जमाए औजारों को अपनाकर जड समाज में संवेदना पैदा नहीं कर पाएगी !

हम साफ देख सकते हैं कि हमारे समाज में पुरुष बेहतर स्थिति में है और उसके पास स्त्री समाज की संवेदना को उदबोधित करने के लिए न तो कोई कारण हैं और न ही चड्डी पहनकर और मशाल लेकर सडक पर निकल पडने की ज़रूरत ही है !

ब्रा बर्निंग आंदोलन की प्रतीकात्मकता के बरक्स गुलाबी चड्डी आंदोलन को देखें ! दोनों ही गैरबराबरी वाले समाज के अवचेतन को चोट पहुंचाने का काम करते हैं !

31 comments:

आशीष said...

जो भी हो पिंक चड्डी आंदोलन को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। हम केवल ब्लॉग और आफिस में बैठकर अपना गुस्सा इजहार करते हैं। कलम और की बोर्ड का जमकर प्रयोग करते हैं। लेकिन यह हमें सोचना पड़ेगा कि भारत जैसे देश में लड़किया खुलकर गुलाबी चड्डी को हथियार के रुप में ले रही हैं। स्थिति बदल रही है। हां पता नहीं है ये कौन लोग हैं जिन्हें पूजा का विरोध सिनिकल या स्वयंसेवी संगठनों के द्धारा प्रायोजित लगता है। यदि कोई औरत ब्रा और पेंटी को अपना हथियार बनाती है तो हमें फिर से सोचना होगा कि क्या हम वाकई इस देश पर नाज कर सकते हैं। जिस देश में औरतों को लड़ने के लिए कपड़ों का सहारा लेना पड़ता है।

Arvind Mishra said...

हूँ ,क्या कहें !

prabhat gopal said...

sochne wali bat hai

Udan Tashtari said...

जो भी हो..इस आंदोलन ने हल्ला बहुत मचवा लिया.

kuhasa.blogspot.com said...

हाँ हल्ला मचवा लिया समीर जी पर क्या ये हल्ला सर्वथा अनुचित है?
हाँ हम कह सकते हैं कि देश के सामने ढेर साड़ी समस्यायें और भी हैं पर क्या प्राथमिकता तय करनी होगी कि पहले इस समस्या पर हल्ला मचे फ़िर इस और इस बीच किसी अन्य समस्या पर चर्चा गैर जरूरी होगी?
इन विरोधों में वही प्रतीक इस्तेमाल हो रहे हैं जो स्त्रियों के ख़िलाफ़ रहे हैं. एक सीमा रेखा की तरह थोप दिया गया कि ये शर्म की दहलीज है इसे पार नही करना है. अब उसी सीमारेखा उसी दहलीज को अगर महिलायें बतौर हथियार इस्तेमाल कर रही हैं तो पुरुषों या समाज को बुरा लग रहा है
गुहार मचाई जा रही है कि ये तब कहाँ थी जब...
जिन्हें इन विरोधों से आपत्ति है उन्हें ख़ुद में झांकना होगा

चौराहा said...

आपके विचार ने काफी हद तक अभियान को एक दिशा देने की कोशिश तो की ही है. किसी विचार को समर्थन देना भी विरोधियों को यहां बदहजमी पैदा कर देता है. निशा के अभियान को मैंने हिंदी ब्लॉग जगत में उठाने की कोशिश की तो ये कह कर तमाम संदेश आ रहे हैं कि महिला के अभियान में पुरुष की क्या भूमिका है. यानी पुरुषवादी अश्लील दृष्टिकोण का चश्मा लगाकर इसमें भागीदारी को भी लोग प्रतिबंधित करना चाहते हैं. आपकी पहल सराहनीय है.

Dr.R.P.DWIVEDI said...

सचमुच,सोच में डालने वाला लेख है।

Suresh Chiplunkar said...

उड़न तश्तरी जी से सहमत, मेरे ब्लॉग पर इससे सम्बन्धित लेख पर आई टिप्पणियों से साफ़ प्रदर्शित होता है कि मेरे राष्ट्रवादी और देश की ज्वलन्त समस्याओं पर लिखे गये कई-कई लेखों पर यह भारी पड़ा। क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 1) "भारत में राष्ट्रवाद के मुकाबले गुलाबी चड्डी ज्यादा जरूरी है"? 2) क्या इसे अंग्रेजी पत्रकारों और अखबारों की सफ़लता भी माना जा सकता हैं?

Neelima said...

@ क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 1) "भारत में राष्ट्रवाद के मुकाबले गुलाबी चड्डी ज्यादा जरूरी है"? 2) क्या इसे अंग्रेजी पत्रकारों और अखबारों की सफ़लता भी माना जा सकता हैं !
--सुरेश जी आपका गुलाबी चड्डी लेख मैं नहीं पढ पाई थी ! पर राष्ट्र्वाद के मुकाबले स्त्री विरोध के प्रकरणों के द्वारा सनसनी फैलना अच्छा लक्षण है ! मीडिया वंचित और उपेक्षित वर्गों की आवाज़ को सामने लाए ,और ऎसी पोस्टों पर ज्यादा से ज्यादा टिप्पणियां आएं ...केन्द्र को चुनौती पहुंचाते रहना जरूरी है 1

पंगेबाज said...

नीलीमा जी मै आपसे १०० नही १०००% सहमत हू पहली बार किसी ब्लोगर ने ( सुरेश जी के लेख के बाद ) इस मामले को सही ढंग से समझा और कहा है , सही यही है जो आपने कहा मंग्लूर में पीटी गई लडकियों के हक में गुलाबी चड्डी अभियान में विरोध के कारण जायज और तरीके नाजायज लगने लगते हैं

डॉ .अनुराग said...

मानता हूँ की विरोध के लिए इस्तेमाल किए गये विम्ब से असहमति हो सकती है पर हैरानी से ज्यादा दुःख है की मूल मुद्दे से भटक-कर हम अजीब किस्म की अनर्गल गैर जरूरी बहसों में उलझकर रह गये है .कई जगह बहस का स्तर निहायत ही व्यक्तिगत ओर निजी हो गया है ...क्या वास्तव में हम लोग पढ़े लिखे समाज का प्रतिनिधित्व करते है ?
यदि विरोध के लिए चड्डी की जगह जूते या फूल जैसे विम्ब का इस्तेमाल होता तो ? बहुत सारे लोगो ने इस अभियान को पब कल्चर ओर वेलेंटाइन डे सीधा जोड़ दिया ..क्यों जोड़ा समझ नही आया .शायद शीघ्र प्रतिक्रिया देने की हड़बड़ी में .
यहाँ सवाल किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन था .....केवल स्त्रियों के पब में जाने से संस्क्रति खतरे में क्यों है ?इस देश में कितने पब है ?ओर कितने शहरों में है ?
ओर शराब के ठेके ?किस राज्य में अपराध ,बलात्कार सबसे ज्यादा है ?किस राज्य में स्त्री-पुरूष संख्या का अनुपात दर सबसे कम है ?किस राज्य में दहेज़ हत्या सबसे ज्यादा है ?इस देश के कितने गाँवों में लड़कियों के १२ तक स्कूल है .ओर उनमे से कितने लोग अपनी लड़कियों को १२ तक पढाते है ?क्या कारण है की हमने किसी पुरूष को अपनी पत्नी की मौत के बाद सती होते नही सुना ........इतने वर्षो में भी....आज भी देश में ऐसे कितने मन्दिर है जहाँ स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है ,दलितों का प्रवेश वर्जित है ?कितने घरो में स्त्री को आर्थिक ओर दूसरे सामाजिक विषयों में निर्णय लेने की भागीदारी है ?बावजूद नौकरी करते हुए ?तो क्या सब जगह पब है ?पब आये तो शायद ३ साल हुए होगे या ४ साल ...तो संस्क्रति कहाँ बैठी थी अब तक ?मुआफ कीजिये हम सब दोगले है .....
आख़िर में एक बात सुरेश जी के लिए मन में आदर है क्यूंकि उन्होंने कई राष्टवादी मुद्दे उठाये है ...ओर बेबाकी से उठाये है .यहाँ असहमत हूँ...पर जानता हूँ असहमति व्यक्त करना भी अभिव्यक्ति ही है.....ओर वे कभी कमेन्ट मोदेरेशन भी नही करते ......
पर इस ब्लॉग जगत में कभी कभी कुछ लोगो की खामोशी भी खलती है.....

कुश said...

भगत सिंह द्वारा कोर्ट में बम फेंकना भी पब्लिसिटी ही थी.. क्या ग़लत किया था? गाँधी की दांडी यात्रा भी पब्लिसिटी ही थी.. राम का नाम लेने वाली सेना की हरकत भी पब्लिसिटी ही थी.. पिंक चड्डी केंपेन चलाना भी पब्लिसिटी ही थी.. मज़े की बात है की सब देश बचाना चाहते थे.. इन चारो में से किसका प्रयास निम्नतम था..??

ये चड्डी लड़कियो के बजाय लड़के भेजते तब भी क्या ऐसा ही बवाल मचता...???

कही सुना था जब जागो तब सवेरा... क्या वो ग़लत था?? यदि नही तो फिर आज जागने में क्या बुरा आयी.. अगर इसी मुद्दे से चड्डी भेजी गयी तो ग़लत है.. क्यो बार बार ये कहा जा रहा है की पहले क्यो नही.. अरे ये पहल ही तो है.. क्या पता आयेज भी भेजी जाए.. आज यहा भेजी है.. कल दहेज लेने वालो के यहा भी भेजी जा सकती है.. रिश्वत लेने वेल के यहा भी भेजी जा सकती है..

कही ना कही से तो कुछ शुरू करना ही पड़ेगा... आप उनका सहयोग ना करे पर समर्थन तो दे ही सकते है...

जो भी पिंक चड्डी को ग़लत कहते हुए ये लेख लिख रहा है.. उनका ये भी मानना है की राम का नाम लेने वाली सेना ने भी ग़लत किया.. इसका मतलब वे मानते है की काम दोनो ने ग़लत किया.. ओर दोनो के ही तरीक़ो से वे सहमत नही है.. लेकिन तब उन्होने ना कोई हल्ला मचाया ना कोई पोस्ट लिखी... जब दोनो से ही सहमत नही तो निशाना सिर्फ़ एक को ही क्यो बनाया...

एक बच्चे ने थप्पड़ मारी.. दूसरे ने उसको वापस मारी.. आप दूसरे बच्चे को कह रहे है.. उसने मारी वो ग़लत था पर तुमने क्यो मारा..

अनुराग जी की तरह मुझे भी कुछ लोगो की चुप्पिया खलती है..

sanjaygrover said...

मुझे लगता है जिस समाज में पुरुषत्व बहुत् गहराई तक रचा बसा हुआ हो उस समाज को झंकझोरने के लिए अपनाए जाने तरीके सतही हों तो काम नहीं चलेगा ! जिस समाज में स्त्री -पुरुष की अवस्थिति बाइनरी ऑपोज़िट्स की तरह हो उस समाज में स्त्री और पुरुष द्वारा अपनाए गए विरोध के तरीके समान हों यह कैसे हो सकता है ! हाशिए पर खडी स्त्री विरोध के जमे जमाए औजारों को अपनाकर जड समाज में संवेदना पैदा नहीं कर पाएगी !

Mujhe bhi yahi lagta hai.

sanjaygrover said...

"भारत में राष्ट्रवाद के मुकाबले गुलाबी चड्डी ज्यादा जरूरी है"?

Rashtrawad kya hai? DalitoN,AlpsankhyakoN,StrioN ko maarna aur gaaliyaaN dena? Kya kuprathaaon aur BhrashtacharioN se ladna Rashtrawad nahiN hai? Jaapan to kisi ko gali nahiN deta. vahaN ke log Imandaari aur anushasan ke sath apna kaam karte haiN. we rashtrawadi nahiN haiN kya? kya bharat japan se zyada tarakki kar gayaa hai?

anoop said...

यह बात अपनी जगह सही है की श्रीराम सेना द्वारा की गई मारपीट ग़लत है मगर उसका विरोध करने के लिए स्तरहीनता का सहारा लेना कहा तक सही है?
प्रश्न यह है कि विरोध का क्या तरीका सही है इसका फ़ैसला कौन करेगा. अगर पुरुषों की आपत्तियों को दरकिनार भी कर दिया जाए तो क्यो न इस मुद्दे पर सामान्य महिलाओ के विचार जानने का सर्वेक्षण करा लिया जाए की पब में जाने की स्वंत्रतता में बाधक तत्वों को अपनी चड्ढी भेजना सही है या ग़लत. उम्मीद है की सामान्य नारी के विचार भी कम महत्वपूर्ण नही है मगर न उनको इस मुद्दे से मतलब है न वो बोल रही है.
दूसरी बात, विरोध के और भी तरीके हो सकते थे मसलन आगामी लोक सभा चुनावो में वो सभी महिलाये उम्मीदवारी का पर्चा भर देती जो इस चड्ढी अभियान से जुड़ी है. अथवा वो सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध कुछ सार्थक काम करती जैसे कुछ स्थानों पर महिलाओ द्वारा पुरुषों का शराब पीना बंद कराने के लिए शराबखानों को तोडा गया है. इसके अलावा बहुत सी योग्य लड़किया सक्षम और योग्य होते हुए भी पैसे के या साधनों के अभाव में नौकरिया पाने से वंचित रह जाती है. ऐसी लड़कियों की सहायता के लिए वो नारिया क्यो नही काम करती जो नारी स्वतंत्रता के इन मुद्दों पर लड़ रही है. क्यो न महिलाओ के हितों के लिए संघर्ष करने वाली महिलाये कुछ ऐसा सार्थक और ठोस काम करे जिससे समाज की आम नारी जो साधनों के अभाव में पिछडी और जागरूक नही है उनका कुछ भला हो सके.

Anonymous said...

anoop

i sometimes wonder how many more years you guys need to keep telling woman what is the right way of life . even in protest you want to tell them how to protest wow

Pramod Singh said...

आगे बबुनी तुम लहराना, पीछे खड़ें हम हाथ चलाना, मत घबराना मत घबराना..

आशीष कुमार 'अंशु' said...

प्रमोद मुतालिक और गुलाबी चड्डी अभियान चला रही (Consortium of Pubgoing, Loose and Forward Women) निशा (०९८११८९३७३३), रत्ना (०९८९९४२२५१३), विवेक (०९८४५५९१७९८), नितिन (०९८८६०८१२९) और दिव्या (०९८४५५३५४०६) को नमन. जो श्री राम सेना की गुंडागर्दी के ख़िलाफ़ होने के नाम पर देश में वेलेंटाइन दिवस के पर्व को चड्डी दिवस में बदलने पर तूली हैं. अपनी चड्डी मुतालिक को पहनाकर वह क्या साबित करना चाहती है? अमनेसिया पब में जो श्री राम सेना ने किया वह क्षमा के काबिल नहीं है. लेकिन चड्डी वाले मामले में श्री राम सेना का बयान अधिक संतुलित नजर आता है कि 'जो महिलाएं चड्डी के साथ आएंगी उन्हें हम साडी भेंट करेंगे.'
तो निशा-रत्ना-विवेक-नितिन-दिव्या अपनी-अपनी चड्डी देकर मुतालिक की साडी ले सकते हैं. खैर इस आन्दोलन के समर्थकों को एक बार अवश्य सोचना चाहिए कि इससे मीडिया-मुतालिक-पब और चड्डी क्वीन बनी निशा सूसन को फायदा होने वाला है. आम आदमी को इसका क्या लाभ? मीडिया को टी आर पी मिल रही है. मुतालिक का गली छाप श्री राम सेना आज मीडिया और चड्डी वालियों की कृपा से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सेना बन चुकी है. अब इस नाम की बदौलत उनके दूसरे धंधे खूब चमकेंगे और हो सकता है- इस (अ) लोकप्रियता की वजह से कल वह आम सभा चुनाव में चुन भी लिया जाए. चड्डी वालियों को समझना चाहिए की वह नाम कमाने के चक्कर में इस अभियान से मुतालिक का नुक्सान नहीं फायदा कर रहीं हैं. लेकिन इस अभियान से सबसे अधिक फायदा पब को होने वाला है. देखिएगा इस बार बेवकूफों की जमात भेड चाल में शामिल होकर सिर्फ़ अपनी मर्दानगी साबित कराने के लिए पब जाएगी. हो सकता है पब कल्चर का जन-जन से परिचय कराने वाले भाई प्रमोद मुतालिक को अंदरखाने से पब वालों की तरफ़ से ही एक मोटी रकम मिल जाए तो बड़े आश्चर्य की बात नहीं होगी. भैया चड्डी वाली हों या चड्डे वाले सभी इस अभियान में अपना-अपना लाभ देख रहे हैं। बेवकूफ बन रही है सिर्फ़ इस देश की आम जनता.

Neelima said...

आशीष कुमार जी ,
स्त्री आंदोलनों का राजनीति द्वारा ऎप्रोप्रिएट कर लेने के डर से , या मीडिया द्वारा उसके माध्यम से कमाई कर लेने की आशंका से हम विरोध करना तो नहीं छोड सकते !आप जिन्हॆं तंज में चड्डी वालियां कह रहे हैं वे अपने लिए निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं आपने यह कैसे मान लिया ? पब का फायदा न हो ,निशा सूसन का फायदा न हो पाए ,इस आंदोलन के ज़रिए कोई राजनीतिक दल वोट की राजनीति न कर पाए इसलिए स्त्रियों को अपने खिलाफ हो रहे अन्याय का अपने तरीके से प्रतिकार नहीं करना चाहिए ? ऎसी सोच से हमें बचना चाहिए !

आशीष कुमार 'अंशु' said...

NEELIMA JEE,
KYAA AAPAKO LAGATAA HAI - VIRODH KAA YAH TARIKAA THEEK AUR VYAVAHARIK HAI?

anoop said...

mr anonymous i dont know you are a guy or gal but at this very moment i atleast have no justified reason not to believe that you are at least a respectable member of civilized society. you even dont have the courage to tell your name.
indeed every body has the right to lodge the protest against atrocities but you must understand that we have certain social norms and above all we must think that what we are going to achieve. i dont say that i or anybody has the right to tell how to protest but there must be someone to guide the society. in your terms it may be asked who are these persons to guide sriram sena how to protest.
every action has the reaction and so on so if pink panty is the reaction of the act of sena then these are the reactions of this pink panty campaign.
you mean to say that pink panty campaign has the right to tell the limits but nobody has the right to tell them their limits?
you also mean to say that only these few persons behind this campaign are the only wise person in this country to decide all the terms and any voice against their campaign is not fair?
do only these persons are the true representative of the society or half world and they have only the right to decide what is right and what is wrong?

नटखट बच्चा said...

ये प्रमोद अंकल कविता कर रहे है ओर रवि रतलामी अंकल ने भी तजा ताजा एक कविता लिखी है ,हमने तो सुना था हिन्दी ब्लोगिंग के बड़े धुरंधर है य दोनों ?यही हिन्दी ब्लोगिंग है ???

Anonymous said...

फालतू की बहस छोड़ो, जल्दी से पता करो चड्ढी के नीचे क्या है?

अजित वडनेरकर said...

मैं सुबह से सोच रहा था कि पूजा प्रकरण का संदर्भ इस सिलसिले में क्यों नहीं आया।
अब देखा। आपने चीज़ों को व्यवस्थित ढंग से देखा है।

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : वेलेंटाइन, पिंक चडडी, खतरनाक एनीमिया, गीत, गजल, व्यंग्य ,लंगोटान्दोलन आदि का भरपूर समावेश

Anonymous said...

मोहल्‍ला में सविता भाभी के बहाने स्‍त्री विमर्श का डंका पीटने वाले
ब्‍लॉगर पत्रकार अविनाश जी के सारे स्‍त्री विमर्श की कलई उस समय खुल गई,
जब उन्‍होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्‍वविदद्यालय की एक छात्रा
के साथ जहां अभी कुछ दिनों पहले वे क्‍लास लेने जाते थे के साथ
जबर्दस्‍ती करने की को‍शिश की. लड़की की तबीयत ठीक नहीं थी। उन्‍होंने
उसे किसी काम के बहाने से ऑफिस बुलाया और फिर उसके लाख मना करने के
बावजूद उसे अपनी नई कार से (अविनाश जी ने अभी कुछ ही दिन पहले नई गाडी
खरीदी है) उसे घर छोड़ने गए। फिर वहां उसे चुपचाप छोडकर आने के बजाय लगभग
जबरदस्‍ती करते हुए उसका घर देखने के बहाने उसके साथ कमरे में गए। लडकी
मना करती रही, लेकिन संकोचवश सिर्फ रहने दीजिए सर, मैं चली जाऊंगी जितना
ही कहा। वे उसकी बात को लगभग अनसुना करते हुए खुद ही आगे आगे गए और उसका
घर देखने की जिद की। लडक को लगा कि पांच मिनट बैठेंगे और चले जाएंगे।
लेकिन उनका इरादा तो कुछ और था। उन्‍होंने घर में घुसने के बाद
जबर्दस्‍ती उसका हाथ पकडा, उसके लाख छुडाने की कोशिश करने के बावजूद उसे
जबर्दस्‍ती चूमने की कोशिश की। लडकी डरी हुई थी और खुद को छुडाने की
कोशिश कर रही थी, लेकिन इनके सिर पर तो जैसे भूत सा सवार था। अविनाश ने
उस लडकी को यहां तक नारी की स्‍वतंत्रता का सिद्धांत समझाने की कोशिश की
कि तुम डर क्‍यों रही हो। कुछ नहीं होगा, टिपिकल लडकियों जैसी हरकत मत
करो, तुम्‍हें भी मजा आएगा। मेरी आंखों में देखो, ये जो हम दोनों साथ
हैं, उसे महसूस करने की कोशिश करो। डरी हुई लडकी की इतनी भी हिम्‍मत नहीं
पडी कि कहती कि जाकर अपनी बहन को क्‍यूं नहीं महसूस करवाते। लडकी के हाथ
पर खरोंचों और होंठ पर काटने के निशान हैं। लडकी अभी भी बहुत डरी हुई है।
ये है पूरे ब्‍लॉग जगत और समाज में स्‍त्री विमर्श का झंडा उठाए घूमने
वाले अविनाश का असली चेहरा।

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" said...

कित्ती बार कहा कि भाई
बड़े बुजुर्गों का ख़याल करो, यानी सधी भाषा में विमर्श हो
सकारात्मक परामश हो
ब्लॉग बांचक को ब्लागिंग पे गर्व हो हर बात का सार्थक अर्थ हो
क्या चद्दीयाँ लंगोट कल फ़िर छि सोचते ही घिन आती है
ब्रा,सेनेटरी नेपकिन जैसे विषय होंगे और गर्त में होंगे
ब्लॉग और ब्लॉगर

Rewa said...

http://rewa.wordpress.com/2009/02/15/padhe-likhe-ko-farsi-kya/

archana said...

मर्दवादी देश में स्त्री की आत्मकथाएं उसकी सेक्सुअलिटी के उद्घाटन की पाठकीय समीक्षा में डूबती उतराती रह जाती हैं ! sach kaha hai aaj bi ye desh purush pradhaan hai

बालसुब्रमण्यम said...

दो ही बातें कहने को है। मंगलोर में जो कुछ हुआ, वह अप्रैल-मई के चुनावों को ध्यान में रखकर सुनियोजित ढंग से किया गया था। महिलाओं ने इस ढंग से विरोध करके बंशी-कांटे-धागे को आकंठ निगल लिया (अंग्रेजी कहावत के लिए क्षमा करें)। वे राम सेना के हाथों में खेल गईं।

जैसे डा. अनुराग ने कहा है, मुद्दे और भी थे, लड़ने-मरने के लिए। जड़डी कांड को वरीयता देकर महिलाओं ने आसान रास्ता पकड़ा है, जो उन्हें कहीं नहीं ले जाएगा। यह अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का सवाल नहीं है, बुद्धिमानी का सवाल था, और महिलाओं ने बुद्धिमानी या सूझबूझ का परिचय नहीं दिया।

महिला आंदोलन से मुझे यही शिकायत है कि वह रिएक्ट ही करता है, खुद एजेंडा सेट नहीं कर पाता। वह एक तरह से विक्टम कांप्लेक्स में फंसा हुआ है, आगे बढ़कर पहल नहीं करता है। इसकी आवश्यकता है, विशेषकर उन महिलाओं से यह अपेक्षित है, जो इस सौभाग्यशाली स्थिति में है कि ऐसा कर सकें।

और नीलिमा जी, आप विराम चिह्न के लिए आश्चर्यसूचक चिह्न क्यों लगा रही हैं? हिंदी विराम-चिह्न शिफ्ट+फुलस्टाप पर है (इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड में)।

बालसुब्रमण्यम said...

दो ही बातें कहने को है। मंगलोर में जो कुछ हुआ, वह अप्रैल-मई के चुनावों को ध्यान में रखकर सुनियोजित ढंग से किया गया था। महिलाओं ने इस ढंग से विरोध करके बंशी-कांटे-धागे को आकंठ निगल लिया (अंग्रेजी कहावत के लिए क्षमा करें)। वे राम सेना के हाथों में खेल गईं।

जैसे डा. अनुराग ने कहा है, मुद्दे और भी थे, लड़ने-मरने के लिए। जड़डी कांड को वरीयता देकर महिलाओं ने आसान रास्ता पकड़ा है, जो उन्हें कहीं नहीं ले जाएगा। यह अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का सवाल नहीं है, बुद्धिमानी का सवाल था, और महिलाओं ने बुद्धिमानी या सूझबूझ का परिचय नहीं दिया।

महिला आंदोलन से मुझे यही शिकायत है कि वह रिएक्ट ही करता है, खुद एजेंडा सेट नहीं कर पाता। वह एक तरह से विक्टम कांप्लेक्स में फंसा हुआ है, आगे बढ़कर पहल नहीं करता है। इसकी आवश्यकता है, विशेषकर उन महिलाओं से यह अपेक्षित है, जो इस सौभाग्यशाली स्थिति में है कि ऐसा कर सकें।

और नीलिमा जी, आप विराम चिह्न के लिए आश्चर्यसूचक चिह्न क्यों लगा रही हैं? हिंदी विराम-चिह्न शिफ्ट+फुलस्टाप पर है (इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड में)।