Friday, August 10, 2007

आपकी गंधाती पुलक से कहीं बेहतर है, उनकी भड़ास

भड़ास हिंदी ब्‍लॉग जगत के लिए चुनौती रहा है जिसे नारद युग में तो केवल नजरअंदाज कर ही काम चला लेने की प्रवृत्ति रही पर जैसे ही नारद युग का अवसान हुआ, भड़ास की उपेक्षा करना असंभव हो गया- करने वाले अब भी अभिनय करते हैं पर हिंदी ब्लॉगिंग पर नजर रखने वाले जानते हैं कि भड़ास का उदय तो नारद के पतन से भी ज्‍यादा नाटकीय है। इतने कम समय में भड़ास के सदस्‍यों की ही संख्‍या 53 है। भड़ास अपनी प्रकृति से ही आंतरिक का सामने आ जाना है- जो दबा है उसका बाहर आना। भड़ास हर किसी की होती है पर बाहर हर कोई नहीं उगल पाता, इसके लिए साहस चाहिए होता है। भड़ास का बाहर आना केवल व्‍यक्ति के लिए ही साहस का काम नहीं है वरन पब्लिक स्‍फेयर के लिए भी साहस की बात है कि वह लोगों की भड़ास का सामना कर सके क्‍योंकि भड़ास साधुवाद का एंटीथीसिस है- हम भी वाह वाह तुम भी वाह वाह नहीं है यह। हम भी कूड़ा तुम भी कूड़ा है यह।

भड़ास चूंकि दमित की अभिव्‍यक्ति है इसलिए उसके प्रिय होने या प्रिय भाषा में होने की तो खैर कोई गुजाइश ही नहीं। भड़ास में गालियॉं भरपूर है, मर्दों में होती ही हैं- सड़क चलते भी सुनाई देती हैं, हम ही नजरअंदाज कर देते हैं, ऐसा मुँह बनाते हैं जैसे - हमने तो कुछ सुना ही नहीं। गालियॉं हैं और मर्दों की हैं तो भले ही वह कोई सम्‍मानित महान कवि दे या भड़ासी, वे मर्दवादी ही होंगी- वे स्‍त्री जननांगों के इर्द-गिर्द ही घूमेंगी- कुछ भी नया तो नहीं।

पर भड़ास तो मनुष्‍य मात्र में होगी न, फिर स्‍त्री क्‍यों भड़ासी नहीं। हमने पूछा- जबाव भी मिला। बिल्‍कुल अपेक्षित जबाव था पर दिया ईमानदारी से गया था। फिर एक पोस्‍ट में इसका और विस्‍तार से खुलासा किया गया। मूलत: दो तर्क

if she has the boldness and can gather enough courage to be associated with this blog then certainly the qualitative measures would also change.

और दूसरा वही समतावादी तर्क था कि इंसान को बांटा क्‍यों जा रहा है, मर्द औरत की बात उठाना बेबात शांति भंग करना है विवाद उठाना है।

समस्‍या इन दोनों तर्कों में है। पहले तो विवाद होगा इस डर से न कहना तो भड़ास-दर्शन हो नहीं सकता। भड़ास अगर विवाद भय से कही न जाए तब तो वह 'बात' ही हो जाएगी। भड़ासी पढ़े-लिखे समझदार लोग हैं वे खुद जानते हैं कि ये तर्क बहुत दूर तक नहीं जाता इसलिए इसे छोड़ देते हैं-

दूसरा तर्क ये कि भड़ास में महिलाएं नहीं हैं, ये महिलाओं की कमी है कि उनमें साहस नहीं है, दम नहीं है, उनकी भाषा में कहें तो गूदा नहीं है कि अपनी भड़ास को कह कर मन हल्‍का कर सकें- पर दोस्‍तों घर, गली, हाट, दफ्तर और लीजिए अब तो ब्‍लॉग व इंटरनेट का जगत तक तो आप मर्दों ने घेर रखा है- कहॉं भड़ास निकालेगी औरत। पर चलो आपने बात कही और सीधे कही- आपका तर्क तो सिर्फ इतना है कि हम भड़ासी है अपनी भड़ास के लिए- तुम्‍हारी भड़ास तुम्‍हारी दिक्‍कत है कहॉं निकालोगी, किस भाषा में इससे तुम खुद निपटो। आपका तर्क तकलीफ देने वाला है पर वैध तर्क है।

पर ब्‍लॉगजगत के हर तकलीफ देने वाले तर्क वैध नहीं हैं। जरा अफसरी तर्कशास्‍त्र को देखें। बड़े अफसर हैं अनूप, ब्‍लॉगर भी बड़े हैं उनके बड़े अफसर मित्र ज्ञानदत्‍त पांडेय- सुबह सुबह जब  बीबीयॉं इन साहब लोगों के दफ्तर जाने का इंतजाम कर ही होती हैं तो एक अफसर लिखता है दूसरा वाह वाह करता है- इससे कब्जियत दूर रहती है- पेट साफ रहता है। किसी वजह से एक समय से लिख नहीं पाया (फिर इस औरत जात यानि बीबी की कारस्‍तानी होगी) तो दूसरे ने अपनी कब्जियत निकालने के लिए किसी और पर निशाना साधा-

उधर नीलिमा जी का पति प्रेम देख कर मन पुलकित च किलकित है कि उन्होंने आदर्श गृहणी की तरह गाढ़े समय के लिये कुछ प्रेम बचा के रखा था और मौका पाते ही उड़ेल दिया। प्रियंकरजी को समझ में आ गया कि जोड़े से ब्लागिंग करने के क्या फ़ायदे होते हैं।

तब तक दूसरे साहब भी आ गए ओर उन्‍होने भी अपना पेट साफ किया और अफसरी समरसता का कर्तव्‍य निबाहा

फेमिली ब्लॉगर आईएनसी को बेचारे छुट्टे मुंसीपाल्टी का ठप्पा लगये घूमते ब्लॉगरों पर ज्यादा तवज्जो दी जाती है. फेमिली ब्लॉग आईएनसी जरूरी है. और नहीं तो टिप्पणी की ट्रेनिग तो होनी चाहिये पत्नी को!  

- यूँ भी एक बकबक करती औरत को चुप कराने का काम पुण्य ही है, दिन भर अपने मातहतों से अच्‍छे से बात कर पाए होंगे- सुबह सुबह ही मूड जो ठीक हो गया था। 

तो जानें कि गोले बनाने के कारखाने के इन बड़े अफसर की पुलक और इन छोटे-मोटे पत्रकारों की भड़ास में क्‍या संबंध है। भड़ासियों के लिए भड़ास का खेल खुल्‍ला खेल फर्रूखाबादी है, कोई दुराव छिपाव नहीं। दारू, औरत और वहीं फटना-फाड़ना, मर्द के अंतस में चूंकि औरत की जगह यही है इसलिए वह मवादी भाषा में बाहर आती है, जाहिर है। ईमानदार। पर बड़े ब्‍लॉगर उस पर भी अफसर वे ईमानदार भला क्‍योंकर होंगे, मर्द हैं तो इसमें उनका क्‍या दोष- वे पहले तो किसी और मर्द से कोई अनबन लेते हैं- होती रहती है इसमें कुछ भी खास नहीं पर जब तिलमिलाहट होती है तो फिर वही करते हैं जो कबीलाई समाज से आज तक मर्द करता रहा है  इस मर्द की 'मातहत' औरत को खोजो और उससे बदला लो। पहले साथ के 'मौज' लेने के लिए राजी यार इकट्ठे करो और फिर मजा चखाएंगे ( जोड़े में ब्‍लागिंग के फायदे गिनाते प्रियंकर ये भूल जाते हैं कि हिंदी की ब्‍लॉगिंग अभी भी कबीलाई मर्दों का शगल है, जिनकी बीबीयॉं चौके में होती हैं और मर्द मौज मजे के लिए शिकार या वेश्‍यालय जाने में असमर्थ होने के कारण इंटरनेट पर जाते हैं, इसलिए जिसकी बीबी ब्लॉगिंग भी साथ कर रही उसे तो नुकसान ही नुकसान है) 

बुजुर्ग ज्ञानदत्‍त-- 'संभाल अपनी औरत को नहीं तो कह चौके में रह' की तर्ज पर मानों कह रहे हैं कि " इस बेशऊर को टिप्‍पणी करना तो सिखा दे कम से कम। (या हाय हाय.... हमने क्‍यो न सिखाई अपनी वाली को ऐसी बेशरूरी..)

धकिया देने का रवैया भी देखें तो नामधारियों की मौज लेती पुलक से भड़ासियों की भड़ास लाख दर्जे बेहतर है। पर कुल मिलाकर हिंदी की ब्‍लॉग दुनिया का शिष्ट चेहरा हो या भड़ासी रूप दोनों बस ये कह रहे हैं कि हम तुम नाकाबिल औरतों को मुँह से कुछ कहकर तो बाहर नहीं खदेड़ देंगे पर अपने कर्मों से कोई कसर भी नहीं छोड़ने वाले।   आपको निराश करने के लिए माफी कम से कम अभी तो हम मैदान साफ छोड़ने वाले नहीं। घर में निपट लेंगे कि ऐसा क्‍यों लिख डाला और आपकी टिप्‍पणियों से भी निपटेंगे जिनमें शरीफ बड़े लोगों पर कीचड़ उछालने के लिए लानत मलामत होगी।

18 comments:

दिनेश शुक्ल said...

बहुत सही लिखा है

Lalit said...

नीलिमा जी,
मान गए गुरु आपको, शायद पहली बार आप ही ने साहस किया है, भड़ास पर अपनी भद्र-भड़ास निकालने का। अत्यन्त सौम्य और श्रद्धेय शब्दों में। सच है, सभी पतितों को पावन बनाने की शक्ति "गंगा" में ही है।

आलोक said...

समझ नहीं आया। निष्कर्ष क्या है? क्या आप भड़ास में शामिल हो रही हैं?

शिल्पा शर्मा said...

'संभाल अपनी औरत को नहीं तो कह चौके में रह'
आदमी कितना भी ऊंचा उठ जाय या बड़ा बन ले, ये भावना नहीं जाती

अभय तिवारी said...

आप गुस्से में ज़ोरदार लिखती है..दो महारथियों की सही खबर ली आप ने.. और सही बात पर.. लम्बा प्रकरण था.. पूरा पढ़कर समझने में समय लगा..पर आप के तेवर देख कर पढ़ना पड़ा..भड़ासिये मित्र आप का अनुमोदन पा कर प्रसन्न होंगे..
अनूप जी और ज्ञानदत्त जी.. दबे हुए संस्कार ऐसे ही बाहर निकल आते हैं..सोचा भी न होगा आप ने कि हल्की फुल्की चुटकी अपने मूल में ऐसी स्त्रीविरोधी बात का उदघाटन कर जाएगी..
मगर आप दोनों की बौद्धिकता पर भरोसा भी है कि जानते होंगे कि दबे हुए संस्कार की पहचान हो जाने पर कैसे निबटना है..

अरिसूदन said...

अरे वाह ! बहुत ही अच्छा। सब पढ़ा। आपका, उनका और उनका भी।
बात सही है।

पर आपने तो पहले ऐसा कभी नहीं लिखा ( या मैंने ही नहीं पढ़ा?)। जो भी है पर मन प्रसन्न हुआ।

अब दो पंक्तियाँ आपके लिये:-

अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक, मनुज कोमल हो कर सहता है

मुकेश कुमार said...

समज मे नही आया ,

Anonymous said...

मज़ा आ गया जी :)
अनूप जी आपके पीछे भी स्त्री शक्ति ,मात शक्ति पड गयी ,क्यो ? कैसा लगा ?अब मठाधीश बनने की कोशिश करोगे तो धराशायी तो होगे ही ।ब्लागरी के बाप बनने का प्रयास अब बन्द ही कर दें तो अच्छा है ।आपकी छोटी समझ का परिचय आप कुछ दिन से अपनी टिप्पणियों में वैसे भी दे रहे हो ।

Anonymous said...

वैसे सुकुल जी
कै करने के लिए मुंह ही फ़ाडना पडता है जो आप बडा अच्छा फ़ाड सकते हो । ही ही ही :)

Divine India said...

आपकी यह बेबाक और स्पष्ट लेखनी ताजे सिरे को लिए बहुत कुछ कह गई…।

अनूप शुक्ला said...

नीलिमाजी, मुझे लगता नहीं यह भाषा आपने ही लिखी है। बहरहाल, आपके ब्लाग पर प्रकाशित है इसलिये मानता हूं कि यह आपके ही उद्गगार हैं। मैंने आपके परिवार संबंधित अंश अपने ब्लाग से निकाल दिये हैं। मैं अपने लिखे पर अफ़सोस व्यक्त करता हूं। आपको जो मानसिक कष्ट पहुंचा, उसके लिये क्षमा मांगता हूं। हो सके तो माफ़ करियेगा। शुभकामनाओं सहित!

अफ़लातून said...

नीलिमा और अनूप को हार्दिक बधाई ।

काकेश said...

आपके इस रूप के तो कायल हो गये जी.सही भड़ास निकाली है.

Neelima said...

अनूप जी धन्यवाद ! आपकी टिप्पणी पढकर मैंने भी यह मान लिया कि यह आपके ही उद्गार हैं ! यह भी साफ है कि जिन संरचनाओं की हम देन हैं उनका असर लाख प्रबुद्धता के बाद भी दिखाई दे जाता है ! इसीए असर से आप कह पाते हैं कि टिप्पणियां लिखवाने की स्त्री को ट्रेनिंग दी जाती है अब कह रहे हैं कि पोस्ट लिखवाई गई है ! वाह ! बलिहारी जाऎ हम तो ! स्त्री की जब तक अंगुली न पकडी जाऎ बेचारी कितनी अबला होती है कि "कोई भी उसके कंधे पर बंदूक रखकर चला सकता है "! माफी की बात गैरजरूरी है क्योंकि आप बात समझना नहीं चाह रहे !

Sanjeet Tripathi said...

त्राहिमाम देवी त्राहिमाम!!
यह वे शब्द हैं जो एक स्त्री(देवी) के समक्ष पुरुष(देव) ही कहता आया है!! आज भी शब्द बदल जाएं पर मौकों पर भाव यही होते है, क्योंकि हर कोई जानता है कि जब स्त्री उठ खड़ी होती है तो पुरुष को बैठना ही पड़ जाता है!!

आपका आक्रोश अपनी जगह उचित है!

Anonymous said...

'Abalaa' stree ke kandhe par bandook kaise rakhenge?...Sunate hain bandook chalne par jhatkaa deti hai...

Waise shodh ka vishay hai, bandook stree ke aage abalaa hai ya stree bandook ke aage..

Shrish said...

अपने इधर तो दो तीन दिन से बिजली की भयंकर स‌मस्या चल रही है, आज ही ऑनलाइन हुए। इसलिए पता नहीं कि झगड़ा काहे का है। क्या लोचा है भई?

Anonymous said...

भड़ास, भाड़, भड़ुए - इन शब्दों की व्युत्पत्ति एक ही स्रोत से हुई लगती है। भड़ास शायद भड़ुओं (माँ-बहनों को भी ... लगानेवाले) का काम है? आप भी क्यों?