Thursday, August 02, 2007

यूं मैं तुमसे करता हूं प्रेम

मैं चट्टान ही रहना चाहता हूं
दुनिया के सबसे मीठे दरिया के किनारे की
आधी डूबी आधी सूखी ....
मैं डरता हूं पानी के मखमली थपेडों से
धीमे धीमे झडते देख खुद को..

मुझे अच्छा लगता है यह दरिया
और उसका मीठा पानी
पर मैं यह नहीं चाहता कि यहां उठे
कोई भी लहर ऊंची
मैं झिझकता हूं पूरा भीगने से....

मैं नहीं चाहता कि कोई भी मल्लाह
उतारे इस जल में अपनी डोंगी
या कि किनारे पर बैठा कोई
तैराए इसमें अपनी कागजी किशती....

मैं चाहता हूं कि किनारे की सारी वनस्पतियां
गवाह हों दुनिया के सबसे गहरे पानी के
ऎन किनारे टिकी इस शिला के शैलपन की ....

मुझे तनिक नहीं भाती ये मछ्लियां
दरिया की चिर सखियां
जो पानी के बहाव में उछ्लती हैं
तैर लेती हैं बहाव के साथ भी
बहाव के खिलाफ भी ...

मैं चाहता हूं इस मीठे पानी के दरिया में
मुझ से झरे कण ठहर जाएं
छोटी छोटी शिलाएं बन
मैं दरिया में उग जाना चाहता हूं
ताकि इस रेतीले किनारे पर टिके-टिके ही
देख आउं मैं दूसरे किनारे को

ओ दुनिया के सबसे नीले झिलनमिलाते दरिया !
मैं तुमसे करता हूं प्रेम !!

.

11 comments:

kamlesh madaan said...

आपकी लेखन शैली को हम भी दिल से प्रेम करते हैं.आप की हर बात गहराई में उतरकर दिल से लेनी पडती है. लिखते रहिये! आप करोडों को दीवाना बनांयेंगीं ये हमारा दावा है

Anil Arya said...

सुंदर !!!

Udan Tashtari said...

ओ दुनिया के सबसे नीले झिलनमिलाते दरिया !
मैं तुमसे करता हूं प्रेम !!


-बहुत खूब. अब तो आप बस कविता किया करें, बेहतरीन माहौल बना हुआ है. बधाई.

अरुण said...

कविता सुंदर है पर हम समझे थे,कि यह पोस्ट मसीजीवी जी ने लिखी है,काहे की उपर लिखा था ना"यूं मैं तुमसे करता हूं प्रेम"..:)

Basant Arya said...

नीलिमा जी, ये प्रेम गजब है. इसके अन्दाज निराले है. आपने ही नहीं हमने भी कुछ ऐसे रोग जतन से पाले हैं ये झील , ये उसका किनारा. कई दीवाने यहाँ बैठे है . अलग बात आप इस झील में डूब गई है.

Neelima said...

कमलेश जी ,अनिल जी, हौसला बढाने के लिए धन्यवाद !

समीर जी आजकल कविता ही लिख पा रहे हैं ! आप अवश्य पढा करें !हिम्मत मिलती रहेगी :)

अरुन जी ये भाव तो किसी भी प्रेमी की हो सकती है !

Neelima said...

बसंत आर्या जी
शुक्रिया कविता के मर्म तक पहुंचे आप

अनूप शुक्ला said...

बढ़िया है। अच्छी कवितायें लिखी जा रही हैं आजकल!

कंचन सिंह चौहान said...

बहुत गूढ़ एवं यथार्थ परक कविता

Anonymous said...

बहुत अच्छा।
आखें भर आयीं।
लिखती रहें।

Anonymous said...

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