Saturday, February 10, 2007

चीते की तलहटी में कोसी का घटवार


काफी पहले शेखर जोशी की प्रसिद्ध कहानी 'कोसी का घटवार' पढ़ी थी। कोसी किनारे की पनचक्‍की के पाटों की खिसिर-खिसिर करती नीरसता और खिचड़ी बालों वाले आटे की सफेदी से ढके, फौजी पैंट को घुटनों तक चढ़ाए घटवार गोसाईं के जीवन की निर्जनता भीतर तक पैठ गई थी। ‘.....कोसी बह रही थी......जीवन चल रहा था....घट की चक्‍की की मथानी पर पड़ता पानी घट-बढ़ रहा था.....’
आज वह गोसाईं मिल ही गया। कोसी किनारे नहीं, टाईगर नाम के तीस मीटर ऊंचे झरने की सूनी संकरी तलहटी के मुहाने पर। पहाड़ों की संकरी उतराई पर बसा नामहीन सा गॉंव जितना ठहरा-धीमा वह ग्राम्‍य जीवन था उतना ही तीखा-तेज दहाड़ता वह झरना।
गाड़ी कच्‍चे बेहद रपटीले और संकरे रास्‍ते पर कुछ दूर तक ही जा सकती थी बाकी का पैदल पहाड़ी उतराव शहरी मिजाज को चुनौती दे रहा था। आधा घंटा लगेगा नीचे उतरने में, साहब, रास्‍ता भी छोटा, ढलवां और कचचा मिलेगा। मिल गया था दो पहाड़ी बच्‍चों का साथ....वह भी बिना मॉंगे। उत्‍तरांचल पर्यटन विकास निगम का भविष्‍य में उस स्‍थान का उद्धार करने वाला बोर्ड....पहाड़ की ढलान को दो दो फीट छीलकर बनाई गई पगडंडी। कहॉं है वह झरना ? कब दिखेगा... हॉं शायद उसके पानी के गिरने की ही आवाज है पैरों की गति बढ़ जाती है उससे भी ज्‍यादा धड़कनों की....। तलळटी तक पहुँचने में भय, उत्‍सुकता ओर कैसे रहते हैं ऐसे नीरव सौंदर्य में दुनिया से कटे ये पहाड़ी ग्रामीण, जैसे शहराती सवालों से टकराहट सबका भारी सहारा था। पानी की दुबली धाराओं के ठीक किनारे बसा छोटा सा घट और घटवार पर नजर पड़ी। ऊपर से उतरते जनों की स्‍वरलहरियॉं सुनकर मेहमाननवाजी के सवर में चिंहुकता खिचड़ी वालों, आटे की सफेदी में सराबोर मैले फौजी रंग के कपड़ों में खड़ा घटवार। ‘आओ जी-- आओ आओ’ आवाज में पुरानी पहचान का दावा गुँजाता ......कया यह भी कहानी में अपने पाठक से मिल चुका है ? दो तीन तीखे पतले घुमावों और पानी की झीनी धाराओं पर पड़े पत्‍थरों पर से झरने की ओर ले जाता घटवार। यहॉं झरने को जी कम ही घूमने वाले जानते हैं। सीधी खड़ी सपाट पहाड़ी से नीचे गिरते सफेद पानी की महीन ठंडी छींटें। गिरते पानी से बने ताल के कोने पर ही खुलती पतली गुफा दिखाई दी। इस गुफा में काफी अंदर तक जा चुके हैं ये, खत्‍म ही नहीं होती....दोनों बच्‍चों में से एक अपनी मीठी जौनसारी में फुसुफसाया था।


घट को बाहर भीतर से बार बार देखतीं हमारी ऑंखें अपने साथ सजीव चलचित्र ले जाने की तैयारी में जुटी थीं। घटवार की आवाज कानों में पड़ी ‘एक मन पर तीन किलो आटा होता है पिसाई का, अकेले क्‍या खाना कितना खाना’ तीन ओर पहाड़ से घिरे झरने के पानी की धार से अविकल चलते धट के सूने निर्जन स्‍थल पर अधेड़ घटवार की लक्षमा के बारे में मन खुद ही कल्‍पनाशील हो उठा। खाने पीने के थैले से बिस्‍कुट के पैकेटों को निकालकर उन मैले कुचैले बच्‍चों की ओर बढ़ाते हुए मन पूछने को हुआ ‘तुम्‍हारी मॉं का नाम क्‍या है ? कहीं लक्षमा तो नहीं ....?
घटवार दूर खड़ा किसी के सिर से पिसान का बोझ उतरवा रहा था। मन हुआ कि पूछे लक्षमा से भेंट हो गई और क्‍या उसने चार पैसे जोड़कर, गंगनाथ का जागर लगाकर भूल चूक की माफी मॉंग ली। शाम रात में बदल रही थी और अंधेरे पहाड़ी रास्‍ते पर हमें तेजी से ऊपर चढ़ना था। रोशनी के नाम पर एक टार्च नाम के सहारे।

5 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

सुन्दर जानकारी के साथ ही साथ सुन्दर चित्र ।

उन्मुक्त said...

हिन्दी चिट्ठे जगत में आपका स्वागत है

Pratyaksha said...

अच्छा लगा पढकर

Anonymous said...

accha laga. mubarakbaad sweekaarain.
gajanan parsai

Manish said...

यह कहानी मुझे भी प्यारी लगी थी… और आज क्लास में बैठा अपने दोस्तों को सुना रहा था… दोस्तों को पसन्द आई तो वे सब इसे पढ़ना चाहे :) गूगल सर्च किया तो आप दिख गयी :P चेहरा जाना पहचाना लगा तो सोचा कमेंट भी मार दिया जाय :)

सब मौन होकर यह कहानी पढ़ रहे हैं
तस्वीरें अच्छी हैं