Friday, September 12, 2008

ब्यूटी पार्लर में सहमी बेटी

वह क्या मजबूरी हो सकती है जिसके चलते एक बारह साल की बच्ची ब्यूटी पार्लर में खडी किसी भयानक दर्द और द्वंद्व से जूझ रही थी ! उसकी मां और पार्लर की आंटियां उस बच्ची को अपने डर पर काबू पाना सिखा रहे थे ! बच्ची की मां उसे बार बार एक ही बात कह रही थी ' बांह के ये बाल बुरे लगते हैं वैक्सिंग करवानी ही पडेगी ..देख तेरी मामी भी डांटेगीं कि फिर बिना करवाए आ गई तू ..' ! बच्ची कहती जा रही थी कि नहीं बहुत दर्द होगा ..मुझे नहीं करवाना ..ऎसे ही ठीक है ...बाद में करवा लूंगी...! आंटियां और उसकी मां जिन आद्य वचनों के सहारे  बेटी को दर्द की ओर धकेल रही थीं  उनका समाजशास्रीय विवेचन करना कितना त्रासद होगा यह तो मुझे बाद में ही पता चला उस वक्त तो मैं वहां केवल उस बच्ची की पीडा की एक मूक दर्शक और पार्लर की एक ग्राहक मात्र थी !

बारह साल की उस बच्ची की मां अपने चेहरे पर चीनी की चिपचिपी पट्टी को कपडे की झालर से खिंचवाती हुई कह रही थी 'देख हम भी तो करवाते हैं एक बार ही तो दर्द होता है सह ले वरना सब तेरा मजाक उडाते रहेंगे !...देख टी-शर्ट की बाहों में से अंडरआर्म के बाल दिखते कितने बुरे लगते हैं ..!"उस समय वहां खडी स्त्रियां बच्ची को ठीक वैसे ही उकसा रही थीं जैसे प्रसव के समय ज़ोर लगाने के लिए उकसावा देती औरतों का झुंड प्रसवशीला को घेर लेता है ! ये दर्द तो सहना ही होगा देख आगे पता नहीं कितने दर्द सहने होते हैं लडकी को ! ये दर्द तो कुछ भी नहीं ..सुंदर बनकर रहेगी तो सब आंखों पर बैठाऎंगे .....


जैसे कोई बकरी घेर ली गई हो ...जैसे उसे कहा जा रहा हो अच्छा होगा जितनी जल्दी तुम जान लोगी औरत होने की पीडा ! वो बच्ची दीवार से सटकर खडी थी जैसे कह रही हो इस बार छोड दो ..अगली बार मैं मन को कडा करके आ जाउंगी ..अभी कुछ दिन और मुझे जैसी हूं वैसी ही रहने दो..हां मैंने पढी थीं उसकी आंखें ...यही तो कह रही थी वो..!

मुझे दर्द से बिलबिलाती पडोस की बच्ची की चीखे याद हैं जिसके कानों में फेरी वाले से सुराख करवाने पूरी गली की औरतें इकट्ठा हो गई थीं ! तब मैं पांच साल की बच्ची थी और खुश हो रही थी कि वाह मेरे तो कानों में तब से सूराख है जब मैं बहुत छोटी थी इतनी छोटी कि वह दर्द भी मुझे याद नहीं !

मैं उस स्त्री समाज का हिस्सा हूं जहां सुन्दरता, मातृत्व, स्त्रीत्व पत्नीत्व जैसे आदर्श दर्द से शुरू होकर दर्द पर ही खत्म होते हैं ! जहां नन्ही नन्हीं बच्चियों की पीडा से नातेदारी करवाकर हम उन्हें सुखी रहने के नायाब मंत्र सिखा रहे हैं ! मुझे उस बच्ची का दर्द को झेलने की कल्पना मात्र से सहमा हुआ चेहरा तब भी बहुत डरा रहा था और मैं शायद कहना चाहकर भी उसकी मां से नहीं कह पा रही थी..' इस बिटिया को छोड दो ये अपने फैसले खुद ले लेगी उसके बचपन को ऎसे आतंक के साये में क्यों कुम्हला रही हो ..." ! वह बच्ची विरोध में सिर्फ गर्दन हिला पा रही थी वह सोच रही होगी कि भाई तो बाहर फुटबाल खेल रहा होगा और मैं यहां आ खडी हूं या कि मैं लडकी क्यों हुई...या शायद कुछ और .. उसका क्या हुआ यह जानने के लिए मैं वहां ज़्यादा रुकी नहीं ..रुक पाई भी नहीं ....!

12 comments:

संजय बेंगाणी said...

मुझे लगता है, पीड़ादायक क्रियाएं नारी जाती अपनी मर्जी से अपनाएं, न कि दबाव में. किसा का कोई दबाव नहीं होना चाहिए.

मोहन वशिष्‍ठ said...

वैसे निलिमा जी दर्द का नारी से काफी पुराना और जुडा हुआ रिश्‍ता है क्‍या मैं सही हूं

sanjay kumar said...

nalini ji, naree sunder dikhne ke liye kasth bhi uthne me kotahi nahi baratti. 12 varsh ki kishori jab youban me prevesh karegi tab khud-b-khud sundar dikhne ki sari prakriya appnayegi.

MANVINDER BHIMBER said...

dard ki shuruaat ka achcha chitr khincha hai

जितेन्द़ भगत said...

परंपरा से ही पुरूषों ने रूत्री के मानस को गुलाम बना रखा है कि‍ 'तुम स्‍त्री हो,तुम चाहे भूखी रहो, पर सुंदर दि‍खो; जो सुंदर नहीं, वो स्‍त्री नहीं।' 12 साल की बच्‍ची जब बड़ी होगी तो अनचाहे ही इस दलदल में फँस चुकी होगी। इस दलदल से बाहर नि‍कलने के लि‍ए अपने स्‍वाभि‍मान को जगाना होगा और अपने बर्ताव में उन कार्यो को चि‍न्हि‍त करना होगा कि‍ कौन-सा काम अपनी खुशी के लि‍ए है और कौन-सा काम दबाव में कि‍या जा रहा है। पर दूसरों(पुरूष) की खुशी में ही अपनी खुशी ढूँढ़नेवाली स्‍त्री इस दलदल से कभी बाहर नहीं आ सकती।

डॉ .अनुराग said...

सच कहा आपने .....कितने कायदे कानून ऐसे है जिसे हमारे समाज ने इस कदर हमारे भीतर घोल दिया है की ....वे अनिवार्य से लगते है......

rakhshanda said...

गलती ख़ुद हमारी है, हम ही ख़ुद को शो पीस बनाकर पुरुषों के सामने पेश करते हैं, हम भी क्या करें, समाज ख़ास कर जब से हमने पश्चिमी समाज का रंग ढंग अपनाया है, हम महेज़ एक सजावटी सामन हो गए हैं...स्लिम रहना है, ऐसे दिखना है, हमारी फिल्मों की हीरोइनें इसको और भी बढ़ावा दे रही हैं...ये है उस समाज का सच, जहाँ की स्त्रियों को आजाद कहकर बेवकूफ बनाया जाता है...और वो खुश हैं की हम आजाद हैं..यही हाल हमारा है और आगे भी होगा.

अनुराग अन्वेषी said...

यह प्रसंग बेचैनी पैदा कर देने वाला है। पर यहां भाई की चर्चा लिख कर नहीं होती तो भी पूरा पुरुष समाज यहां खड़ा दिख जाता। और तब वह अभी से कहीं ज्यादा अपील करता।
बेशक, दर्द का यह प्रदेश मेरे जैसों के लिए बिल्कुल अनजाना था। कई बार दूर से बात बेहद छोटी दिखती है, पर पास जाकर पता चलता है कि पीड़ा कितनी गहरी है।

Sanjeet Tripathi said...

आपने तस्वीर का दूसरा रूख सामने रखा, शुक्रिया।
दर-असल इस पहलू पर नज़र दौड़ी ही नही कभी।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बिलकुल सच्ची और उतनी ही दुःखी करने वाली तस्वीर खींची है आपने। सही शिक्षा और जागरूक बनाने की जरूरत है लड़कियों को।

manoj dwivedi said...

nilima ji us ladki ke pichhe bhi to shtree hi thi. jo use bal ukhadwane ke liye prerit kar rahi hai.dekhiye mera manana hai mahilayen khud purushon ki preyasi bane rahana chahati hai.aise me sirf purus ko dosh dena thik nahi hai. bhai jo bahar footboll khel raha hai. wo bhi to bahut sare aise kam karta hoga jise gharwale ladki se kahate bhi nahi honge.

vikas said...

Nilima ji hamare dimago me samaj ki chhavi ek dhani kharidar jaisi ban chuki hai.Muhmange damo me khrid liye jane ki chahat me hum koi bhi kurbani dene ya kitni bhi taklif sahne ke liye taiyar dikhte hain.