Thursday, July 10, 2008

आप अपने ऑफिस में बलात्कार करते हैं या सुहागरात मनाते हैं ?

समाजवादी पार्टी के जनरल सेक्रेटेरी अमर सिंह कई मायनों में जानी मानी हस्ती हैं ! आज के बाद उनको जिस एक अन्य जरूरी कारण  से जाना जाएगा वह है सामाजिक जीवन में स्त्री के लिए उनके मन में बसने वाला सम्मान भाव !  एक औपचारिक बातचीत में उन्होंने कांग्रेस पार्टी की लीडर सोनिया गांधी से हुई रजनीतिक मुलाकात के लिए "सुहागरात " और "बलात्कार" जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया ! कई स्त्री -संगठनों ने इसपर आपत्ति व्यक्त की है और अमर सिंह से उनके इस मासूस शाब्दिक प्रतीक के इस्तेमाल के एवज में सार्वजनिक माफी की मांग की है !

अमर सिंह की बात जाने दें ! ये दो बडे बडों के बीच का मसला है और कई मोर्चों से विरोध के स्वर भी उठ रहे हैं ! बात सुलट जाएगी ! सबकुछ पीसफुल हो ही जाएगा !पर  एक आम कामकाजी औरत के व्यावसायिक जीवन में इस प्रकार के भाषिक यौन उत्पीडन की कल्पना करें तो हमारा स्वयं को कटघरे में पाते हैं ! कामकाजी जीवन में पुरुष सहकर्मियों के साथ बराबर की भागीदारिता करने वाली हर स्त्री कभी न कभी इस तरह की वाचिक हिंसा का शिकार हो ही जाती है ! बहुत बार स्त्री अपने लिए कहे गए जुमलों और व्यंग्यों के भीतर छिपी यौन हिंसा को पहचान नहीं पाती ! प्रोफेशनल प्रतिस्पर्धा में पुरुष से खुद को हीन न मान ने वाली औरतें हों या पुरुष को स्वाभाविक तौर पर स्त्री से बेहतर जीव मानने में संतोष करने वाली औरतें - दरअसल दोनों तरह की औरतें पुरुषों के द्वारा किए गए भाषिक हमले का शिकार होती हैं ! कभी कभी तो महज हल्के लगने वाले माहौल में हल्की बातचीत, लतीफागिरी , चुहलबाजी , प्रोफेशनल बातचीत आदि में पुरुष मित्रों और सहकर्मियों के द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा व प्रतीक स्त्री के प्रति उनके नजरिये को दर्शाते हैं !

मैंने अक्सर देखा है अपने लिए इस्तेमाल की गई सेक्सिस्ट भाषा व आपत्तिअजनक जुमलों का विरोध करने का नतीजा बहुत त्रासद होता है ! आपके प्रतिरोध के उपहार स्वरूप आपके लिए कहा जाएगा  - य़े औरत तो पागल हो गई  या फिर इस औरत का  घरेलू जीवन ही बडा खराब है जिसका गुस्सा यह यहां उतार रही है या  कमाल है इसका कौन सा पल्ला खींच लिया है या कहा जा सकता है यहाँ औरत झूठा इल्जाम लगा रही है किसी शत्रु सहकर्मी के भडकाने पर फंसा रही है ...वगैरह वगैरह...

अमर सिंह की सार्वजिक रूप से की गई बयानबाजी के राजनीतिक गैरराजनीतिक पाठ भी हो सकते हैं और इस्तेमाल भी ! पर एक आम औरत जब अपने लिए नागवार गुजरने वाले आपत्तिजनक जुमलों का अकेला प्रतिरोध करती है तो उसके निहितार्थ घोर निजी होते हैं ! यहां घर परिवार ,मित्र, निकट की स्त्रियां व्यवस्था के सहयोग की मात्रा भी बहुत कम होती है ! यौन उत्पीडन का आरोप दर्ज करने वाली स्त्री को हर कदम पर अपने चरित्र और इरादों की सफाई भी देनी होती है ! इस विरोध के झंझटों से बच कर चलने वाली हर स्त्री कामकाज के स्थलों पर यह मानकर चलने लगती है कि जब बाहर निकलोगी तो यह सब तो होगा ही ...!

पुरुष अपने अवचेतन में स्वयं स्त्री का यौन -नियंता समझता है ! उसके मन की भीतरी परतों मे स्त्री मात्र यौन- उपकरण है जिसपर बलपूर्वक अधिग्रहण किया जा सकता है !  सो कबीलाई समाज के संस्कार जाते जाते भी नहीं जा पाते ! उसके लिए स्त्री एक यौन प्रतीक है ,जिसकी कोई यौनिक आइडेंटिटी नहीं है ! इस अवचेतन मन के दबावों में सुहागरात बलात्कार ,संभोग ,स्त्री की देह सब प्रतीक है जिनका इस्तेमाल पुरुष किसी भी गंभीर अभिव्यक्ति के लिए भी जाहिर तौर पर कर बैठते हैं ! अमर सिंह ने भी समझा होगा इस भाषा के इस्तेमाल से वे सोनिया गांधी के राजनीतिक समीकरणों को आम भोली भाली जनता तक आसानी से पहुंचा पाऎंगे ! वे शायद भारतीय जनता के सार्वजनिक अवचेतन की गहरी समझ रखते होंगे ! या ये उनकी ज़बान की फायडियन स्लिप भी हो सकती है !.....जाने दें ..!

जाहिर है स्त्री जितना सिकुडॆगी उतनी ही उसके लिए जगह कम होती जाएगी ! उसे अपने स्तर पर यौन हिंसा के इस रूप का विरोध करना ही होगा ! पर वह यह भी जानना चाहेगी कि ऎसे में स्त्री से इतर समाज का क्या स्टैंड है ? क्या हमें उस दिन का इंतज़ार है जब  स्त्री की भाषा उन यौन प्रतीकों से बनी होगी जो पुरुष के लिए तकलीफदेह होंगे और उसकी कार्यकुशलता को सेक्सुअल आधारों पर कमतर सिद्ध करते होंगे !

19 comments:

हिन्दुस्तानी said...

में आपकी बात से पुरी तरह सहमत हूँ, यह तो हर ऑफिस में हर औरत को सहना पड़ता है......

Udan Tashtari said...

आप सही कह रही हैं मगर मेरे विभाग में स्त्रियाँ ज्यादा हैं. मुझे तो उल्टा सहना पड़ता है, मैं क्या करुँ-कोई मेरी मदद को भी आगे आओ..कहीं शोषित न हो जाऊँ..बह्ह्हूऊऊ!!! :(

दिनेशराय द्विवेदी said...

इस भाषा का सख्ती से सभी स्थानों पर, सभी संभव मंचों से विरोध करना जरूरी है।

मिथिलेश श्रीवास्तव said...

नीलिमा जी, प्रतिक्रियावादी न बनिए..पुरुषवादी मानसिकता का जवाब पुरुषवाद से मत दीजिए। नेताओं की भाषा पर तो हमें थोड़ा भी ध्यान नहीं देना चाहिए वो कब क्या कहते हैं उन्हें भी नहीं पता होता...और हमेशा इस ताक में रहते हैं कि कुछ ऐसा बोल दूं कि लोगों में चर्चा की वजह बने...खैर, इस प्रवृत्ति पर लगाम तो कसनी ही होगी।

महेंद्र मिश्रा said...

मै आपके जज्बो से पूरी तरह सहमत हूँ . भाई उड़न तश्तरी जी के ऊपर जो उलटी पड़ रही है उस स्थिति को ध्यान में रखकर उन्हें कुछ सुझाव अवश्य दे. बढ़िया पोस्ट आभार

swapandarshi said...

This linguistic violence should be opposed in all possible ways and resistance should come from individuals, groups and all other quarters as well. Thanks for this post.

हर्षवर्धन said...

अमर सिंह को मसखरे से ज्यादा हैसियत देना खुद की बेइज्जती है। वैसे भी इस राजनीतिक दलाल को बहुत हैसियत बख्श दी ह, भारतीय राजनीति की विसंगतियों ने।

अंकित माथुर said...

काफ़ी प्रासंगिक विषय पर आपने अपने विचार काफ़ी अर्से बाद रखे हैं, जिन्हे मैं तो कम से कम प्रतिक्रियात्मक नही कहूंगा।
मेरे आफ़िस में भी महिलायें कार्यरत हैं और अक्सर ऐसा पाया जाता है, कि पुरुषों के बीच में वे अपने आप को असहज महसूस करने लगती हैं, रही बात अमर सिंह की तो वे तो जो चाहें जिसे चाहें कह ही देते हैं। लेकिन आम तौर पर भी आफ़िस में ये नज़ारा देखने को मिल ही जाता है जब पुरुष सहकर्मी, महिलाओं की उपस्थिती को एकदम नकार कर जो मन में होता है कह देते हैं (अक्सर आपत्तिजनक शब्द) और बाद में कह देते हैं सारी।
कल ही की बात है मेरे बास एक मीटिंग में एक काफ़ी भारी भरकम हिन्दी की गाली दे देते हैं और बाद में जब उन्हे एहसास हुआ कि इस मीटिंग में महिलायें भी हैं तो उन्होने हल्के से कह दिया, " माफ़ कीजिए" अब सोचने की बात है कि उस एक पल मे उन महिला सहकर्मियों ने क्या महसूस किया होगा।

Mired Mirage said...

समस्या यह है कि ऐसी भाषा को आमतौर पर लोग यह कह कर टाल देते हैं कि ऐसी बात करने वाले के मुँह क्या लगना । यदि बचपन से ही बच्चों को सही भाषा का उपयोग सिखाया जाए तभी कुछ बदल सकता है। देखने में यह आता है कि जितनी भद्दी भाषा कोई उपयोग करता है लोग उतना ही उसे टोकने से डरते हैं। यह भाषा अचानक तो नहीं पनप जाती। अवश्य सदा से वे ऐसी भाषा का उपयोग करते होंगे व उनके सहकर्मी या सहयोगी उसे सुनकर खींसे निपोर देते होंगे।
घुघूती बासूती

डा० अमर कुमार said...

सारी डियर्स, आई हैव नो एप्रोप्रियेट कमेन्ट टू आफ़र ,
बट हैव अ क्वेश्चन इन माई सिली माइंड ! दीज सजेस्टिव गेस्चर्स..से्ड्यूसिंग ड्रेसेस..परफ़्यूम्ड परसोना etc.etc.
आर दे एसेन्शियल फ़ार वर्किंग विमेन इन आफ़िस आवर्स ?

नाऊ..नाऊ, डोन्ट से दैट बुर्ज़ुआ मेन आर अगेनस्ट योर फ़्रीडम टू ड्रेस ?

और..अमर सिंह को नेता कौन मान रहा है, भाई ?
जरा बताये तो कि वह नेता किस तिकड़म से कहलाये जाने लगे ?

Anil Pusadkar said...

bahut sahi kaha aapne.baat keval amar singh ki nahi hai,aaj har dusra aadmi amar singh se milta julta nazar ayega.unhe jawaab dene nihaayat hi jaruri tha aur ye kam aapne kiya.aapko bahut bahut badhai

Tarun said...

जो गलत है वो गलत है, अब चाहे सिंह बोले या कोई और, राजनीतिक है करके आप कैसे जाने दे सकती है।

लेकिन यहाँ ये मामला एक तरफा नही है, ये "F" शब्द यहाँ महिलायें भी बहुत बोलती हैं, बल्कि शायद ज्यादा बोलती हैं। उडनतश्तरी वाली नाव में हम भी शामिल है।

भाषा पर लगाम सभी को लगा के रखनी चाहिये, खासकर उनको जो मीडिया में Expose होते रहते हैं। कई लोग तो उन्ही की सुनकर शायद सुरू भी करते हों, ऐसी भाषा बोलना।

आभा said...

उआलझन को ठीक से महसूस भी कर रही हूँ पर आज औरत सहते सहते कई बार ढ़ीढ हो रही है जिसका खामियाज समीर जी जैसे सहज लोग भूगत रहे हैं पर अमर सिंह जी के बारे मे हर्ष वर्धन जी सही कह रहे हैं ....यही उनका ढ़ग है।

अनुराग said...

आपकी बात से पूरीतरह सहमत हूँ....विरोध उठाना भी जरुरी है,वरना इन सामजिक पशुओ को कौन रोकेगा ?रही अमर सिंह की बात भाषाई टुच्चापन जितना वो राजनीती में लाये है....उससे बढ़ा उदारहण कोई ओर नही...

Anonymous said...

sahii likha haen neelima , wo chahey amar singh ho ya pramod mahajan { inhoney to sonia ko monica lewnski keha thaa } soniya gandhi ko kewal ek aurat hee samjhtey haen . jab tak yae soch haen hamarey smaaj ki koi tabdeeli nahin ho saktee . soniya ghandhi ho yaa ek aam stri sab ki daeh hee koi mehtav rakhtee haen pursh soch kae liyae baaki uskae kiyae huae sab kaam vyarth haen .
bus taslee haen ki har mahila sanghathan iskae virodh mae hee boltaa haen
rachna

geet gazal said...

neelimaa ji ,namaskar . shree amar singh jee ka apni juban par niyantran nahi. rahta. kitni hi bar ve behooda tippniya kar chuke hai. unke asheel aur ghatiya bayan ka sakhti se virodh hona chahiye.
mukesh kumar masoom

Amit K. Sagar said...

sach hameshaa kadvaa hotaa hai...ik lakeer bachtee hai...aar-paar ke beech...sab isase waabasta hote hain...nayaab karnaa alag baat hai...bahut khub. (shayad comment samajh na aaye-mujhe aati hai-esliye chhod rhaa hoon) likhte rahiye.
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ULTA TEER

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

सच्घ्मुच गलत चीज़ का विरोध होना चाहिए.. आपकी बातें सही हैं और इनमें दम भी है..

लेकिन प्रतिक्रिया तो शांति से होनी चाहिए..

Anonymous said...

nilima ji , amar singh jaise "dalal" ke kahne par aap jaisi stri agar is kadar vathithy ho jaye to isme to is math....... amar ki jeet mujhe nazar aati hai. keep it up yaar kutte to bhokte he hain attention pane ke liye.

manish