Wednesday, January 09, 2008

पाठशाला भंग कर दो....

बहुत साल पहले मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग से बी.एड. किया था ! एक पर्चे के रूप में प्राइमरी एजुकेशन का भी अध्ययन करन था ! हमारे एक अध्यापक हमेशा कहा करते थे कि छोटे बच्चों को केवल वही पढाए जो स्वयं शिशु-हृदय हो ,जिसे बच्चों से प्रेम हो और जो बच्चों का समाजीकरण करने की प्रक्रिया में उनकी विशिष्टताओं को चोट न पहुंचाए ! पता नहीं तब पढ़ाया जा रहा सबक कितना समझ आता था और मैं स्वयं अपनी प्राइमरी कक्षाओं में शिक्षण अभ्यास करते हुए उन सबकों को कितना लागू कर पाती थी , पर आज जरूर मैं तहेदिल से यह महसूस करती हूं कि मैं अपने बच्चों के साथ पूरा न्याय नहीं कर रही हूं ! एक मां हो जाने के बाद बच्चों की दुनिया को ज्यादा नजदीक से देख और समझ पा रही हूं शायद ! अपने परिचितों में भी ज्यादातर का लेना देना इस या उस जरिये से शिक्षण से ही है ! सो अक्सर बच्चों की , उनके स्कूलों की , स्कूलों में अध्यापकों की हालत पर चर्चा -विवाद उठ खडे होते हैं और हम पाते हैं कि हम स्वयं शिक्षा से जुडे होने के बावजूद बच्चों को एक बेहतर शैक्षिक वातावरण नहीं दे पा रहे हैं ! हम शर्मिंदा हैं !
हमने अपने बच्चों को समाजीकृत होने के लिए कैसा माहौल दिया है यह समझने के लिए हममें से किसी को बहुत दूर देखने की जरूरत नहीं है ! अपने घर या पास के किसी भी बच्चे की जिंदगी को देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति इन नन्हों से सहानुभूति महसूस करेगा ! अपने बेटे को 3 साल की उम्र में मैंने स्कूल भेजना शुरू किया था ! अपने बहुत एक्टिव, बहुत नटखट और खुशमिजाज और स्पष्ट भाषिक अभिव्यक्ति करने वाले बेटे को स्कूल के हवाले करते हुए दिल बैठता था ! उसने अपनी टीचर की सिखाई हुई पहली कविता सीखी -'मम्मी डार्लिंग पापा डार्लिंग , आई लव यू , सी योर बेबी डांसिंग जस्ट फार यू " पर कक्षा में सुनाते हुए उसने कविता में अपनी ओर से दो पंक्तिया जोड दीं थी- मासी डार्लिंग ,नानी डार्लिंग..... ' ! शिक्षाशास्त्र जिस रचनात्मकता की पैरवी करता है वह यहां भरपूर थी पर शिक्षा के सिद्दांतों को लागू करने वाले तंत्र के लिए ये चिंताजनक हालात थे ! बच्चे की सृजनात्मकता और विषिष्टता को इस तंत्र के अनुसार इसलिए खत्म हो जाना चाहिए क्योंकि वह तंत्र यह मानता है उसका काम सभी बालकों को सामान्यीकृत कर देना है ! यह समाजीकरण करने वाला तंत्र बच्चों की रचनात्मकता और खास योग्यताओं को जिस बेरहमी से दमित करता है उससे साफ हो जाता है कि इस तंत्र {जिसमें कभी- कभी अभिभावक भी शामिल होते हैं} का उद्देश्य एक भीड का निर्माण करना है , एक संवेदनक्षम ,रचनात्मक मेधा से भरपूर मनुष्य नहीं ! एक आम अभिभावक अपने बच्चे की खासियत को न तो समझता है और न ही उसके स्कूल से ऎसी कोई अपेक्षा रखता है ! सो हम सब अपने बच्चों के व्यक्तित्व को हिंदी -इंगलिश ,मेथ्स ,साइंस के पीरियडों में बांट कर खींचतान कर उन्हें बडों की दुनिया के लायक बनाने में जुटे हैं....! कक्षाओं के बंद कमरों में नीरस केन्द्रीकृत शिक्षा देने वाला ,एक घंटी से दूसरी घंटी तक का समय - बस केवल यही सच है हमारे बच्चों की जिंदगियों का !

अपने आसपास के बच्चों की बातों में स्कूल को लेकर ऊब, डर, निराशा और तनाव का स्वर आपने भी अक्सर सुना होगा !मेरे एक दोस्त की5 साल की बेटी एक दिन अचानक ऊबकर बोली - कितना गंदा है आसमान जो रात को अचानक सुबह बना देता है और मुझे स्कूल जाना पडता है ! मेरा बच्चा कभी कभी यह कहता है कि - मम्मी ये दुनिया बच्चों के लिए नहीं बनी है यहां सब कुछ बडों जैसा है बच्चों की एक अलग दुनिया होनी चाहिए- या फिर यह है कि मैं सारे स्कूलों की दीवारों को मार मारकर तोड दूंगा - तब तब मेरा मन कह उठता है कि वाकई.... पाठशाला भंग कर दो ..!

4 comments:

मीनाक्षी said...

नीलिमा जी, मेरे दिल के भाव लिख दिए आपने. आपका लेख पढ़कर फिर बच्चों की याद आ गई जो आज भी आँखों मे आस लिए हैं कि जल्दी ही मै फिर वापिस पढ़ाना शुरु कर दूँगी. बच्चो जैसा मन ही बच्चो से बाँध सकता है. सच कहा आपने...विज्ञान का धन्यवाद जो अंतर्जाल के माध्यम से बच्चे सम्पर्क बनाए रखते हैं. बेटे को खूब प्यार दीजिए. जल्दी ही उसके लिए अपनी लिखी एक कव्वाली पोस्ट करूँगी.

prabhat said...

meri beti bari ho rahi hai. aapki baaton ne meri aankhen khol di.

durga said...

यह समाजीकरण करने वाला तंत्र बच्चों की रचनात्मकता और खास योग्यताओं को जिस बेरहमी से दमित करता है उससे साफ हो जाता है कि इस तंत्र {जिसमें कभी- कभी अभिभावक भी शामिल होते हैं} का उद्देश्य एक भीड का निर्माण करना है , एक संवेदनक्षम ,रचनात्मक मेधा से भरपूर मनुष्य नहीं !

बहुत सही लिखा है आपने.
आपके विचार से मैं भी सहमत हूँ.

अनुराग अन्वेषी said...

आपकी यह टिप्पणी पूरी त्रासदी के एक छोटे से हिस्से को समेट रही है। वैसे, हमारी और आपकी पाठशाला में भी हमारे और आपके बच्चे सही तालीम पा रहे हैं या नहीं, विचार करने की जरूरत है। गौर करें हम सब अपनी छोटी-छोटी तमाम गलतियां, जो हम अपने नासमझ बच्चों के सामने करते हैं और जिसे बच्चे अपने ढंग से समझ कर असमय ही बड़े होने लगते हैं। बच्चों से उनका बचपन छीनने में हम सब शरीक हैं। सचमुच हमें अपनी आदतें भी बदलनी चाहिए।

 
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