<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763</id><updated>2012-01-21T22:00:32.162+05:30</updated><category term='veil'/><category term='दिल्ली ब्लॉगर मीट'/><category term='parivar'/><category term='population'/><category term='evening'/><category term='pratibha patil'/><category term='नीलिमा'/><category term='neelima'/><category term='समीरलाल'/><category term='हास्य - व्यंग्य hindi blogging'/><category term='purdah'/><category term='photo'/><category term='असहमति'/><category term='delhi'/><category term='family'/><category term='दिल्ली विश्वविद्यालय'/><category term='फुरसतिया'/><category term='hindi blogging'/><category term='बच्चे'/><category term='kavita'/><category term='दिल्‍ली'/><category term='president'/><category term='love'/><category term='शाम'/><category term='प्रेम कविता'/><category term='हास्य - व्यंग्य'/><title type='text'>आँख की किरकिरी</title><subtitle type='html'>कहता है वो, बुरा हो इन आँधियों का कि पैर की धूल आँख की किरकिरी बन गयी</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>77</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-2208681306919013869</id><published>2010-03-09T14:28:00.008+05:30</published><updated>2010-03-09T16:09:34.291+05:30</updated><title type='text'>हे भगवान ! हमें मोटी होने का हक दो !</title><content type='html'>प्रार्थना - हे भगवान हमें मोटी होने का हक दो ! हमें अपनी छाती और बाहों पर बाल  उगाने का हक और हिम्मत दो ! हमें देह को सजाने और न भी सजाने का फैसला लेने की   बुद्धि दो ! हमें हिम्मत दो कि  हमसे आइना जब सवाल करे हम उसे उलट दें ! हमें हिम्मत दो कि हम छाती को छिपाती न फिरें ! हे भगवान हमें हमारी देह ऊपर उठा दो ! &lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पिछले साल  जिम जाकर हुलिया और सेहत सुधारने का भूत सर पर सवार हुआ ! वजन में दो चार किलो का इजाफा मुझे नाकाबिले बर्दाश्त था ! मैं सोचती उम्र बढ रही है शरीर ढल रहा है स्टेमिना कम हो रहा है ! शायद जिम का व्यायाम मुझे कोई लाभ पहुंचाए ! मुझे लगता था एक लंबी उम्र परिवार के लिए दौड दौडकर बिता दी , खुद को खपा दिया ! सीढियां चढने में हांफना , वर्क लोड से सांसों का तेज हो जाना , शरीर में भारीपन महसूस होना.....अब कुछ समय खुद को  और अपने स्वास्थ को भी दूं ! जिम में जाकर पता चला मैं बहुत पतली और स्वस्थ थी ! वहां पतली होने आई कई महिलाएं अपने 80 , 100 और 120 किलो के शरीर से युद्ध कर रही थीं ! सोनिया ,मोना , अनीता ..कोई विवाहित तो कोई अविवाहित ! ट्रेडमिल पर ,साइकिल पर, ऎलिप्टेकल पर पसीने से लथपथ ,बिना नाश्ता किए घर का बहुत सा काम निपटाकर , पति और बच्चों को भेज कर 2 से ढाई घंटे शरीर से कडी मेहनत करवाने वाली उन स्त्रियां से जब बातचीत होती स्त्री समाज की नियति पर क्रोध आता ! &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अनीता की उम्र अभी 22 साल है और वजन 80 किलो ! ऊपर से गालों पर फुंसिया और वह कमाती तक नहीं ! उसके पापा अपनी बेटी की बदसूरती और नाकाबिलितय से परेशान होकर रातों को सोते तक नहीं ! एक दिन वह बोली कि ' मैंने नर्सरी टीचर का एग्ज़ाम दिया हुआ है अगर उसमें मेरा नाम नहीं आया तो मैं सुसाइड कर लूंगी ! वह बोली पापा कहते रहते हैं कि तू पतली तो हो ही सकती है कि नहीं ! इतना तो मेरे पर उपकार कर ही सकती होगी ! मैं कहां से हो जाऊं पतली सब कुछ करके देख लिया ! "- जब वह मुझे अपनी बिखरी कहानियां सुन रही होती मैं सोच रही होती ये कोई उपन्यास या कहानी में से उडकर आई हुई घटनाएं हैं ! इनकी जिंदगियों में कोई रोशनी कोई चमक नहीं ,कोई लडाई का भाव भी नहीं ! काश ये सोती न होती जाग जातीं !&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सोनिया से साइकिल चलाते हुए अक्सर बात होती ! वह बेहद पढी लिखी पिता की लाडली बेटी है ! उसके पिता और उसने 34 लडके रिजेक्ट किए ! उसके पिता को  अपनी बेटी के मेंटल प्रोफाइल से मैच करता लडका नहीं मिला !आखिर में पडोस के बचपन के साथी से शादी की  ! हाईली क्वालिफाइड ,बारीक समझ वाली सोनिया अपनी आधी अधूरी आपबीती सुनाते हुए कभी रो पडती तो कभी गुस्से से आंख लाल करके फदकते होंठों से कहती कि आज तो मन किया कि अपने हस्बेंड के पेट में चक्कू मार दूं ! कॉर्पोरेट जगत के उस पति को बच्चे की पैदाइश के बाद मोटी हो गई पत्नी नहीं चाहिए ! दोनों के बीच लडाई के ढेर सारे मुद्दे हैं नौबत तलाक तक आई हुई है पर असल बात आकर मोटापे तक पहुंच जाती है ! पति पर्फेक्शनिस्ट  है इगोइस्टिक ,मैनेजमेंट गुरू - जिसे अपनी पत्नी बच्चा जनते ही मोटी ,भद्दी ,गंवार और जंगली लगने लगी है ! साल छ महीने में आने वाली सास और कुंवारी ननद के साथ मिलकर पति उसके गंवारपन का मातम मनाते हैं ! उसने अपनी पत्नी को हर साल तोहफों में पतले होने की मशीनें लाकर दी हैं !45000 वाला ट्रेडमिल , स्टेशनरी साइकिल , टमी ट्रेनर , तरह तरह के वेट्स ..... ! वह कहता है " ..बाकी सब तो तू छोड 5 साल से तू पतली तक तो हो नहीं सकी ! " &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सोनिया रोज बिना खाए 3 घंटे की कडी एक्सरसाइज करती है उसने 3 महीने की पेमेंट जिम में की है उतना समय खुद को पतला होने के लिए रखा है और साथ साथ स्कूलों में नौकरी के लिए इंटरव्यू भी दे रही है ! शायद उसके बाद वह पति को छोडने या न छोडने के बारे में कोई फैसला ले पाएगी !  ( सोनिया से माफी पिछ्ले सितम्बर में उसने मुझसे मेरे ब्लॉग में अपनी आपबीती लिखने के लिए कहा था पर मैं आज जाकर लिख रही हूं ! ) &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऎसी ही और भी कहानियां  हैं जो दुख देती हैं ! सोनिया की तरह " चक्कू मार देने जितना गुस्सा पैदा करती हैं ! पर कहीं कुछ नहीं बदलता ! न प्यार से न ही क्रोध से ! और अंत में मेरे हाथ प्रार्थना में  खुद -ब खुद उठ जाते हैं - हे भगवान ! हमें खुद को समझने और खुद के लिए जीने का मौका दो ! हमें हमारे हिस्से की खाद दो , हवा दो , पानी दो ! हमें भी इंसानों की पंक्ति में जगह दो ! &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आमीन !&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-2208681306919013869?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/2208681306919013869/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=2208681306919013869' title='30 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2208681306919013869'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2208681306919013869'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='हे भगवान ! हमें मोटी होने का हक दो !'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>30</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-5990530845754410990</id><published>2009-12-01T13:24:00.001+05:30</published><updated>2009-12-01T13:36:22.112+05:30</updated><title type='text'>मेरी नाप की चप्पलें</title><content type='html'>&lt;p&gt;मजबूत , आरामदेह और हल्की चप्पलें मैं हमेशा से खोजती रही हूं ! एक आध बार बाज़ार में ऎसी चप्पल मुझे मिली भी और उसे पाकर मुझे लगा कि मानो मैंने कोई मैदान मार लिया हो ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;चप्पल और&amp;#160; कामकाजी औरत का नाता बहुत गहरा होता है ! यदि चप्पल साथ न दे तो बस के पीछे भागकर उसमें चढना , मेट्रो की बहती भीड को चीरकर आगे बढकर उसमें चढना , ऑफिस की सीढियां जब देर हो हो रही हो तो भागते फलांगते चढना ( वैसे देर तो अक्सर ही हो रही होती है ) बाजार से दूध ,सब्जी दवाई दालें और मेहमानों के लिए बिस्कुट नमकीन खरीदते हुए घर की ओर भागना ,.....अगर चप्पल&amp;#160; भी आजकल के प्रेमियों की तरह साथ देने से इंकार कर दे तो क्या हो ? &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बाजार में कई तरह की अजीब - अजीब चप्पलें देखकर मुझे हमेशा से हैरानी होती रही है - रंग बिरंगी ,पतली-पतली ऊंची ऊंची एडी वाली , चिलकनी , लटकन, डोरी शीशा ,फर ,झूमर , कढाई जबतक न हो मानो औरतों के लिए चप्पल सैडिलें बन ही नहीं सकती ! जाहिर है कि कि इन चप्पलों की सूरत और सीरत में ओई तालमेल नहीं होगा ! इन्हें पहनकर कोई भी स्त्री दौड भाग तो दूर ठीक से खडी भी कैसे होती होगी मुझे ताज्जुब होता है ! फिर भी ये चप्पलें बन भी रही हैं और बिक भी रही हैं ! पतली कमर के साथ पतली लंबी हील के सैंडिल जबतक न हों - बलखाई&amp;#160; नजाकत भरी चाल और अदा कहां से आएगी ? शायद दुनिया की जूता कंपनियां फेमिनिटी के पोषक तत्वों पर काफी शोध कर चुकी हैं ! मजबूती टिकाऊपने और सहूलियत के तत्वों को गायब करके हमारे पांव के लिए सबसे दुर्गम डिजाइन वाली चप्पलें ही बनाई जाती हैं ! आपके लिए अच्छी चप्पल के मायने जूता कंपनियों की &amp;quot;अच्छी&amp;quot; की परिभाषा से उलट होंगें ! हमें घीमी , मदमाती गजगामिनी चाल इन्हीं चप्पलों की बदौलत ही तो मिल सकती है !&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SxTOBdyo5II/AAAAAAAAAzQ/330ycGAIgHg/s1600-h/image%5B2%5D.png"&gt;&lt;img title="image" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="244" alt="image" src="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SxTODOFl9qI/AAAAAAAAAzU/YPdsoxrEeXU/image_thumb.png?imgmax=800" width="244" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;हमारे सौंदर्य के मानदंडों में कद और सुंदरता का गहरा नाता है सो अच्छे लंबे कद के प्रदर्शन के फेर में स्त्री अपने लिए ऊंची से ऊंची हील की चप्पलों को पहनती हैं ! अक्सर इस तरह की चप्पलों से उनके पैरों के तकलीफ होती है , थकान बहुत होती है ,गिर पडने का खतरा बढ जाता है नोकदार ऎडी किसी गड्ढे, नाली के जालीदार ढक्कन या सीढी चढते हुए अटक जाती हैं - पर स्त्री को पीडा सहने की आदत होती है ! ब्यूटी और स्टाइल ही नहीं यहां अपने भीतर पनपी हीनता ग्रंथी को भी सवाल है ! कष्ट तो सहना ही होगा ! कष्ट तो शरीर पर वैक्सिंग करवाने , भौहें बनवाने और बच्चा जनने में भी होता है ! पीडा सहना तो हमारी आदत में शुमार है ! शायद पीडा सहने की प्रौक्टिस करते रहना हमारी विवशता है ... ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;जब कभी स्पोर्ट्स जूतों में और आरामदेह चप्पलों में घूमती लडकियों को देखती हूं तो काफी राहत मिलती है ! स्त्री अपने शरीर को जब समाज और पुरुषों के नजरिये दसे न देखकर अपनी नज़रों से देखना शुरु करेगी तब उसे संज्ञान होगा कि उसने अपने और अपने शरीर के साथ कितना अन्याय किया है ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मुझे अपने लिए जैसे तैसे अपनी नाप की आरामदेह चप्पलें बहुत ढूंढ के बाद मिल ही जाती हैं ! उन्हें पहनकर आत्मविश्वास, तेज़ी&amp;#160; निर्भीकता से चलती हूं ! पर मेरी साथी औरतों को कैसे कहूं कि बस स्वयं को और कष्ट देना अब वे बंद करें ! साथिनों की क्या कहूं मैं तो अपनी छात्राओं तक को नहीं कह पाई ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;एक बार अपने कॉलेज में परीक्षा कक्ष में मैंने बहुत मोटे और लंबे प्लेटफार्म वाली चप्पलों को पहने एक लडकी को देखा ! अति साधारण घर की लडकी ने जैसे तैसे समय और फैशन के साथ कदमताल मिलाए हुई थी ! फिल्मी तारिकाएं मानो उसका आदर्श थीं जिनकी नकल के बेहद सस्ते कपडे पहने हुए थी वह लडकी ! उसकी चप्पलें मानो मेरे पैरों में घाव किए दे रही थीं ! मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने उससे कहा कि उसे ऎसी चप्पलें नहीं पहननी चाहिए इससे तबीयत खराब हो जाएगी ! उस लडकी ने बडे सपाट और ठंडे तरीके से&amp;#160; जवाब दिया - &amp;quot; मैडम अगर ऎसी चप्पलें नहीं पहनूंगी तो तबीयत खराब हो जाएगी &amp;quot; !&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-5990530845754410990?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/5990530845754410990/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=5990530845754410990' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5990530845754410990'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5990530845754410990'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='मेरी नाप की चप्पलें'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SxTODOFl9qI/AAAAAAAAAzU/YPdsoxrEeXU/s72-c/image_thumb.png?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-2519812597741532298</id><published>2009-09-02T12:33:00.001+05:30</published><updated>2009-09-02T12:45:54.780+05:30</updated><title type='text'>हाउस , फ्राउऎन , सेक्स - मार्गिट श्राइनर</title><content type='html'>&lt;p&gt;अपनी &lt;a href="http://vadsamvad.blogspot.com/2009_08_01_archive.html" target="_blank"&gt;पिछली पोस्ट&lt;/a&gt; में मैंने एक अनोखे तेवर वाले उपन्यास &amp;quot;&amp;#160; घर ,घरवालियां ,सेक्स &amp;quot;का नामोल्लेख&amp;#160; किया था !&amp;#160; कई मित्रों ने इस उपन्यास के बारे में जानना चाहा है ! इसका हिंदी अनुवाद अमृत मेहता ने किया है तथा इतिहास बोध प्रकाशन द्वारा यह प्रकाशित है !&amp;#160; एक अक्खड , मर्दवादी , बकवादी और&amp;#160; स्त्री और घर के चक्कर में खुद को लुटा पिटा&amp;#160; मानने वाले पुरुष के अंदरूनी गुबार को पेश करती है ! उसने पत्नी से मांगा प्यार , सेक्स खुशी , सुरक्षा&amp;#160; ! जिसके लिए उसने अपना सबकुछ कुर्बान किया - दिमाग , वक्त , आज़ादी ! किंतु उसने जितना इंवेस्ट किया इतना उसे मिला नहीं !&amp;#160; उसे मिली -एक ठंडी , घर और बच्चों के नैपी और रसोई की बास से भरी ,कामकाजों में उलझी धोखेबाज, बहानेबाज और पति की कमाई पर जीने वाली स्वार्थी औरत ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;यह एक&amp;#160; &amp;quot; कुशल चातुर्यपूर्ण गद्य रचना है जिसमें पत्नी द्वारा त्याग दिए जाने के बाद कथक अपना मरदाना बकवादी चेहरा दिखाता है !&amp;quot;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;इसकी रचना एक&amp;#160; स्त्री ने की है !&amp;#160; मारी थेरेज़े - सुपरमार्केट की खजांची ,अपनी बीवी को संबोधित करते इस उपन्यास के पीडित पुरुष का दर्द पेश है&amp;#160;&amp;#160; ---&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&amp;quot; ...तुम देख सकते हो ,लुगाइयां हमारा क्या हाल कर देती हैं ! बिना पलक झपकाए वो हमारी ज़िंदगी बर्बाद कर देती हैं !चट्टान की चटनी बना देती हैं !तुम लोग हो तो बुनियादी तौर पर निर्मम ! और कठोर ! जानती हो मेरा धीरे-धीरे मेरा क्या खयाल बनता जा रहा है ? मेरा यह खयाल बनता जा रहा है कि तुम्हारी यह तथाकथित रहस्यात्मकता एक धोखा है : नारी की रहस्यात्मकता, नारी , एक रहस्यमय जीव , नारी हिरणी , परी , जादूगरनी ! कई बार जब तुम स्वप्निल नेत्रों से खिडकी के बाहर देख रही होती हो और तुम्हारे नेत्र दमक रहे होते हैं तो मुझे लगता है कि तुम्हें महावारी हो रही है , और कुछ नहीं !यदि इसके पीछे कोई सिद्दांत जोडना है तो उसको यथार्थनिष्ठ सिद्ध करना होगा! मेरा मतलब कोई तो सबूत होना चाहिए , जो तुम्हारे बारे में जानकारी दे : कोई दूरदृष्टि हो , कोई दर्शन हो साहसकर्म का कोई सपना हो ! लेकिन है कहां महिला दार्शनिक , दूरदृष्टि रखने वालीयां , या दुस्साहसी स्त्रियां ? शोधकर्ता ? तुम लोगों ने अभी तक एक ही गहरा शोध किया है - बंदरों की कामक्रियाओं पर ! तुम लोग तो ठीक से कोई नारी आंदोलन भी नहीं चला सकीं ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;.......एक बार औरत बच्चा पैदा कर दे तो सेक्स तो उसके बाद ज़्यादातर खत्म हो जाता है ! उसे बच्चा मिल गया, अर्थात सुरक्षा मिल गई , प्यार की अमानत , गारंटी और फिर उसे सेक्स में दिलचस्पी नहीं रहती ! हम मर्द वैसे नहीं हैं, इसलिए तुम लोग चाहती हो कि हमारी दिलचस्पी न सिर्फ अपनी बीवियों में न रहे बल्कि दूसरी औरतों में भी न रहे ! खैर यह बात तो सब अच्छी तरह से जानते हैं: पहले तो तुम हमेशा बच्चे के साथ व्यस्त होती हो, फिर तुम थकी होती हो तुम्हॆं आधासीसी का दर्द होता है आदि ! हमेशा जब हम तुम्हारे नजदीक आने की कोशिश करते हैं तो कोई न कोई गडबड तुम्हारे साथ रहती है ! या तुम्हें महावारी होती है , या बच्चे अभी नहीं सोए या तुम्हें इच्छा नहीं है , क्योंकि हम तुमसे कभी बात नहीं करते या क्योंकि हम बहुत उंचा बोले हैं और या क्योंकि हमने कुछ पी रखी है , और तुम शराबी के साथ नहीं करना चाहती और या क्यॉंकि हमने कुछ नहीं पिया और इस कारण चिडचिडे हैं और क्योंकि तुम ऎसे आदमी के साथ नहीं करना चाहती जो हमेशा चिडचिडा रहता है और चूमाचाटी नहीं करता इत्यादि ! यह सब कुछ स्वभावत: लुके छिपे अपरोक्ष ढंग से ! ऎसा कभी नहीं होगा कि कोई बीवी अपने मियां से सीधे -सीधे कहाँ देकि वह उसके साथ नहीं लेटेगी! सवाल ही पैदा नहीं होता ! तुम लोग ऎसे दिखावा करती हो कि तुम तो चाहती हो ! सिर्फ हालात ही इसके खिलाफ हैं !................समस्या सिर्फ बंदे की नहीं है ! समस्या सिर्फ प्रेम की नहीं है ! समस्या औरतों की है ! वे वास्तव में होती ही प्रेमहीन हैं ! ऊपर ऊपर से ! सतही ! बस दिखना चाहिए , असली चीज़ वही है ! बस असुरक्षा नहीं चाहिए , जोखिम नहीं चाहिए , स्वयं को सुरक्षित रखना है बस , और फिर वे सद्वभावपूर्ण दांपत्य जीवन भी चाहती हैं ! लेकिन सेक्सहीन ! क्योंकि इससे तो अशांति उत्पन्न होती है न ! और पुरुष बरसों इस स्थिति के साथ निभाता रहता है ! परिवार की खातिर , ज़िम्मेदारी की खातिर , फर्ज की खातिर ! और औरतों को देखना बंद कर देता है सेक्सहीन प्राणी बन जाता है&amp;#160; जो सिर्फ पैसा कमाता है और अपने हॉबी कक्ष में बैठकर बढईगिरी करता है................. &amp;quot;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-2519812597741532298?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/2519812597741532298/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=2519812597741532298' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2519812597741532298'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2519812597741532298'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='हाउस , फ्राउऎन , सेक्स - मार्गिट श्राइनर'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-1064125871833108464</id><published>2009-08-25T11:40:00.001+05:30</published><updated>2009-08-25T12:41:29.590+05:30</updated><title type='text'>घर , घरवालियां और सेक्स</title><content type='html'>&lt;p&gt;पिछले दिनों अफगानिस्तान में &lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/news/world/uk/Sex-starved-Afghans-can-deny-food-to-wives-Report/articleshow/4897962.cms" target="_blank"&gt;घोषित&lt;/a&gt; नए कानून के द्वारा मानवीयता की सारी हदें पार कर दी गईं ! इसके मुताबिक अपनी पत्नी द्वारा सेक्स से वंचित पति उसे खाना देने से इंकार कर सकता है !&amp;#160; इसके अनुसार पत्नी को चार दिन में कमसे कम एक बार अपने पति की शारीरिक इच्छा की पूर्ति करनी होगी ! इससे विवाह की परिधि में पत्नी से बलात्कार को कानूनी मान्यता दी गई ! इसे घोषित करने वाले&amp;#160; अफगान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई का समर्थन अफगान के रुढिवादी संगठनों ने किया जिनके बल पर चुनावी राजनीति का निकृष्टतम दांव खेला गया ! इस कानून का पश्चिमी नेताओं और अफगानी स्त्री संगठनों ने &lt;a href="http://womenagainstshariah.blogspot.com/" target="_blank"&gt;विरोध&lt;/a&gt; और निंदा की !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt; नो वर्क नो सैलरी -&amp;#160; नो सेक्स नो फूड ! अफगानी समाज में स्त्री की पारिवार में स्थिति कामगार की तरह है ! जिसका काम पति की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना और उसके बच्चों को पालना मात्र है ! उसके एवज में पति उसे खाना और रहने की जगह देकर इस घरेलू कामगार के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री करता है ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अफगान समाज तो बहुत सभ्य निकला ! उसने विवाह ,परिवार, स्त्री की बराबरी से जुडी कई वैश्विक समस्याओं को इतने सहज तरीके से सुलटा दिया ! इसने विश्व को समझा दिया कि कि सभ्य समाज में स्त्री और पुरुष के संबंध तो कबीलाई ही रहेंगे ! कितनी भी कवायदें आप कर लें कितना भी आप विमर्श कर लें ! स्त्री का जन्म एक घरेलू मजदूर के रूप में हुआ है इस सच से मुंह नहीं मोड सकते ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;दिहाडी मजदूरी को हम आज तक नहीं खत्म कर सके ! मजदूर संगठन बनते टूटते रहते हैं पर मजदूरों की बेबसी बनी रहती है ! स्त्री के साथ भी यही स्थिति है ! अफगान हमसे ज़्यादा दो टूक है ! उसने बराबरी , हकों और सम्मान के सारे भ्रमों को तोडते हुए जो बात साफ साफ कही विश्व के बडे - बडे स्ट्रेट फार्वर्ड समाज नहीं कह पाए ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;दरअसल स्त्री की देह तो एक कॉलोनी मात्र है ! जिसका इसपर कब्ज़ा है वही उसका मालिक है ! अपने श्रम से औपनिवेशिक ताकतों की इच्छाओं की पूर्ति करते जाना और बदले में भोजन ताकि जीवित रहा जा सके और अगले दिन की बेगारी के लिए तैयार रहा जा सके ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अगर ज़्यादा कडवा सच पचा पाएं तो - स्त्री की योनि एक कॉलोनी मात्र है ! जिसके शोषण की एवज में स्त्री जीवित रहने की हकदार होती है ! प्रतिबंधित समाज इस सच को कहने में नहीं झिझकते ! खुले समाजों में शब्दों की चाशनी , विचारों और विमर्शों की तहों में यह धारणा लिपटी रह जाती है ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;स्त्री का अस्तित्व राजनीति के लिए बहुत बढिया पैंतरा&amp;#160; है ! सभ्य कहे जाने वाले समाजों में स्त्री की मुक्ति और बंद&amp;#160; समाजों में उसकी दासता के एलान के बल पर राजनीतिक ताकतें सत्ता का खेल खेलतीं हैं ! स्त्री की गुलामी और आज़ादी दोनों&amp;#160; का राजनीतिक इस्तेमाल सबसे भारी दांव होता है ! स्त्री विमर्श की बडी लेखिका मृणाल पांडे मानतीं हैं कि स्त्री- आंदोलनों को राजनीतिक पार्टियां अपने फायदें में ऎप्रोप्रिएट कर लेतीं हैं ! ऎसे में स्त्री के पारिवारिक - सामाजिक अधिकार और बराबरी एक ऎसा समीकरण होता है जिसका जितना उलझाव होगा उतना ही फायदा पुरुष समाज का होगा !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;घर की चौखट में सुरक्षित दिखने वाली स्त्री उसके भीतर कितने शोषण और समझौतों के बावजूद ही रह पा रही है इसका अंदाज़ा शायद उन विवाहिताओं बनाम पीडिताओं को भी नहीं होता ! स्नेह , कर्तव्य ,आदर्श ,नैतिकता, प्रेम ..जैसे कई छलावों में लिपटा सच यही है कि विवाह स्त्री के लिए एक समझौता और करार है ! क्या विवाह एक यौन पशु के लिए चारे और सुविधा का इंतज़ाम है जिसके जरिए वह सत्ताधीश कहलाता है और उसका वंश भी आगे बढता रहता है ?&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मार्ग्रेट श्राइनर&lt;/strong&gt; का उपन्यास - &lt;strong&gt;घर , घरवालियां और सेक्स&lt;/strong&gt; पढकर समाज की मुख्य बुनियाद विवाह और परिवार पर ही अनेक शक पैदा होते है ! स्त्री और पुरुष के संबध विवाह के बाहर और भीतर दोनों ही जगह&amp;#160; शोषक - शोषित&amp;#160;&amp;#160; और मालिक - मजदूर के हैं !&amp;#160; सामाजिक विकास के चरणों में कबीलाई समाज की मूल प्रवृत्तियां बदल नहीं पाईं !&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-1064125871833108464?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/1064125871833108464/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=1064125871833108464' title='22 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/1064125871833108464'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/1064125871833108464'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='घर , घरवालियां और सेक्स'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>22</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-465690746095936543</id><published>2009-06-15T11:12:00.001+05:30</published><updated>2009-06-15T15:26:34.676+05:30</updated><title type='text'>शास्त्री फिलिप जी से मुलाकात : सारथी ही तो हैं वे</title><content type='html'>&lt;p&gt;बीते महीने की पंद्रह तारीख को सपरिवार मैं केरल और लक्ष्यद्वीप की यात्रा पर थी ! दिल्ली से हवाई जहाज की मात्र चार घंटे की यात्रा के बाद जिस ज़मीन पर हम थे उसका रंग हरा था और नाम था देवभूमि केरल - गॉड्स ओन कंट्री ! कोचीन हवाई अड्डा ! बस कंवेयर बेल्ट से आता हुआ अपना सामान उठाना था और बाहर स्वागत में खडे ट्रेवल एजेंट के साथ गाडी तक जाना था ! बाकी सब इंतज़ाम पहले से ही तय थे !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;गाडी में बैठते ही हमने &lt;a href="http://sarathi.info/" target="_blank"&gt;शास्त्री जी&lt;/a&gt; को फोन किया और अपने पहुंच जाने की इत्तला दी ! मिलने की जगह तय हुई हमारे ठहरने की जगह होटल सी लॉर्ड ! रात आठ बजे का समय तय हुआ था - ठीक दो घंटे बाद का ! दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर उस जगह पर हमारे कोई परिचित रहते हैं और उनसे पहली बार वर्चुअल स्पेस से बाहर मुलाकात होगी - हम रोमांचित थे ! ठीक आठ बजे होटल की लॉबी में दरवाज़ा खोल कर प्रवेश करते हुए शास्त्री जी ने हमें और हमने शास्त्री जी को पहली ही नज़र में पहचान लिया ! मसिजीवी से जीभर गले मिलते हुए और मुझसे आत्मीय अभिवादन का आदान -प्रदान करते हुए शास्त्री जी बेहद चिर -परिचित लगे ! अचंभित और रोमांचित होते हुए उन्होंने दो तीन बार इस बात को अलग अलग अंदाज़ में दोहराया &amp;quot; तुम लोग तो बहुत छोटे हो , बिल्कुल बच्चे हो , जैसे फोटो में दिखते हो उससे दस साल छोटे लगते हो ... &amp;quot; ! मैंने कहा कि लेकिन आप जैसे फोटो में दिखते हैं वैसे ही दिखते हैं - उत्साह , जीवंतता, तेज और फुर्ती से भरे हुए ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfFB7tsDI/AAAAAAAAAvI/TLijyel6OGg/s1600-h/IMG_2143%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img title="IMG_2143" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="IMG_2143" src="http://lh5.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfGFzDxbI/AAAAAAAAAvM/iHyZw65E9Qw/IMG_2143_thumb.jpg?imgmax=800" width="244" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;शीशे की तरह आर-पार देखे जा सकने वाला उनका दिल और चेहरा ! ज़िदगी को लेकर सकारात्मक नज़रिया , विवादित मुद्दों और अपनी बेहद मौलिक मान्यताओं पर उठाए गए &lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com/" target="_blank"&gt;मसिजीवी&lt;/a&gt; के सवालों का बेहद ईमानदार ,साफ और सहज उत्तर ! न थकने वाले , और सक्रियता में जीवन का सार ढूंढने वाले शक्स हैं शास्त्री जी ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;लॉबी&amp;#160; के चिकने फर्श पर तेज़ी से भाग भागकर फिसलने और शोर मचाने वाले हमारे दोनों बच्चों से शास्त्री जी की बातचीत में उनका बालसुलभ हृदय झलक रहा था ! ज़िदगी की व्यर्थ राजनीति , संसाधनों को जुटाने की मारामारी और खोखली चमक से दूर सादगी और निष्टा का जीवन जीने वाला व्यक्ति ही पहली मुलाकात में छोटे बच्चों के इतने नज़दीक पहुंच सकता है !&amp;#160; उनके भेंट किए ऎतिहासिक महत्व के चांदी सिक्के मेरे बच्चों की अब तक की सबसे अमूल्य निधि हैं जिन्हें वे दिन में कई बार देखते और सहेजते हैं&amp;#160; ! बारह दिन के घूमने जाने की भागदौड में हम शास्त्री जी के लिए कोई भेंट नहीं ले जा सके ! शास्त्री जी को पुराने ऎतिहासिक सिक्कों के संग्रह का शौक है !&amp;#160; पुरातत्वीय महत्व के पांच सिक्के शास्त्री जी ने बहुत श्रम से जुटाए थे ! इनमें से एक उन्होंने अपने पास रखा तथा एक-एक सिक्का अपने बेटे आनंद तथा आशा को और हमारे बच्चों प्रभव तथा मिष्टी को दिया है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfH7fERhI/AAAAAAAAAvQ/kvJnmS9txWE/s1600-h/IMG_2142%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img title="IMG_2142" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="IMG_2142" src="http://lh3.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfIqYfsHI/AAAAAAAAAvU/XsbmbiQU4Zk/IMG_2142_thumb.jpg?imgmax=800" width="244" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;जिस अपनत्व को शास्त्री जी में पाया वह इतना सहज और गहरा था कि मैं मुग्ध थी ! उनकी पत्नी शांता जी से मुलाकात नहीं हो सकी पर लगा उनसे भी हम मिल लिए हों !&amp;#160; शास्त्री जी ने कहा कि शांता जी जी कि इच्छा थी कि हम उनके घर पर ही जाते पर उन्होंने हमारे कार्यक्रम में समय, दूरी और घंटों का हिसाब लगाकर देखा पर मुलाकात उनके यहां संभव नहीं हो पा रही थी ! हम कोचीन शाम पांच पहुंचे थे अगली सुबह हमें अगाती ( लक्षयद्वीप) के लिए हवाई जहाज़ में सवार होना था ! हमें काफी खेद हुआ क्योंकि इस मुलाकात और कोचीन को देखने के लिए हमारे पास बहुत कम समय था !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;शास्त्री जी ने बताया कि उनके बेटे आनंद को बहुत दुख हुआ जब उन्हें पता चला कि हम होटल सी लॉर्ड में ठहर रहे हैं ! किसी समय कोचीन का सबसे शानदार होटल अब व्यसन करने वाले ग्राहकों की वजह से अपनी गरिमा में गंवा चुका है ! यदि उन्हें पहले पता होता कि हम वहां ठहर रहे हैं तो वे हमें कोई अन्य सुझाव दे पाते ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;शास्त्री जी से देर रात ग्यारह बजे तक बातें होती रहीं ! मैंने हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा ही पढा था ! आज उनसे मिलने का गौरव प्राप्त हो रहा था ! मैं ज़्यादा मुखर नहीं थी ! मसिजीवी और शास्त्री जी की गर्मजोशी ,आत्मीयता से चल रहे संवादों को एक मुग्ध श्रोता की तरह सुन रही थी ! मानो एक दिव्य अनुभव से गुज़र रही हूं ! मैं एक कैमरा हो गई थी !&amp;#160; उस अविस्मरणीय बातचीत के तालमेल ,लय और उत्साह में एक चमक थी ! जब मैंने कहा कि &amp;quot; आसपास जब टुच्चेपन की बहार हो ऎसे में आप जैसे व्यक्तित्व से मिलना बहुत सुखकारी है ' तो शास्त्री जी उन्मुक्त हंसी हंसे ! &lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfKMqEf0I/AAAAAAAAAvY/yz1pPrWh4HY/s1600-h/IMG_2134%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img title="IMG_2134" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="IMG_2134" src="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfMIB05-I/AAAAAAAAAvc/mVQVsUQFL9E/IMG_2134_thumb.jpg?imgmax=800" width="244" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;ईसाईत्व , धर्म ,मनुष्यत्व ,&amp;#160; हिंदी भाषा के प्रति प्रेम , उनकी गहरी देश -निष्ठा , राष्ट्रीय संस्कृति के लिए प्रतिबद्धता ,ब्लॉगरी में आस्था ,उनका अध्यवसाय , केरल की जलवायु , आगे का कार्यक्रम ..अनेक बातें हुईं ! सबका पता दे पाना यहां एक पोस्ट में कठिन है ! प्राणपण से इन उद्देश्यों के लिए लगे हुए इस कर्मठ योद्धा से मिलकर लगा कि नौकरी और निजता के उद्देश्यों से ऊपर उठकर किसी महत सामाजिक उद्देश्य के लिए जीना ही असली जीना है ! उनके सिद्धांत और जीवन में जैसी गहरी एकता दिखी वैसी एकता आज के ज़माने में मिलना बहुत कठिन है ! उनसे बातचीत दिल से दिल की बातचीत थी ! पुराने सगे मित्रों सी ! खोट , दुराव ,&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; छिपाव , दुराग्रह राजनीति&amp;#160;&amp;#160; नहीं केवल निश्चल आत्मीय संवाद ! &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfNYSxBsI/AAAAAAAAAvg/P6rT63YQs7w/s1600-h/IMG_2136%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img title="IMG_2136" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="IMG_2136" src="http://lh3.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfQ3WuZEI/AAAAAAAAAvk/Xr_s_V9H8r0/IMG_2136_thumb.jpg?imgmax=800" width="244" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfSsFmHAI/AAAAAAAAAvo/KPBf5Ve1HYw/s1600-h/IMG_2137%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img title="IMG_2137" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="184" alt="IMG_2137" src="http://lh5.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfT1DIJkI/AAAAAAAAAvs/ZSH_w12LY44/IMG_2137_thumb.jpg?imgmax=800" width="244" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;शास्त्री जी ने दो अच्छी सूचनाएं दीं ! पहली यहाँ कि उनका चिट्ठा आज से सारथी.इंफो पर चला गया है और दूसरा यह कि जल्द ही उनकी बिटिया का ब्याह होने वाला है ! वे कहने लगे कि ' अब तो जल्द ही उनका घोंसला सूना हो जाएगा ..किंतु तुरंत ही प्रभव और मिष्टी की ओर देखकर बोले कि कोई बात नहीं इन बच्चों की उमर अभी बहुत छोटी है ये और ज़रा से बडे हो जाएं तो अकेले ही यहां हमारे घोंसले में आ जाया करेंगे .मैं हवाई अड्डे से इन्हें ले लिया लूंगा..! वे कह रहे थे कि आगे जब कभी हमें केरल आना हो तो उनके घोंसले में ही रुकें ,होटल में नहीं !'&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;पिछ्ले दो तीन महीने से ब्लॉगिंग से मन उठा सा गया था लग रहा था कि क्या पाते हैं हम यहां अपने को नष्ट करके&amp;#160; ....केवल व्यक्तिगत जीवन पर प्रहार ..और कटुता और राजनीति के गर्द में सनना ही होता है क्या ! पर शास्त्री जी जैसे व्यक्तित्व से मिलकर लगा कि यहां रहना व्यर्थ कहां रहा बहुत कुछ तो मिल रहा है जो अन्यथा कैसे मिलता.... ?&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfH7fERhI/AAAAAAAAAvQ/kvJnmS9txWE/s1600-h/IMG_2142%5B2%5D.jpg"&gt;&amp;#160;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-465690746095936543?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/465690746095936543/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=465690746095936543' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/465690746095936543'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/465690746095936543'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='शास्त्री फिलिप जी से मुलाकात : सारथी ही तो हैं वे'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SjXfGFzDxbI/AAAAAAAAAvM/iHyZw65E9Qw/s72-c/IMG_2143_thumb.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-5152181683474516547</id><published>2009-03-26T12:46:00.001+05:30</published><updated>2009-03-26T19:56:52.035+05:30</updated><title type='text'>आपके शहर के सुनसान और खतरनाक रास्ते कौन से हैं ?</title><content type='html'>&lt;p&gt;अगर आप स्त्री हैं तो अंधेरे ,सुनसान रास्तों पर अकेले न जाएं ! आप बलात्कार , हत्या , लूटपाट का शिकार हो सकतीं हैं ! ............आप रोज़ वहां से गुजरतीं हैं ? हो सकता है किसी रोज़ आपकी सडी गली लाश ही मिले....&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;जाहिर है हममें से कोई भी कामकाजी या घरेलू स्त्री अपनी किसी छोटी -सी ज़िद ,ज़रूरी काम या आपात से आपात स्थिति में भी रात में घर से बाहर अकेले नहीं निकलना चाहेगी ! न ही दिन के उजाले में सुनसान सड्कों से गुज़रना चाहेंगी ! स्त्री के लिए बदलता समाज और बदलते समाज में सशक्त होती स्त्री, पुरुष से बराबरी पर दिखाई देती है ! पर वास्तव में यह ऎसा सामाजिक मिथक हैं जिसका चेहरा यथार्थ से काफी मिलता जुलता है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;यदि आज कोई स्त्री या लडकी इस सबसे बड़ी सामाजिक मिथकीय संरचना को जानना चाहे तब भी वह क्या रात के बारह -एक बजे अपने घर की चाहरदीवारी को लांघकर सडक पर निकल सकती है !&amp;#160; समाज में अपनी बराबरी को जानने के लिए कोई भी स्त्री सौम्या या जिगीशा का सा हश्र नहीं चाहेगी ! दिल्ली की सडकों पर रात में इंडिया गेट के आगे से अगुवा कर बलात्कार का शिकार बनाई गई&amp;#160; लडकी , दिल्ली के साउथ कैंपस में रात में भरी रिंग रोड पर चाय की दुकान के आगे से अगुवा कर &lt;a href="http://news.indiainfo.com/2005/05/27/2705du-rape.html" target="_blank"&gt;सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई छात्रा&lt;/a&gt;&amp;#160; - जैसी अनेक घटनाएं हैं जिनसे बार बार असुरक्षित स्त्री समाज की विडंबना उभर कर आती है ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;img src="http://www.gradyzart.co.za/img/resized/crime%20against%20women%20and%20children.jpg" /&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;एक बडे अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुख्य पन्ने पर स्त्रियों के लिए खतरनाक &lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/Delhi/Nelson_Mandela_Marg_lonely__unguarded/articleshow/4315778.cms" target="_blank"&gt;दिल्ली के दस&amp;#160; स्ट्रेचिज़&lt;/a&gt; की पहचान की गई है ! आप अगर स्त्री हैं तो आप इनमें और भी कई एसे रास्ते जोड सकती हैं जहां आपने खुद को असुरक्षित महसूस किया हो ! आप वहां से न गुज़रें ! क्योंकि इन रास्तों से गुजरती स्त्री एक आसान शिकार हो सकती है यह सब अपराधियों को पता है ! वे यह भी जानते हैं कि वहां आपको बचाने वाला कोई मर्द भी नहीं होगा न ही आपकी चीखों पुकार किसी के कानों तक पहुंच पाएगी !&amp;#160; यूं तो कई बार अपने घर के आगे टहलती लडकियों को अगुवा कर बलात्कार की घटनाए भी होती रहतीं हैं और &lt;a href="http://ghughutibasuti.blogspot.com/" target="_blank"&gt;अपने घर में भी वे अपराध का शिकार बनाई जा सकती&lt;/a&gt; हैं परंतु घर के बाहर कामकाज के लिए रोजाना निकलने वाली स्त्री जिस असुरक्षा और रिस्क के साए तहत काम करती है वह मेरी दृष्टि में स्त्री का प्रतिक्षण का मानसिक शोषण है ! कामकाज के लिए बराबरी की स्पर्धा सहती स्त्री के मन में प्रतिक्षण&amp;#160; बसा यह डर कि उसे कहां कहां से कब कब नहीं गुज़रना उसकी कार्य - क्षमता को बाधित करता है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;किसी सभ्य समाज में पुलिस द्वारा कामकाजी स्त्रियों की अपने ऑफिस तक की यात्रा के संबंध में निकाले गए हिदायत वाले विज्ञापन हों या अखबारों में असुरक्षित जगहों की पहचान की कवायद हो - सबसे यही सिद्ध होता है कि और कुछ तो बदल नहीं सकता इसलिए आप यदि अपराधों का शिकार होने से बचना चाहती हैं तो कई सारी सावधानियों से काम लें - शायद आप बच जाएं !&amp;#160; समाज वही रहेगा सडकें वही रहेंगी,&amp;#160; अपराधी बलात्कारी रहेंगे , अकेलापन अंधेरा सब होगा - आपको बचने के तरीके आने चाहिए ! न आते हों सीख लें जिससे आज आप बचकर यह सोच लें कि आज आप बचीं हैं तो आपकी जगह ज़रूर कोई और हुई होगी शिकार !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मेरी बडी तमन्ना रही है बचपन से कि किसी सडक किनारे की चाय वाली गुमटी के बाहर पटरी पर अकेले ही ढली शाम तक बैठकर चाय पी जाए पर एक चाय और उस सुकून का रिस्क मैं कभी ले नहीं पाई ! और अब तो यही शुक्र मनाती हूं कि मैं किसी कॉल सेंटर , मीडिया कपंनी या ऎसे मल्टी नेश्नल में नहीं काम करती जहां से आधी रात को काम से लौटना होता ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;आप सब भी सुकून मनाइए कि आपकी पत्नियां बेटियां और बहनें दिन दिन में ही अपने काम काज से&amp;#160; घर लौट आती हैं और आपके शहर के उन सुनसान रास्तों से उनको कभी गुजरना नहीं होता !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;चित्र के लिए &lt;a href="http://www.gradyzart.co.za/img/resized/crime%20against%20women%20and%20children.jpg" target="_blank"&gt;आभार&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-5152181683474516547?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/5152181683474516547/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=5152181683474516547' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5152181683474516547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5152181683474516547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='आपके शहर के सुनसान और खतरनाक रास्ते कौन से हैं ?'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-716188830642343450</id><published>2009-02-21T12:48:00.008+05:30</published><updated>2009-02-21T21:41:26.752+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बच्चे'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्ली विश्वविद्यालय'/><title type='text'>दिल्ली विश्वविद्यालय ; एक नज़र  यह भी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/SZ-tnX2P9UI/AAAAAAAAAuw/aBHpHoDrq20/s1600-h/IMG_1731.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer; width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/SZ-tnX2P9UI/AAAAAAAAAuw/aBHpHoDrq20/s400/IMG_1731.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305149777993790786" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;                   दिल्ली विश्वद्यालय के हाईटेक संस्थान - "&lt;a href="http://illl.in/"&gt;इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ लॉंग लर्निंग&lt;/a&gt;" के आधुनिकतम                           भवन के दरवाजे के बाहर देश और उसका भविष्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/SZ-tQHf_onI/AAAAAAAAAuo/mobM2aUXKBc/s1600-h/IMG_1660.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer; width: 400px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/SZ-tQHf_onI/AAAAAAAAAuo/mobM2aUXKBc/s400/IMG_1660.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305149378468487794" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;            दिल्ली विश्वविद्यालय का मुख्य दरवाजा और विवेकानंद प्रतिमा के पास सपने बुनता बच्चा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/SZ-rzFYV9WI/AAAAAAAAAug/pij5_r5UkSE/s1600-h/IMG_1659.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer; width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/SZ-rzFYV9WI/AAAAAAAAAug/pij5_r5UkSE/s400/IMG_1659.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305147780171691362" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src="file:///C:/DOCUME~1/VIJENDER/LOCALS~1/Temp/moz-screenshot-1.jpg" alt="" /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-716188830642343450?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/716188830642343450/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=716188830642343450' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/716188830642343450'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/716188830642343450'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2009/02/blog-post_21.html' title='दिल्ली विश्वविद्यालय ; एक नज़र  यह भी'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/SZ-tnX2P9UI/AAAAAAAAAuw/aBHpHoDrq20/s72-c/IMG_1731.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-5350501152416087965</id><published>2009-02-17T07:25:00.001+05:30</published><updated>2009-02-17T10:33:00.640+05:30</updated><title type='text'>सही काम का सही नतीजा उर्फ मारे गए गुलफाम</title><content type='html'>&lt;p&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;कल अपने बेटे की वैल्यू ऎजुकेशन की नोटबुक से उसे परीक्षा की तैयारी कराते हुए मुझे पहली बार पता चला कि गांधी जी ,इंदिरा गांधी और अब्राहिम लिंकन के मारे जाने के क्या कारण थे ! इस जानकारी का उत्स बच्चे को नैतिक ज्ञान का एक पाठ-  राइट एंड रांग पढाते हुए हुआ ! इस पाठ में बताया गया था कि &lt;/p&gt;  &lt;ul&gt;   &lt;li&gt;&lt;strong&gt;जो बच्चा सही काम करता है गॉड उसे बहुत पसंद करते हैं ! &lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;    &lt;li&gt;&lt;strong&gt;सही काम करने के लिए करेज चाहिए ! &lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;    &lt;li&gt;&lt;strong&gt;गलत काम करने वाले से समाज और गॉड नाराज हो जाते हैं ! &lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;    &lt;li&gt;&lt;strong&gt;कोई भी कभी भी सही काम कर सकता है ! &lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;    &lt;li&gt;&lt;strong&gt;सही काम का सही अंजाम होता है ! &lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;    &lt;li&gt;&lt;strong&gt;सही काम करने के  लिए करेज चाहिए इसके कुछ उदाहरण दीजिए -&lt;/strong&gt; &lt;/li&gt; &lt;/ul&gt;  &lt;p&gt;    गांधी जी वॉज़ शॉटडेड&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;    इंदिरा गांधी वॉज़ ऑल्सो शॉट डेड &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;    अब्राहिम लिंकन वॉज़ मर्डरड &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वैल्यू या मॉरल ऎज्यूकेशन के नाम पर आठ नौ साल के बच्चे को परोसा गया यह माल भाषिक नैतिक शैक्षिक किस उद्देश्य की पूर्ति करता है ? एक बच्चे के लिए अच्छाई और बुराई की समाज निर्धारित परिभाषाओं को इस कुरूप  और भयावह तरीके से पेश करना बच्चे की मानसिकता संरचना के साथ की गई आपराधिक कोटि की छेडछाड नहीं तो और क्या है ?&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;ईश्वर , धर्म ,सही -गलत , विनम्रता ,सहिष्णुता के सबकों को पढाने के लिए स्कूलों के पास तो समय है न ही सामर्थ्य !  पढाई के घंटों अलग -अलग विषयों में बंटा टुकडा -टुकडा सा समय , एक ही कमरे में पैंतालीस -पचास बच्चे , बच्चों की भीड झेलते शिक्षक ...! सिस्टम ही ऎसा है किसको दोष दें ! ले दे के सारा दोष हम अपने ऊपर ही ले लेते हैं ! चूंकि हम एक असमर्थ ,मध्यवर्गीय अभिभावक हैं जो सिस्टम की आलोचना तो कर सकते हैं पर उसको बदल डालने की हिम्मत और हिमाकत नहीं कर सकते ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;एक हमारे सपूत हैं ! पक्के नास्तिक और शंकालु ! बेटे को भगवान और ड्रामाई बातों पर यकीन भी नहीं ,नंबर भी चाहिए ! नैतिक ज्ञान के अनूठे सवालों के हमारे द्वारा सुझाए जवाब भी नहीं वे लिख सकते क्योंकि मैडम की झाड पड सकती है !  नैतिकता की अवधारणाओं की रटंत से उकताया बच्चा सचमुच बडा निरीह जान पडता है ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;सही क्या है ये तो आजतक बडों की दुनिया तक में भी अनिर्णीत , परिस्थिति सापेक्ष और गडमगड है ! बच्चा ऎसे सही -गलत के निर्णय की दुविधा को कैसे पार कर पाऎगा !  वे "सही " काम एक बच्चा कैसे कर पाएगा जिनका अंजाम मौत होती हो ! घर देश समाज की नज़रों में उठने के लिए  और भगवान को प्यारे लगने के लिए नन्हे बच्चे को दिया गया यह  करेज घुले सदाचार का  पाठ तो बडे बडों को भी सदाचार से डराने वाला है ! बच्चे की रंगीन कल्पनाओं भरी दुनिया के ठीक कॉंट्रास्ट में हम ये क्या दुनिया पैदा कर रहे है ?&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मृत्यु और नैतिकता से इतनी सहजता और क्रूरता से साक्षात्कार करवाने स्कूलों को हमारा शत-शत नमन ! &lt;br /&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SZmrPu1-65I/AAAAAAAAAuQ/KG4a98nRbb4/s1600-h/image%5B3%5D.png"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SZmrPu1-65I/AAAAAAAAAuU/QULCDTsgJXo/s1600-h/image%5B5%5D.png"&gt;&lt;img title="image" style="border: 0px none ; display: inline;" alt="image" src="http://lh5.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SZmrnwtkgZI/AAAAAAAAAuc/eadCMiwNt7k/image_thumb%5B3%5D.png?imgmax=800" width="445" border="0" height="572" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SZmrPu1-65I/AAAAAAAAAuU/QULCDTsgJXo/s1600-h/image%5B5%5D.png"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SZmrPu1-65I/AAAAAAAAAuU/QULCDTsgJXo/s1600-h/image%5B5%5D.png"&gt; &lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-5350501152416087965?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/5350501152416087965/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=5350501152416087965' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5350501152416087965'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5350501152416087965'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2009/02/blog-post_17.html' title='सही काम का सही नतीजा उर्फ मारे गए गुलफाम'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SZmrnwtkgZI/AAAAAAAAAuc/eadCMiwNt7k/s72-c/image_thumb%5B3%5D.png?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-1763325112211199288</id><published>2009-02-13T06:41:00.000+05:30</published><updated>2009-02-13T06:41:00.397+05:30</updated><title type='text'>गुलाबी अंतर्वस्त्र आखिर किसको लजाएगा</title><content type='html'>&lt;p&gt;आज सुजाता ने अपनी &lt;a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2009/02/blog-post.html" target="_blank"&gt;पोस्ट&lt;/a&gt; में मोस्ट चर्चित पिंक चड्डी अभियान के बारे में बात करते हुए बहस का फोकस तय करने की बात की है ! कुछ समय पहले अंतर्वस्त्रों में सडक पर मार्च पास्ट करती &lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com/2007/07/blog-post_7899.html" target="_blank"&gt;पूजा का विद्रोह&lt;/a&gt; एक उद्धत बहस का कारण बन गया था !&amp;#160; देखकर लगा कि जब स्त्री विमर्श किताबों और बहसों की दुनिया से बाहर पैर फैलाता है तो वह डराता है ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;विद्वत समाजों में स्त्री की अस्मिता से जुडे सवालों पर सैद्धांतिक नजरिये से खूब बातें होती हैं ! स्त्री शोषित है यह भी मान लिया जाता है और उसके विक्टिमाइजेशन को रचनात्मकता के फोकस से देखकर उसे अलग अलग कला रूपों में भी ढाल लिया जाता है ! लेकिन स्त्री के पास अपने साथ हो रहे अन्याय के विरोध का क्या तरीका है इसपर&amp;#160; गोष्ठियां खुद को मूक पाती हैं ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मैं पेशे से प्राध्यापक हूं ! वक्तव्य सुनना सुनाना इस पेशे का ही एक हिस्सा है ! कई बार तीन या चार हफ्तों वाले रिफ्रेशर कोर्स किए हैं ! साहित्य,भाषा ,समाज संस्कृति, स्त्री और दलित विमर्श पर बहसों में शिरकत की है !&amp;#160; ऎसी गोष्ठियों में स्त्री विमर्श पर&amp;#160; बहस सुनी हैं ! यहां तक कि पिछ्ले साल विमेन स्टडीज पर हुए तीन हफ्ते के सम्मेलन में देश के विख्यात विद्वानों को सुना ! लेकिन उन स्त्री द्वारा विरोध के औजारों की पडताल और खोज पर चुप्पी दिखाई दी ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मर्दवादी देश में स्त्री की आत्मकथाएं उसकी सेक्सुअलिटी के उद्घाटन की पाठकीय समीक्षा में डूबती उतराती रह जाती हैं ! पूजा का विरोध सिनिकल या स्वयंसेवी संगठनों के द्वारा प्रायोजित लगता है ! मंग्लूर में पीटी गई लडकियों के हक में गुलाबी चड्डी अभियान में विरोध के कारण जायज और तरीके नाजायज लगने लगते हैं ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मुझे लगता है जिस समाज में पुरुषत्व बहुत् गहराई तक रचा बसा हुआ हो उस समाज को झंकझोरने के लिए अपनाए जाने तरीके सतही हों तो काम नहीं चलेगा ! जिस समाज में स्त्री -पुरुष की अवस्थिति बाइनरी ऑपोज़िट्स की तरह हो उस समाज में स्त्री और पुरुष द्वारा अपनाए गए विरोध के तरीके समान हों यह कैसे हो सकता है ! हाशिए पर खडी स्त्री विरोध के जमे जमाए औजारों को अपनाकर जड समाज में संवेदना पैदा नहीं कर पाएगी ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;हम साफ देख सकते हैं कि हमारे समाज में पुरुष बेहतर स्थिति में है और उसके पास स्त्री समाज की संवेदना को उदबोधित करने के लिए न तो कोई कारण हैं और न ही चड्डी पहनकर और मशाल लेकर सडक पर निकल पडने की ज़रूरत ही है ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;ब्रा बर्निंग आंदोलन की प्रतीकात्मकता के बरक्स गुलाबी चड्डी आंदोलन को देखें ! दोनों ही गैरबराबरी वाले समाज के अवचेतन को चोट पहुंचाने का काम करते हैं ! &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-1763325112211199288?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/1763325112211199288/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=1763325112211199288' title='31 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/1763325112211199288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/1763325112211199288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='गुलाबी अंतर्वस्त्र आखिर किसको लजाएगा'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>31</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-267723777814821573</id><published>2008-11-12T11:34:00.001+05:30</published><updated>2008-11-12T11:50:44.355+05:30</updated><title type='text'>काले हैवान और गोरे फरिश्ते</title><content type='html'>&lt;p&gt;मेरी बेटी स्कूल जा रही थी और एक गाना गुनगुना रही थी - नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए बाकी जो बचा था काले चोर ले गए ! बेटी ने अचानक गाना रोककर सवाल दागा - ये चोर काले क्यों , गोरे चोर क्यों नहीं ! सवाल औचक था , स्कूल की बस छूट जाने का भय था जवाब लंबे और मुश्किल थे सो मैंने बेटी से कह दिया की शाम को बात करॆंगे !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;भाषा ,संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता ( न्गुगी वा थ्योंगो ) पढते हुए नस्लभेद और रंगभेद की औपनिवेशिक विरासत पर तीखे सवाल मन में पैदा होते हैं&amp;#160; ! न्गुगी अपने लेखन में जातीय हीनता को पैदा करने वाली पोस्टकोलोनियल ताकतों&amp;#160; और प्रकियाओं पर बात करते हैं ! आज राजनितिक आजादी हासिल किए हुए हमें एक लंबा अरसा हो गया है पर आज भी हम मानसिक रूप से गुलाम हैं !&amp;#160; अंग्रेजियत और अंग्रेजी भाषा केछिपे हुए औजारों के ज़रिए हम गुलाम मानसिकता को&amp;#160; अपने बच्चों को सौंप रहे हैं ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;हम एक काली भूरी नस्ल की जाति हैं पर हमारा आदर्श है - सफेदी ! वाइट हाउस ,वाइट स्किन&amp;#160; ! बाकी सब काला है ब्लैक डे , ब्लैकलिस्ट , ब्लैक मार्किट !&amp;#160; सब नकारात्मक भावों के लिए कालापन एक सार्थक प्रतीक बनाए बैठे हैं हम !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;हमारी कहानियों में निन्म वर्ग ,गरीब ,अपराधी ,सर्वहारा काला ही होगा ! कालापन क्रूरता , असभ्यता , गरीबी , अज्ञानता और दुख का प्रतीक है ! हम हमेशा अपनी प्रार्थनाओं में अज्ञान की कालिमा से ज्ञान के उजालों की ओर जाने के गीत गाते आ रहे हैं ! मुंह पर कालिख पोतना - जैसी भाषिक अभिव्यक्तियों का इस्तेमाल करते रहे हैं ! किसी व्यक्ति खासकर किसी स्त्री का परिचय&amp;#160; बताते हुए हमारा पहला या दूसरा&amp;#160; परिचयात्मक जुमला रंग पर ही होता है -- &amp;quot;... आप लतिका को खोज रहे हैं अच्छा वही काली सी ठिगनी सी औरत ? &amp;quot; किसी आपराधिक दास्तान को हम&amp;#160; इतिहास के पन्नों पर काले अक्षरों में ही दर्ज करते हैं&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SRp1FM5rusI/AAAAAAAAAqI/xmWxVCFhN70/s1600-h/racism.png"&gt;&lt;img title="racism" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="244" alt="racism" src="http://lh3.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SRp1PJiATtI/AAAAAAAAAqM/tK4x-9XElWg/racism_thumb.png?imgmax=800" width="232" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;काले राक्षसों और गोरी परियों की कहानी सुनाने वाले हम अपने बच्चों को भाषा के संस्कारों के साथ ही&amp;#160; रंगभेद की विरासत भी दे डालते हैं ! हम सिखाते हैं कि काला रंग विकलांगता और गैरकाबिलियत का प्रतीक है ! यह एक प्रकार की बीमारी है जिसकी वजह से हीनता का अहसास होना चाहिए ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;सारे वैचारिक विमर्श एक तरफ .....! मैं खुश हूं कि मेरी 6 साल की बेटी अपने समाज परिवेश और सांस्कृतिक विरासत पर तीखे आलोचनात्मक सवाल उठा पा रही है ! आज शायद मैं उसे काली परियों की प्यारी सी कहानी भी सुनाउं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;चित्र के लिए आभार - &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a title="http://brotherpeacemaker.files.wordpress.com/2007/09/racism-on-cruise-control.jpg" href="http://brotherpeacemaker.files.wordpress.com/2007/09/racism-on-cruise-control.jpg"&gt;http://brotherpeacemaker.files.wordpress.com/2007/09/racism-on-cruise-control.jpg&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-267723777814821573?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/267723777814821573/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=267723777814821573' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/267723777814821573'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/267723777814821573'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/11/blog-post_12.html' title='काले हैवान और गोरे फरिश्ते'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh3.ggpht.com/_qCbfUYmeGWQ/SRp1PJiATtI/AAAAAAAAAqM/tK4x-9XElWg/s72-c/racism_thumb.png?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-93602369740486668</id><published>2008-11-08T13:36:00.003+05:30</published><updated>2008-11-08T15:13:07.027+05:30</updated><title type='text'>यार ! बेकार ही कार खरीदी</title><content type='html'>&lt;p&gt;हाल ही में हमने एक लाल प्यारी सी कार खरीदी है ! हर मध्य वर्गीय का - एक घर एक कार वाला सपना होता है ! कार हमारे लिए एक बडा सपना थी ! सपना पूरा हुआ ! हम खुश थे ! इस कार से हम कई दुर्गम पर्वतीय स्थानों पर घूमघामकर आए! कार ने हर जगह हमारा साथ दिया !नई कार हमारी हाउसिंग सोसायटी की अनेकों कारों की लाइन में पार्क की गई !पर जैसे ससुराल में नई दुल्हन की और कॉलेज में फ्स्ट ईयर के छात्र की रैगिंग होती है वैसे ही इस कार की भी खूब रैगिंग हुई !नई चमकती हुई कार हर सुबह कहीं न कहीं से खरोंची हुई मिलती !   &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;   &lt;br /&gt;हमारा घर तीसरी मंज़िल पर है सो कार जब भी पार्क होती किसी ग्राउंफ्लोर वाले घर के आगे ही पार्क करनी होती !यूं तो सोसायटी की सडकों पर सबका बराबर हक है पर ग्राउंडप्लोरवासी अपने घर के बाहर की जमीन पर किसी भी पराई कार को देखकर वैसे ही बिदक जाते जैसे मध्यवर्गीय घरों के पिता अपनी बेटी के क्लास के लडके का फोन आने से असहज हो जाते हैं !चूंकि आजकल जमाना शरीफाई का है सो कोई भी जमीनी फ्लैटवाला मुंह से कुछ नहीं कहता है ! वह रात के अंधेरे में चुपचाप उठता है और कार पर चाभी ,चाकू या पत्थय के टुकडे से सौहार्द की डेढी मेढी लकीरें खींच देता है ! आप सुबह उठते हैं और अपनी नई किस्तों वाली कार पर ऎसी साइन लैंग्वेज देखकर चुपचाप अपनी कार वहां से हटा लेते हैं !    &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;जब से बेकार से हम कार वाले हुए हमें गरीबी ,आतंकवाद,असमानता जैसी राष्ट्रीय समस्याओं में एक समस्या और जोडने का मन कर रहा है - शहर में घरों के बाहर खडी असुरक्षित कारों की बढती समस्या !आप हंसेंगे अगर आपने आपके पैरों में यह बिवाई नहीं फटी होगी ! पर समस्या वाजिब है !अब अगर नैनों आ गई और एक लाख रुपल्ली की कारों की बाढ से सडकों पार्किंग स्थलों की कमी पडेगी तो कारों पर निशानदेही छोडने वाले लोगों को खुल्लमखुल्ला बदमाशी करनी पड जाएगी !ठीक वैसे ही जैसे हमारी सोसायटी के एक भद्र आदमी को करनी पडी !उन्होंने अपने घर के आगे वाली जमीन खुद ही अपनी कार के नाम की हुई थी और वे चाह रहे थे कि यह संदेश आसपास के कार वालों के पास सहजबुद्धि से पहुंच जाना चाहिए ! पर कई कार मालिक इस सहज संदेश को पाने की योग्यता नहीं रखते थे सो उन्होंने अपनी कार वहां पार्क कर दी थी !जब वह भद्र आदमी घर लौटा तो उसे अपने घर के आगे पराई कार पार्क देखकर एक गमला उठाकर उस कार का शीशा तोडना पडा ! चूंकि वे भद्र आदमी थे इसलिए उन्होंने टूटे शीशे के पैसे कार मालिक को चुकाए ! अगली सुबह सब पडोसियों को अपनी कार वहां न खडी करने संबंधी संदेश मिल चुका था !    &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;   &lt;br /&gt;चूंकि भारत में मुफ्त सलाह दिए जाने की पुरानी संस्कृति रही है सो हमें भी सलाह मांगने न कहीं जाना पडा न कोई खर्चा हुआ ! हमें कार कवर खरीद लेने , सोसायटी के नो मेंस ज़ोनों  की तलाश कर वहीं कार पार्क करने , बच्चों की छोटी बडी कबाडा साइकिलों को इकट्ठाकर उनपर एक गीला तौलिया सुखाकर छोड देने के जरिए पार्किंग की जमीन पर कब्जा घोषित करने ,सोसायटी के गेट के बाहर कार लगाने जैसे कई ऎडवाइज़ मिले ! और तो और स्क्रेच लगी पुरानी गाडियों के मालिकों ने इस सत्य को निगल लेने की सलाह भी दी कि दिल्ली में तो गाडियां स्क्रेचलेस हो ही नहीं सकती !हमारी ही सोसायटी क्यों हर जगह का यही हाल है ! नए पे कमिशन में पी बी -4 की तंखवाह की खबर पाकर हमारे कई साथियों ने कार खरीदी थी ! आज हमारे दुख में वे ही हमारे सच्चे साथी साबित हो रहे हैं ! किसकी कार को कहां से खरोंचा गया औरै उसके प्रतिरोध ने किसने कितनी बार चुप्पी लगाई और कितनी बार सडक पर खडे होकर अनाम स्क्रेचकारी को जी भर कोसा हमारी बातचीत में अक्सर ये चर्चाए भी उठ जाती हैं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;  &lt;br /&gt;हमारी भी आंखें खुलीं हमने देखा कि वाकई कार लेने से हमें कितने बडे सामाजिक सत्य के बारे में पता चला है ! कार न ली होती तो हमें कैसे पता चलता कि समाज में आज भी कितनी असहनशीलता है ,कितनी प्रतिद्वंद्विता है ,कितनी असमानता है और कितना उत्पीडन है ! घर की दहलीज के बाहर जब कार का ये हाल है तो हमारी अकेली बेटियां कितनी असुरक्षित होंगी ! हम आसानी से समझ पाते हैं कि क्यों एक कवि कह गए थे &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;   &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;   &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं / शहर में रहना भी तुम्हें नहीं आया /फिर कहां से सीखा डसना /विष कहां पाया ?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;    &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;   &lt;br /&gt;आज एक और कवि पंक्तियां भी याद आ रही हैं -    &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;कितने रिक्शे,कितनी गाडियां ,कितनी सडकें कितने लोग / हे राम ! / हे रावण !       &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;   &lt;br /&gt;आज किस्तों वाली गाडी पर पडते स्क्रेचों से हम उतने उदास नहीं होते जितने पहले होते थे ! वो क्या है न हर मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवी के पास दुखों के उदात्तीकरण वाली एक तरकीब होती है ! बस ठीक वही हमने भी अपना ली है ! साथ ही हम कार के जिस्म पर खरोंचों को समाज रूपी बुढऊ के शरीर की खरोंचों के रूप में देख रहे हैं !&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-93602369740486668?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/93602369740486668/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=93602369740486668' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/93602369740486668'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/93602369740486668'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='यार ! बेकार ही कार खरीदी'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-2562161003921534311</id><published>2008-10-16T11:10:00.005+05:30</published><updated>2008-10-16T12:49:08.140+05:30</updated><title type='text'>हैप्पी करवा चौथ टू ऑल द आइडियल वाइव्स</title><content type='html'>करवा चौथ का दिन हमारे देश की पत्नियों के सौभाग्य को बढाने वाला दिन है ! चूडी ,बिंदी ,सिंदूर ,निर्जल निराहार व्रत - उपवास चांद की पूजा - माने हैप्पी करवा चौथ ! जो पत्नियां अपने पति की जान की कीमत समझती हैं उन्हें प्यार करती हैं ,उनके दिल की एकमात्र रानी बनकर रहना चाहती हैं , दूसरी औरत के साये से आपने पति को बचाकर रखना चाहती हैं वे निश्चय ही करवा चौथ के व्रत रखती हैं ! कम से कम इस व्रत की विविध वर्जनों वाली तमाम कथाऎ तो यही कहती हैं ! बाकी अगर आप किसी इस व्रत को रखने वाली पढी लिखी महिला से उसके व्रत का मकसद पूछेंगे तो हो सकता है कि वह इस व्रत के कोई सांस्कृतिक कारण गिनाए या भारतीय परंपरा की बात करे !  किसी आम औरत से पूछिए -उसका घर ,बच्चे ,मान सम्मान ,धन - वैभव ,सामाजिक रुतबा सब पति से है ,सो इतने कीमती पति की जान की सलामती के लिए करवा चौथ का व्रत रखकर एक दिन कष्ट सहना उनके पत्नी धर्म का सबसे बडा कर्तव्य है !&lt;br /&gt;इस दिन मेरी मां और मेरी सास कॉलेज की हिंदू सहकर्मी सबके पास अपने व्रत की कठिन साधना को निभाने के साथ साथ एक और जरुरी काम होता है -मुझसे एक बार फिर इस व्रत को न रखने का कारन जानना और इस व्रत के सामाजिक ,नैतिक ,सांस्कृतिक औचित्य पर मुझसे बहस करना ! पूरी कालोनी की चमकीली साडियों ,मेहंदी सजे हाथों वाली औरतों के लिए सादे कपडों में बिना साज सज्जा वाली नीलिमा को वे - हंसी ,दया ,नसीहत देने की जरुरत वाले भावों से देखती हैं !&lt;br /&gt;करवा चौथ की कथा मुझे हमेशा से बडी डरावनी लगती है ! जिसे सुनकर लगता है एकता कपूर के सारे सीरियलों में स्त्री पुरुष का आदिम संबंध बडी रिऎलिटी के साथ दिखाया गया है और एकता को गलियाने की बजाए उसके प्रति उदार भाव पैदा होने लगते हैं ! ये व्रत भारतीय बीवियों के मन में बैठे डरों का विरेचन करता है ! पति के मरने , पति के द्वारा प्यार न मिलने , उसे दूसरी औरत द्वारा रिझा लिए जाने ,गरीबी के हमले आदि आदि अनेक आपदाओं का ऑल इन वन इलाज !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये आदिम औरत मर्द संबंध करवा चौथ के व्रत की हर कथा की केन्द्रीय संवेदना हैं ! ये हर औरत को डराकर उसे उसकी जगह पर रखने की साजिश है ! पति ही प्रभु है ! उसका जीवन और कृपा -दृष्टि न रहे तो जीवन क्या खत्म है ! रखो व्रत और बनी रहो सौभाग्यवती सदा सदा के लिए ! इट एज़ रियली अफोर्डेबल नो ? एक कहानी सुनिए न शार्ट में -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;......एक रानी थी सात भाइयों की बहन और एक राजा था ! राजा जंगल में शिकार पर गया जहां उसके शरीर में कई सुइयां चुभ गईं और वह रास्ता भी भटक गया ! रानी की दासी " गोली" ने उसे करवा चौथ के व्रत की महिमा के बारे में बताया और यह भी बताया कि उसकी और उसके पति की दशा इस व्रत को न रखने के कारन ही हुई है ! रानी आने वाला करवा चौथ का व्रत रखती है पर व्रत के सारे नियमों का पालन नहीं करती है ! पति व्रत के दिन ही घर लौट आता है ! व्रती रानी राजा के शरीर से सुइयां निकालती जाती है किंतु आखिरी सुई के निकालने तक रानी की आंख लग जाती है ! उसकी दासी चीटिंग करती है और आखिरी सुई खुद निकाल देती है ! राजा की खोई चेतना लौट आती है और वह दासी को रानी समझ बैठते हैं ! रानी ने व्रत का सच्ची भावना से पालन न किया सो उसे दंड मिला !-.. जो राणी सी ओ गोली बण गई ...अगले साल रिपेंट करती रानी ने पूरी आस्था और नियमों का पालन करते हुए व्रत रखा ! राजा की भ्रष्ट हो गई बुद्धि ठीक ठाक हो गई ! और जो राणी बण गई सी ओ गोली बन गई ....गोली बण गई राणी ..!&lt;br /&gt;सो जैसे उस असली रानी के दिन फिरे वैसे ही इस व्रत की सभी धारिकाओं के भी फिरें !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-2562161003921534311?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/2562161003921534311/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=2562161003921534311' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2562161003921534311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2562161003921534311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='हैप्पी करवा चौथ टू ऑल द आइडियल वाइव्स'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-8049749393831278889</id><published>2008-09-17T18:25:00.001+05:30</published><updated>2008-09-17T18:25:23.058+05:30</updated><title type='text'>डार से बिछुडे हम</title><content type='html'>&lt;p&gt;मुझे अपने हाथ पर उनका स्पर्श शायद कभी नहीं भूलेगा ! उम्र के ढलते पडाव पर पहुंची उस स्त्री को सहारा चाहिए था ! किसी अनजान चेहरे पर भी अपनापन खोजती उनकी आंखें दुनिया की रफ्तार और अपने शरीर की जर्जरता से ठिठकी सी थीं ! अपने ही घर के आगे की सडक उनके लिए नई ,तेज और बेफिक्र थी जिसे पार कर उन्हें ठीक सामने कुछ कदम की दूरी पर बनी इमारत के गेट तक जाना था ! जब मुझे रोकर उन्होंने पूछा - &amp;quot; बेटा क्या तुम्हारे पास दो मिनट का वक्त है मुझे बहुत ज़रूरी काम से सामने के गेट तक जाना है ?&amp;quot;&amp;#160; मुझे पहली बार अहसास हुआ कि भागती दौडती जिंदगी को अपने सामने देखकर इस जर्जर होती उम्र को कैसा अहसास होता होगा ! हर मिनट की वसूली कर लेने वाली नई पीढी के वक्त की अहमियत के आगे खुद को व्यर्थ और भार समान मानने वाली बडी पीढी किस बूते जीती रह पाती होगी ? मैं उन वृद्धा के साथ चलती हुई भूल गई थी कि तेज कदमों से हांफती हुई मैं किस काम से जा रही थी ! झुकी पीठ से धीरे-धीरे चलती हुईं , आंखों में स्नेह भरे वे कह रही थीं --बेटा जुग जुग जियो , जो भी काम करो ईश्वर तुम्हें उसमें सफलता दे , सदा खुश रहो बच्ची ...&amp;quot;&amp;#160; ! उन वृद्धा के हाथ को पकडे और उनके मुख से निकलने वाले आशीर्वचनों को सुनते हुए एक पल को लगा था कि जैसे मैंने उनका नहीं उन्होंने मेरा हाथ थामा हुआ है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मुझे अचानक याद आई वो झडपें जो मेट्रोरेल के सफर में अक्सर हो जातीं हैं ! हट्टे कट्टे नौजवान ,कान में मोबाइल का हेड फोन लगाकर फिल्मी गानों की धुन पर पैर थिरकाते ,च्विंगम चबाते सामने खडे बेहद वृद्ध व्यक्ति को अनदेखा कर 'केवल वृद्धों के लिए' आरक्षित सीटों पर जमे रहते हैं ! उनसे वृद्धों को सीट देने की गुज़ारिश करने का अर्थ होता है &amp;quot; मैडम आपको क्या परेशानी है &amp;quot; सुनने के लिए तैयार रहना ! मैं प्रतिदिन डेढ घंटे का मेट्रो सफर करती हूं पर कभी किसी वृद्ध को अपने लिए सीट मांगते नहीं देखा ! शायद सामाजिक जीवन में संवेदनशीलता की कमी का अहसास उन्हॆं है और शायद वे सम्मान से जीना चाहते हैं ! पर जब कभी कोई यात्री अपनी सीट छोडकर उन्हें बैठने को कहता है तो उस समय उनके चेहरे पर सहूलियत की खुशी से ज़्यादा इस बात की राहत होती है कि जीवन और जगत में अभी भी इंसानियत बची है और उनके मुख से सीट छोडकर उठ जाने वाले व्यक्ति के लिए आशीर्वचन निकलने लगते हैं ! पर खुद बखुद सीट छोड देने वाले संवेदनशील यात्री बहुत कम मिलते हैं ! मेरे एक परिचित भी कभी -कभी मेरे साथ यात्रा करते हैं ! एक बार उन्होंने अपनी सामाजिक व्यवहार कुशलता की डींग हांकते बताया कि मेट्रो में सीट मिलते ही वे आंखें बंद करके पीछे की दीवार से सिर टिकाकर बैठ जाते हैं और अपने स्टेशन के आने पर ही आंख खोलते हैं जिससे सीट छोडने की नौबत ही नहीं आती ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;आज का वक्त किसी के लिए भी रहमदिल नहीं है ! अगर हम तेज़ रफ्तार ज़िंदगी के साथ भाग नहीं सकते तो अपने लिए जीवन के साधन नहीं जुटा पाऎंगे ! महंगाई की मार, ट्रेफिक की मार ,बॉस की मार और नए नए सुख साधनों की बाढ से उमडे बाज़ार की मार ! इच्छा ,लोभ ,लाभ ,मोह स्वार्थ के लफडों की भरमार ! अपने जीवन को जैसे-तैसे मैनेज करता व्यक्ति अपनी ऊर्जा का एक एक कतरा प्रयोजनवाद के दर्शन से खर्च करना चाह्ता है ! ऎसे माहौल को हतप्रभ देखती वृद्ध पीढी की ओर देखने का वक्त किसी के पास नहीं ! मैं सोच रही थी ऎसे में सुबह के साढे सात बजे किसी युवा व्यक्ति से दो मिनट की सहायता मांगना किसी वृद्ध के लिए कितना हिचक भरा हो सकता है ! पर सडक पार जाकर लौट आने में सहायता करने के लिए उन वृद्धा का हाथ पकडकर चलना मेरे लिए वक्त की मार से उबरने का एक मौका था ! वे बहुत आत्मीयता और प्रेम से अपने दिल की बात कह रही थीं - ' इस बुढापे में अब मौत से बिल्कुल डर नहीं लगता ! डर लगता है इस ज़िंदगी से ! घर में तो मैं चल लेती हूं पर बाहर निकलती हूं तो टांगें कांपती हैं ,इसलिए मैं घर से निकलती ही नहीं.... &amp;quot;! ईश्वर धर्म और आस्था के सहारे मृत्यु का इंतज़ार ही क्या हमारे बुज़ुर्गों के लिए बच गया काम है ? शायद सामाजिक जीवन में भागीदारी में बुजुर्गों के आत्मविश्वास को उनके प्रति हमारी उपेक्षा ने ही पैदा किया है ! अभी पिछ्ले दिनों सुना कि पडोस के एक स्कूल में &lt;i&gt;ग्रैंड-पेरेंट्स डे&lt;/i&gt; मनाया जाता है जिसमें बच्चे को अपने दादा-दादी और नाना नानी को स्कूल लाना होता है ! अच्छा लगा कि संरचनाओं के किसी कोने में तो पीढियों में संवाद कायम रखने की फिक्र बची है ! उत्सव के दिन ही सही दादा-दादी का महत्व अपने पोते पोतियों को स्कूल बस तक छोडकर आने से अधिक माना गया है ! पर हम साफ देख सकते हैं कि प्रेमचंद की 'बूढी काकी' का सीमांत अस्तित्व आज शायद और अधिक सीमा पर धकेल दिया गया है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बाहर की यह आपाधापी कितनी त्रासद ,कितनी निर्दय और कितनी चुनौती भरी है इसका अंदाजा उस वृद्ध स्त्री और उन तमाम वृद्ध जनों की आंखों में पढा जा सकता था जिनसे मैं अपने रोजमर्रा के सफर पर मिली हूं ! जो घर ,गलियां ,शहर और देश यौवन में उनके अपने थे आज वक्त की तेज़ रफ्तार में उनके हाथ से छिटककर उनकी पकड से बहुत दूर निकल गए हैं ! केन्द्र में सजधज है हाशियों पर अंधेरा है ! गलियों, बाजारों और मीडिया में उमडते यौवन का आक्रामक रूप अपनी जडों के प्रति पूरी तरह उदासीन दिखाई देता है ! पीढियों के बीच बढती संवादहीनता हमारे अतीत और जडों को सुखा रही है !! अपनी वृद्ध पीढी के प्रति हमारा यह रवैया बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब विद्यालयों में बच्चे &amp;quot;वृद्धों की उपयोगिता&amp;quot; पर निबंध लिख रहे होंगे ! &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-8049749393831278889?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/8049749393831278889/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=8049749393831278889' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8049749393831278889'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8049749393831278889'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/09/blog-post_17.html' title='डार से बिछुडे हम'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-7874195403349931488</id><published>2008-09-12T17:08:00.001+05:30</published><updated>2008-09-12T17:19:26.903+05:30</updated><title type='text'>ब्यूटी पार्लर में सहमी बेटी</title><content type='html'>&lt;p&gt;वह क्या मजबूरी हो सकती है जिसके चलते एक बारह साल की बच्ची ब्यूटी पार्लर में खडी किसी भयानक दर्द और द्वंद्व से जूझ रही थी ! उसकी मां और पार्लर की आंटियां उस बच्ची को अपने डर पर काबू पाना सिखा रहे थे ! बच्ची की मां उसे बार बार एक ही बात कह रही थी ' बांह के ये बाल बुरे लगते हैं वैक्सिंग करवानी ही पडेगी ..देख तेरी मामी भी डांटेगीं कि फिर बिना करवाए आ गई तू ..' ! बच्ची कहती जा रही थी कि नहीं बहुत दर्द होगा ..मुझे नहीं करवाना ..ऎसे ही ठीक है ...बाद में करवा लूंगी...! आंटियां और उसकी मां जिन आद्य वचनों के सहारे&amp;#160; बेटी को दर्द की ओर धकेल रही थीं&amp;#160; उनका समाजशास्रीय विवेचन करना कितना त्रासद होगा यह तो मुझे बाद में ही पता चला उस वक्त तो मैं वहां केवल उस बच्ची की पीडा की एक मूक दर्शक और पार्लर की एक ग्राहक मात्र थी !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बारह साल की उस बच्ची की मां अपने चेहरे पर चीनी की चिपचिपी पट्टी को कपडे की झालर से खिंचवाती हुई कह रही थी 'देख हम भी तो करवाते हैं एक बार ही तो दर्द होता है सह ले वरना सब तेरा मजाक उडाते रहेंगे !...देख टी-शर्ट की बाहों में से अंडरआर्म के बाल दिखते कितने बुरे लगते हैं ..!&amp;quot;उस समय वहां खडी स्त्रियां बच्ची को ठीक वैसे ही उकसा रही थीं जैसे प्रसव के समय &lt;a href="http://vadsamvad.blogspot.com/2007/08/blog-post_11.html"&gt;ज़ोर लगाने के लिए&lt;/a&gt; उकसावा देती औरतों का झुंड प्रसवशीला को घेर लेता है ! ये दर्द तो सहना ही होगा देख आगे पता नहीं कितने दर्द सहने होते हैं लडकी को ! ये दर्द तो कुछ भी नहीं ..सुंदर बनकर रहेगी तो सब आंखों पर बैठाऎंगे .....&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;   &lt;br /&gt;जैसे कोई बकरी घेर ली गई हो ...जैसे उसे कहा जा रहा हो अच्छा होगा जितनी जल्दी तुम जान लोगी औरत होने की पीडा ! वो बच्ची दीवार से सटकर खडी थी जैसे कह रही हो इस बार छोड दो ..अगली बार मैं मन को कडा करके आ जाउंगी ..अभी कुछ दिन और मुझे जैसी हूं वैसी ही रहने दो..हां मैंने पढी थीं उसकी आंखें ...यही तो कह रही थी वो..!&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मुझे दर्द से बिलबिलाती पडोस की बच्ची की चीखे याद हैं जिसके कानों में फेरी वाले से सुराख करवाने पूरी गली की औरतें इकट्ठा हो गई थीं ! तब मैं पांच साल की बच्ची थी और खुश हो रही थी कि वाह मेरे तो कानों में तब से सूराख है जब मैं बहुत छोटी थी इतनी छोटी कि वह दर्द भी मुझे याद नहीं ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मैं उस स्त्री समाज का हिस्सा हूं जहां सुन्दरता, मातृत्व, स्त्रीत्व पत्नीत्व जैसे आदर्श दर्द से शुरू होकर दर्द पर ही खत्म होते हैं ! जहां नन्ही नन्हीं बच्चियों की पीडा से नातेदारी करवाकर हम उन्हें सुखी रहने के नायाब मंत्र सिखा रहे हैं ! मुझे उस बच्ची का दर्द को झेलने की कल्पना मात्र से सहमा हुआ चेहरा तब भी बहुत डरा रहा था और मैं शायद कहना चाहकर भी उसकी मां से नहीं कह पा रही थी..' इस बिटिया को छोड दो ये अपने फैसले खुद ले लेगी उसके बचपन को ऎसे आतंक के साये में क्यों कुम्हला रही हो ...&amp;quot; ! वह बच्ची विरोध में सिर्फ गर्दन हिला पा रही थी वह सोच रही होगी कि भाई तो बाहर फुटबाल खेल रहा होगा और मैं यहां आ खडी हूं या कि मैं लडकी क्यों हुई...या शायद कुछ और .. उसका क्या हुआ यह जानने के लिए मैं वहां ज़्यादा रुकी नहीं ..रुक पाई भी नहीं ....!   &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-7874195403349931488?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/7874195403349931488/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=7874195403349931488' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7874195403349931488'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7874195403349931488'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='ब्यूटी पार्लर में सहमी बेटी'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3624953488273799500</id><published>2008-08-18T12:14:00.001+05:30</published><updated>2008-08-18T12:18:21.788+05:30</updated><title type='text'>औरत होने की सज़ा क्या है ?</title><content type='html'>&lt;p&gt;मोहल्ले की कई औरतें मुझे गद्दार कहेंगी ! मेरे पास उनकी ज़िंदगी के कई राज हैं जिन पर मैं भविष्य में कहानियां और लेख लिख सकती हूं ! पास पडोस की औरतों के कई राज कई दुखडे और कई अफसाने मेरे पास जमा हो गए हैं ! जब भी किसी परिचित स्त्री से सुकून और ऎसे या वैसे जुटाई गई फुरसत के लम्हों में बात होने लगती है मुझे स्त्री विमर्श का नया मुद्दा मिल जाता है और उन स्त्रियों से छिपाकर मैं उनकी जिंदगी के राज बटोर लाती हूं ! पर शायद सच्चे अफसानों से सच्ची कहानियां गढना सबसे मुश्किल काम है ! बहरहाल आपके सामने कच्चा माल ही हाज़िर है ......&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;किट्टो की मम्मी ,तीन लडकियों की मां दो बार ऎबार्शन करवा चुकीं हैं ! उनके परिवार वालों को लडका चाहिए और किट्टो की मम्मी को चाहिए सुकून और इज्जत !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;सुनीता अपने पति से दो साल बडी है ! उसे अपने पति और उसके घर वालों से यह बात ताउम्र छिपाकर रखनी है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;35 नं वाली भाभी जी ने चुपके से मल्टी लोड लगवा लिया है ! सास और पति दूसरा बच्चा चाहते हैं जबकि भाभीजी के लिए ज़ॉब के साथ द्सरा बच्चा पैदा करना और संभालना बहुत बडी आफत का काम होगा ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मेरी एक मित्र जो कि दिल्ली के एक कॉलेज में प्रवक्ता हैं! स्त्री विमर्श जैसे विषय पर उनका डॉक्टरेट है ,स्त्री-स्वातंत्र्य की कहानियां और कविताऎं भी प्रकाशित होती रहती हैं ! लेकिन अपने पति से छिपाकर उन्हें अपनी विधवा मां की आर्थिक सहायता करनी होती है ! उनका मानना है क्रांति के चक्कर में उनका घर कई बार बर्बाद होते होते बचा है और फिलहाल अपने बच्चे के बडे हो जाने तक वे कोई क्लेश नहीं अफोर्ड नहीं कर सकतीं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मिसेज आरती अपने पति के लंपटपने से परेशान हैं ! पति का पान चबाते रहना , बच्चों की पढाई और परवरिश से कोई वास्ता न रखना ,पत्नी को केवल शरीर मानना - जैसी कई बातों से आहत हैं वे ! दसवीं पास पति की&amp;#160; ग्रेजुएट पत्नी के रूप में उन्हें हर रात की यही धमकी सुननी होती है कि वे &amp;quot;कहीं और जाकर मुंह मार लेंग़े &amp;quot; ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;... ऎसी कई कहानियां हैं ! झूठ और दुराव की नींव पर टिके रिश्ते ढोती कई औरतें हैं ! प्यार और संवेदना की जगह भ्रम की पोपली ज़मीन पर पता नहीं ये नाते कब तक टिके रह सकते हैं ! पर स्त्री अपनी ओर से उन्हें टिकाए रखने के प्रयास में रोज खुद से और परिवार तथा समाज से कई राज छिपाती जी रही है ! परिवार को अपनी धुरी मानकर उसके ही खिलाफ क्रांति का दुस्वप्न देख्नना उन्हें सबसे बडा पाप लगता है ! वे शायद आस्थावादी होती हैं इसलिए तत्क्षण की एक छोटे से लक्ष्य वाली क्रांति से अपना संभावित सुखी भविष्य नहीं उजाडना चाहतीं ! नकली सुख का असली नाटक करती स्त्री को परिवार इतनी पवित्र और ज़रूरी&amp;#160; संस्था लगता है कि जिसको वह अपने &amp;quot; छोटे से स्वार्थ &amp;quot; के लिए नष्ट होते नहीं देख सकती !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;प्रेम .विवाह ,रिश्ते और परिवार उससे कितना मांगते हैं और उसे कितना देते हैं - यह सोचने का वक्त और माहौल उसके पास है भी क्या ? अपनी ज़रूरत अपनी इज्जत और अपना अस्तित्व मैनेज करने में जाया जाती अपनी ज़िंदगी का मूल्य जान पाऎगी वह ?&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3624953488273799500?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3624953488273799500/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3624953488273799500' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3624953488273799500'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3624953488273799500'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='औरत होने की सज़ा क्या है ?'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-9121391514850708007</id><published>2008-07-17T11:44:00.001+05:30</published><updated>2008-07-17T11:55:35.281+05:30</updated><title type='text'>जेंडर इनइक्वैलिटी - डोंट हाइड विहाइंड साइंस</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://gendifhindi.blogspot.com//"&gt;ab inconvenienti&lt;/a&gt;&amp;#160; ने विज्ञान की लाठी से स्त्रीवाद के कई अहम सवालों को एकसाथ भांज कर रख दिया है !सुजाता ने &lt;a href="http://http://sandoftheeye.blogspot.com/"&gt;चोखेर बाली&lt;/a&gt; में इन मान्याताओं का खंडन करते हुए मजबूत तर्क दिया है ! जिन भिन्नाताओं को वे जेंडर आधारित साबित कर रहे हैं वे शुद्धत: विज्ञान आधारित हैं और नारीवाद का कोई भला नहीं करतीं ! कई वैज्ञानिक तथ्यों की दलील उन्होंने दी है ! इन तथ्यों से निकलने वाले नतीजे स्त्री की मौजूदा हालत को स्बाभाविक सिद्ध करते हैं !स्त्री के स्त्रीत्व और पुरुष के पुरुषत्व को जस्टीफाइड और नैचुरल मानते हुए ab inconviventi लिखते हैं -&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;em&gt;&amp;quot;तो भी या सीधा सा सच सामने है:&amp;#160;&amp;#160; पुरूष होना और स्त्री होना यानि मानव संरचना का अलग पुर्जा होना है, अदला बदली कम से कम मानव द्वारा तो मुश्किल है&lt;/em&gt;.'&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;दरअसल ab inconvenienti&amp;#160;&amp;#160; की दलीलें स्त्रीवाद के सामाजिक संघर्ष को वैज्ञानिक प्रमाणों से निरुत्तर करने का प्रयास हैं पर उनकी इस मान्याता से कई भ्रम पैदा होते हैं और कई सामाजिक शोषण की परंपराओं के पैटर्न सही सिद्ध हो जाते हैं -----&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;जॆंडर की अवधारणा सामाजिक है ! आप वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर इस सामाजिक अवधारणा के साथ घपला नहीं कर सकते !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;नारीवाद सेक्सुऎलिटी की अदला बदली या संक्रमण की कामना नहीं है ! जैसा कि आप मान रहे हैं ! नारीवाद अवसरों और अधिकारों की समान रूप से ऎक्सेसिबिलिटी का संघर्ष है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;स्त्रीवाद स्त्री पुरुष की जड भूमिकाओं में फ्लेक्सिबिलिटी की बात करता है ! आप विज्ञान द्वारा इन भूमिकाओं को और अधिक जड सिद्ध कर रहे हैं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;ममता वर्सेस आक्रामकता , शक्ति वर्सेस कोमलता जैसे &lt;a href="http://http://sandoftheeye.blogspot.com/search?q=%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%82+%E0%A4%95%E0%A5%8B+%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6"&gt;समाजीकरण के फंदों&lt;/a&gt; से स्त्री पुरुष दोनों की मुक्ति ज़रुरी है न कि विज्ञान के सहारे इन्हें और मजबूत नहीं किया जाना चाहिए !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;लिंग आधारित भूमिकाओं को समाज का आधार बानाना लिंग आधारित शोषण को जस्टीफाई करना ही है ! स्त्री की शारीरिक क्षमता को पुरुष से कम आंकने के पीछे विज्ञान का आश्रय लेना यौन हिंसा और घरेलू हिंसा के आधारों को स्वाभाविक मानना है ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;दरअसल स्त्रीवादी आंदोलन को सिर्फ और सिर्फ सामाजिक आधारों पर ही समझा जा सकता है ! आप जेंडर जस्टिस के लिए विज्ञान की&amp;#160; गोद में जाकर स्त्री का ही नहीं पुरुष का भी अहित करेंगे ! विज्ञान मनुष्य को शरीर मात्र मानता है उसके लिए तो खेल कोशिकाओं और रसायनों का है ! लेकिन सामाजिक शोषण और विभेदों की कोई व्याख्या विज्ञान नहीं कर सकता ! समाज की अलग अलग सीढियों पर खडे स्त्री और पुरुष को अलग मकसदों से बनाए गए कलपुर्जे मानना सामाजिक असमानता को स्वाभाविक मानना नहीं तो और क्या है ?&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;.....और.अंत में ... स्त्री और पुरुष में सिर्फ गर्भाशय का अंतर है और कोई अंतर नहीं है&amp;#160; !&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-9121391514850708007?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/9121391514850708007/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=9121391514850708007' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/9121391514850708007'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/9121391514850708007'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/07/blog-post_17.html' title='जेंडर इनइक्वैलिटी - डोंट हाइड विहाइंड साइंस'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-8209900698776733592</id><published>2008-07-10T17:02:00.001+05:30</published><updated>2008-07-10T17:02:25.860+05:30</updated><title type='text'>आप अपने ऑफिस में बलात्कार करते हैं या सुहागरात मनाते हैं ?</title><content type='html'>&lt;p&gt;समाजवादी पार्टी के जनरल सेक्रेटेरी अमर सिंह कई मायनों में जानी मानी हस्ती हैं ! आज के बाद उनको जिस &lt;a href="http://www.thaindian.com/newsportal/politics/apology-demanded-from-amar-singh-for-sexist-remarks_10069651.html"&gt;एक अन्य जरूरी कारण&lt;/a&gt;&amp;#160; से जाना जाएगा वह है सामाजिक जीवन में स्त्री के लिए उनके मन में बसने वाला सम्मान भाव !&amp;#160; एक औपचारिक बातचीत में उन्होंने कांग्रेस पार्टी की लीडर सोनिया गांधी से हुई रजनीतिक मुलाकात के लिए &amp;quot;सुहागरात &amp;quot; और &amp;quot;बलात्कार&amp;quot; जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया ! कई स्त्री -संगठनों ने इसपर आपत्ति व्यक्त की है और अमर सिंह से उनके इस मासूस शाब्दिक प्रतीक के इस्तेमाल के एवज में सार्वजनिक माफी की मांग की है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अमर सिंह की बात जाने दें ! ये दो बडे बडों के बीच का मसला है और कई मोर्चों से विरोध के स्वर भी उठ रहे हैं ! बात सुलट जाएगी ! सबकुछ पीसफुल हो ही जाएगा !पर&amp;#160; एक आम कामकाजी औरत के व्यावसायिक जीवन में इस प्रकार के भाषिक यौन उत्पीडन की कल्पना करें तो हमारा स्वयं को कटघरे में पाते हैं ! कामकाजी जीवन में पुरुष सहकर्मियों के साथ बराबर की भागीदारिता करने वाली हर स्त्री कभी न कभी इस तरह की वाचिक हिंसा का शिकार हो ही जाती है ! बहुत बार स्त्री अपने लिए कहे गए जुमलों और व्यंग्यों के भीतर छिपी यौन हिंसा को पहचान नहीं पाती ! प्रोफेशनल प्रतिस्पर्धा में पुरुष से खुद को हीन न मान ने वाली औरतें हों या पुरुष को स्वाभाविक तौर पर स्त्री से बेहतर जीव मानने में संतोष करने वाली औरतें - दरअसल दोनों तरह की औरतें पुरुषों के द्वारा किए गए भाषिक हमले का शिकार होती हैं ! कभी कभी तो महज हल्के लगने वाले माहौल में हल्की बातचीत, लतीफागिरी , चुहलबाजी , प्रोफेशनल बातचीत आदि में पुरुष मित्रों और सहकर्मियों के द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा व प्रतीक स्त्री के प्रति उनके नजरिये को दर्शाते हैं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मैंने अक्सर देखा है अपने लिए इस्तेमाल की गई सेक्सिस्ट भाषा व आपत्तिअजनक जुमलों का विरोध करने का नतीजा बहुत त्रासद होता है ! आपके प्रतिरोध के उपहार स्वरूप आपके लिए कहा जाएगा&amp;#160; - य़े औरत तो पागल हो गई&amp;#160; या फिर इस औरत का&amp;#160; घरेलू जीवन ही बडा खराब है जिसका गुस्सा यह यहां उतार रही है या&amp;#160; कमाल है इसका कौन सा पल्ला खींच लिया है या कहा जा सकता है यहाँ औरत झूठा इल्जाम लगा रही है किसी शत्रु सहकर्मी के भडकाने पर फंसा रही है ...वगैरह वगैरह...&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अमर सिंह की सार्वजिक रूप से की गई बयानबाजी के राजनीतिक गैरराजनीतिक पाठ भी हो सकते हैं और इस्तेमाल भी ! पर एक आम औरत जब अपने लिए नागवार गुजरने वाले आपत्तिजनक जुमलों का अकेला प्रतिरोध करती है तो उसके निहितार्थ घोर निजी होते हैं ! यहां घर परिवार ,मित्र, निकट की स्त्रियां व्यवस्था के सहयोग की मात्रा भी बहुत कम होती है ! यौन उत्पीडन का आरोप दर्ज करने वाली स्त्री को हर कदम पर अपने चरित्र और इरादों की सफाई भी देनी होती है ! इस विरोध के झंझटों से बच कर चलने वाली हर स्त्री कामकाज के स्थलों पर यह मानकर चलने लगती है कि जब बाहर निकलोगी तो यह सब तो होगा ही ...! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt; पुरुष अपने अवचेतन में स्वयं स्त्री का यौन -नियंता समझता है ! उसके मन की भीतरी परतों मे स्त्री मात्र यौन- उपकरण है जिसपर बलपूर्वक अधिग्रहण किया जा सकता है !&amp;#160; सो कबीलाई समाज के संस्कार जाते जाते भी नहीं जा पाते ! उसके लिए स्त्री एक यौन प्रतीक है ,जिसकी कोई यौनिक आइडेंटिटी नहीं है ! इस अवचेतन मन के दबावों में सुहागरात बलात्कार ,संभोग ,स्त्री की देह सब प्रतीक है जिनका इस्तेमाल पुरुष किसी भी गंभीर अभिव्यक्ति के लिए भी जाहिर तौर पर कर बैठते हैं ! अमर सिंह ने भी समझा होगा इस भाषा के इस्तेमाल से वे सोनिया गांधी के राजनीतिक समीकरणों को आम भोली भाली जनता तक आसानी से पहुंचा पाऎंगे ! वे शायद भारतीय जनता के सार्वजनिक अवचेतन की गहरी समझ रखते होंगे ! या ये उनकी ज़बान की फायडियन स्लिप भी हो सकती है !.....जाने दें ..!&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;जाहिर है स्त्री जितना सिकुडॆगी उतनी ही उसके लिए जगह कम होती जाएगी ! उसे अपने स्तर पर यौन हिंसा के इस रूप का विरोध करना ही होगा ! पर वह यह भी जानना चाहेगी कि ऎसे में स्त्री से इतर समाज का क्या स्टैंड है ? क्या हमें उस दिन का इंतज़ार है जब&amp;#160; स्त्री की भाषा उन यौन प्रतीकों से बनी होगी जो पुरुष के लिए तकलीफदेह होंगे और उसकी कार्यकुशलता को सेक्सुअल आधारों पर कमतर सिद्ध करते होंगे ! &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-8209900698776733592?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/8209900698776733592/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=8209900698776733592' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8209900698776733592'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8209900698776733592'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='आप अपने ऑफिस में बलात्कार करते हैं या सुहागरात मनाते हैं ?'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-4037216932205025092</id><published>2008-06-09T16:07:00.001+05:30</published><updated>2008-06-09T16:16:15.960+05:30</updated><title type='text'>डॉ पांगती - पंक्ति में नहीं खड़ॆ हैं जो</title><content type='html'>&lt;pre class="csharpcode"&gt;पिछली पोस्ट में मैंने अपनी &lt;a href="http://vadsamvad.blogspot.com/2008/06/blog-post.html" target="_blank"&gt;मुनस्यारी यात्रा&lt;/a&gt; के कुछ छायाचित्र प्रस्तुत किए थे !&amp;#160; आज देखिए डॉ पांगती के निजी प्रयासों से बने हेरिटेज म्यूजियम की कुछ तस्वीरें ! डॉ पांगती मुनसियारी के मूल निवासी हैं जिन्होंने वहीं रहकर जोहर घाटी और भोटिया जनजाति पर अपना पी.ऎच.डी का काम पूरा किया !वे करीब एक दशक पहले मुनस्यारी के इंटरकॉलेज से रिटायर हुए हैं और आजकल दिल्ली में रहने वाले अपने बेटे के द्वारा लाए गए लैपटॉप पर वे लोकभाषा पर काम कर रहे हैं ! &lt;/pre&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मुनस्यारी के छोटे से गांव में कच्चे रास्ते से होकर आप उनके पैतृक घर में बने इस म्यूज़ियम में पहुंच सकते हैं ! उनके अकेले और अथक प्रयासों से एक बडा सा कमरा संग्रहालय में तब्दील हो गया है ! पांगती जी के म्यूज़ियम में लोकजीवन की कई स्मृति चिह्न हैं -बर्तन , वस्त्राभूषण ,चीन और तिब्बत से स्वतंत्रतापूर्व की व्यापार संधियां ,नक्शे , किताबें , हिमालय पर हुआ नया शोध कार्य , जडी बूटियां , हथियार....! इस इलाके के लोकजीवन पर रचित कुछ दुर्लभ किताबों को आप यहां से खरीद सकते हैं ! यह म्यूज़ियम मुनस्यारी में मास्टर साब के म्यूज़ियम के नाम से जाना जाता है ! पांगती जी से बातचीत के दौरान उनकी काम के लिए खब्त का पता चला तो कई सवाल मन में पैदा हुए ! कुछेक पूछ भी डाले ! उनका मकसद क्या है ? उनकी यह धरोहर संभालने वाला कौन है ? धन का इंतजाम कैसे होता है ? ! डॉ पांगती का कहना था &amp;quot;यहां के बच्चे अपनी लोक संस्कृति को नहीं जानते ! लोक भाषा शैली सबको भूल रहे हैं ! अपनी सांस्कृतिक धरोहर के हिस्से मैं संजोने की कोशिश करता हूं ..हमारा जातीय इतिहास खो न जाए !&amp;quot; पुरानी पीढी और नए जमाने के बीच उगती गहराती खाई के कई सबूत हमने वहां के जीवन में महसूस किए ! डॉ पांगती के मन में भी इस सांस्कृतिक विस्मृति के लिए अस्वीकार था ! पर साथ ही एक आस्था और विश्वास भी उमके भीतर दिखा ! वे मानते हैं कि भविष्य में कभी न कभी इस काम को आगे बढाने वाला आस्थावादी लोक संस्कृति का प्रेमी जरूर पैदा होगा ! डॉ पांगती ने हमें आगंतुक पुस्तिका पर कुछ लिखने का आग्रह किया क्योंकि इस साल उन्हें राज्य से कुछ अनुदान मिल रहा है राज्य तो अनुदान से पहले आपके काम के सबूत देखता है न ! हमने हिमालय के इतिहास और लोकसंस्कृति पर लिखित कई किताबें उससे खरीदी! चलते हुए उन्होंने हमें अपना लिखा एक लेख दिया ! भाषा के सामाजिक पक्ष पर लिखा यह लेख एक आध जगह से बिना छपे वापस आ चुका था ! सो उन्हें संकोच था ,पर बातचीत में पैदा हुई सहजतावश उन्होंने वह लेख हमें थमा दिया ! &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;embed pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" src="http://picasaweb.google.com/s/c/bin/slideshow.swf" width="400" height="267" type="application/x-shockwave-flash" flashvars="host=picasaweb.google.com&amp;amp;captions=1&amp;amp;RGB=0x000000&amp;amp;feed=http%3A%2F%2Fpicasaweb.google.com%2Fdata%2Ffeed%2Fapi%2Fuser%2Fneelimasayshi%2Falbumid%2F5209809015250248401%3Fkind%3Dphoto%26alt%3Drss" /&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-4037216932205025092?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/4037216932205025092/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=4037216932205025092' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4037216932205025092'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4037216932205025092'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/06/blog-post_09.html' title='डॉ पांगती - पंक्ति में नहीं खड़ॆ हैं जो'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-483380629094855363</id><published>2008-06-07T16:27:00.001+05:30</published><updated>2008-06-07T16:27:19.972+05:30</updated><title type='text'>मुनस्‍यारी में हम</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बहुत समय से मुनस्यारी जाने की कामना थी जो आखिरकार पूर्ण हुई ! उत्तरांचल की आखिरी सडक पर आखिरी मोटरऎबल गांव ! मिलम ,रलम ,पिंडारी और हीरामणि ग्लेशियरों से घिरा और पंचचुली पर्वतमाला के चरणों में अडा यह गांव दिल्ली की चहल पहल से 700 किलोमीटृर दूर है ! इस दूरी को हमने अपनी&amp;#160; नई नवेली ऎवियो युवा कार से की गई यात्रा से पाटा ! पेश हैं कुछ छायाचित्र -&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;embed pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" src="http://picasaweb.google.com/s/c/bin/slideshow.swf" width="400" height="267" type="application/x-shockwave-flash" flashvars="host=picasaweb.google.com&amp;amp;captions=1&amp;amp;RGB=0x000000&amp;amp;feed=http%3A%2F%2Fpicasaweb.google.com%2Fdata%2Ffeed%2Fapi%2Fuser%2Fchauhan.vijender%2Falbumid%2F5208432689068852401%3Fkind%3Dphoto%26alt%3Drss" /&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-483380629094855363?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/483380629094855363/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=483380629094855363' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/483380629094855363'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/483380629094855363'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='मुनस्‍यारी में हम'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-8696234927040772505</id><published>2008-05-26T09:22:00.001+05:30</published><updated>2008-05-26T10:54:07.557+05:30</updated><title type='text'>ब्लॉग जगत के बलात्कारी ब्वायज़</title><content type='html'>&lt;p&gt;कल से कठपिंगल नामक एक नव ब्लॉगर जो कि बडे मठाधीश भी होते हैं बहुत परेशान हैं ! उन्होंने एक साथी बलात्कारी ब्लॉगर की अपराध की दास्तान हम सब को सुनाई और फिर जी भर यहाँ जांचने में तुल गए कि कौन उसपर कितना रिऎक्ट कर रहा है ! यश्वंत के बलात्कारी व्यक्तित्व की निंदा में चोखेरबाली समाज चांय चांय नहीं कर रहा वे इस बात से भी आहत हैं ! अविनाश ने कल बलात्कार की कथा को बहुत दम से बयान किया ! उन्होंने हमेशा की तरह अपनी पत्नी को घर पर ही रखा और ब्लॉग जगत के सबसे सेंसेटिव और ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते सब ब्लॉगरों को उनके नैतिक ड्यूटी के लिए उकसाया ! पर जैसा कि प्रमोद ने कहा यश्वंत पकडा गया क्योंकि वह फिजिकल एब्यूज़ कर बैठा था ! पर यहां के कई थानेदार मठाधीश जो कि समाज के हर मुद्दे पर सबसे तेज और संवेदनशील राय रखते हैं आजाद हैं और तबतक रहेंगे जबतक कि कोई फिजिकल एब्यूज न कर बैंठें ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;ब्लॉग जगत के मोहल्ला की चारपाई पर बैठा एक ब्वाय बलात्कार की खबर दे रहा है दूसरा ब्वाय जेल से छूटा ही है ! चारपाई वाले ब्वाय की पत्नी घर के अंदर और बलात्कारी की पत्नी गांव में है ! अब बचीं ब्लॉग जगत की औरतें जिनके लिए मोहल्लापति ने नए संबोधन बनाना ,उनको उनके कर्तव्य बताना , उनके सम्मान और हित में बोलने वाले पुरुषों को पुरुष समाज का विभीषण बताना जैसी कई बातें इस ब्वाय ने बताईं हैं ! इसमें से एक ब्वाय स्त्री विमर्श जैसे कई विमर्शों की रिले रेस चलवाता है और चाहता है कि उसे हिंदी ब्लॉग जगत का सबसे बौद्दिक और समझदार ब्वाय समझा जाए ( क्योंकि वह बलात्कारी भी नहीं है ) जबकि दूसरे ब्वाय के द्वारा बलात्कार की खबर देता हुआ यहाँ चारपाई ब्वाय अपनी एक परिचित ब्लॉगर को &amp;quot; सनसनी गर्ल &amp;quot; दूसरी को छुटे सांड की तरह सींग चलाने वाली माताजी कहकर ही अपनी बात आगे बढा पाता है ! हमारे पास यश्वंत के बलात्कारी रूप के कोई फोटो नहीं हैं ( हो सकता है कोई ब्वाय जारी कर दे आजकल में ..) पर हमारे पास चारपाई ब्वाय का लिखा है &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/chauhan.vijender/SDkhbh7BbTI/AAAAAAAABr4/q0fIWhx8of8/s1600-h/ScreenHunter_02%20May.%2025%2013.15%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img height="204" alt="ScreenHunter_02 May. 25 13.15" src="http://lh5.ggpht.com/chauhan.vijender/SDkheh7BbUI/AAAAAAAABsA/0J8iIYgoepc/ScreenHunter_02%20May.%2025%2013.15_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800" width="428" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;आप कहें गे कहेंगे क्या अनूप तो कह ही रहे हैं कि नीलिमा ने ही उनको उकसाया है तो फिर यहाँ सब तो लाजमी है ! यश्वंत का भी क्या कसूर रहा होगा उस पीडिता ने भी उसको उकसाया होगा !अब चारपाई ब्वाय को उकसाया जाएगा तो वह किसी स्त्री को पहले तो भूखी सांड की तरह हर जगह दौडती ही कहेगा माताजी भी कह लेगा पर इससे ज्यादा मत उकसाओ ....! जाहिर है अपनी हदों को पार करने वाली औरत या आपकी गलती दिखाने वली औरत माताजी ही कलाऎगी क्योंकि वह सुकुमारी वाले काम कहां कर रही है ! विरोध के स्वर में बोलने वाली औरत को बूढी पके बाल वाली माताजी कहने से कितना चिढ सकती है वह ! वह जाकर शीशे में ध्यान से अपने को निहारने पहुंचेगी कि ऎसा मेरे चेहरे में क्या था कि मैं माताजी लगने लगी हूं , छुटी भूखी सांड की तरह लगती हूं .....बस वह उदास हो जाएगी चेहरे पर लेप मलेगी और अपने आप से वादा करेगी कि कल से किसी भी मर्द को ऎसे नहीं कहेगी और उनकी तारीफ के योग्य करम करेगी !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वैसे जब चारपाई ब्वाय एक बलात्कार की खबर देते हुए स्त्री के बारे में इन संबोधनों को कह रहा है तो उसके मन में यही न चल रहा होगा कि छुटी सांड सी दौडती फिरोगी तो यही सुनोगी ! और फिर कुछ भी फिजिकल या लैंग्वेज एब्यूज़ हो सकता है ! माई डियर तैयार रहा करो तुम्हारे साथ आगे कुछ भी हो सकता है ! वह सोचता होगा हमारी वाली को देखो घर में बंधी रहती है मजाल है उसके साथ कोई कुछ कर जाए ...! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;ऎसे चारपाई ब्वाय को मसिजीवी पत्नीवादी ,प्रमोद सिंह भी &amp;quot;बदचलन &amp;quot; लगेगा ! दोनों ही अपनी पत्नी को बांधकर नहीं रख सके ! एक की भूखे सांड सी दौडती रहती है दूसरे की भाग जाती है ! हे चारपाई ब्वाय तुम नीलिमा को कठघरे में खडा करने के लिए जितने उतावले हो अगर उतने ही उलावले अपनी काठ की संवेदना को गलाने के लिए होते तो बात थी !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;तुम तो पहुंचे गाल बजाते देखो साला पकडा गया बलात्कार ऎसे नहीं किया जाता साले को कितनी बार समझाया था ! जो करो ऎसे करो कि पकडे न जाओ ! बोधि जी को देखो बोला भी बाद में पलट भी गए बच गए ! मुझे देखो सनसनी गर्ल कहा था तुरंत मिटा दिया साथ ही यह कहने के ऎतराज में आई टिप्पणी भी मिटा दी ! एकदम साफ कोई सबूत नहीं ! पर भूखी सांड सी पीछे पडेगी तो आगे का कुछ नहीं कह सकता ! मैं कहता था न मैं बडा बाप हूं मुझसे सीखो ! स्त्री विमर्श भी करो स्त्री का एब्यूज़ भी करो ! तरीका मुझसे सीखो -मैंने कई बार कहा था ! तुम ठहरे कच्चे खिलाडी और जल्दबाज ..खैर भुगतो !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;तो हे चारपाई ब्वाय हिंदी व्लॉग जगत की मुझ सी भूखे सांड सी बेवजह जगह -जगह दौडती औरत जिसमें तुमने अपनी माताजी का रूप देखा , पत्रकार स्&amp;#8205;मृति दुबे जिनमें तुम्हें सनसनी गर्ल ( कॉल गर्ल ,बार गर्ल ,पिन अप गर्ल ,सिज़्लिंग गर्ल जैसी ही कोई चीज़ .....जो तुम औरतों में देखते होंगे ..) प्रत्यक्षा , सुजाता मनीषा पांडे जैसी तमाम औरतें बस अब तुम्हारी चारपाई की ओर देख रही हैं ! चारपाई पकडे रहना बलात्कारी ब्वाय को तो हम&amp;#160; और कानून मिलकर देख ही लेंगे ,साथ की कामना करेंगे कि और कोई बलात्कारी ब्वाय उगने न पाए !&amp;#160; आमीन !    &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-8696234927040772505?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/8696234927040772505/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=8696234927040772505' title='23 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8696234927040772505'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8696234927040772505'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='ब्लॉग जगत के बलात्कारी ब्वायज़'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/chauhan.vijender/SDkheh7BbUI/AAAAAAAABsA/0J8iIYgoepc/s72-c/ScreenHunter_02%20May.%2025%2013.15_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>23</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3056778318042078300</id><published>2008-04-09T11:27:00.001+05:30</published><updated>2008-04-09T11:44:21.312+05:30</updated><title type='text'>इन औरतों का इंकलाब ज़िंदाबाद बंद कराओ</title><content type='html'>&lt;p&gt;सुनिए आप सब &lt;a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/04/blog-post.html" target="_blank"&gt;अनाम&lt;/a&gt; &lt;a href="http://linkitmann.blogspot.com/" target="_blank"&gt;सनाम&lt;/a&gt; महाशयों ! अब तो आप सब की ही तरह इस नारीवादी औरतवादी नारेबाजी - बहसबाजी से&amp;#160; मैं भी तंग आ चुकी हूं ! आप सब सही कह रहे हैं ये इंकलाबी ज़ज़्बा हम सब औरतों के खाली दिमागों और नाकाबिलिय़त का धमाका भर है बस ! हम बेकार में दुखियारी बनी फिर रही हैं ! सब कुछ कितना अच्छा ,और मिला मिलाया है ! पति घर बच्चे ! हां थोडी दिक्कत हो तो पति की कमाई से मेड भर रख लें तो सारी कमियां दूर हो जांगी ! फिर हम सब सुखी सुहागिनें अपने अपने सुखों पर नाज़ अकर सकेगीं ! सब रगडे झगडे हमारी गलतफहमियों या ऎडजस्टमेंट की आदत न होने से होते हैं !&amp;#160; पर एक बात बताओ -हम कितने सुखी हैं ये फहमी तभी तक क्यों बनी रहती है जब तक हम सारी घरेलू जिम्मेदारियां हंसते संसते उठाती रहतीं हैं ! काश जब हम पति की कमीज बटन न टांकें और फिर भी घर की खुशहाली बनी रहे और हमारे बारे में नाकाबिल औरत औरत का फतवा न जारी किया जाए !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बकवास है सब साली ! फेमेनिज़्म सब धरा रह जाएगा जब बटन न टांकने , समय पर रोटी न देने पर पति घूर कर देखेगा चांटा मारने को उसका हाथ उठेगा ! कमीना फेमेनिज़्म आपके रिश्ते की पैरवी में नहीं आएगा तब और आप सोचेगी हाय एक बटन टांक ही देती तो क्या हर्ज हो जाता ??&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अब एक पति महाशय दलील दे रहे थे कि मैं अगर कमाकर लाने से इंकार कर दूं तो ? सारा दिन बाहर खटता हूं मैं भी तो खुद को मजदूर मान सकता हूं ? मुझे घर मॆं चैन की दो वक्त की रोटी भी न मिले तो क्यों मैं घर लौट के आना चाहूं ?बडा गंदा ज़माना आ गया है घरों की शांति खत्म हुए चली जा रही है ! हर बात में दमन ,शोषण देखने की आदत पद चुकी है इन औरतों को !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;सही बात कहूं तो मैं अब सुधरने की सोच रही हूं - एक खुशहाल, पति सेविका परिवार की धुरी बन सब कुछ संभालने वाली औरत ! पर क्या करूं ये सब सोच ही रही कि&amp;#160; मृणाल पांडॆ का लिखा पाठ &amp;quot; मित्र से संलाप &amp;quot; पर स्लेबस के लिए लिखने का ज़िम्मा ले डाला ! अब उन्होंने आप सब के द्वारा नारीवाद पर लगाए आरोपों की लिस्ट बताई है ! आप भी गौर करें और हो सके तो अपनी अपनी दलीलें -आरोप आदि को लिस्ट करें ! वाकई अब निर्णायक दौर आ गया है इस फेमेनिज़्म पर कुछ फैसला लेने का --&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;औरत ही औरत की दुश्मन होती है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;सारी फेमेनिस्ट औरतें तर्क विमुख होती हैं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;फेमेनिज़्म एक पश्चिमी दर्शन है ! कोकाकोला की तरह&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; झागदार और लुभावना आयात भर है!&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;नारी संगठन बस नारेबाज़ी और गोष्ठियों का आयोजन भर करते हैं !गावों में इनकी कोई रुचि नहीं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मध्यवर्गीय कामकाजी औरतें घर से बाहर कामकाज के लिए नहीं मटरगश्ती के लिए निकलती हैं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;पारिवारिक शोषण की शिकायत करने वाली स्त्रियां ऎडजस्ट करना नहीं जानती !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;{&lt;/font&gt;&lt;font color="#000000"&gt; प्लीज़ अपनी राय या आरोप लिस्ट में&amp;#160; जोडना न भूलें }&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3056778318042078300?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3056778318042078300/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3056778318042078300' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3056778318042078300'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3056778318042078300'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/04/blog-post_09.html' title='इन औरतों का इंकलाब ज़िंदाबाद बंद कराओ'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3174277750422088319</id><published>2008-04-04T18:58:00.001+05:30</published><updated>2008-04-08T09:01:59.833+05:30</updated><title type='text'>सेक्सुअली वॉट आय ऎम ??</title><content type='html'>&lt;p&gt;स्त्री और सेक्सुऎलिटी का आपसी संबंध क्या है ?यह सवाल अब स्त्री विमर्शों में यदा कदा उठने लगा है ! इस समाज में&amp;#160; औरत अपनी सेक्सुएलिटी पर अपना ही अधिकार खो देती हैं ! यह पितृसत्ता ही है जो हमारी सामाजिक आर्थिक राजनीतिक और सेक्सुअल आइडेंटिटी को काबू में रखती है ! किसी स्त्री या लडकी का अपनी सुक्सुएलिटी , शरीर और प्रजनन पर नियंत्रण समाज को ,पेट्रीआरकी को सबसे खुली चुनौती होता है ! इसीलिए हमारे समाज के सबसे वर्जित सवालों में से एक सवाल है - किसी स्त्री के द्वारा&amp;#160; अपनी यौनिक पहचान को जबरिया डिफाइन करने वाली संरचनाओं पर उठाया गया सवाल !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;हमारे समाज में स्त्री का शरीर और उसकी आजादी पितृसत्ता का सबसे बडा हथियार भी हैं और उसके लिए सबसे बडा खतरा भी ! जिस समाज में पुरुष का सेक्सुअल सेल्फ हावी रहता है उसी समाज में औरत का सेक्सुल आत्म लगातार दबाया और कुंठित किया जाता है ! इसी समाज की ट्रेनिंग के फलस्वरूप स्त्री हमेशा अपनी इस आइडेंटिटी को पुरुष की थाती मान लेती है ! स्त्री के पास अपने सेक्सुअल आत्म को अभिव्यक्त करने के न अवसर हैं न भाषा और न ही आत्मविश्वास ! परिवार ,समाज संस्कृति ,नैतिकता ,मर्यादा का दायित्व एकमात्र उसके उउपर लादकर चल रही हमारी ये संरचनाऎ बेफिक्र हैं ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;स्त्री अपने शरीर के प्रति कितनी सहज और सजग है&amp;#160; या फिर उसकी सेल्फ की परिभाषा में उसकी अपनी यौनिकता को क्या जगह देती है ? स्त्री अपनी यौनिक आइडेंतिटी की अभिव्यक्ति को लेकर कितनी कुंठित ,दमित या पराश्रित है ?-- आदि कुछ सवाल हैं जो हमारे पितृसंरचनात्मक समाज की देन हैं ! इन सवालों को सवाल की तरह देखा जाना अभी कहां शुरू हुआ है -?-केवल वृहद विमर्शों की सुलझी हुई तहों के भीतर ये दबे हुए हैं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;एक आम स्त्री की ज़िंदगी की तमाम उलझनों ,पीडाओं , समस्याओं से इन सवालों को क्या लेना देना --मैं जानती हूं आपमें से काई सुधी पाठकों के मन में यह सवाल उठ रहे होंगे ! आप स्त्री की जिंदगी और जिस्म को कई अलग-अलग टुकडों में देखने के आदी हो गए होंगे सो उसकी सामाजिक राजनीतिक और यौनिक आजादी ( और अभिव्यक्ति ) को आप अलग अलग संघर्षों के रूप में देख रहे होंगे ! ज़ाहिर है आपको यह भी लगता होगा को बेचारी स्त्री कहां कहां लडेगी ??&lt;a href="http://lh4.google.com/neelimasayshi/R_YyDk9n14I/AAAAAAAAAV4/pwQTaqvgnOo/465_2%5B9%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="244" alt="465_2" src="http://lh5.google.com/neelimasayshi/R_YyE09n15I/AAAAAAAAAWA/dJ4LUeuZlY0/465_2_thumb%5B3%5D.jpg" width="230" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3174277750422088319?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3174277750422088319/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3174277750422088319' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3174277750422088319'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3174277750422088319'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html' title='सेक्सुअली वॉट आय ऎम ??'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-5539024064606111088</id><published>2008-04-03T19:14:00.001+05:30</published><updated>2008-04-03T19:29:29.153+05:30</updated><title type='text'>आखिर मैं इतने दिन से कहां थी ?</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बहुत दिन तक&amp;#160; कोई भी पोस्ट न लिखने के क्या फायदे हैं इसका विश्लेषण करते हुए &lt;a href="http://http://hindini.com/fursatiya/" target="_blank"&gt;फुरसतिया जी&lt;/a&gt; ने बहुत सी राज की बातें बताई हैं ! वे हमसे बतियाते हुए बोले कि अच्छा है कि आपकी वजह से चिट्ठा पढने वाले लोग कम परेशान हुए ! बहरहाल उनकी बात सुनकर कई दिनों से न लिख पाने से परेशान मन को बहुत राहत मिली ! :)&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;दरअसल पिछले 3-4 सप्ताह से स्त्री विमर्श पर आयोजित एक पुनश्चर्या कार्यक्रम मॆं हिस्सा ले रही थी ! इस कार्यक्रम के तहत कई नामी विद्वानों और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं को सुनना हुआ ! कमला भसीन ,अपर्णा बासु ,विभा चतुर्वेदी ,कविता श्रीवास्तव ,निर्मला बैनर्जी ,ऎन स्टीवर्ट ,राकेश चन्द्रा , उमा चक्रवर्ती सरीखे कई वक्ताओं को सुनने का मौका मिला ! इस पूरे कार्यक्रम में दिल्ली विशवविद्यालय के&amp;#160; शिक्षकों के साथ साथ कई अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक भी थे ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;इस कार्यक्रम में मैंने अपना पर्चा &amp;quot;हिंदी जनपद का ब्लॉगफेमेनिज़्म &amp;quot; पर तैयार किया और पढा !&amp;#160; यहां मौजूद श्रोताओं ने साइबर फेमेनिज़्म को एक बिल्कुल नये फिनामिमा के रूप में ग्रहण किया ! इस पर्चे में ब्लॉग जगत की सत्ता संरचना में पितृसत्तामकता के सबूतों की पडताल की ! चोखेरबाली के उदय के ऎतिहासिक दबावों पर बात हुई ,ब्लॉग जगत की स्त्री लेखिकाओं के लेखन पर विमर्श हुआ ! जो एक महत्वपूर्ण सवाल रामजस कॉलेज के इतिहास विभाग के वरिष्ठ और स्त्री संघर्षों के बहुत सक्रिय चिंतक मुकुल ने पूछा वह था -कि क्या इस साइबर स्त्री विमर्श एक पत्नीवाद या सुक्सुऎलिटी के विमर्श उठते हैं ?&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;यह रिफेशर कोर्स मेरे लिए बहुत अहम रहा ! स्त्री आंदोलनों ,स्त्री विमर्श , पितृसत्तामकता , जेंडर इक्वेलिटी और जेंडर जस्टिस , फेमिनिटी और मस्क्युलिनिटी ,स्त्री और मीडिया ,यौन उत्पीडन और स्त्री ,जेंडर और साइकॉलोजी ,फैमिली लॉ ,ट्रैफिकिंग एंड वुमेन लॉ अगेंस्ट डॉमेस्टिक वॉयलेंस --जैसे कई अहम मुद्दों पर वक्तव्य हुए !इन सब विमर्शों के प्रभावस्वरूप स्त्री विमर्श से जुडे कई आयामों पर एक समझ बनाने का मौका मिला ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;यहां हुए कई अनुभव आपसे साझा करने का मन है ! खासकर सेक्सुऎलिटी पर हुई वर्कशॉप के कुछ गंभीर और कुछ हास्यास्पद अनुभव ! बिना इस डर के कि रियाज जी फिर न कह दें कि आप औरतें स्त्रियों और बच्चों के अलावा और कुछ नहीं लिख सकतीं क्या ?:)&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-5539024064606111088?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/5539024064606111088/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=5539024064606111088' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5539024064606111088'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5539024064606111088'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='आखिर मैं इतने दिन से कहां थी ?'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-5539557622227188833</id><published>2008-03-03T12:55:00.001+05:30</published><updated>2008-03-03T13:00:05.204+05:30</updated><title type='text'>उनका थूकशास्त्र आपपर कैसा बीतता है ?</title><content type='html'>&lt;p&gt;अगर कोई बलगम का लोथडा गले में अटक गया हो उसे उगल दीजिए दिल हलका हो जाएगा !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;भारत देश की जनता को इतनी थूक क्यों आती है माइलौड ? यहां की सडकें भारतवासियों के दिल में सूराख कर रहे टी.बी. रोग के सबूतों से अटी क्यों पडी रहती हैं ? इन रंग बिरंगी पीकों से रहित कब होंगी हमारी गलियां गमारी सडकें ?&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;आकथू...आकथू ..&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;दरअसल हमारे सीनों में बरसों से थूक पीक का संगम बवाल मचाए हुए है ! लिसलिसा हरा गीला पदार्थ हमारे दिल में आप्लावित होता रहता है हुजूर ! जबतब ये कमबख्त गले में उबल पडता है ! आप जाने जनाब हमारे मुंह से ठीक उसी समय कोई बढिया बात निकलने वाली होती है पर बलगम के लोथडे में उलझकर रह जाती है ! ऎसे में हम मुंह खोलते हैं तो बस वही लिसलिसे थक्के बेकाबू होकर बाहर निकला चाहते हैं ! अब सडक उडक पे चलते हुए किसी मैदान के बेंच पर बैठे हुए ,किसी जलसे में शिरकत करते हुए हमारा मुंह भर आए तो फोंकने कहां जाऎं ? लिहाजा हमें ये स्वाभाविक कर्म वहीं अंजाम देना पडता है ! अब इससे आपको बदमज़गी हो या आपका पैर उसपर पड जाए या फिर उसकी झींटें उडकर आपपर आ पडें तो इसमें हमारा क्या कुसूर !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;आप हमपे नैतिकता न थोपें ! इस तरह सडकें चौराहे और पार्क रंग देने से हमारा दिल हलका होता है ! सुकून मिलता है ! हम तो उगलेंगे&amp;#160; ..दूसरों का दामन ,घर या सार्वजनिक सडक की सफाई का हमने क्या ठेका लिया हुआ है ! हम भोले- भाले हैं दिल के साफ हैं भावुक हैं बेबाक हैं नंग धडंग हैं&amp;#160; ! आप सब अपनी आंखों ,नाक कान सबको बंद रखने के लिए आजाद हैं ! हम अपनी थूक पेशाब ट्ट्टी जैसी स्वाभाविकताओं को लेकर शर्म नहीं मानते !&amp;#160; अगर आप अपनी सहज क्रियाओं को भी अकेले में करने का मौका देखने वाले बेचारे बने रहेंगे तब तो आप जरूर समझ लेंगे लोकतंत्र का मतलब ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अब हम सबसे मारे हुए , सीने में जहां भर का दर्द लिए हुए जमीनी लोग हैं ! इसलिए सबसे ज़्यादा बीमार रहते हैं और इसलिए हमारे&amp;#160; सीने में इमोशंस ,ईमानदारी शराफत हो न हो बेशुमार बलगम जरूर भरी रहती है जिसे उगल उगलकर हम दिल का बोझ हलका करते फिरते हैं ...! गले में उफनती पीक थूक मवाद सटकना हमारी नज़र से बेचारगी है सरजी !&amp;#160; और हां..इस बहाने आप हमसे खौफ भी तो खाऎगे&amp;#160; ! आप अपने कपडे अपना चेहरा बचाऎगे हमसे ! हम पूरा ज़ोर लगाकर थूकेंगे गली मोहल्ले पटे होंगे इस थूक की पिच पिच से ! आप पैर रखते हय हाय करेंगे&amp;#160; ! हो सकता है आपका जी मितलाए और आप कसम खाऎं कि आप दोबारा घर से बाहर कदम नहीं रखॆंग़े ! तो सरजी थूकने पीकने लिए ही तो भारतीय सडकें बनीं हैं आप अपने लिए तलाश क्यों नहीं लेते एक साफ सुथरी सडक या फिर पटरी ..?&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&amp;#160; तो सरजी हनने तो डिसाइड किया है कि हमारी बिलबिलाते रोगाणुओं से लबालब लेसदार मोटी बलगम की पिचकारियां पच्च पच्च कररेंगी ही ! हमारी मर्दानगी, आज़ादी ,लोकतंत्र और बलगम के लोथडे उगलना -उडाना ....हमें तो सब एक सा ही लगता है जी !!&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-5539557622227188833?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/5539557622227188833/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=5539557622227188833' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5539557622227188833'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5539557622227188833'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='उनका थूकशास्त्र आपपर कैसा बीतता है ?'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3860545307425473372</id><published>2008-02-07T10:53:00.001+05:30</published><updated>2008-02-07T10:56:46.302+05:30</updated><title type='text'>कह लूं ज़रा दर्द आधी धरती का</title><content type='html'>&lt;p&gt;दुनिया आधी है अधूरी है ! पूरी क्यों नहीं है का सवाल भी मेरा है और पूरी कैसे हो की सारी छटपटाहट भी मेरी है ! क्या आधी दुनिया में सिर्फ पानी है और बाकी की आधी दुनिया बनी है चट्टानों की बेलौस ताकत से, कैक्टसों शानदार अनगढता से ! बाकी की आधी दुनिया&amp;#160; क्या पाने को छटपटा रही है ? &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वो हाट लगा के बैठे हैं मेरी छटपटाहट का ! यहां मेरा दर्द भी बिकेगा और मेरे दर्द की कहानी भी ! क्या करुं ? &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मुझे नहीं होना चट्टान नही होना है कैक्टस ! तो क्या होना है मुझे ? मुझे सोच लेना होगा वरना वह सोच लेगा कि मैं क्या होना चाहती हूं ! देखो न वह मेरे दर्द से मतवाला हुआ जा रहा है ! वो कहता है कि वो जानता है मेरे मन को ...उसकी एक एक परत को उघाड लेना चाहता है वह ताकि वह रच सके कोई गीत !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt; मैं उसकी कहानी की नायिका हूं ! वही नायिका जिसे वह दर्द भी देता है और दवा भी देता है खुद ही ! वह मदमाता है कि वह कंटीला कैक्टस है और वह कहता है कि हे प्रिय तुम फूल हो फूल ही रहो !&amp;#160; वह मेरे पुष्पत्व का अकेला माली और रखवाला ! उसकी चट्टानता और उसकी महानता से दुनिया के सहमे हुए जलस्रोत खुद को अंजुली का पानी समझ रहे हैं ! वह मेरा दर्द मेरे अनगढ शब्दों में मुझसे नहीं सुन पाता पर मेरे दर्द पर लिखे गीतों किस्सों में खूब मन रमा पाता है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt; मैं सिलसिलेवार नहीं , मैं कथाकार नहीं ! कैद है मेरी हंसी , मेरा दर्द , मेरा सपना तुम्हारी तिजोरी में ! तुम रचते हो ,पिरोते हो करीने से मेरे इस कैदी स्व को और सुनाते हो मुझी को ! कहते हो हे प्रिये ! पीडा का सृजन, सृजन की पीडा सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए ..&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;..मैं खामोश हूं अभी ....वहां ठीक उस चट्टान की तली से बह रहा है पानी.....   &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3860545307425473372?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3860545307425473372/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3860545307425473372' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3860545307425473372'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3860545307425473372'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/02/blog-post_07.html' title='कह लूं ज़रा दर्द आधी धरती का'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-1429062578103237154</id><published>2008-02-02T14:20:00.001+05:30</published><updated>2008-02-02T17:41:50.606+05:30</updated><title type='text'>मेरा उलझा फेमेनिज़्म और चुगली करती गोल रोटियां</title><content type='html'>&lt;p&gt;क्या कभी कोई स्त्री खुद से यह सवाल पूछ्ती होगी कि अगर उसे दोबारा मौका मिले तो वह स्त्री ही होना चाहेगी ? पता नहीं ऎसा बेतुका प्रसंगहीन सवाल क्योंकर मेरे मन में उठता रहता है मैं अपना मन इसमें नहीं उलझाना चाहती पर कभी लगता है कि इसका कोई ठीक ठीक तार्किक जवाब ढूंढ ही लूं !&amp;#160; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मुझे हमेशा से गोल रोटी बेलने से सख्त चिढ रही है और मैंने कभी कायदे से घर गृहस्थी के काम करना नहीं सीखा ! कभी कभी अपने इस खस्ता हाल से कुंठा होती है तो कभी यह किसी तमगे से कम नहीं लगता ! कभी लगता है मैं एक कंफ्यूज्ड स्त्री हूं जो अपनी जिम्मेदारियों में मन नहीं लगाती !कामकाजी हूं ! सो फुर्तीली और अपटूडेट बने रहने का प्रयास जरूर करती हूं ! मेरे कुलीग्स जब मेरी इस पर्स्नेलिटी की तारीफ करते हैं तो सोचती हूं कि काश मैं इन वाहवाहियों को पसंद कर पाती ,पर जानती हूं कि स्त्री को उसकी&amp;#160; अच्छी सामाजिक छवि का चक्कर महंगा भी पड सकता है ! मैं जानती हूं कि यह एक ट्रैप है ! मैं किसी भी छवि के ट्रैप में फंस जाने से डरती हूं ! मैं अपने आसपास ऎसी औरतों को बहुत हैरत से देखती हूँ जो यह दावा करती हैं कि वे एक बहुत सफल कुक ,ट्यूटर , मां ,पत्नी , मेजबान और बेहद जागरूक कामकाजी महिला हैं!&amp;#160;&amp;#160; अचानक अपने स्त्रीत्व पर उठता प्रश्नवाचक चिह्न दिखाई देने लगता है !&amp;#160; मै सोचती हूं कि जब मैं प्रसव पीडा सह सकती हूं तो ये अच्छी स्त्री वाली छवि की पीडा से क्यों डरती हूं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;सडक पर अकेले चलना ,चलते जाना बिना किसी वजह के ! या कि फिर सडक पर चलते रुक कर किसी ऊंची शाख या बनते बिगडते बादलों के झुंड को देखना है मुझे ! पर नहीं अचानक लगता है कई आँखें देख रही हैं ! सडक पर चलते रिक्शे वालों , खोमचे वालों गुजरती कारों में बैठे लोंगों की कई जोडी आंखों का मैं लक्ष्य बन सकती हूं ! मैं बडी गुस्सैल ,बददिमाग और अडियल हूं !&amp;#160; कामकाज के माहौल के हर मुद्दे में अपनी टांग अडाती रहती हूं ! जबकि अक्सर कई कुलीग्स गोलमोल लहजे में मेरी इस गंदी आदत के बारे मॆं चिंतित होते हैं क्योंकि उनका मानना हैं कि कम उम्र की बाल बच्चॉं वाली औरतों को पंगों में नहीं पड़ना चाहिए ! मैं गालीबाज हूं पर वे कहते हैं -&amp;quot;अगर गाली देने का इतना ही शौक है तो साला या उल्लू का पट्ठा भी कोई गाली है थोडा और आगे बढो &amp;quot;! वे एक फार्वड ,बेलौस, वाचाल औरत के साथ मानकर चलते है कि इसके कंधे पर हाथ रखकर बतियाने जैसी उनकी हरकतें तो बहुत जायज हैं !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;खैर ..जाने दें ! मेरा यह खिचडी आत्मालाप बोझिल हो रहा होगा आपके लिए ! यदि दोबारा मौका मिले तो मैं स्त्री ही होना चाहूंगी का जबाव ..उफ ..फिर कभी ! पर इतना तो है कि अब आपको अपनी पत्नी बहुत सुघड़, सुलझी हुई संस्कारी ,कर्तव्यशीला स्त्री लग रही होगी ! आप तो अपना टिफिन खोलिए गोल रोटियों को खाने का लुत्फ उठाइए !&amp;#160; आपके द्वारा खाई जा रहीं रोटियों का आकार आपके दांपत्य संबंधों की चुगली तो नहीं कर रहा है ....!&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-1429062578103237154?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/1429062578103237154/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=1429062578103237154' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/1429062578103237154'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/1429062578103237154'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='मेरा उलझा फेमेनिज़्म और चुगली करती गोल रोटियां'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-778983339497737051</id><published>2008-01-16T12:59:00.001+05:30</published><updated>2008-01-16T13:06:22.958+05:30</updated><title type='text'>बटरफ्लाईज़ : डू दे फ्लाई ?</title><content type='html'>&lt;p&gt;नाम : अनुज चौधरी ! उम्र : 20 साल ! पेशा :&amp;#160; दिल्ली में एक मंत्री के यहां अटेंडेंट ! जी मैं बात कर रही हूं अपने कॉलेज के प्रथम वर्ष के एक छात्र की ! दुबले पतले चमकती आंखों वाले इस छात्र को पढाते हुए उसे हमेशा हंसते- मुस्कुराते और पढाई में मन लगाते देखा है ! अक्सर हम प्राध्यापक लोग अपने छात्रों&amp;#160; की निजी जिंदगी की तकलीफों से अनजान रहते हैं !सो मैं भी उसे बाकी सभी छात्रों में से एक समझती रही ! पर कल उससे हुई बातचीत में मुझे उसकी जिंदगी की कडवी सच्चाइयों का पता चला ! मैं हतप्रभ हूं , गौरवांवित हूं कि मुझे एक बेहद जुझारू बहादुर बच्चे को पढाने का अवसर मिला है ! अनुज के माता पिता जब गुजरे तब वह मात्र 8 साल का था ! चाचा -चाची के अत्याचार से तंग आकर वह घर से भाग निकला और एक ट्रक&amp;#160; ड्राइवर के हाथ लग गया ! ड्राइवर ने उसे बम्बई पहुंचा दिया जहां एक होटल में बर्तन मांजने का काम उसने किया ! महज 8 साल का बच्चा वहां सॆ भी भाग निकला और दिल्ली पहुंचा दिया गया ! दिल्ली के एक मंदिर के बाहर रहते हुए अनुज को एक एन जी ओ बटरफ्लाईज़ ने गोद लिया .पाला और पढाया ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अनुज अपनी जिंदगी की कहानी ऎसे सुनाता है मानो किसी और की कहानी हो ! वह अपना वृत्तांत सुनाते हुए ज़रा भी जज़्बाती नहीं हुआ पर उसकी कहानी सुनते हुए मैं जज़्बाती हो गई ! बटरफ्लाईज़ में रहते हुए उसकी जिंदगी कैसी रही वह मुझे फिर कभी सुनाएगा ! पर उसने समाज सेवा के नाम पर भारी सरकारी अनुदान लेने वाली इन संस्थाओं की राजनीति और भ्रष्टाचार को नजदीक से न केवल देखा है बल्कि विरोध भी किया है ! इसी विरोध की वजह से उसे इस एन. जी. ओ. से निकाल बाहर किया गया था और उसे यह नौकरी करनी पडी ! &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;आज अनुज खुश है कि वह बी.ए. कर रहा है ! आज वह सडक पर नहीं है !पर वह सडक पर रहने वाले बच्चों की जिंदगियों से बहुत गहरे जुडा हुआ है ! सडक पर रहकर मजदूरी कर जीने वाले तमाम बच्चों की दुर्दशा की कहानियां वह आपको सुना सकता है, उनकी जिंदगी को संवारने के लिए क्या हो यह बता सकता है ! आज वह इतना परिपक्व हो गया है कि एक बाल मजदूरों की दमित आवाज को आप तक पहुंचाना चाहता है ! इसके लिए उसने एक पेपर मैगज़ीन निकाली है -&amp;quot;बाल मजदूर की आवाज़ &amp;quot; ! अपनी इस मासिक पत्रिका के संपादकीय में उसने बटर्फ्लाईज़ की संस्थापक के प्रति नाराज़गी ज़ाहिर की है और सडक पर सोने वाले बाल मजदूरों के शारीरिक शोषण और&amp;#160;&amp;#160; उनके अनुभवों को भी दर्ज किया है !&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;कल से अनुज का हंसता - चमकता चेहरा मेरी आंखों के सामने घूम रहा है ! न जाने इन 3 सालों में उसे पढाते हुए मुझे उससे क्या-क्या सीखने को मिल जाए ! प्रिय अनुज ! तुम्हारी जिजीविषा को तुम्हारी इस टीचर का शत शत नमन !!&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-778983339497737051?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/778983339497737051/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=778983339497737051' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/778983339497737051'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/778983339497737051'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/01/blog-post_16.html' title='बटरफ्लाईज़ : डू दे फ्लाई ?'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-8459094259926827916</id><published>2008-01-09T11:19:00.000+05:30</published><updated>2008-01-09T12:09:54.246+05:30</updated><title type='text'>पाठशाला भंग कर दो....</title><content type='html'>बहुत साल पहले मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग से बी.एड. किया था ! एक पर्चे के रूप में प्राइमरी एजुकेशन का भी अध्ययन करन था ! हमारे एक अध्यापक हमेशा कहा करते थे कि छोटे बच्चों को केवल वही पढाए जो स्वयं शिशु-हृदय हो ,जिसे बच्चों से प्रेम हो और जो बच्चों का समाजीकरण करने की प्रक्रिया में उनकी विशिष्टताओं को चोट न पहुंचाए ! पता नहीं तब पढ़ाया जा रहा सबक कितना समझ आता था और मैं स्वयं अपनी प्राइमरी कक्षाओं में शिक्षण अभ्यास करते हुए उन सबकों को कितना लागू कर पाती थी , पर आज जरूर मैं तहेदिल से यह महसूस करती हूं कि मैं अपने बच्चों के साथ पूरा न्याय नहीं कर रही हूं ! एक मां हो जाने के बाद बच्चों की दुनिया को ज्यादा नजदीक से देख और समझ पा रही हूं शायद ! अपने परिचितों में भी ज्यादातर का लेना देना इस या उस जरिये से शिक्षण से ही है ! सो अक्सर बच्चों की , उनके स्कूलों की , स्कूलों में अध्यापकों की हालत पर चर्चा -विवाद उठ खडे होते हैं और हम पाते हैं कि हम स्वयं शिक्षा से जुडे होने के बावजूद बच्चों को एक बेहतर शैक्षिक वातावरण नहीं दे पा रहे हैं ! हम शर्मिंदा हैं !&lt;br /&gt;हमने अपने बच्चों को समाजीकृत होने के लिए कैसा माहौल दिया है यह समझने के लिए हममें से किसी को बहुत दूर देखने की जरूरत नहीं है ! अपने घर या पास के किसी भी बच्चे की जिंदगी को देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति इन नन्हों से सहानुभूति महसूस करेगा ! अपने बेटे को 3 साल की उम्र में मैंने स्कूल भेजना शुरू किया था ! अपने बहुत एक्टिव, बहुत नटखट और खुशमिजाज और स्पष्ट भाषिक अभिव्यक्ति करने वाले बेटे को स्कूल के हवाले करते हुए दिल बैठता था ! उसने अपनी टीचर की सिखाई हुई पहली कविता सीखी -'मम्मी डार्लिंग पापा डार्लिंग , आई लव यू , सी योर बेबी डांसिंग जस्ट फार यू " पर कक्षा में सुनाते हुए उसने कविता में अपनी ओर से दो पंक्तिया जोड दीं थी- मासी डार्लिंग ,नानी डार्लिंग..... ' ! शिक्षाशास्त्र जिस रचनात्मकता की पैरवी करता है वह यहां भरपूर थी पर शिक्षा के सिद्दांतों को लागू करने वाले तंत्र के लिए ये चिंताजनक हालात थे ! बच्चे की सृजनात्मकता और विषिष्टता को इस तंत्र के अनुसार इसलिए खत्म हो जाना चाहिए क्योंकि वह तंत्र यह मानता है उसका काम सभी बालकों को सामान्यीकृत कर देना है ! यह समाजीकरण करने वाला तंत्र बच्चों की रचनात्मकता और खास योग्यताओं को जिस बेरहमी से दमित करता है उससे साफ हो जाता है कि इस तंत्र {जिसमें कभी- कभी अभिभावक भी शामिल होते हैं} का उद्देश्य एक भीड का निर्माण करना है , एक संवेदनक्षम ,रचनात्मक मेधा से भरपूर मनुष्य नहीं ! एक आम अभिभावक अपने बच्चे की खासियत को न तो समझता है और न ही उसके स्कूल से ऎसी कोई अपेक्षा रखता है ! सो हम सब अपने बच्चों के व्यक्तित्व को हिंदी -इंगलिश ,मेथ्स ,साइंस के पीरियडों में बांट कर खींचतान कर उन्हें बडों की दुनिया के लायक बनाने में जुटे हैं....! कक्षाओं के बंद कमरों में नीरस केन्द्रीकृत शिक्षा देने वाला ,एक घंटी से दूसरी घंटी तक का समय - बस केवल यही सच है हमारे बच्चों की जिंदगियों का !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने आसपास के बच्चों की बातों में स्कूल को लेकर ऊब, डर, निराशा और तनाव का स्वर आपने भी अक्सर सुना होगा !मेरे एक दोस्त की5 साल की बेटी एक दिन अचानक ऊबकर बोली - कितना गंदा है आसमान जो रात को अचानक सुबह बना देता है और मुझे स्कूल जाना पडता है ! मेरा बच्चा कभी कभी यह कहता है कि - मम्मी ये दुनिया बच्चों के लिए नहीं बनी है यहां सब कुछ बडों जैसा है बच्चों की एक अलग दुनिया होनी चाहिए- या फिर यह है कि मैं सारे स्कूलों की दीवारों को मार मारकर तोड दूंगा - तब तब मेरा मन कह उठता है कि वाकई.... पाठशाला भंग कर दो ..!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-8459094259926827916?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/8459094259926827916/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=8459094259926827916' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8459094259926827916'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8459094259926827916'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='पाठशाला भंग कर दो....'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-7777325683915127439</id><published>2007-11-16T13:21:00.001+05:30</published><updated>2007-11-16T13:33:40.048+05:30</updated><title type='text'>न बुझे है किसी जल से ये जलन....</title><content type='html'>&lt;p&gt;सब चुप ...कविजन -चिंतक -शिल्पकार क्या सब चुप हैं ! नहीं नहीं सब बोल रहे हैं ! जलती आग में जलते झोपडों को सब देख ही तो रहे हैं और बोल भी तो रहे हैं ! बुद्धदेव- युद्धदेव- क्रुद्धदेव हवन में समिधा डाल रहे हैं&amp;nbsp; लधुकाय दीन खडा है भीमकाय के सामने ! शांति - क्रांति - भ्रांति का गायन&amp;nbsp; हो रहा है ! स्वाहा - स्वाहा के दिशा भेदी मंत्रोच्चार में आर्तजन का हाहाकार मलिन पड रहा है ! लो किन्नरों के दल के दल मतवाला नाच कर रहे हैं ...! &lt;/p&gt; &lt;p&gt; वे करबद्ध खडे हैं.. अनेकों अनेकों जिह्वाहीन जन !&amp;nbsp; जीवन कितना और कितनी मृत्यु ...?&amp;nbsp; अब जीवन की गुणवत्ता के प्रश्न उन्हें छोटे लग रहे हैं ! ग्राम खेत घर यहां तक कुंए तक में लग गाई आग ! आग सिर्फ उन्हें ही जलाएगी ! इस आग की लपटॆं नहीं जलाऎगी भीमकाय यज्ञ नियंता को नहीं जलाऎगी ये  हमारी थुलथुली कविता को..... न हमारे लंपट विमर्श को ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;उजडे बिखरे लोग ही लोग ! हमारे दरवाजे पर ऎन सुबह पडे अखबार पर क्रंदन करते चेहरे !हम गिन रहे हैं कितने हैं मौत की तालिका को मिले अंक ! एक घटा दो या एक बढा दो क्या अंतर पडता है ...? अखबार अखबार ही रहेगा और दरवाजे के बाद उसे मेज या पलंग पर आना है ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;जी ठीक कहा.. मसला सुलझ रहा है! तब तक कविता रचो नेता के कंधे पर बिलखते लाचार चेहरे फिल्माओ ,मौत की गिनती दुरुस्त करो&amp;nbsp; ! पिछ्ली बार उसका दोष था ..इस बार इसका दोष है.....&lt;/p&gt; &lt;p&gt;ओह उधर आग लग गई&amp;nbsp; और वो .. उधर गोली चल गई ....लहू बह रहा है मिट्टी पर ! पता नहीं किसका पर उनके जूते खराब हो रहे हैं ! हां ये वही जूते हैं घोडे की नाल ठुके ,लोकराज की चमडी से बने ! पर कोई गम नहीं.. सत्ता के दरवाजे पर बिछे कालीन पोंछ देंगे न जूतों पर लगा लहू...!&lt;/p&gt; &lt;p&gt; पानी के कटोरों सरीखी कई जोडी आंखॆं देख रही हैं हमारी ओर ! देखो हम धिक्कार रहे हैं भीमकाय ,नाल ठुके जूतेधारी को...!..... वो साला बर्बर है...लोकतंत्र का हत्यारा है....महा अमानवीय है ....नरपशु है.......सत्ता का जोंक है......नाश हो सत्यानाशी का...&lt;/p&gt; &lt;p&gt;........बस&amp;nbsp; बस बस ..अब हमारी गालियां चुक रही है.... ..हमारी जबान पथरा रही है...... जल रही है ..... कहीं जल नहीं है !... है तो बस सिकती- धधकती हुई रेत&amp;nbsp; और उसमें धू धू कर जलता मानव......!&lt;/p&gt; &lt;p&gt; &lt;div class="wlWriterSmartContent" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:d3decc67-bf62-4a70-addc-bc0b5ac40053" style="padding-right: 0px; display: inline; padding-left: 0px; float: none; padding-bottom: 0px; margin: 0px; padding-top: 0px"&gt;Technorati Tags: &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae" rel="tag"&gt;नंदीग्राम&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be" rel="tag"&gt;हिंसा&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%aa%e0%a4%a3%e0%a5%80" rel="tag"&gt;टिप्‍पणी&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a7" rel="tag"&gt;प्रतिरोध&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/p&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-7777325683915127439?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/7777325683915127439/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=7777325683915127439' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7777325683915127439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7777325683915127439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/11/blog-post.html' title='न बुझे है किसी जल से ये जलन....'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-4376279824515512800</id><published>2007-10-28T13:38:00.001+05:30</published><updated>2007-10-28T13:38:05.382+05:30</updated><title type='text'>ओ$म सुपर सेक्सी कालाय नम:</title><content type='html'>&lt;p&gt;आज जमाना सुपर फास्ट हो गया है ! जब से हमने उस सुप्रीम पावर वाले भगवान की सुपीरियोरिटी के भगोने में छिद्र कर दिया है तब से हम सुपर उन्मुक्त हो चले हैं ! सुपर बाजार से सामान खरीदते हैं , सुपर सफेद कपडे पहनते हैं ,सुपर्ब सुपर्ब कहकर अपने सौंदर्यबोध को जाहिर करते हैं ! अब किसी हिंदी फिंदी वाले से मत पूछ लिया जाए कि भैया मतलब समझत हो स्सुपर का ! बेचारा वह अपने सुपर साहित्यिक लहजे मॆं हडबडिया सुपरफिशियल जवाब दे डालेगा _सुपर माने सुन्दर पर !हे हे !! इस सुपर सांइंटिफिक जमाने&amp;nbsp; में ऎसे सुपर बेकवर्ड को कोई तो उबारो रे ! खैर हम तो कह यह रहे थे कि भैया आजकल सुपर सेल मॆं कुछ भी माल लगा दो और बेचो _बस ये ध्यान रखो कि माल के सुपर एट्रेक्टिव कवर पर सुपर लफ्ज जरूर लगा हो ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अब आजकल के गानों को ही देख लो ! हर सुपर सेड्यूसिव गाने मॆं सुपर सेक्सी नायक नायिका गण गा रहे होंगे "आय एम सुपर सेक्सी , य़ू आर सुपर सेक्सी " ! अब सेक्स भी सुपर की गारंटी के पैकेज में है जिससे मिले सुपर सेटिस्फेक्शन ! सेटिस्फेक्शन जो सुपर बाजार से सुपर शापिंग करने या सुपर रिन की चमकार मारते कपडों को पहनने के समतुल्य ही है ! ये वो सेटिस्फेक्शन है जो सुपर सेक्स काड्यूट गाते नायक नायिका वृंद से इतर हर दर्शक के सुपर कांप्लेक्सिटीज से भरे मन की आकुल व्याकुल पुकार है ! हर उघडी नायिका सुपर डांस के सुपर एक्टेव झटके मारती कह रही है सिर्फ मुझे ही पाओ क्योंकि मैं ही हूं सुपर सेक्सी !वात्स्यान मुंह सिकोडे खडे हैं रीतिकाल के कविगण अपने कथित अश्लील काव्य को सुच्चा साबित कर पा रहे हैं ! वहां सब कुछ शास्त्रीय था - पर नायक का परनायिका से प्रेममिलन या संभोग रस की कोटि का गायन ! ये सुपर कॉंवेश्नल काल बीत चुका ! अब जमान है हर गली मॆं सुपर सेक्स और सुपर सेक्सी की धूम का !&amp;nbsp; सुपर सेक्स का रसाभास करो और इस नाम की भूतनी या भूत से डसे जाओ ! अब सब कुछ सुपर हॉट है !&amp;nbsp; मौका हो हो या सेल हो गाना हो या खेल हो सब कुछ है सुपर सिजलिंग !&amp;nbsp; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;बाजार रूपी थाली में हरएक के लिए खास तौर पर सजा अर्ध्य _ 'भागो और भोग लो!&amp;nbsp;&amp;nbsp; " कर्म का भोग भोग का कर्म "-&amp;nbsp; ये कौन बोला रे ? अब बोलो- भागकर भोग कर लो कर्म करो तो सिर्फ भोग का !&amp;nbsp; ओ सुपर सेक्सी युग के&amp;nbsp; सुपर नॉटी&amp;nbsp; बालक-बालिकाओ !! गांठ बांध लो सुपर टाइट क्यॉकि यही है आज का सुपर मंत्रा !!बोलो ओ$म सुपर सेक्सी कलाय नम: ..!!'&lt;/p&gt; &lt;p&gt; ! &lt;/p&gt; &lt;div class="wlWriterSmartContent" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:51514d82-c9be-4966-9ea8-c1c1cade6d5b" style="padding-right: 0px; display: inline; padding-left: 0px; padding-bottom: 0px; margin: 0px; padding-top: 0px"&gt;Technorati Tags: &lt;a href="http://technorati.com/tags/Super" rel="tag"&gt;Super&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/super%20sexy" rel="tag"&gt;super sexy&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%b0" rel="tag"&gt;सुपर&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b8%e0%a5%80" rel="tag"&gt;सेक्‍सी&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%9a%e0%a4%a8" rel="tag"&gt;विवेचन&lt;/a&gt;&lt;/div&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-4376279824515512800?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/4376279824515512800/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=4376279824515512800' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4376279824515512800'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4376279824515512800'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/10/blog-post_28.html' title='ओ$म सुपर सेक्सी कालाय नम:'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-7975970622613281321</id><published>2007-10-27T16:40:00.001+05:30</published><updated>2007-10-27T16:50:53.684+05:30</updated><title type='text'>अगर मुन्नी न हो तो?</title><content type='html'>&lt;p&gt;मुन्नी मेरी बेटी या पास पडोस की किसी साफ सुथरी सी राज दुलारी का नाम नहीं है यह नाम है मेरे घर में काम करने वाली पन्द्रह सोलह साल की लडकी का ! मुन्नी अपने बहुत&amp;nbsp; काले रंग की आलोचना बहुत बेरहमी से करती है ! अपने खुरदरे हाथों बिवाइयों से भरे पैरों की ओर देखकर अक्सर हंसती हुई कहती है "वाह क्या किस्मत देकर भेजा है भगवान ने हमें " पर अगले ही पल कहने लगती है "पर भाभी दुनिया में सभी तो परेशान हैं ! पैसे वाले तो और भी ज्यादा हर समय डरते हैं मोटापे से ,गंदगी से कामवाली के छुट्टी कर लेने से -अजीब अजीब चीजों से परेशान रहते हैं "!&amp;nbsp; मुन्नी के जीवन दर्शन के आगे मैं अपनी थकावट और वक्त की कमी से हुई झंझलाहट को बहुत थुलथुली महसूस करने लगती हूं !मुन्नी महीने में सिर्फ चार दिन नहीं आती है! छुट्टी करने से पहले ही वह हर घर में बता देती है ! पर एक दो घरों में वह छुट्टी के दिन भी आकर कामकर जाती है! जब मैंने पूछा कि वह ऎसा क्यों करती है तो उसने बताया कि इससे उसे महीने के चार सौ रुपये और मिल जाते हैं ये उसके अपने होते हैं इसे मां को नहीं देना होता ..!&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/p&gt; &lt;p&gt; मुन्नी हर सुबह अपनी मां के साथ ठीक 6 बजे आ जाती है !मां बेटी मिलकर कई घर निपटाते हैं _सफाई ,बरतन और कपडों की धुलाई ,गमलों को पानी देने ,फ्रिज साफ करने जैसे कई काम निपटाती हुई शाम को 7 बजे तक घर जाती है !मुन्नी के पिता दिनभर सोसाइटी के बाहर रिक्शा लेकर खडे रहते हैं और सोसाइटी की महिलाओं को आसपास के बाजारों तक पहुंचाने का काम करते हैं ! मुन्नी कई घरेलू महिलाओं के घरों का काम करती है !&amp;nbsp; मुन्नी अक्सर बुडबुडाती हुई काम करती है "फलां नंबर वाली आंटी मुझे नाश्ता क्या करा देती हैं अपमना गुलाम ही समझने लगती हैं ,जब चाहे बुला लेती हैं फालतू काम कराती हैं ! पर भाभी मैं मना नहीं कर पाती क्योंकि एक बार मेरे पेट में दर्द हुआ था तो उन्होंने अपने पैसो से इलाज कराया था अल्ट्रासाउंद के पैसे भी लगाए मुझपर.." ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;मुन्नी अक्सर हंसती रहती है ! वह अखबार की सनसनीखेज खबरों पर बातें करते हुए झटपट काम निपटाती चलती है ! फिल्मों पर खासकर हाल ही में देखी फिल्म के सामाजिक संदेश पर अपनी राय देती बरतनों की जूठन हटाती चलती है ! वह अक्सर थकी होती है पर जब मेरी हडबडी और व्यस्तता और थकावट देखती है तो फौरन&amp;nbsp; आराम करने या दवा ले लेने की सलाह दे डालती है !मुझे पता है ,उसे भी पता है कि उसके एक दिन न आने पर मेरी दिनचर्या बुरी तरह प्रभावित हो जाती है -अखबार अधपढी रह जाती है या फिर कॉलेज के लिए क्लास की तैयारी पूरी नहीं हो पाती है या नेट देवता और ब्लॉग देवता के दर्शन तक नहीं हो पाते हैं या किसी एक वक्त का खाना खाने के लिए आसपास के भोजनालयों का मैन्यू टटोलना पडता है !&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;कभी कभी मैं सोचती हूं कि &lt;strong&gt;अगर वह और अधिक समझदार हो गई तो धीरे धीरे वह समझने लगेगी कि बौद्दिक ,रचनाशील ,क्रंतिकारी और संधर्षशील स्त्रियों के इस समस्त कुनबे के बने रहने में उसका कितना हाथ है ! &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;अक्सर वह मुझे कंप्यूटर पर काम करते देखती है और अक्सर जानना चाहती है कि मैं कंप्यूटर पर क्या करती रहती हूं !&amp;nbsp; सो पिछ्ले दिनों&amp;nbsp; मैंने उसे अपना ब्लॉग दिखाया और अपने काम के बारे में बताया ! उसने तारीफ के भाव से ब्लॉग को देखा , ब्लॉग पर लगी मेरी फोटो को सराहा ! फिर उसने बहुत रहस्य भरे लहजे में बताया कि उसका बडा भाई भी काफी समय से कंप्यूटर की एक दुकान पर काम कर रहा है और कंप्यूटर&amp;nbsp; काफी कुछ सीख चुका है ! उसकी आंखों में चमक और आवाज में उमंग थी वह बोली -"&amp;nbsp; भाभी मैं भी अपने भाई से कहकर अपनी फोटो कंप्यूटर पर लगवाउंगी ताकि मुझे भी दुनिया देख सके जैसे आपको देखती है पर क्या लिखूंगी कैसे लिखूंगी&amp;nbsp; ये नहीं पता ........."! मुन्नी काफी देर गहरी सोच में डूबी रही ......मेरे मन ने कहा कि मुन्नी जो तुम कह सकती हो वह मैं नहीं इसलिए तुम लिखो... .....मुन्नी ने अभी तक नहीं लिखा है पर मैंने लिख दिया है ...उसके बारे में !मैं अक्सर सोचती हूं कि अगर मुन्नी न हो तो.....?&lt;/p&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-7975970622613281321?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/7975970622613281321/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=7975970622613281321' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7975970622613281321'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7975970622613281321'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/10/blog-post_27.html' title='अगर मुन्नी न हो तो?'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-5683999248159920094</id><published>2007-10-24T11:38:00.001+05:30</published><updated>2007-10-24T11:45:11.323+05:30</updated><title type='text'>क्या है जिंदगी क्या हो जिंदगी</title><content type='html'>&lt;p&gt;जिंदगी कितनी एब्सर्ड हो चली है इसका अंदाजा कभी कभी ही लग पाता है ! नौकरी की भागमभाग ,सडकों का ट्रेफिक ,संबधों की उलझन ,भविष्य की चिंता ,पानी बिजली फोन के बिलों , बच्चों की पढाई और भी सैकडों कामों- तनावों -हडबडियों के बीच जीते हम ! वक्त पैसा और लगन की त्रयी के बिना कहां हो पाता है जीवन रूपी नाटक का एक भी अंक पूरा ! हम रोज सोचते हैं कि शायद आज का ही दिन ऎसी हडबडी और रेलमपेल का आखिरी दिन था -कल तो जरूर सुकून का दिन आएगा और हम अपने अधूरे छूट गए कामों को कर पाऎगें ! पर ऎसा सुकून का दिन तलाशना एक दिवास्वप्न सा लगने लगता लगता है ! तारे गिनने , उगते सूरज को देखने ,बादलों की बनती संवरती छवियों को निहारते चले जाने या कि खुद से बात करने के बीच शोर है बाजार है, घडी है , गाडियां और बिल्डिंगें हैं ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;इस मोबाइल जीवी युग के प्रणेता हम लाभ-हानि, कर्म-अकर्म , अहमन्यता-सामाजिकता का व्याकरण बिना चूके रट लेना चाहते हैं ! मैं- मेरा -मुझे की लगन मॆं डूबा मन बाजार को अपना सबसे बडा हितैषी गुरू मानता है !&amp;nbsp; गडबडी ,जल्दबाजी ,ठेलमठाली के मंत्र के बिना भी क्या श्हर में रहा जा सकता है ?यहां हमेशा बेहतर चुनाव करना होता है ! यहां के गणित को हमेशा अन्यों से अधिक गहराई से समझते रहना होता है ! यहां प्रगति और विकास के व्यक्तिगत पाठों को लगातार पढते चलना होता है ! यहां समाज ,सामाजिकता ,सामाजिक नैतिकता , सामाजिक निष्ठा जैसे आउटडेटिड लफ्जों पर सिर्फ हंसना होता है ! जयशंकर प्रसाद की इडा का हर तरफ बोलबाला है ..कहां है श्रद्धा ? नहीं श्रद्धा को ढूंढना बेमानी है ! वह हमारे भीतर ही तो है ! पर हम नहीं सुनेंगे उसकी आवाज ,क्योंकि वह जो कुछ कहेगी उसे हम बहुत अच्छे से वाकिफ हैं पर वह वाकिफ नहीं इस सच से कि हम ट्रैप्ड हैं जिस सांस्कृतिक दुष्चक्र में वहां केवल वही सर्वाइव करेगा जो सबसे ज्यादा निष्ठुर होगा&amp;nbsp; ! श्रद्धा !! तुम्हारी आवाज सुनने के लिए जो दो पल ठहरे तो कुचले जाऎगे पीछे आने वाली भीड के पैरों तले..!&lt;/p&gt; &lt;p&gt; तो आज हमारे पास&amp;nbsp; बहाने हैं, वाजिब कारण हैं ,लधुता का बोध है , जिनके आगे हम लाचार हैं ! सो वही केवल वही कर पा&amp;nbsp; रहे हैं जिससे कि केवल जीवन चलता रहे सकुशल ! कोई बडा सपना कोई बडा संघर्ष ,कोई बडा जज्बा नहीं जिसके लिए हमारे भीतर बची रह गई हो थोडी निष्ठा ,थोडा सा समर्पण ..! क्या हम कभी नहीं चुन पाऎगे अपनी पसंद की हवा ..सांस लेने के लिए और क्या अब हम कभी नहीं महसूस पाऎगे अपने खंडित व्यक्तित्व को....!&lt;/p&gt; &lt;p&gt; जिंदगी की इस एब्सर्ड एकांकी का कोई तो सार्थक, ओजमय ,कर्ममय निष्कर्ष पाना होगा ...!!&lt;/p&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-5683999248159920094?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/5683999248159920094/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=5683999248159920094' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5683999248159920094'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5683999248159920094'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/10/blog-post_24.html' title='क्या है जिंदगी क्या हो जिंदगी'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-730419625370302704</id><published>2007-10-04T13:15:00.001+05:30</published><updated>2007-10-04T13:15:05.926+05:30</updated><title type='text'>दिल दोस्ती ऎट्सेक्ट्रा ..वाया सेक्स दुश्मनी ऎट्सेक्ट्रा...</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;a href="http://lh3.google.com/neelimasayshi/RwSZ5T-hcmI/AAAAAAAAANo/dXM6xQKlrT0/dil1%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="301" alt="dil1" src="http://lh5.google.com/neelimasayshi/RwSZ6z-hcnI/AAAAAAAAANw/nj8Ijx8io1s/dil1_thumb%5B1%5D.jpg" width="260" border="0"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;"क्या तुम एक ही दिन में तीन लडकियों से कर सकते हो "--&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;-प्रकाश झा की फिल्म दिल दोस्ती ऎटसेक्ट्रा के पात्र संजय मिश्रा के द्वारा अपने मूल्य विभ्रमित जूनियर अपूर्व से पूछे गए इस सवाल से फिल्म शुरू होती है! &lt;/p&gt; &lt;p&gt; यह फिल्म दिल्ली युनिवर्सिटी की पृष्टभूमि में आज के नवयुवा की जिंदगी के पहलुओं को दिखाने का प्रयास है ! फिल्म में होस्टल लाइफ की उन्मुक्तता , भारतीय युवा की नव -अर्जित सेक्स फ्रीडम ,विश्वविद्यालयी राजनीति ,दोस्ती कुंठा सब कुछ है ! ये वह माहौल है जहां भारतीय युवा अपने क्लास कांसेप्ट से जूझने के दौरान अपने लिए किसी रास्ते की तलाश में जुटे हैं !&amp;nbsp; फिल्मकार ने दिल्ली के नवधनाढय और धनाढय तथा बिहार से आए छात्रों के बहाने आधुनिक भारतीय समाज की वर्ग संरचना और मूल्य संघर्ष को दिखाया है !&amp;nbsp; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;यह फिल्म अपनी बनावट में बहुत बडें लक्ष्‍य को लेकर नहीं चली है ! किसी भी पात्र से बहुत आदर्शात्मकता की &lt;a href="http://lh5.google.com/neelimasayshi/RwSZ7z-hcoI/AAAAAAAAAN4/_FJPRhrgjUw/dil2%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="147" alt="dil2" src="http://lh3.google.com/neelimasayshi/RwSZ9T-hcpI/AAAAAAAAAOA/KYGaXjjlFKI/dil2_thumb%5B1%5D.jpg" width="204" align="left" border="0"&gt;&lt;/a&gt;उम्मीद नहीं की गई है !&amp;nbsp; फिल्म की संवेदना को उभारने के लिए कोई बडा प्रतीक नहीं उठाया गया है ! अपूर्व और संजय मिश्रा इन दो चरित्रों के विपरीत जीवन दृष्टिकोणों के फिल्माकंन के बहुत सामान्य पर बहुत सटीक तरीके अपनाए हैं फिल्मकार ने ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अपूर्व अपने हाइक्लास पिता से पैसा लेकर कोठे पर जाता है ! वह कहता है कि&amp;nbsp;&amp;nbsp; - &lt;em&gt;&lt;strong&gt;"मेरे लिए कॉलेज और कोठे में फर्क करना मुश्किल हो गया है "&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&amp;nbsp; ! वह वैशाली नाम की वेश्या से जिस संबंध में स्वयं को पाता है&amp;nbsp; उसकी व्याख्या वह नहीं कर पाता है ! न ही स्कूली छात्रा किंतु से सेक्स संबंध स्थापित करने में वह प्यार जैसे किसी मूल्य की जरूरत को मानता है ! वेश्यालय में टंगी भगवान की मूर्ति को मोड कर सेक्स क्रिया में रत होता है जिसपर वेश्या वैशाली को बहुत ताज्जुब होता है ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.google.com/neelimasayshi/RwSZ-j-hcqI/AAAAAAAAAOI/e9TwOLoiu0s/dil3%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="150" alt="dil3" src="http://lh6.google.com/neelimasayshi/RwSaAD-hcrI/AAAAAAAAAOQ/bNsc9etx7Fk/dil3_thumb%5B1%5D.jpg" width="204" align="right" border="0"&gt;&lt;/a&gt; संजय मिश्रा अपनी जातीय अस्मिता और अपनी मध्यवर्गीय मूल्य संरचना को संभाले रहने वाला पात्र है ! वह स्वंय को एक अति संपन्न सहपाठिनी प्रियंका से प्रेम और समर्पण की स्थिति में पाता है और अपने इस संबंध अपने भविष्य और लक्ष्‍य को लेकर एकाग्र है ! जबकि प्रियंका अपने पिता के संपर्कों के सहारे मॉडल बनना चाहती है !उसके लिए सेक्स शरीर की जरूरत है न कि कोई प्रेम का प्रतीक या मूल्य ! वह संजय से अपने प्रेम को लेकर श्योर है न ही वह अपने दोस्त अपूर्व से काम संबंध बना लेने को किसी भावना से जोडकर देखती है! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;फिल्म अपने ट्रेजिक ऎंड में अपनी इस उत्तरआधुनिक स्थिति को दिखाती भर है - कोई मूल्य निर्णय नहीं थोपती ! संजय मिश्रा के लिए कॉलेज एलेक्शन जीतना प्रेम को समर्पण भाव से करना और कैरियर बनाना है जबकि अपूर्व को संजय के चुनाव के दिन तक तीन लडकियों से संभोग कर लेना है जिसकी शर्त वह अपने दोस्तों से पहले ही लगा चुका है !अपूर्व संभोग करता है संजय की प्रेमिका प्रियंका से ! संजय चुनाव जीतता है- दोस्ती और प्रेम के इस रूप को स्वीकार नहीं कर पाता और मृत्‍यु को प्राप्‍त होता है ! ....&lt;/p&gt; &lt;p&gt;यह फिल्म दो परिस्थितियों की टकराहट है दो वर्गों और उनकी मूल्य दृष्टि की टकराहट है ! यहां दिल प्रेम की वस्तु नहीं दोस्ती निभाने की वस्तु नहीं ! यहां अवसर , शरीर की जरूरत, सेक्स में भोग और दुश्मनी है ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अंतत: संजय नहीं रहता और कोठे पर जाने वाला और एक ही दिन कमें तीन लडकियों से सेक्स करने वाला अपूर्व जीता है और सेक्स और सेक्स मॆं नएपन की तलाश में डांसबारों और पार्टियों में भटकता है !.....&lt;/p&gt; &lt;div class="wlWriterSmartContent" id="scid:0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:36fb84ab-6a4b-4b29-91f0-f5153f36db90" style="padding-right: 0px; display: inline; padding-left: 0px; float: none; padding-bottom: 0px; margin: 0px; padding-top: 0px"&gt;Technorati Tags: &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae%20%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be" rel="tag"&gt;फिल्‍म समीक्षा&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/movie" rel="tag"&gt;movie&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/dil%20dosti%20etc" rel="tag"&gt;dil dosti etc&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/Prakash%20jha" rel="tag"&gt;Prakash jha&lt;/a&gt;&lt;/div&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-730419625370302704?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/730419625370302704/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=730419625370302704' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/730419625370302704'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/730419625370302704'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/10/blog-post_04.html' title='दिल दोस्ती ऎट्सेक्ट्रा ..वाया सेक्स दुश्मनी ऎट्सेक्ट्रा...'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-6843055644173444340</id><published>2007-10-03T23:47:00.001+05:30</published><updated>2007-10-04T00:20:31.263+05:30</updated><title type='text'>मेरी पहचान मुझे लौटा दो ब्‍लॉगवालो</title><content type='html'>&lt;p&gt;ब्‍लॉगिंग की दुनिया के डाइनासोर तो नहीं हैं हम, पर एकदम नए भी नहीं रहे। साल भर होने को आया। बड़ा तो नहीं है पर गलतफहमी पाले रहते हैं कि छोटा सा नाम तो है ही। ब्‍लॉग शोधार्थी हैं, ब्‍लॉगर भी। पर एकाएक गड़बड़ हो गई लगता है। गड़बड़ यह है कि हमारा नाम चोरी हो गया है। साफ साफ समझाया जाए- &lt;/p&gt; &lt;p&gt;ये &lt;strong&gt;&lt;a href="http://narad.akshargram.com/archives/author/neelima/" target="_blank"&gt;नारद पर नीलिमा&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; की लिखी पोस्‍टों के लिए कैप्‍चर्ड छवि देखें-&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.google.com/neelimasayshi/RwPcnz-hciI/AAAAAAAAANI/ez29N7DYQD8/name%20swap%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="321" alt="name swap" src="http://lh6.google.com/neelimasayshi/RwPcpT-hcjI/AAAAAAAAANQ/zshPt3yOSrA/name%20swap_thumb%5B1%5D.jpg" width="266" border="0"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;देखा आपने ये हमारी तस्‍वीर जिन पोस्‍टों के साथ दिख रही है वे हमने नहीं लिखीं वे तो एक अन्‍य ब्‍लॉगर साथी&amp;nbsp; &lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/14754898614595529685" target="_blank"&gt;नीलिमा सुखिजा अरोरा&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; ने लिखी हैं। ऐसा नहीं है कि केवल नारद से ही यह गड़बड़ हुई, &lt;strong&gt;&lt;a href="http://chitthajagat.in/?chitthakar=neelima" target="_blank"&gt;चिट्ठाजगत पर नीलिमा&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; लेखक की प्रविष्टियॉं के लिए छवि ये है- &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.google.com/neelimasayshi/RwPcrD-hckI/AAAAAAAAANY/fvkG5sYK5sw/name%20chittha%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="281" alt="name chittha" src="http://lh6.google.com/neelimasayshi/RwPcsT-hclI/AAAAAAAAANg/Z86IcUhBTcw/name%20chittha_thumb%5B1%5D.jpg" width="328" border="0"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;यानि वहॉं भी हम दो नीलिमाओं की पहचान गड्डमड्ड है। यूँ इसमें दोष किसी का नहीं है, सिवाय इस बात के कि तकनीक इन दो नामों से भ्रमित हो रही है। और नारद ने अति उत्‍साह में हमारी तस्‍वीर जो उनके पास हमारे दो ब्‍लागों के कारण पहले से ही थी, &lt;strong&gt;&lt;a href="http://neelima-mujhekuchkehnahai.blogspot.com/" target="_blank"&gt;नीलिमा सुखिजा जी के ब्‍लॉग&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; को हमारा तीसरा ब्‍लॉग मानकर चस्‍पां कर दी और फिर ईमेल किए जाने पर भी किसी कारण हटा नहीं पाए। इस प्रकरण में हमें वो स्‍कूली दिन याद आए जब एक ही कक्षा में कविता, सीमा जैसे नाम एक ये ज्‍यादा होने पर फर्स्‍ट, सेकेंड कहकर काम चलाते थे पर वो तो यहॉं शायद हो नहीं सकता पर जो हो सकता हो किया जाए पर पहचान के इस घालमेल को खत्‍म करो भई।&lt;/p&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-6843055644173444340?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/6843055644173444340/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=6843055644173444340' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/6843055644173444340'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/6843055644173444340'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/10/blog-post.html' title='मेरी पहचान मुझे लौटा दो ब्‍लॉगवालो'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-8391540513952466760</id><published>2007-09-25T16:24:00.001+05:30</published><updated>2007-09-25T16:33:27.941+05:30</updated><title type='text'>मुझे कदम कदम पर चौराहे मिलते हैं बाहें फैलाए</title><content type='html'>&lt;p&gt;रोज कुंआ खोदो और पानी पियो -वाली कहावत का रचयिता हमारी नजरों में अब तक का सबसे बडा दूरदर्शी था जिसने बहुत पहले ही ब्लॉगिंग करने वालों की नियति का बहुत पहले ही अंदाजा लगा लिया था !यहां एक दिन भी नागा कर जाना आपका पेज रैंक गिरा सकता है ,श्रद्धालु पाठकों की भीड का रुख मोड सकता है , धडाधड महाराज की नजरों में आपकी इज्जत का फलूदा बना सकता  है ! यहां बडे बडे लिखवैये बिना नागा लिख रहे हैं और हम हैं कि रोज परेशान रहते हैं कि आज क्या लिखॆंगे !बहुत काम का मसला न मिलने पर लगता है कि कम काम के मुद्दों को ही उठा लिया जाए ! हर समय काम के और खूबसूरत मसलों पर लिखना भी जरूरी नहीं है ! कभी कभी दिमाग के तंतुओं को आराम की छूट हम दे देंगे तो छोटे नहीं कहलाने लगेंगे ! क्या लिखॆं ? का जवाब जैसे ही पा लेते हैं क्यों लिखॆं&amp;nbsp; ? का सवाल सामने लहराने लगता है! क्या लिखॆं का जवाब खोजते हुए इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि बस कुछ भी लिख डालो ! और क्यों लिखें का सवाल हमॆं इन निष्कर्षों पर पहुंचा देता है कि लिखो शायद क्रंति हो जाए ,या कि किसी को आपका लिखा पसंद आ जाए और वह आपकी भाषा में अपने दिल की बात पढ पाए ,या हो सकता है कि आत्मसाक्षात्कार हो जाए ,या फिर कि आज तो बस लिख डालो पेज रैंक तो बच जाएगा -कल देखॆंगे कुछ बढिया सा लिख सके तो .....&lt;/p&gt; &lt;p&gt;ठीक इसी जद्दोजहद की वजह से कभी कभी हमें मुक्तिबोध की कविता "मुझे कदम कदम पर" बिलकुल भी समसामयिक नहीं लगती की लगती जिसमें वे कहते हैं कि आज के लेखक की दिक्कत यह नहीं कि कमी है विषयों की बल्कि विषयों की अधिकता उसे बहुत सताती है और वह सही चुनाव नहीं कर पाता है कि किस पर लिखे ! जब मुक्तिबोध लिखते हैं कि "मुझे कदम पर चौराहे मिलते हैं बाहें फैलाए -एक पैर रखता हूं सौ राहें फूटतीं " तब हम इसमें निहित समसामयिकता तभी देख पाते है जब हम यह मान लेते हैं कि भई यह तो बडे कवियों के लिए कही गई बात है हम छोटे कवियों पर कैसे लागू हो सकती है ! खुद को छोटा लिखवाडी मान लेने पर न कोई बंधन होता है न नैतिक बोझ का दबाव न विषय चयन की समस्या से ही गुजरना पडता है ! सो हम बच जाते हैं ,नागा भी कर पाते हैं महान विषयों पर कलम चलाने के जोखिम की संभावना का तो कोई सवाल ही नहीं उठता !&lt;/p&gt; &lt;p&gt;.... हां ठीक ऎसे में ही कलम चलती है अपनी मर्जी से हमारे भीतर के लेखक के इशारे पर नहीं ! कलम खुद कहती है कहानी बिना लागलपेट के साफगोई से ..! जहां हमारा महान लेखक अपने वजन के तले नहीं दबा पाता कलम को ! जहां कलम हल्की होकर चलती है !जहां कलात्मक मन देख पाता है वे राहें जिनपर अभी हम चले नहीं जो बीहडों से होकर गुजरती हैं और जो शायद बहुत बहुत लंबी हैं कि जिनपर चलते चलते पैरों में उठ आऎ फफोले ..घाव ! पर हम जब भी चलते हैं इन बीहडों से गुजरते रास्तों पार् तो होता है&amp;nbsp; सत्य सुंदर और शिव का कलात्मक अभिव्यंजन.....शाश्वत अभिव्यंजन...&lt;/p&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-8391540513952466760?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/8391540513952466760/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=8391540513952466760' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8391540513952466760'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/8391540513952466760'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/09/blog-post_25.html' title='मुझे कदम कदम पर चौराहे मिलते हैं बाहें फैलाए'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3163518952110925976</id><published>2007-09-20T12:29:00.001+05:30</published><updated>2007-09-20T12:39:12.512+05:30</updated><title type='text'>जरा हौले हौले चलो मोरे साजना हम  भी पीछे हैं तुम्हारे....?</title><content type='html'>&lt;p&gt;स्त्री का परंपरागत संसार बडा विचित्र भी है और क्रूर भी है -यहां उसकी सुविधा ,अहसासों , सोच&amp;nbsp; के लिए बहुत कम स्पेस है !गहने कपडे और यहां तक कि वह पांव में क्या पहनेगी में वह अपनी सुविधा को कोई अहमियत देने की बात कभी सोच भी नहीं पाई ! अपने आसपास की लडकियों महिलाओं के पहनावे की तरफ देखते हैं तो उनकी जिंदगी की विडंबना साफ दिखाई देती है ! घर बाजार ऑफिस हर जगह दौडती स्त्री पर भरपूर नजाकत लाने और पर-ध्यान को केन्द्रित करने की पुरजोर आशा में अपने पहनावे को सहूलियत के साथ बहुत बेरहमी से अलग करे दीखती है ! परंपरागत महौल में पली बढी यह स्त्री अपने दर्शन में स्पष्ट होती है --कि उसका जीवन सिर्फ पर सेवा और सबकी आंखों को भली लगने के लिए हुआ है ! छोटी बच्चियां घर- घर , रसोई -रसोई ,पारलर-पारलर खेलकर&amp;nbsp; इसी सूत्र को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेने की ट्रेनिंग ले रही होती हैं .......ठीक उसी समय जब उसकी उम्र के लडके गन या पिस्तौल से मर्दानगी के पाठ पढ रहे होते हैं या कारों की रेस या बेमतलब की कूद -फांद- लडाई -झगडे के खेल खेल रहे होते हैं&amp;nbsp; ! एक जगह घर रचा जा रहा है एक जगह बाहर ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;कोई कह सकता है कि यही है गहरे संतुलित समाज की नींव ! वेलडिफाइंड ! गाडी के दो पहिए अपनी अपनी पटरी से बंधे ..! हम कहेंगे नहीं नहीं ! सौ बार नहीं ! अपनी कॉलेज की बच्चियों को भी कभी कभी समझाते हैं ! वे नहीं समझना चाहतीं !ज्यादातर निम्न या मध्य वर्गीय परिवारों से आई हुई ये छात्राऎं अपने लिए बेहद असुविधाजनक पहनावे में आती हैं ! गर्मी व उमस में सिंथेटिक कपडे , बेहद ऊंची हील के सैंडल बार बार फिसलते दुपट्टे में जडी तरह तरह की लटकनें ....&lt;/p&gt; &lt;p&gt;कभी कभी आसपास नवविवाहित जोडों को देखने पर भी अजूबा होता है !&amp;nbsp; रास्तों में बाजारों में काम की जगहों में चमकीले तंग कपडों में फंसी ,पल्ला और उसकी जगह जगह उलझती लटकनें संभालती रंगी पुती&amp;nbsp; स्त्रियां ! अपने आप संभलकर चल पाने में असमर्थ पति की बाहं का सहारा लिए लिए कभी कभी लुढकने को होती स्त्रियां ! अजीब अजीब प्लेटफार्म वाले सैंडलों की हीक को मेट्रो और उसके प्लेटफार्म की दरार से निकाल कर हडबाडाती स्त्रियां ! अपने फिसलने पल्लू को संभालकर कंधे पर डालते हुए अपने पीछे खडी सवारी के मुंह पर मारती स्त्रियां ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;इनके लिए ये नजाकत है ..फिमिनिटी है ..मजबूरी है ...फैशन है ... पता नहीं ! पर इतना तो साफ है कि ये अब घर में बंद सजी धजी घर संवारती घरहाइन नहीं रहीं है ! रीतिकाल भी अब जा चुका ! ये तो निकली हैं पढने.....लडने ...जूझने....! बराबरी&amp;nbsp; पर आने .. !पर अपने संधर्ष में अपने ही साथ नहीं हैं ये पैरों की हील ,ये पल्लू ,ये लटकन , ये नजाकत ! कहां से आ जाएगी बराबरी ! कैसे चलेगी मर्द को पीछे छोडती ये आगे ! ..क्या यही कहना होगा कि आप जरा धीरे चलें क्योंकि हम आपसे तेज नहीं चल सकतीं या अपनी ही चाल को बनाना होगा दुरुस्त , तेज और दमदार .........तो बदलें खुद को .....? और करें शुरुआत पहनावे से ही .........?&amp;nbsp; .....और आओ कहें उससे कि तुम चलो अपनी चाल से अपनी गति से और अब हम चलेंगी अपनी चाल और गति से और तुम्हारे साथ चलेंगी ...आगे भी बढेंगी .... &lt;/p&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3163518952110925976?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3163518952110925976/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3163518952110925976' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3163518952110925976'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3163518952110925976'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/09/blog-post_20.html' title='जरा हौले हौले चलो मोरे साजना हम  भी पीछे हैं तुम्हारे....?'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3918212083020054708</id><published>2007-09-10T11:24:00.001+05:30</published><updated>2007-09-10T13:11:24.025+05:30</updated><title type='text'>दे आर BAD BAD गर्ल्स</title><content type='html'>&lt;p&gt;स्त्री विमर्श वाले बहसते विमर्शते रह गये और उधर लडकियों ने घोषणा कर डाली कि अब उनके अच्छे बने रहने का जमाना गया ! वे गा उठी 'वी आर बैड बैड गर्ल्स....जमाने को सुनना पडा कि वे कह रही हैं कि वे गंदी लडकियां हैं...."चक दे इंडिया "फिल्म की हॉकी टीम की लडकियां उद्बबाहु धोषणा करते हुए जो गीत गाती हैं वह है - &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ना तो रोटियां पकाऎगी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ना छ्त पे बुलाऎगी&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ना नंगे पैर आऎगीं &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ना हंस के रिझाऎंगी&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ना सर पे बिठाऎंगी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ना गोरी होके आंऎंगी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ना नखरे उठाऎंगी.....उन्हें नहीं दिखना सुन्दर -नाजुक और गोरी  ,उन्हें नहीं तैयारी करनी पूरा बचपन एक दूल्हे को रिझा लेने की ,वे नहीं करेंगी सेवा , उन्हें नहीं चाहिए तारीफ  या आपकी छाया ,आपका नाम ! वे नहीं अपने सपने छोडकर बाकियों के सपनों को पूरा करने की मशीन बनेगीं वे आपकी दी हुई जिंदगी नहीं जिऎंगी ....ये जिद की पक्की ,बहुत खूंखार ,बेशर्म ,अडियल , बेखौफ लडकियां हैं...&lt;/p&gt;&lt;p&gt; आह...... भौंह कटीली -आंखे गीली- घर की सबसे बडी पतीली भरकर भात पसाने वाली परंपरागत भारतीय लडकियों की बुद्धि कैसे भ्रष्ट हो गई ? संरक्षणशील लज्जाशील कर्तव्यशील शीलवती भारतीय लडकियां अब घरबार को दुत्कारकर इतनी बेपरवाह होकर निकल पडेगीं अपनी पसंद के रास्ते पर ! परिवार का क्या होगा ? समाज का क्या होगा ? मर्दवादी संसचना का क्या होगा ? &lt;/p&gt;&lt;p&gt;उफ............. उफ ये छुट्टी लडकियां वह सब नहीं करेंगी जो अब तक करती आई हैं तो क्या करेंगी ? क्या पा लेंगी ? क्यों पा लेंगी ? वे साफ कह रही हैं कि वे अच्छी लडकियां नहीं हैं इसलिए उनसे कोई भी कोई उम्मीद न रखे ! वे अब वह करेंगी जो वे हमेशा से करना चाहती थी ! वे अब नहीं मानेगी किसी भी सत्ता को और न ही किसी संरचना से कोई भी उम्मीद करेंगी ! वे आपके बनाए खांचे को तोडकर बाहर निकल गई हैं और अब किसी भी खांचे को अपने आसपास नहीं बनने देगी ! वे खुद कह रहीं हैं और बहुत  साफ साफ कह रही हैं कि वे गंदी लडकियां हैं ! गंदी इसलिए क्योंकि आपके लिए अच्छी लडकियां जैसी होनी चाहिए वैसी वे नहीं हो सकती अब ! गंदी लडकियां कहलाने में जो आजादी है उसका भरपूर इस्तेमाल कर वे आपको और आपके ढांचों को ठेंगा दिखा देंगी !..................तब आप केंद्र में बैठे रहते थे जनाब और उन्हें अपने आसपास  उलझाऎ रखते थे अब वे आपमें नहीं उलझॆगी ! अपने रास्ते चुनेंगी और अपने भरोसे अपने तरीके से चलेंगी !&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आप क्या सोच रहे हैं कि ये क्रांति है उनकी या कि जंग है ? नहीं जी ये आपका और आपके ढांचों का उपहास है जिन्हें आपने बडे जतन और चालाकी से बनाए रखा अबतक ! जिन जडों में आपने नापतोल कर सिंचाई की वे अब आपकी करतूत पहचान गईं हैं इसलिए वे फैलेग़ीं जी भर फैलेंगी ......उन्होंने गंदी लडकियां होने के रिस्क को चुना है जानते बूझते चुना है.....वे आपकी मूल्य व्यवस्था को धता बताकर चल पडी हैं और आप उन मूल्यों की पोटली सर पर धरे बीच बाजार खडे हैं कि अब आपका क्या होगा ....? नहीं उन्हें गंदी लडकियां कहलाने में कोई ऎतराज नहीं ये उनके लिए गाली नहीं ! अच्छेपन के बोझ तले दबे रहना अब और नहीं गंदेपन के खिताब का वे पुरजोर स्वागत कर रहीं हैं !लडकियां आपको चुनौती रहीं हैं खबरदार उनके रास्ते में मत आना ...उन्हें रोकने की कोशिश मत करना ...उन्हें बांधने का ख्वाब मत देख लेना ....&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो देखो ...वे चमक रहीं ..वे हंस रहीं हैं ...उनपर अब कोई भार नहीं है ..कोई नकली आवरण अब नहीं ढोना है उन्हें....वे अपने बूते उडेंगी डूबेंगी तैरेंगी आप रोक नहीं पाऎगे.....सिर्फ इतना कह पाऎंगे .....वो देखो वो रही ...,.गंदी लडकियां ......&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;u&gt;येस दे आर बैड बैड गर्ल्स....&lt;/u&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3918212083020054708?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3918212083020054708/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3918212083020054708' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3918212083020054708'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3918212083020054708'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/09/bad-bad.html' title='दे आर BAD BAD गर्ल्स'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3523926039503778360</id><published>2007-09-07T12:58:00.001+05:30</published><updated>2007-09-07T15:21:18.557+05:30</updated><title type='text'>मुझे भी चांद चाहिए</title><content type='html'>&lt;p&gt;ये आम औरतें भागती दौडती सी हरदम &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्हें क्यूं चांद चाहिए &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने बहुत बार सुना है इन हांफती दौडती औरतों के मुंह से&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हां किसी दिन चांद चाहिए&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर अभी तो नहीं&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अभी तो अभी का झमेला ही बहुत है &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और चांद भी तो दूर है बहुत&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह भी कि--अभी तो पैरों की जमीन ही नहीं पा सकीं पूरी&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अभी तो चांद को देखने  भर का मौका नही &lt;/p&gt;&lt;p&gt;घर और बाहर बस बनाए रखने की जंग में लगी हूं अभी ! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;चांद चाहिए पर किसी मुनासिब वक्त पर&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब लगे कि हां पा ली जमीन भी&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये औरतें बातें करती हैं अक्सर एक दूसरे से &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऑफिस के रास्ते में ,बस के सफर में ....&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाजार के रास्ते में दो पल रुककर बतियाती ये औरतें अक्सर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बातचीत के बीच में शर्मिंदा हो रही होती हैं &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कि इस चुराये हुए वक्त में वे फलां काम &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कर लेतीं तो शायद सबके लिए अच्छा होता&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आंचल संभाले भागती  जूझती ये औरतें &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपना हर जरूरी काम कर रही होतीं हैं &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोई और जरूरी काम छोड कर....&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अक्सर दिखती हैं आसपास हाथ बढाकर&lt;/p&gt;&lt;p&gt; चांद को छूने की तमन्ना पाले औरतें &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सपनों में ये बुनती हैं पुल &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और हकीकत में सोच रही होतीं हैं अक्सर चांद.....&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3523926039503778360?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3523926039503778360/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3523926039503778360' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3523926039503778360'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3523926039503778360'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/09/blog-post_07.html' title='मुझे भी चांद चाहिए'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-151186459251024810</id><published>2007-09-04T08:50:00.001+05:30</published><updated>2008-12-09T20:56:35.518+05:30</updated><title type='text'>मैं यार बनाणा नी चाहे लोग बोलियां बोलें ...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/RtzR0rqWNQI/AAAAAAAAAM0/QttTS_2Tz1c/s1600-h/friend.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5106186780535043330" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/RtzR0rqWNQI/AAAAAAAAAM0/QttTS_2Tz1c/s400/friend.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;आजकल अपना ईमेल बाक्स खोलते ही एक दो ऎसे मेल जरूर दिख जाते हैं जिनमें पूछा गया होता है-- "इज फलां युअर यार ..." और आगे एक्सेप्ट या रिजेक्ट करने के उदार ऑप्शंस भी दिए गए होते हैं ! ऎसे रार- वादी युग में यार बनाने के इतने मौके हम सब को मिल रहे हैं और हम राग अलापते हैं कि समय बडा खराब आ गया है.... दोस्तों की कमी हो गई है ...भाईचारा खत्म हो रहा है ! भई हम तो अब ऎसे यारी के ऑफर पाकर इन दकियानूसी प्रलापी खयालों को तज चुके हैं ! दोस्ती के नए वर्चुअल कांटेक्स्ट में जीने का समय आ गया है और हम सब हैं कि अपने आस पास ओल्ड फैशंड मित्रता टाइप बातों की उम्मीद कर रहे हैं ! यार ये ग्लोबल युग है ! यहां बहुत दिल मिला कर पते के मित्र बनाने में लगे रहोगे , दोस्ती निभाने ..दोस्त के सुख दुख के साथी बनने या मित्र धर्म के पैमाने पर अपने और अपने मित्र को कसने के फेर में पडोगे तो बच्चू मारे जाओगे ! देखते नहीं टाइम कहां भाग रहा है ! अब दो चार दोस्तों से काम नहीं चल सकता दोस्त हों तो इतने कि सबों के नाम याद रखने मुश्किल हों जाऎं ....बनो तो इतनों के दोस्त बनो कि आपके नेट नाम के साथ लिखा दिखाई दे -'' फलां (220) या " ढिमकां (305) !ऎसे धांसू च फांसू (आलोक जी चोरी का इल्जाम न लगाऎ और कोई फेंकू च कैचू मुहावरा नहीं न मिला ) नाम - नंबर वाले, हममें हीन भावना की उत्पत्ति कर देने में सक्षम यार की दोस्ती ऎक्सेप्ट न करें तो और क्या करें.....बस आप फंस ही जाते हैं आकाश दिशा की ओर उठे हुए अंगूठे को क्लिक कर अपनी यारी लिस्ट भी बढा डालते हैं ! वैसे इस प्रेशर में ना भी आऎ तो आपकी नैतिकता आपकी इंसानियत (जिसका आप दम भरते रहे हैं ) आपको परेशान करेगी क्योंकि यारी के ऑफर को ठुकरा देने पर ऑफरकर्ता के लटके मुंह की कल्पना भी आप :( के माध्यम से कर पा रहे होंगे !&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;अब दिल की बात कहें--- ये दोस्ती, मित्रता सब बेकार के हिप्पोक्रेटिक लफ्ज हैं असल मजा तो "यारी" में है ! यारी के नए ग्लोबल मायनों में यह लफ्ज --मजे , टाइम पास और ,टेंशनलेस, फर्जलेस फर्जी दोस्ती के भाव से चिरकाल के लिए नत्थी हो चुका है !ये फर्जी नाम के साथ मर्जी की दोस्ती का अनंत विस्तार है ! यहां टाइम एंड स्पेस मोल्डेबल और रिवर्सऎबल हैं ! मिनी -माइक्रो--स्लिम के जमाने में दोस्ती का मोटा लबादा ओढे कौन घूमे ? वैसे भी टाइम क्राइसिस की टॆंशन में नेट की यारी फायदे का सौदा है !करना ही क्या है कोई भी यार सिलेक्ट करके दोस्ती का ऑफर ही तो भेजना है या आए हुओं को उनकी फ्रोफाइल और थोबडा देखकर हां या ना करना है !&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;हमारे घर के सामने वाले मंदिर में बहु बेटों पोतों की ठुकराई हुई बुजुर्गवार औरतें हर दोपहर बाद फिल्मी गानों पर बने भजन माइक पर गाती हैं ! कल उन्होंने कृष्णजन्माष्टमी के आने की खुशी में जो भजन गाए उनमें एक था _नी मैं यार बनाणा नी चाहे लोग बोलियां बोलें ...नी मैं बाज न आना नी.....! उनकी कृष्णोपासना में भी गोपियों की ही तरह लोक- कुल की निंदा- आलोचना का डर नदारद था , अंदाज नया था ! वे भी निर्गुण निराकार की यारी में डूबी थीं ( वैसे हम कृष्ण को सगुण साकार के रूप में ही पढाते हैं ) और अपने जीवन के सूनेपन को कृष्ण की यारी से आबाद कर रही थीं ...सो हमारा यह फायदा हुआ कि अपने लिखे हुए इस खामखाह के विलापी लेख के लिए बहुत कैची सा टाइटल मिल गया !खैर वैसे अब आप फंस ही गए हैं तो बताते भी जाऎ - &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;"इज नीलिमा युअर यार "!&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-151186459251024810?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/151186459251024810/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=151186459251024810' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/151186459251024810'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/151186459251024810'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/09/blog-post_04.html' title='मैं यार बनाणा नी चाहे लोग बोलियां बोलें ...'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/RtzR0rqWNQI/AAAAAAAAAM0/QttTS_2Tz1c/s72-c/friend.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-4202890365524477067</id><published>2007-09-03T11:44:00.001+05:30</published><updated>2007-09-03T15:10:03.308+05:30</updated><title type='text'>आंगन के भीतर .... आंगन के बाहर</title><content type='html'>&lt;p&gt;आंगन के भीतर वसंत है&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आंगन के बाहर पतझड आ बैठा है.. &lt;p&gt;मैं नहीं चाहती कि देखें पतझड &lt;p&gt;मेरे बच्चे या कि पूछें सवाल &lt;p&gt;झडे पत्तों की ढेरी को देख &lt;p&gt;जिसे बनाया है अभी अभी किसी &lt;p&gt;सडक बुहारती मजदूरिन ने.. &lt;p&gt;मैं नहीं चाहती कि उठे मेरे भीतर दर्द &lt;p&gt;और मैं उठा लूं लपककर उसका &lt;p&gt;दुधमुंहा बालक तपती जमीन से &lt;p&gt;मैं नहीं चाहती देखना उस ओर के पतझड को &lt;p&gt;मेरे लिए मेरा आंगन ही मेरा सत्य़ है... &lt;p&gt;पर क्या करूंगी उन सवालों का &lt;p&gt;उठे हैं जो मेरे नन्हों के भीतर &lt;p&gt; हैरान हैं वे एकसाथ दो ऋतुएं देख &lt;p&gt;अभी वे नहीं जानते कि सत्य क्या है &lt;p&gt;आंगन के भीतर का वसंत या कि &lt;p&gt;बाहर पसरा पडा पतझड &lt;p&gt;-- &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-4202890365524477067?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/4202890365524477067/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=4202890365524477067' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4202890365524477067'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4202890365524477067'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/09/blog-post.html' title='आंगन के भीतर .... आंगन के बाहर'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3026520552357102142</id><published>2007-08-16T12:00:00.001+05:30</published><updated>2007-08-16T13:39:40.520+05:30</updated><title type='text'>गुजरिए भूख, वासना और गंदगी के बाजार से - जरा दामन बचाके</title><content type='html'>&lt;p&gt;गरीबी और शरीर की भूख की बैकग्राउंड में मेट्रो का नई दिल्ली स्टेशन ! एक का मैलापन और एक का उजलापन ! नहीं नहीं.... कोई दिक्कत नहीं होती हमें अपने साहित्य के विद्यार्थियों को विरोध और विरोधाभास अलंकार&amp;nbsp;को समझाने में ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;ये मेट्रो का नई दिल्ली स्टेशन है जहां से आप भारतीय रेल सेवा की कोई भी ट्रेन पकडकर पूरे भारत में कहीं भी जा सकते हैं ! नहीं जाना कहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp;...? तो जनाब कोई हर्ज नहीं क्नॉट प्लेस की लकदक के साक्षी तो बन ही सकते हैं ! ..तो जनाब हाइटेकनीक और एयरकंडीशंड स्टेशन से बाहर की दुनिया में कदम रखना बडा जिगर का काम है दिल्ली घूमने वालों या दिल्ली में नए नए आए के लिए ! पर हमारा तो रोज का काम है यहां ! आप यहां आऎं ये भारत की राजधानी की भी राजधनी को घेरे एक&amp;nbsp;अजब इलाका है ! इलाका क्या है विरुद्धों का सामंजस्य है !.... काले -सफेद का गैर आभिजात्य-आभिजात्य का हाशिए और केन्द्र का .... यहां मेट्रो के कर्मचारी आपको हर समय इसकी टाइलों -शीशों को चमकाते मिलेंगे !&amp;nbsp;कहीं गंदगी- धूल का कोई निशान नहीं....स्टेशन से बाहर निकलते ही आप एकदम उलट जहान में खडे पाऎगे खुद को .....! दिल्ली आपका स्वागत करेगी ...मूत्र की बदबू से बचने के लिए आप मुंह पर फटाफट रूमाल रख लेंगे&amp;nbsp;&amp;nbsp;,अपने कपडे बचाने की फिक्र में लग जाऎगे ... आप नाक कान मुंह सब बंद कर लेंगे पर आंख तो नहीं न बंद कर सकते ! आपकी आंखें देखेंगी सडक पर उलटे सीधे तरीके से रुके चलते वाहनों की भीड ,मैल में डूबे सैंकडों रिक्शे वाले , दीवार पर किए गए मूत्र की बहती धारों से अटी पडी पटरी पर मृत्यु की सी निंद्रा में सोए लावारिस नंगे लोग , कहीं कोई भूखी बेहद मैली विकृत चेहरे वाली रोती पछ्ताती बुढिया आपको शिकायत और एतराज से देखती होगी&amp;nbsp;...............!! भई ये सब आप देखॆगे हम तो रोज देखकर ये सबक लें चुके हैं कि बच्चू अगर देखा अटके भी और भटके भी&amp;nbsp;...और फिर ठीक 5 मिनट बाद शुरू होने वाली क्लास में क्या खाक पढा पाओगे.....,सो हमारी आंखें देखती हैं पर देखती नहीं ....पर कभी कभी रिक्शे वाले के फफोले भरे हाथों में पांच रुपये के सिक्के थमाते हुए उसके लाचार बीमार हारे हुए&amp;nbsp;चेहरे और &amp;nbsp;उसकी मैल के मानवीकरण अलंकार हो जाने के साक्षी बन जाना&amp;nbsp;पडता है ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;..तो आप सोच लें कि आप यहां से निकलकर कहां मुडेंगे एक तरफ चमक की दुनिया दूसरी तरफ पहाडगंज के तंग इलाके और दिल्ली का "गंदा" इलाका जी बी रोड है ! आप नहीं सोचेंगे तो रिक्शे वाला आपकी आंख में आंख डालकर इशारों में ही पूछेगा ! यदि आप स्त्री हैं तो आपका पूरा हुलिया कई कई आंखों द्वारा जांचा जा रहा होगा1.,.... ये आंखें आपके पहनावे और चालढाल से आपके भीतर नगरवधू और कुलवधू के फर्क के सबूतों को खोज रहीं होंगी ! आप कुछ भी हों ये अंदाज लगाने में क्या जाता है कि आपका रेट क्या होगा एक बार का 10- 20 या 50 या 100 ....!! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;उफ ...नहीं ...हम रोज दुखी नहीं हो सकते ...रोज रोज नहीं रो सकते ..हर वक्त सोचते भी नहीं रह सकते ...पर पढाना तो है हमें आधुनिक भारत का यथार्थ बारास्ता कविता ,उपन्यास ,कहानी........! यहां बच लेंगे, आंख मूंद लेंगे ,पक्के हो लेंगे.. पर क्लास में ये साहित्य पढाते हुए जब उसकी भावपूर्ण व्याख्या पर जाएगे .....तब कहां जाऎगे ....नहीं बच सकते .....फंस ही जाऎगे भाई&amp;nbsp;......! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;....हां हां&amp;nbsp; ... ठीक वैसे ही जैसे मेट्रो से निकलकर क़ोलेज तक जाने में नहीं बच सकते ! ये सच जो आंखों के आगे पसरा पडा है ऎसे नहीं तो वैसे ..अब नहीं तो तब ...गलाऎगा ही...तपाऎगा भी ... सिर्फ मुझे ही क्यों ....आप सब को भी तो ...!!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;( आगे भी पर बाद में )&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3026520552357102142?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3026520552357102142/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3026520552357102142' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3026520552357102142'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3026520552357102142'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/08/blog-post_16.html' title='गुजरिए भूख, वासना और गंदगी के बाजार से - जरा दामन बचाके'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-6084114534534148740</id><published>2007-08-15T07:27:00.001+05:30</published><updated>2007-08-15T07:34:51.864+05:30</updated><title type='text'>ठीक नहीं आपका इतना मुस्कुराना</title><content type='html'>&lt;p&gt;मुकुराना हमारे लिए कितना घातक हो सकता है यह बात कई बार हमें बहुत देर से पता चलती है और तब तक हम बहुत मुस्कुरा चुके होते हैं ! खास तौर पर स्त्री के लिए उसकी मुस्कुराहट के नतीजे अक्सर उसके खुद के लिए बहुत कडु़वे होते है ! कल अविनाश ने &lt;a href="http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/08/blog-post_12.html" target="_blank"&gt;हंसी पर बात&lt;/a&gt; की थी ,पर हम तो अभी तक मुस्कुराहट पर ही अटके हैं और जान रहे हैं कि कहां मुस्कुराऎं ,कहां नहीं मुस्‍कुराऎं ,कितना मुस्कुराऎं&amp;nbsp; ...? अक्सर बस या रेल में यात्रा करते हुए किसी अनजान&amp;nbsp;से नजर मिले और वह मुस्कुरा दे तो हमारी व्यावहारिक बुद्धि बहुत देर में जवाब देती है कि हमें क्या करना है दिमाग में सवालों की लहरें दौड जाती हैं कि कहीं पहले मिले तो नहीं ?कहीं यह पड़ोस का व्यक्ति ही तो नहीं? कहीं लंपट या सिरफिरा तो नहीं ?&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;एक हमारी बडी उम्र की &amp;nbsp;जानकार हैं ,वे कहती हैं स्त्री को बेमतलब पुरुषों के सामने हंसना मुस्कुराना नहीं चाहिए&amp;nbsp; क्योंकि मर्द मानते हैं &lt;em&gt;"लडकी हंसी तो फंसी"&lt;/em&gt; !पर&amp;nbsp; हमारी समझ में नहीं आता कि हंसी या मुस्कुराहट&amp;nbsp;पर पुरुषों का पेटेंट&amp;nbsp; खुद स्त्री ही क्यों करती है ! पर वे मानती&amp;nbsp;हैं कि स्त्री की हंसी या मुस्कुराहट पुरुष को एक खुला निमंत्रण होती है जिसके बाद वह आपके बारे में कुछेक धारणाऎं बनाने के लिए स्वतंत्र होता है जैसे कि-- आप बहुत भोली हैं ,आप कमसमझ हैं ,आपके अनुभव कम हैं, आपको बरगलाया जा सकता है, आप मुस्कुराहट के पात्र के सामने आत्मसमर्पणात्मक भंगिमा के साथ है !वैसे अक्सर हमने अपने मुस्कुराने के अतीत में झांककर देखा है तो पाया है कि बहुत मंहगा पडा हमें हमारा अंदाज ! जिस स्पेस में हम खुद को सबके बराबर मानकर मुस्कुरा रहे हैं वहां हमारी मुस्कुराहट को हमारी विनम्रता, और कमजोरी समझा गया&amp;nbsp;&amp;nbsp;!&amp;nbsp; हमारा मुस्कुराना सहज मानवीय भंगिमा होता है यह वह भाव है जो मुलाकात या बातचीत में मन की निष्कपटता को बयान करता है !यह सामने वाले व्यक्ति के वजूद&amp;nbsp;की स्वीकारोक्ति है! बेमतलब के&amp;nbsp;संजीदापन की चादर गलत मौके पर भी ओढे रहना तो जरूरी नहीं ! अपने कार्यस्थल पर पुरुषों के साथ काम करती स्त्री का यह मानवीय हक है कि वह अपने मनोभावों को पुरुषों की ही तरह जाहिर होने दे ! अभी हाल ही में &lt;a href="http://www.hindustantimes.com/StoryPage/StoryPage.aspx?id=a21c4ae2-0ba8-434d-b608-a8dd9015ad7c&amp;amp;&amp;amp;Headline=Workplace+has+no+room+for+an+angry+woman" target="_blank"&gt;अखबार में एक शोध&lt;/a&gt; के नतीज़ों का सार यह था कि स्त्री यदि अपने वर्कप्लेस पर अपनी नाराजगी या गुस्सा जाहिर करती है तो वह चिडचिडी, असंतुलित और घरेलू दिक्कतों से परेशान मानी जाती है ! हमारे तो अनुभव कहते हैं कि इन "मानने वालों" में खुद महिलाऎं भी शामिल होती हैं वे महिलाऎं जो मर्दों की सत्ता को अंतिम सत्य मानकर खुद भी उनकी सत्ता बनने में थोडी सी सत्ता का सुख पा लेना चाहती हैं ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;एक बार आप क्या मुस्कुराईं आपकी कोमल छवि की स्थायी इमेज ग्रहण कर ली गईं और लीजिए आप हो गईं उसमें ट्रैप !~आप अब सहिए&amp;nbsp;जुमलेबाजी ,छींटाकशी ,&amp;nbsp;बिनमांगी सरपरस्ती , जबरिया रहनुमायी और "&amp;nbsp;बेचारी स्त्री"&amp;nbsp; के भावों की बौछार! और जब आप इस छवि को तोडता- सा कोई प्रतिरोध भरा &amp;nbsp;कदम उठाएगीं तो कहलाऎंगी सिरफिरी ,किसी मर्द के द्वारा भडकायी गई या पति के द्वारा सताई गई या सास से परेशान&amp;nbsp;या कि कुंठिता... उफ ....!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;हमारा मुस्कुराने का अनुभव ज्यादातर तो बुरा ही रहा है पर हमने अभी हार नहीं मानी है ! हम तो यह मानकर अब तक मुस्कुराते आए हैं कि हम खुद को ऎसे ही मुस्कुराते देखना चाहते हैं और यह कि यह किसी भी इंसान की सहज वृत्ति है, और यह कि किसी और की वजह से हम क्यों छोडें मुस्कुराना ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अब आप ही बताइए कि हम क्यों न मुस्कुराएं ?&lt;/p&gt; &lt;div class="wlWriterSmartContent" id="0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:cf71f7b8-dde7-40fd-ab92-392d43c7995b" contenteditable="false" style="padding-right: 0px; display: inline; padding-left: 0px; padding-bottom: 0px; margin: 0px; padding-top: 0px"&gt;Technorati Tags: &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6" rel="tag"&gt;स्‍त्री-विमर्श&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/gender" rel="tag"&gt;gender&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/neelima" rel="tag"&gt;neelima&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/smile" rel="tag"&gt;smile&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-6084114534534148740?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/6084114534534148740/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=6084114534534148740' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/6084114534534148740'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/6084114534534148740'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/08/blog-post_15.html' title='ठीक नहीं आपका इतना मुस्कुराना'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-6118582177222488955</id><published>2007-08-13T12:17:00.001+05:30</published><updated>2007-08-13T16:55:58.496+05:30</updated><title type='text'>149 में से 112 गए</title><content type='html'>&lt;p&gt;हर गर्मी की छुट्टियों में एक बहुत गैरपुण्‍य का काम करना पड्ता है - दिल्ली विश्वविद्यालय की उत्तरपुस्तिकाए जांचने का काम ! हमें पता नहीं होता कि किस कॉलेज की ये कॉपियां हैं ! हमें बस सवालों को देखकर जवाबों को आंकना होता है ! हर बार बडी आशा से हम कापियां लाते हैं और सबसे बचकर मनोयोग से उन्हें जांचने बैठते हैं और हर बार हमारे हाथ से कईयों की जिंदगी स्वाहा हो जाती है - मतलब कम से कम हमें तो यही लगता है ! हर बार मनौती मानते हैं कि भगवान अगर तू है तो इस बार कॉरेस्पॉंडेंस की कापियां न मिलें रेग्युलर वालों की मिलें वो बहुत बेहतर होती है ! पर लगता है भगवान है ही नहीं क्योंकि कभी भी मन की मुराद पूरी नहीं होती ! खैर जब ओखली में सर दे ही देते हैं तो मूसल से भी नहीं डरते हम ! लग जाते हैं काम पे लाल पेन और सवालों का पर्चा उठाके ! कसम से ऎसे ऎसे ओरिजनल आन्सर मिलते हैं कि हम अपने हिंदी साहित्य के अधूरे ज्ञान और अपनी कल्पना की कमजोर शक्ति पर मन मसोस कर रह जाते हैं ! प्रतिपाद्य लिखो ,निम्न की व्याख्या करो ,फलां का चरित्र- चित्रण करो ,फलां उपन्यास की उपन्यास के तत्वों के आधार पर चर्चा करो, शृंगार रस का उदाहरण दो या फिर फलां छंद के लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत करो......! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब हमारे सवाल तो फिक्स्ड होते हैं पर भएया जवाबों में गजब का वेरिएशन ,फेंटेसी, बहादुरी ,गल्पात्मकता ,ओरिजनैलिटी क्रएटिविटी कूट कूट के भरी रहती है ! हमारे एक सहयोगी को उत्तर की कॉपी में दो बार पचास के नोट मिल चुके हैं (वैसे वे जनाब इकोनॉमिक्स पढाते हैं ) जबकि हमें हमारी प्यारी हिंदी की कॉपी के आखिर में लिखा मिलता है---&lt;/p&gt;&lt;p&gt; "सर/मैडम मुझे पास कर देना ! मैं बीमार थी इसलिए पढ नहीं पाई ! मैं आगे पढना चाहती हूं प्लीज" !&lt;/p&gt;&lt;p&gt; एसे में एक तो अपनी हिंदी का मारकेट रेट साफ दिखाई देकर भी हम अनदेखा करते रहते हैं बेबात फ्रस्टेशन मोल लेने का का फायदा ? एक कॉपी में नकल करने वाले/वाली ने नकल की बारीक सी पुर्जी जल्दी जल्दी में कॉपी के अंदर ही छोड दी तो कई कॉपियों में ऊपरी पन्ने पर एग्जामिनर के साइन के लिए छोडे गए खाली स्थान पर उत्तर देने वाले/वाली का साइननुमा नाम लिखा मिल जाएगा जैसे सुनीता , शेफाली  वगैरहा....! ये नाम हमेशा लडकियों के क्यों होते हैं - जब सोचते हैं तो साफ दिखता है कि उत्तर देने वाला /वाली यह मानकर चल रहे हैं यदि उनकी कॉपी महिला एग्जामिनर के हाथ पडेगी तो "औरत ही औरत का दर्द समझ सकती है वाला मामला जम जाएगा ! यदि किसी पुरुष एग्जामिनर के हाथ से चेक हो रही है तो उसका सॉफ्ट कार्नर लडकी के नाम मात्र से जग जाएगा !&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खैर जब आपको इतना झेलाया है तो हिंदी साहित्य को लेकर आपकी जानकारियों का वर्धन करना भी तो हमारा ही फर्ज बनता है ! इसलिए ये अमूल्य बातें जो हमारे होनहार बच्चों की अपनी सूझ बूझ का नतीजा हैं - पढकर ही जाऎ-&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1 व्याख्या के लिए कविता कोई भी आए उसका रचयिता     कालीदास या तुलसीदास ही होता है ! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;2 कविता या गद्य किसी भी कृति से उद्धृत हो "ये पंकतिया हमारी पाठेपुस्तक मे से ली गई होती है " &lt;/p&gt;&lt;p&gt;3 दोहा छंद का उदाहरण -"जो बोले सोणिहाल ससरियाकाल"&lt;/p&gt;&lt;p&gt;4व्याख्या में ज्यादा कुछ नहीं करना होता बस दी हुई लाएनों को आगे पीछे करके उन्हें बडा करके दिखाना होता है ! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;5 "शिंगार रस वहां होता है जहां कोई औरत सज धज के अपने प्रेमि से मिलने जाती है जिसमे प्यार का बहुत सा रस दिखाए देता है और उनके बहुत प्यार करने से ये बडता है ! इससे पडने वाले को आंनद मिलता है ...."&lt;/p&gt;&lt;p&gt;6 अनुप्रास अलंकार अनु +परास से बनता है इसमे एक ही शबद बार बार आता जाता है जिससे पडने में अच्छा लगता है कानो में भी अच्छा लगता है ! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;7 "सूरज का सातवा घोडा"  प्रेम चंद ने लिखा है जिसका नायक बहुतों से प्यार करता है पर शादी एक से भी नहीं करता ! और इसमें ऎसी औरतओं की कहानी है जिनका चाल चलन ठीक नहीं है  ! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;8  राज भाशा हिनदी हमारे राजाओं की भाशा है जिसका सारे देश में खूब विस्तार करना है ताकि भारत में एकता की जो कमी आ गई है वो दूर हो सके ! इसमें सारे शब्द बहुत मुस्किल होते हैं पर पदते रहने से आसान भी हो जाते है? &lt;/p&gt;&lt;p&gt;9  (किसी भी कवि का जीवन परिचय पूछा जाए वह लगभग एक सा होगा ) &lt;/p&gt;&lt;p&gt;" नागार्जन कवि बहउत बडे कवि थे !उनका बचपन बहुत गरीबी में बीता पर उन्होने हार नही मानी ! वे लिखते गए सब तकलीफों में डरे नहीं ! उनकी कविता हमारे लिए बहुत जरूरी है ! वे बहुत ईमानदार और अच्छे कवी थे जिनको सब प्यार करते थे ! उनकी माता भ्चपन में ही मर गई थी इसलिए उनका पालन पोसन नीरू और नीता नामके जुलाहे ने किया ! वे उत्तरपदेश के लमही गांव में पैदा हुए थे ! उनकी पहली कविता उन्होंने बहुत बचपने में ही लिख ली थी बाद में वो लगातार लिखते गए उनकी भाशा में बहोत जादु है क्योंकि उनकी बाते मार्मस्पर्शी होती है जो की हिर्दय से निकलती हे ........!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;10 बाबा बटेसरनात" उपनयास बहुत से तत्वों से भरा है जैसे चरित चित्रन , भाशा , संवाद , कथानाक ,देशकाल और वातावरन ! उसके सभी लोग एक दूदरे से बहुत अच्छे संवाद करते हैं जिनसे उपनयास का कथानाक आगे बडता है ! इसमे बहुत से पात्र हैं जिलका चरित चितरन बहुत गहरा है ! ये एसे पेड की कहानी है जो बहुत बुडा और समजदार है जिसको सब काटना चाहते हैं पर वो देश के लिए समाज के लिए जान दे देता है !....&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिए तो कह रहे हैं जनाब कि 149 में से 112 गए ! बाकी कितने बचे ?&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-6118582177222488955?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/6118582177222488955/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=6118582177222488955' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/6118582177222488955'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/6118582177222488955'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/08/149-112.html' title='149 में से 112 गए'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-7443961623167826680</id><published>2007-08-11T13:30:00.001+05:30</published><updated>2007-08-11T13:49:22.067+05:30</updated><title type='text'>जोर लगाओ लगाओ लगाओ लगाओ लगाओ</title><content type='html'>&lt;p&gt;"सिस्टर ऎडमिशन पेपर्स तैयार करवाओ , इमिजिऎट एन एस टी.. ऎनीमा..क्लीनिंग.."&lt;/p&gt; &lt;p&gt;पर डक्टर मुझे डर लग रहा है मुझे लगता है ये फाल्स पेन हैं मैं मैं..." नहीं भई&amp;nbsp; नहीं ..ये तो बहुत अच्छी दरद हैं..डाक़्टर अपने साउथ इंडियन लहजे में बोली .'फिफ्टीन मिनट्स के इंटवेल पर पेन हो रही हैं अब ऎर्‍डमिट होना होगा बच्ची.."&lt;/p&gt; &lt;p&gt;दया के चेहरे पर अनजाना कहर टूटता दिखाई देता है उसकी सास पूछ्ती है 'अरी बता तो दर्द कमर से उठ रहा है या पेट से ..कमर से उठता है तो लडका होता है ..बता ?" नहीं मुझे नहीं पता मुझे कुछ नहीं पता मुझे बचाओ कोई बस .." सास का चेहरा निर्दयी हो उठता है "ऎरी तू अनोखी नहीं जनने जा रही है बच्चा सारी दुनिया जनती है". पास से गुजरती सिस्टर कहती है नहीं दुनिया का हर डिलेवरी केस अलग होता है माता जी ,अब चलो तुम व्हील चेयर पर बैठो. " &lt;/p&gt; &lt;p&gt;डिलीवरी रूम&amp;nbsp; की ट्रेनी यंग डाक्टर नीचे के हिस्से में जांचं पडताल में लगी थी एक के चेहरे पर मरीज के दर्द से पैदा हुआ दर्द था तो दूसरी अपने खून लगे कोट से बिना घिन्नाए दया के केस को पढ रही थी -" सुनो दर्द बढाने की दवाई डाल दी है जितनी जल्दी अच्छे दर्द होंगे उतनी जल्दी आजाद हो जाओगी .." दया बिना हिले डुले लेटी है मुहं से बीच बीच में कराह निकलती है नजर दौडाती है लेबर रूम में ! पेट फुलाए पडी कराहती रोती औरतें ही औरतें ! दर्द का इंजार करती , दर्द के बढने की दुआ मनाती दांत भींचती औरतें ही औरतें ! ...................दर्द बहुत जरूरी है ! दर्द के बिना यहीं पडी रहोगी पेट काट्ना पडेगा तो ज्यादा तकलीफ होगी ! दया चिल्लाती है हिस्टीरिक होकर ..मुझे जाने दो मुझे छोड दो यहां की चीखों से दिल दहलता है इन औरतों के दर्द में विकृत हो गए चेहरों&amp;nbsp; को देखने से&amp;nbsp;मितली आ रही&amp;nbsp; है ............देखो ये सांउड फूफ कमरे हैं यहां की दीवारें चीखों को बाहर नहीं जाने देतीं ......तुम भी दर्द के और बढने पर चीखोगी ....शायद कोई नर्स बोली थी ! उठो घूम लो पडी रहने से दर्द जमेगा ..."मैं नहीं खडी हो सकती ....टांगे कांप रही हैं मेरे पति को बुलाओ..."यहां किसी की एंट्री एलाउड नहीं है !"नर्स उदासीन भाव से जवाब दे रही थी ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;दया को याद आता है बॉस का व्यंग्य से भरा चेहरा ! प्रेगनेंनसी की बात सुनते ही बोला था "यू टिपिकल इंडियन लेडीज..जॉब मिलते ही मैरिज, मैरिज होते ही प्रेगनेंनसी...कैरियर स्टेगनेंट हो जाएगा तुम्हारा समझी ...प्रीकाशन नहीं ले सकती थी ?..."&amp;nbsp; दया पानी पनी चिल्ल्लाती है दर्द उसे जकड रहा है बेड पैन हाथ में लिए पास से जाती सफाई कर्मचारी उसे पानी देती है ! दया झिझकती है पर फिर लपककर पी जाती है "थें..क्स..आह आह ..........अब कितनी देर और.....दर्द बेकाबू ....हो रहा है ... डाक्टर को भेजो ...वक्त क्या हु...आ है ?&amp;nbsp; मुझे पेनलेस डिलीव..री चाहिए ............."सांस फूल रही थी दया की मुट्ठियां भिंच रही थीं! पति पर बहुत गुस्सा आ रहा था !मेरा हाथ थाम ले एक बार वह ..देखे मेरा हाल कमर से ऊपर उठे डेलीवरी गाउन में टांगे फैलाए पलंग के किनारों से भिडते मुंह सूख रहा है.... सिस्टर सिस्टर......! डाक्टर लोबो आती हैं बहुत सामान्य भाव लिए आवाज में गुस्सा लिए कह रही हैं "क्यों तुम्हें चाहिए दरद दूर करने का टीका ...तुमहारी मां ने तुम्हें टीका लगवाकर पैदा किया था क्या ..वैसे भी सेफ कहां यह टीका सुन्न हो जाएगा रास्ता तो बच्चा अंदर रह सकता है और ऑपरेशन की जरूरत पड सकती है ..बच्चे को खतरा हो सकता है ..." &lt;/p&gt; &lt;p&gt;पता नहीं मुझे मैं इस समय मुझे अपनी जान जाती लग रही है मुझे या तो मार दो या मर जाने दो डाक्टर " दया के होंठ&amp;nbsp;चिपकने लगते हैं आंखें आंसुओं का लगातार बहना बढ जाता है पेन का इंटरवेल अभी बढ रहा है ! मां तो कहती थी बस ज्यादा पता नहीं चलता तू बस बच्चे के बारे में सोचना ! सास कहती थी लडका होगा सोचना तो दरद महसूस नहीं होगा ! सब झूठ था मुझे यहां धकेलने का षडयंत्र.... ..बेड पर नजर जाती है खून ही खून कोई नर्स कह रही है&amp;nbsp; ओह ये मरीज 'शो' दिखा रही है&amp;nbsp; ! जूनियर डाक्टर देखती है&amp;nbsp; डाइलेशन फोर इंचिज हुआ है इस हिसाब से अभी फाइव ऑवर्स लगेंगे नर्स सुबह छ्ह के आसपास !&amp;nbsp; डाक्टर चली जाती हैं दया नर्स का हाथ पकडकर झिंझोड देती है&amp;nbsp; ....."&amp;nbsp;नहीं इससे ज्यादा दर्द नहीं सह सकती मैं ...इससे ज्यादा दरद हो ही कैसे सकता है किसी को ....कोई बच ही कैसे सकता है इस दर्द के बाद ......बताओ बताओ " दया देखती है नर्स का चेहरा उसके दर्द से अछूता है ! दया चाहती है कि कोई तो उसे सहला कर कह दे कि हां मैं महसूस कर रहा&amp;nbsp;हूं तुम्हारा दर्द ...वह नर्स झांक रही है भीतर&amp;nbsp;और कह रही है&amp;nbsp; "&amp;nbsp;देखो सिर दिख्नने लगा है डाइलेशन इंप्रूवड है सांसे लंबी लो ए चिल्लाओ मत इतना ..करते वक्त नहीं पता था कि दर्द होगा ? ! " &lt;/p&gt; &lt;p&gt;दया बीच में जाने हताश हो रही है या सो रही है ! इंद्रियां शिथिल पड रही हैं दिमाग अजीब अजीब चित्र बना रहा है ! गुस्सा ,नफरत, तडप ,प्रतिरोध के चित्र डाक्यूमेंट्री&amp;nbsp;से शुरू होकर कोलाज में बदल जाने वाले चित्र ! एक में वह बच्ची है मां के स्तन से चिपकी ,एक में वह जतिन की बाहों में है और जतिन कह रहे हैं कि वह उनके किए दुनिया की सबसे खूबसूरत उपलब्धि है ,एक में वह ग़िडगिडा रही है "जतिन तुम अपने परिवार को समझते हो मुझे भी समझो जरा ..." जतिन&amp;nbsp; जतिन जतिन......आओ मुझे तुम्हारी जरूरत है ...मैं लडते लडते हार रही हूं हर मोर्चे पर ..तुम साथ होकर भी साथ महसूस नहीं होते ...क्या प्यार का शादी में बदलना गलत रहा...मैं कब तक सहेजती रहूं यह रिश्ता अकेले ......कहो ...कुछ तो कहो ......तुम्हारी चुप्पी.......! दया हांफ रही है बाल नोंच रही है हाथ पटक रही है ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;दया की चीखें बढती जा रही हैं ! उसे लग रहा है जरूर उसका चिललाना इन दीवारों के बाहर खडे जतिन को सुनाई दे रहा होगा ...वह रो रहा होगा मेरे लिए...वह दीवार तोडकर यहां आ जाना चाहता होगा वैसे ही जैसे मुझसे प्रेम विवाह के लिए वह एक बार सारे जमाने से लड गया था .....! डाक्टर डाक्टर भगदड मच जाती है रेस्ट रूम से डाक्टर भागती आती हैं स्ट्रेचर आ यहा है "हरि अप जल्दी डिलीवरी टेबल पर शिफ्ट करो ...रोको अभी जोर नहीं लगाओ सांस अंदर खींचो ..." दया की&amp;nbsp;टांगें खोलकर लटका दी जाती हैं वह जीवित और मृत के बीच की सी देख रही है "वे कह रही हैं "सुनो हाथ टंगों पर लपेटकर&amp;nbsp;छाती से टांग चिपकाकर जोर लगाओ ....रोको जब दर्द की लहर उठेगी तब लगाना खाली नहीं ...." दया गला फाडकर चिल्लाती है मम्मी&amp;nbsp; मम्मी मम्मी&amp;nbsp; ! सीनियर डाक्टर फटकार रही है ए मुंह बंद करो बच्चा नीचे से निकलेगा मुंह से नहीं ! मुंह भीचो&amp;nbsp;...' अचानक दर्द की तेज लहर उठती है दया का चेहरा और भी रौद्र हो जाता है&amp;nbsp;,वहां खडी सब औरतें समवेत स्वर में गाती हैं हां हां लगाओ लगाओ लगाओ लगाओ&amp;nbsp; बस ....हां लगाओ लगाओ लगओ लगाओ लगाओ.....उंचा रिवाजिया पर भावहीन समवेत गायन... धान की कटाई के समय का सा.....लो यह आ गया बाहर लो देख लो क्या है फिर काटेंगे प्लेसेंटा को ...लो यह काट दी नाल वह पडी है ट्रे में देखो .....वे रूई ठूंस रहे हैं दया में ! अब कुछ बाहर नहीं आना चाहिए !कुछ भी नहीं ! वे कह रही हैं आफ्टर पेन्स आतें हैं पर तुम हिलो नहीं नहीं तो टेडी सिल जाएगी फिर रोओगी बैठकर तुम ..&amp;nbsp; .....दया देख रही है ट्रे में पडी गर्भनाल को सिलाई का धागा खाल में से निकलता साफ सुनाई दे रहा है बाकी की डाक्टर्स व नर्सें जा चुकी हैं दूसरे डेलीवरी टेबल पर!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;एक बेहोशी सी......दर्द की खुमारी सी दिमाग पर चढ रही है बच्चा लपेटा जा चुका है कपडे में वह धीरे धीरे कराह रही है उसे लग रहा है वह एक फिल्म देख रही है ! पूरी डूबकर ! दर्द के दरिया में डूबी वह कोई और दया है ! बहे चली जा रही है ! किनारे पर जतिन खडा है बच्चा हाथ में झुलाता बुला रहा है उसे-." लौट आओ दया वापिस देखो तुम्हारा बच्चा ...किनारे की ओर लौट आओ ....हां हां जोर लगाओ तुम्हें आता है जोर लगाना दया......दया पानी को काटती चली आओ.... और और और &amp;nbsp;जोर लगाओ दया.........!&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-7443961623167826680?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/7443961623167826680/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=7443961623167826680' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7443961623167826680'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7443961623167826680'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/08/blog-post_11.html' title='जोर लगाओ लगाओ लगाओ लगाओ लगाओ'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-2265652780514985775</id><published>2007-08-10T17:38:00.001+05:30</published><updated>2007-08-10T18:48:58.650+05:30</updated><title type='text'>आपकी गंधाती पुलक से कहीं बेहतर है, उनकी भड़ास</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;a href="http://bhadas.blogspot.com" target="_blank"&gt;भड़ास&lt;/a&gt; हिंदी ब्‍लॉग जगत के लिए चुनौती रहा है जिसे नारद युग में तो केवल नजरअंदाज कर ही काम चला लेने की प्रवृत्ति रही पर जैसे ही नारद युग का अवसान हुआ, भड़ास की उपेक्षा करना असंभव हो गया- करने वाले अब भी अभिनय करते हैं पर हिंदी ब्लॉगिंग पर नजर रखने वाले जानते हैं कि भड़ास का उदय तो नारद के पतन से भी ज्‍यादा नाटकीय है। इतने कम समय में भड़ास के सदस्‍यों की ही संख्‍या 53 है। भड़ास अपनी प्रकृति से ही आंतरिक का सामने आ जाना है- जो दबा है उसका बाहर आना। भड़ास हर किसी की होती है पर बाहर हर कोई नहीं उगल पाता, इसके लिए साहस चाहिए होता है। भड़ास का बाहर आना केवल व्‍यक्ति के लिए ही साहस का काम नहीं है वरन पब्लिक स्‍फेयर के लिए भी साहस की बात है कि वह लोगों की भड़ास का सामना कर सके क्‍योंकि भड़ास साधुवाद का एंटीथीसिस है- हम भी वाह वाह तुम भी वाह वाह नहीं है यह। हम भी कूड़ा तुम भी कूड़ा है यह। &lt;/p&gt; &lt;p&gt;भड़ास चूंकि दमित की अभिव्‍यक्ति है इसलिए उसके प्रिय होने या प्रिय भाषा में होने की तो खैर कोई गुजाइश ही नहीं। भड़ास में गालियॉं भरपूर है, मर्दों में होती ही हैं- सड़क चलते भी सुनाई देती हैं, हम ही नजरअंदाज कर देते हैं, ऐसा मुँह बनाते हैं जैसे - हमने तो कुछ सुना ही नहीं। गालियॉं हैं और मर्दों की हैं तो भले ही वह कोई सम्‍मानित महान कवि दे या भड़ासी, वे मर्दवादी ही होंगी- वे स्‍त्री जननांगों के इर्द-गिर्द ही घूमेंगी- कुछ भी&amp;nbsp;नया तो नहीं।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;पर भड़ास तो मनुष्‍य मात्र में होगी न, फिर स्‍त्री क्‍यों भड़ासी नहीं। &lt;a href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=9112860503835822172&amp;amp;postID=4015234700833687021&amp;amp;isPopup=true" target="_blank"&gt;हमने पूछा&lt;/a&gt;- जबाव भी मिला। बिल्‍कुल अपेक्षित जबाव था पर दिया ईमानदारी से गया था। फिर &lt;a href="http://bhadas.blogspot.com/2007/08/gender-based-demarcation-mission.html" target="_blank"&gt;एक पोस्‍ट में&lt;/a&gt; इसका और विस्‍तार से खुलासा किया गया। मूलत: दो तर्क &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;if she has the boldness and can gather &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;enough courage to be associated with this blog then certainly the &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;qualitative measures would also change&lt;/strong&gt;.  &lt;p&gt;और दूसरा वही समतावादी तर्क था कि इंसान को बांटा क्‍यों जा रहा है, मर्द औरत की बात उठाना बेबात शांति भंग करना है विवाद उठाना है।  &lt;p&gt;समस्‍या इन दोनों तर्कों में है। पहले तो विवाद होगा इस डर से न कहना तो भड़ास-दर्शन हो नहीं सकता। भड़ास अगर विवाद भय से कही न जाए तब तो वह 'बात' ही हो जाएगी। भड़ासी पढ़े-लिखे समझदार लोग हैं वे खुद जानते हैं कि ये तर्क बहुत दूर तक नहीं जाता इसलिए इसे छोड़ देते हैं-  &lt;p&gt;दूसरा तर्क ये कि भड़ास में महिलाएं नहीं हैं, ये महिलाओं की कमी है कि उनमें साहस नहीं है, दम नहीं है, उनकी भाषा में कहें तो गूदा नहीं है कि अपनी भड़ास को कह कर मन हल्‍का कर सकें- पर दोस्‍तों घर, गली, हाट, दफ्तर और लीजिए अब तो ब्‍लॉग व इंटरनेट का जगत तक तो आप मर्दों ने घेर रखा है- कहॉं भड़ास निकालेगी औरत। पर चलो आपने बात कही और सीधे कही- आपका तर्क तो सिर्फ इतना है कि हम भड़ासी है अपनी भड़ास के लिए- तुम्‍हारी भड़ास तुम्‍हारी दिक्‍कत है कहॉं निकालोगी, किस भाषा में इससे तुम खुद निपटो। आपका तर्क तकलीफ देने वाला है&amp;nbsp;पर वैध तर्क है।  &lt;p&gt;पर ब्‍लॉगजगत के हर तकलीफ देने वाले तर्क वैध नहीं हैं। जरा अफसरी तर्कशास्‍त्र को देखें। बड़े अफसर हैं अनूप, ब्‍लॉगर भी बड़े हैं उनके बड़े अफसर मित्र ज्ञानदत्‍त पांडेय- सुबह सुबह जब&amp;nbsp; बीबीयॉं इन साहब लोगों के दफ्तर जाने का इंतजाम कर ही होती हैं तो एक अफसर लिखता है दूसरा वाह वाह करता है- इससे कब्जियत दूर रहती है- पेट साफ रहता है। किसी वजह से एक समय से लिख नहीं पाया (फिर इस औरत जात यानि बीबी की कारस्‍तानी होगी) तो दूसरे ने अपनी कब्जियत निकालने के लिए किसी और पर &lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=319" target="_blank"&gt;निशाना साधा-&lt;/a&gt;  &lt;p&gt;&lt;em&gt;&lt;font color="#000000"&gt;उधर नीलिमा जी का &lt;/font&gt;&lt;/em&gt;&lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com/2007/08/blog-post_08.html"&gt;&lt;em&gt;&lt;font color="#000000"&gt;पति प्रेम&lt;/font&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;font color="#000000"&gt; देख कर मन पुलकित च किलकित है कि उन्होंने आदर्श गृहणी की तरह गाढ़े समय के लिये कुछ प्रेम बचा के रखा था और मौका पाते ही उड़ेल दिया। प्रियंकरजी को समझ में आ गया कि जोड़े से ब्लागिंग करने के क्या फ़ायदे होते हैं।&lt;/font&gt;&lt;/em&gt;  &lt;p&gt;तब तक दूसरे साहब भी आ गए ओर उन्‍होने भी अपना पेट साफ किया और अफसरी समरसता का कर्तव्‍य निबाहा  &lt;p&gt;&lt;em&gt;&lt;font color="#000000"&gt;फेमिली ब्लॉगर आईएनसी को बेचारे छुट्टे मुंसीपाल्टी का ठप्पा लगये घूमते ब्लॉगरों पर ज्यादा तवज्जो दी जाती है. फेमिली ब्लॉग आईएनसी जरूरी है. और नहीं तो टिप्पणी की ट्रेनिग तो होनी चाहिये पत्नी को!&lt;/font&gt;&lt;/em&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;  &lt;p&gt;- यूँ भी एक बकबक करती औरत को चुप कराने का काम पुण्य ही है, दिन भर अपने मातहतों से अच्‍छे से बात कर पाए होंगे- सुबह सुबह ही मूड जो ठीक हो गया था।&amp;nbsp;  &lt;p&gt;तो जानें कि गोले बनाने के कारखाने के इन बड़े अफसर की पुलक और इन छोटे-मोटे पत्रकारों की भड़ास में क्‍या संबंध है। भड़ासियों के लिए भड़ास का खेल खुल्‍ला खेल फर्रूखाबादी है, कोई दुराव छिपाव नहीं। दारू, औरत और वहीं फटना-फाड़ना, मर्द के अंतस में चूंकि औरत की जगह यही है इसलिए वह मवादी भाषा में बाहर आती है, जाहिर है। ईमानदार। पर बड़े ब्‍लॉगर उस पर भी अफसर वे ईमानदार भला&amp;nbsp;क्‍योंकर होंगे, मर्द हैं तो इसमें उनका क्‍या दोष- वे पहले तो किसी और मर्द से कोई अनबन लेते हैं- होती रहती है इसमें कुछ भी खास नहीं पर जब तिलमिलाहट होती है तो फिर वही करते हैं&amp;nbsp;जो कबीलाई समाज से आज तक मर्द करता रहा है&amp;nbsp;&amp;nbsp;इस मर्द की 'मातहत' औरत को खोजो और उससे बदला लो। पहले साथ के 'मौज' लेने के लिए राजी यार इकट्ठे करो और फिर मजा चखाएंगे ( जोड़े में ब्‍लागिंग के फायदे गिनाते प्रियंकर ये भूल जाते हैं कि हिंदी की ब्‍लॉगिंग अभी भी कबीलाई मर्दों का शगल है, जिनकी बीबीयॉं चौके में होती हैं और मर्द मौज मजे के लिए शिकार या वेश्‍यालय जाने में असमर्थ होने के कारण इंटरनेट पर जाते हैं, इसलिए जिसकी बीबी ब्लॉगिंग भी साथ कर रही उसे तो नुकसान ही नुकसान है)&amp;nbsp;  &lt;p&gt;बुजुर्ग ज्ञानदत्‍त-- 'संभाल अपनी औरत को नहीं तो कह चौके में रह' की तर्ज पर मानों कह रहे&amp;nbsp;हैं कि " इस बेशऊर को टिप्‍पणी करना तो सिखा दे कम से कम। (या हाय हाय.... हमने क्‍यो न सिखाई अपनी वाली को ऐसी बेशरूरी..)  &lt;p&gt;धकिया देने का रवैया भी देखें तो नामधारियों की मौज लेती पुलक से भड़ासियों की भड़ास लाख दर्जे बेहतर है। पर कुल मिलाकर हिंदी की ब्‍लॉग दुनिया का शिष्ट चेहरा हो या भड़ासी रूप दोनों बस ये कह रहे हैं कि हम तुम नाकाबिल औरतों को मुँह से कुछ कहकर तो बाहर नहीं खदेड़ देंगे पर अपने कर्मों से कोई कसर भी नहीं छोड़ने वाले।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आपको निराश करने के लिए माफी कम से कम अभी तो हम मैदान साफ छोड़ने वाले नहीं। घर में निपट लेंगे कि &lt;em&gt;ऐसा क्‍यों लिख डाला&lt;/em&gt; और आपकी टिप्‍पणियों से भी निपटेंगे&amp;nbsp;जिनमें शरीफ बड़े लोगों पर कीचड़ उछालने के लिए लानत मलामत होगी। &lt;/p&gt; &lt;div class="wlWriterSmartContent" id="0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:6d173a9a-ccb6-4ebe-9b1a-5beb1e357737" contenteditable="false" style="padding-right: 0px; display: inline; padding-left: 0px; float: none; padding-bottom: 0px; margin: 0px; padding-top: 0px"&gt;Technorati Tags: &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ad%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%be%e0%a4%b8" rel="tag"&gt;भड़ास&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%aa" rel="tag"&gt;अनूप&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%a6%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4" rel="tag"&gt;ज्ञानदत्‍त&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80%20%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97" rel="tag"&gt;हिंदी ब्‍लॉगिंग&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/neelima" rel="tag"&gt;neelima&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-2265652780514985775?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/2265652780514985775/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=2265652780514985775' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2265652780514985775'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2265652780514985775'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/08/blog-post_10.html' title='आपकी गंधाती पुलक से कहीं बेहतर है, उनकी भड़ास'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-917978437795770424</id><published>2007-08-02T12:03:00.000+05:30</published><updated>2007-08-02T14:02:40.021+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेम कविता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kavita'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='love'/><title type='text'>यूं मैं तुमसे करता हूं प्रेम</title><content type='html'>मैं चट्टान ही रहना चाहता हूं&lt;br /&gt;दुनिया के सबसे मीठे दरिया के किनारे की&lt;br /&gt;आधी डूबी आधी सूखी ....&lt;br /&gt;मैं डरता हूं पानी के मखमली थपेडों से&lt;br /&gt;धीमे धीमे झडते देख खुद को..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे अच्छा लगता है यह दरिया&lt;br /&gt;और उसका मीठा पानी&lt;br /&gt;पर मैं यह नहीं चाहता कि यहां उठे&lt;br /&gt;कोई भी लहर ऊंची&lt;br /&gt;मैं झिझकता हूं पूरा भीगने से....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं नहीं चाहता कि कोई भी मल्लाह&lt;br /&gt;उतारे इस जल में अपनी डोंगी&lt;br /&gt;या कि किनारे पर बैठा कोई&lt;br /&gt;तैराए इसमें अपनी कागजी किशती....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं चाहता हूं कि किनारे की सारी वनस्पतियां&lt;br /&gt;गवाह हों दुनिया के सबसे गहरे पानी के&lt;br /&gt;ऎन किनारे टिकी इस शिला के शैलपन की ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तनिक नहीं भाती ये मछ्लियां&lt;br /&gt;दरिया की चिर सखियां&lt;br /&gt;जो पानी के बहाव में उछ्लती हैं&lt;br /&gt;तैर लेती हैं बहाव के साथ भी&lt;br /&gt;बहाव के खिलाफ भी ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं चाहता हूं इस मीठे पानी के दरिया में&lt;br /&gt;मुझ से झरे कण ठहर जाएं&lt;br /&gt;छोटी छोटी शिलाएं बन&lt;br /&gt;मैं दरिया में उग जाना चाहता हूं&lt;br /&gt;ताकि इस रेतीले किनारे पर टिके-टिके ही&lt;br /&gt;देख आउं मैं दूसरे किनारे को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ दुनिया के सबसे नीले झिलनमिलाते दरिया !&lt;br /&gt;मैं तुमसे करता हूं प्रेम !!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-917978437795770424?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/917978437795770424/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=917978437795770424' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/917978437795770424'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/917978437795770424'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/08/blog-post_02.html' title='यूं मैं तुमसे करता हूं प्रेम'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-408517384703878376</id><published>2007-08-01T12:42:00.001+05:30</published><updated>2007-08-01T15:59:00.881+05:30</updated><title type='text'>प्यार में कवि</title><content type='html'>&lt;p&gt;वह फडफडाती अपने सतरंगी पंख&lt;/p&gt; &lt;p&gt;और चहचहाती कहती-&lt;/p&gt; &lt;p&gt;उड आऊं आकाश में तनिक&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह कहता गहराये टिके अंदाज में&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;लौट आना लेकिन जल्द ही&lt;/p&gt; &lt;p&gt;इंतजार करूंगा बेसब्र मैं तुम्हारा..&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;जब कोई झुंड नारे लगाता गुजरता &lt;/p&gt; &lt;p&gt;उसके हरियाये आंगन के बाहर &lt;/p&gt; &lt;p&gt;चूल्हे पर खौलती चाय भूल &lt;/p&gt; &lt;p&gt;दौड&amp;nbsp;पडती वह दरवाजे की ओर&lt;/p&gt; &lt;p&gt;ठिठका देते स्वर में वह पुकारता &lt;/p&gt; &lt;p&gt;क्या हुआ चाय का....?&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;अल्लसुबह नींद से उठ वह&lt;/p&gt; &lt;p&gt;सुनाती अधूरे रह गए सपने उसे&lt;/p&gt; &lt;p&gt;सपने - जिनमें बेखौफ अकेली वह&lt;/p&gt; &lt;p&gt;गहन समुद्र के नील अंधकार में&amp;nbsp; उतर जाती है&lt;/p&gt; &lt;p&gt;या फिर किसी बहुत ऊंचे सफेद शिखर पर &lt;/p&gt; &lt;p&gt;पैर टिकाए निहारती है&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;डूबता उगता चमकीला सूरज &lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह ध्यान से सुनता&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;उसकी लटों में अपनी अंगुलियां फिराते &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;कहता पुचकारती आवाज में&lt;/p&gt; &lt;p&gt;प्रिये ! ऎसे सपने देखना तो अच्छा शगुन नहीं &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;बेफिक्र सोया करो तुम.....&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह अक्सर कविता करता लपलपाती आग की &lt;/p&gt; &lt;p&gt;ऊंची लहरों में घिरी&amp;nbsp;नौका की जिसमें &lt;/p&gt; &lt;p&gt;सवार होती जूझती एक अकेली औरत&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह कहती आओ बात करें आग की &lt;/p&gt; &lt;p&gt;तूफान में घिरी उस औरत की&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह नेह भरी झिडकी देता&lt;/p&gt; &lt;p&gt;पगली ! आग की बात सिर्फ कविता में अच्छी लगती है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह छिपा देता है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;आग और जूझ की अपनी कविता और&lt;/p&gt; &lt;p&gt;उसके लिए रचता है&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;रोमानी सुरों में&amp;nbsp;ढले गीत &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;रात के गहराऎ कालेपन में जब वह&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;उतर रहा होता है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;नींद की तलहटी में धीमे धीमे &lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह अपने भीतर उतार डालती है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;कागजों&amp;nbsp;में छिपा पडा&lt;/p&gt; &lt;p&gt;बेताला रुद्र आदि गीत&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;आग का...&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-408517384703878376?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/408517384703878376/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=408517384703878376' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/408517384703878376'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/408517384703878376'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/08/blog-post.html' title='प्यार में कवि'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-4903298465418039533</id><published>2007-07-25T15:21:00.001+05:30</published><updated>2007-07-25T19:03:03.401+05:30</updated><title type='text'>लोग जा़लिम हैं हरइक बात का ताना देंगे</title><content type='html'>&lt;p&gt;आज असीमा कह रही हैं कल पता नहीं और कौन क्या क्या कहेगी ! एक ऎसी औरत जिसको सुखद दाम्पत्य जीवन नसीब नहीं&amp;nbsp; हुआ और उसकी दूर दूर तक कोई संभावना न पाकर वह अपने पति पर कीचड उछ्ल रही है ! लोग सूंघेंगे बल्कि सूंघ रहे हैं कि वह औरत ऎसा&amp;nbsp; क्या करती थी कि पीटी जाती थी !आखिर वह कुछ तो करती होगी ऎसा कि एक बहुत बडा संवेदनशील कवि हाथ उठाने पर मजबूर हो जाता होगा ! चार औरतें मिलकर यहां बखूबी बात करती पाई&amp;nbsp;जा सकती हैं कि हमारा तो हमें नहीं पीटता बडे प्यार से रखता है ! जैसा कि मेरी पडोसन की सास कहती है कि औरत खुद ही अपने ऊपर हाथ उठवाती है ......! इस प्रसंग का&amp;nbsp;उठ जाना बहुत अच्छा है क्योंकि&amp;nbsp;बहुत सी पत्नियां अपने सुखी जीवन में सुख का तुलनात्मक अध्ययन कर सकती हैं&amp;nbsp;, जान सकती हैं कि उनका पति औरों के मुकाबले कितना अच्छा पति है ..कि वह कभी कभार ही उसे पीटता है ..कि वह उसका अक्सर तो&amp;nbsp;खयाल ही रखता है ..! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;असीमा एक ऎसी औरत है जिसने जबान खोलकर जग की विवाहिताओं में अपना मजाक उडवाया है ! समाज के विवाहित पुरुषों के लिए उपहास का मसला बनी है ! उसे ऎसा नहीं करना चाहिए था ! यह मैं इस लिए भी कह रही हूं कि मैं यह देख पा रही हूं कि उन्होंने अपने लिए कैसा रपटीला रास्ता चुन लिया है जहां उनका मसला अंतत: एक पागल औरत का प्रलाप सिद्ध हो जाने वाला है ! मैं यह&amp;nbsp;इसलिए जान पा रही हूं क्योंकि मैंने असीमा की कथा को छूने का प्रयास करती हुई एक कविता लिख डाली है और जिसकी एवज में चंद्रभूषणजी की पोस्ट पर &lt;a href="http://pahalu.blogspot.com/2007/07/blog-post_24.html" target="_blank"&gt;टिप्पणी&lt;/a&gt; में प्रिय बोधि भाई सहित मेरी &lt;a href="http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_24.html" target="_blank"&gt;कल की पोस्ट&lt;/a&gt; पर कई गुमनाम भाईयों ने उत्साहवर्धक टिप्पणियों से नवाजा है! यह उत्सावर्धन जरूरी है नहीं तो चारों ओर यही कचरा फैल सकता है और कई सुखमय विवाहित जीवन नष्ट हो सकते है !&amp;nbsp;उनका कहना है कि कविता में यह सारा कीचड क्यों आए ! कविताई में यह वीरांगनापन एक अकवियित्री के द्वारा तो&amp;nbsp;कतई मंजूर नहीं ! कविता सत्य,सुन्दर और काम्य&amp;nbsp;के लिए है !इस तरह के कीचड और लीद के लिए नहीं ,और यह भी सामने आया कि कविताई का सारा मतलब बडे कवियों द्वारा सत्य व सुन्दर का संधान है ! मान लिया भाई जी ! पर यह मंच मेरा है जहां मैं अपने मंतव्य को जैसे चाहे लिख डालूं ! मैं जनपथ पर खडी नहीं न बोल रही, न ही आपके मंच पर तो आप काहे बिलबिला गए ! आप निश्चिंत रहें जनाब आपकी कविताई और उसकी शुचिता बनी रहेगी और पाठक भी बरकरार रहॆगे! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;आप भी तो लिखते हैं न असीमाओं पर ! पर आपको तब पता नहीं होता कि आप जिनपर लिख रहॆ हैं वे सब भी असीमा हैं ! क्योंकि आप दूर से दिख रही असीमाओं पर लिख रहे होते हैं!&amp;nbsp; आपकी काव्य चेतना में अनदेखी असीमाएं होती है हमने देखी हुई औरत असीमा की कविता कर डाली ! ...छोडिए भी....! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;कविता क्या है ?यह बताने के लिए नए रामचंद्र शुक्लों का अवतार अपने बीच हो रहा है ! सच हो मगर दूर से ! सच ,मगर अपना ही, स्थापित हो गए बडे कवियों का ! उनके पास कवि दृष्टि है वे हमारे जीवन पर&amp;nbsp;लिख सकते हैं पर हम अपने जीवन का भोगा हुआ नहीं कह सकते ! क्योंकि कविताई&amp;nbsp; तमाशा है ! संवेदना का फैशन है ! रुतबा है ! मजा है, कुछ बडेपन का ऎसा अहसास&amp;nbsp;बडे कवि जिसके परस्पर&amp;nbsp;सिरजनहार हैं ! यह गुटधरता है ! संवेदनात्मक मौज है ! इनाम है! शोहरत है ! ........।संवेदनशील सामाजिकों में संवेदना की ठेकेदारी है...!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;.............&amp;nbsp;असीमा तुमहारा कहा बेकार जाएगा ! न तुम घर की होगी न घाट की ! तुम्हारे&amp;nbsp;सच को बांटने जानने की सजा बहुत बडी हो सकती है ! क्यों मैं या और कोई भी औरत तुम्हारे साथ खडी होने के खतरे मोल ले&amp;nbsp;? वैसे भी मैं बहुत डरपोक हूं ! तुम मुझसे तो कतई कोई&amp;nbsp; उम्मीद&amp;nbsp; न रखना ! वैसे मैं जानती हूं कि तुम जानती हो मुंह खोल देने के बाद के अकेलेपन के रिस्क को ! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;असीमा..!! आज तुम सडक पर खडी हो .........कोई भी औरत जानती है कि किसी भी स्त्री का सडक पर दो मिनट भी खडे रहना क्या होता है .............और तुम तो सडक पर खडी हुंकार उठी हो&amp;nbsp;............. यह क्या कर डाला तुमने असीमा.......!!!&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-4903298465418039533?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/4903298465418039533/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=4903298465418039533' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4903298465418039533'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4903298465418039533'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_25.html' title='लोग जा़लिम हैं हरइक बात का ताना देंगे'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-955591202104366960</id><published>2007-07-24T11:55:00.001+05:30</published><updated>2007-07-24T12:03:35.507+05:30</updated><title type='text'>असीमा ! मैं क्या तुम्हारी कथा कहूं.....</title><content type='html'>&lt;p&gt;काली सुरंगों में भागती वह अकेली औरत&lt;/p&gt; &lt;p&gt;नहीं जानती कि किधर जाना है उसे&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह देखती है सर उठाकर ऊपर&lt;/p&gt; &lt;p&gt;तो आती है उसे आवाजें छैनी हथौडे की&lt;/p&gt; &lt;p&gt;जगह जगह गिरता है मलबा रोडी पत्थर&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह जानती है उसे सुरंग में धकेल डालने वाला वह&lt;/p&gt; &lt;p&gt;अपने पैरों तले की जमीन को छेद रहा है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;बना रहा है कई मुहाने&lt;/p&gt; &lt;p&gt;सुरंग के रास्ते पर &lt;/p&gt; &lt;p&gt;और कह रहा है आस पास की भीड से-- देखो ये गटर हैं..&lt;/p&gt; &lt;p&gt;...वह दौडती है और तेज &lt;/p&gt; &lt;p&gt;...सुरंगों में धस गई कई मरी हुई औरतों की कहानी &lt;/p&gt; &lt;p&gt;उस सुरंग को याद है जबानी&lt;/p&gt; &lt;p&gt;सुनो ! अब उन्हें सुन सकती हो सिर्फ तुम ही...&lt;/p&gt; &lt;p&gt;...वह दौडती है और तेज&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;सुनती है गुत्थमगुत्था आवाजों में उलझी पडी सैकडों कहानियां&lt;/p&gt; &lt;p&gt;चीखें, आहें,आंसुओं,सिसकियों में तहायी पडी सैकडों कहानियां&lt;/p&gt; &lt;p&gt;............&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह फिर भी डरती नहीं ,और भागती है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;कदमों की चाल से चेहरे पर छिटक आए&lt;/p&gt; &lt;p&gt;कीच को पोंछे बिना....&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह अकेली है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;-यही सुरंग में घुस जाने की नियति है!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह दौडती है&lt;/p&gt; &lt;p&gt;-यह उसका अपना फैसला है!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वह लथपथ है कीच गर्द गुब्बार से&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;--यह उसके दौडने की सजा है !&lt;/p&gt; &lt;p&gt;...............मुहानों से आती हर गूंज उसे कहती है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;-अपना चेहरा तो देखो&lt;/p&gt; &lt;p&gt;इसे पोंछ क्यों नहीं लेती &lt;/p&gt; &lt;p&gt;और वह बुदबुदाती है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;-अब यही मेरा चेहरा है ..यही मेरा चेहरा है .....&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-955591202104366960?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/955591202104366960/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=955591202104366960' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/955591202104366960'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/955591202104366960'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_24.html' title='असीमा ! मैं क्या तुम्हारी कथा कहूं.....'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-5303177642274691186</id><published>2007-07-22T16:07:00.001+05:30</published><updated>2007-07-22T16:16:43.567+05:30</updated><title type='text'>मोहल्ले का तो है  अंदाजेबयां कुछ और</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;सामूहिक चिट्ठाकारिता का अपना अलग व्याकरण है ! इस व्याकरणशास्त्र का परिवर्धन - परिमार्जन लगातार हो रहा है और हमने उस पर नजर भी रखी हुई है! हमने देखा कि किस तरह से उसका निजी चिट्ठाकारिता से अलग एक स्वरूप व उद्देश्य है -यह चिट्ठाकारिता का एक नया तेवर है जिसकी गंभीर पडताल बाद में लिंकित मन पर की जाएगी ! पर फिलहाल तो ऎसे ही एक "लोकप्रिय" चिट्ठे &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/index.html" target="_blank"&gt;मोहल्ले&lt;/a&gt; के साथ कुछ-कुछ पंगा शैली में लिख बैठे हैं --पंगा यह जानते हुए लिया गया है कि पत्रकार बिरादरी को छेडना बहुत खतरनाक भी हो सकता है ! अब छपास पीडा का शमन न करना होता तो लिख भर देते ,पोस्ट न करते ;) पर फिलहाल तो निज पीडा ही बडी जान पड रही है !!!!&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;तो देखा जाएगा परिणाम आप तो मुलाहिजा फरमाऎं---&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;चिट्ठा करि करि जग बौराना, अंधकूप गिरा तहहि समाना&lt;br&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वादी विवादी अधिक उकसाना,चिंतनशील विकट हैराना !!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;पत्रकार के चिट्ठे पे कबहु विवेकी न जाइ&lt;/p&gt; &lt;p&gt;उत्सुकतावश यदि जाइ&amp;nbsp;तो कबहु न टिपियाइ !!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/index.html" target="_blank"&gt;चिट्ठों के चौबारे&lt;/a&gt; पर लगी रहा चिट्ठा मेला&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ढूंढे से भी न मिले तहां चिट्ठाकार अकेला !!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;स्त्री दलित हिंदुमुस्लिम&amp;nbsp;चालू&amp;nbsp;आहे बाजार&lt;/p&gt; &lt;p&gt;धाट&amp;nbsp;धाट से चुनि चुनि लगि रहा यह&amp;nbsp;अंबार!!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; इक ही विषय पर आइ रहा मति -कुमति का रेला&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; लेख-कुलेख धकियाइ के लाइम लाइट में ठेला !!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;चिंतन करि करि ऊपजे ऎसा विमर्श -पहाड&lt;/p&gt; &lt;p&gt;छुटपुट लेखक चढि पडा सूझे न कोई उतार !!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जहां तहां से उद्धृत करें सम-&amp;nbsp;समभावी विचार&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बेनामी टिपियाय रहे पड्तु निरंतर मार !!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;कहें विमर्श करतु संघर्ष न निकले निष्कर्ष&lt;/p&gt; &lt;p&gt;ऋन धन,धन ऋण होई जात है कैसे हो उत्कर्ष !!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;font color="#000000"&gt;&lt;/font&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वा गली वा कुंजनिन में लगी रही संतन भीड&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;हल्का -फुल्का एकु न,एकौ ते एक गंभीर !!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; एकु ते एकु गंभीर, मिली-मिली ग्य़ान बधारें&amp;nbsp;  &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बनी परकास-स्तंभ करत हैं जग उजियारे !!&amp;nbsp; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जग महि करें प्रकास नहीं हैं इन्हें अवकास&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ग्यान&amp;nbsp;&amp;nbsp;चक्षु हैं खुलि गए बाकी सब बकवास !!&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;क्षमा करें बंधु हमें हमरा है नहीं दोस&lt;/p&gt; &lt;p&gt;टिपियाकर परगट करें अपना सब आक्रोस !!&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-5303177642274691186?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/5303177642274691186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=5303177642274691186' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5303177642274691186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/5303177642274691186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_22.html' title='मोहल्ले का तो है  अंदाजेबयां कुछ और'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-4900652890120838345</id><published>2007-07-20T11:54:00.001+05:30</published><updated>2007-07-20T17:10:17.468+05:30</updated><title type='text'>खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों.........</title><content type='html'>&lt;p&gt;प्यार और उसकी अभिव्यक्ति के मामले में अब हमारे शहर बदल रहे हैं , हमारे मन बदल रहे हैं ! प्यार करने के लिए अब प्रेमी जोडों को खेत खलिहान झाडी की ओट नहीं तलाशनी पडती न ही जमाने की घूरती नजर की परवाह करनी पडती है ! प्यार किया तो डरना क्या की तर्ज पर अपने आस पडोस की मानव आकृतियों की फिक्र किए बिना प्यार करने वाले प्यार भी कर रहे हैं और उसका इजहार भी ! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने घर की बाल्कनी में खडे हों तो अक्सर नीचे सडक पर हाथ में हाथ डाले प्रेमी लडके - लडकियां घूमते दिखाई दे जाते हैं ! मेट्रो से यात्रा करें तो सब ओर मेट्रोमय प्रेम और प्रेममय मेट्रो ही होती है ! मॉलों की सीढियां प्रेमबद्ध युगलों को पार करके ही चढना संभव होता है !शहर के सारे पार्कों में हर बॆंच पर प्रेम में आकंठ डूबा जोडा लौकिक जगत के बोध से रहित प्रेमालाप करता दिखाई देता है ! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऎसा खुल्ला प्यारमय माहौल हमें तो सब ओर पॉजिटिव ही पॉजिटिव होता मानने को मजबूर कर देता है ! मन कहता है काहे का पिछडापन भई हम तो लगातार विकास कर रहे हैं ! आत्मा से आवाज निकलती है कहां है मध्यकालीनता , कौन- सी बंद सोसायटी ? हम तो एक आधुनिकतम खुला समाज हैं जहां कोने - कोने पे प्रेम की नदियां बह रही हैं ..... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्या है कि हम मसिजीवी जी की तर्ज पर कहें तो ठहरे मास्टर.. न न.. मास्टरनी .....! अब पिछले दो साल से पढा रहे हैं फर्स्ट इयर के लडकों को रीतिकाल ! कहने को कोऎड कॉलेज है पर हमारी क्लास में एक भी लडकी नहीं ! तो भाई लोगों कवि पद्माकर, मतिराम देव आदि आदि के प्रेमकाव्य की सप्रसंग व्याख्या करने की मुसीबत से हफ्ते में 3 बार गुजरते हैं....अब पद्माकर कह गये कि बच्चों देखो कैसे रति क्रीडा के बाद सुबह प्रेममग्न नायिका रति कक्ष की देहरी पर हाथ रखे खडी होती है ..कि कैसे उसके बाल उसके गले के हारों से गुत्थमगुत्था हो गए हैं ....कि कैसे वह नायक को मादक दृष्टि से देखती है और यह कि फलां छंद में विपरीत रति का चित्रण है फलां में नख और दंत छेदन ..और यहां मुग्धा नायिका है ....यहां प्रौढा.............................! अब क्या करें जब वात्सयायन जी कामसूत्र की रचना कर ही गए हैं , हमारे रीतिकालीन कवि उस पर आधारित नायिका- भेद व रति -चित्रण कर ही गए हैं तो हम भी उसे बिना हकलाए, बच्चों से बिना नजर चुराए और व्याख्या को बिना सारांश में बदले पढा ही डालते हैं ........&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऎसे में हमें हमारे पार्कों में लतावेष्टित आलिंगन में बंधे चुंबन के अनेकों वात्सायनी पाठों को आजमाते नायक नायिका ध्यान जरूर आते हैं ! वे स्कूल या कॉलेज से भागे हुए कच्ची पक्की उम्र के युवा .....! हम भरसक कोशिश करते हैं उन्हें न देखने की पर वे कोई कोशिश नहीं करते हमें न दिखने की .........मानो हम उनके लिए अदृश्य हैं !.....पार्क में खेलने गए किसी बच्चे की बॉल अपने पास आकर गिरने या फिर पिकनिक मनाने आए किसी बडे से परिवार के छोटे बडे सदस्यों वाले झुंड के अपने पास से गुजरने पर भी वे अपने शयन- कक्ष वाली मुद्रा को त्यागे बिना रत रहते हैं ......ऎसे में लगता है कि हम पीछे छूट गए और आउटडेटिड हैं ...कि यही ट्रेंड है ....यही अदा है नए प्यार की ....आप जले या नएपन को कोसें ....नजर चुराऎ या नजर भर देखॆं...... या फिर अपने बीत गए जमाने में प्यार करने की दिक्कतों को लेकर कुंठित हों........ &lt;/p&gt;&lt;p&gt;..........हम इसे पब्लिक डिस्प्ले ऑफ अफेक्शन मानें या उन्मुक्त यौन अभिव्यक्ति......अपनी फिल्मों में यौनिक अभिव्यक्ति का स्वागत करते हम अपने आसपास क्यूं न करें इसे स्वीकार ? कला और यथार्थ में आती खाई को आओ पाट दें........या फिर अपनी आंखो के दोगलेपन पर करें फिर से विचार.....बहरहाल हम पता नहीं कब तक रीतिकाल को पढाऎगे और यह भी हमारी ही सरदर्दी है कि कैसे पढाऎगे.......वैसे एक बात है कि मन में कई बार उठ्ता है कि विभाग में बाकी सभी 9 पुरुष हैं...वे ही क्यों नहीं पढा लेते यह एक पेपर ! पंतु तभी मन में एक कोने से कोई आवाज सुनाई देती मैं क्यों नहीं ............ !&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-4900652890120838345?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/4900652890120838345/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=4900652890120838345' title='27 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4900652890120838345'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/4900652890120838345'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_20.html' title='खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों.........'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>27</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3501340498128026221</id><published>2007-07-18T13:49:00.001+05:30</published><updated>2007-07-18T13:49:37.522+05:30</updated><title type='text'>गालियों से रिसता चिपचिपा पदार्थ</title><content type='html'>&lt;p&gt;अनामदास जी बोधिसत्व जी तथा और भी जितने भी जी गाली शास्त्र पर अपने विचार व्यक्त करते पाए गए उन सभी से क्षमा प्रार्थना के बाद ही मुझ जैसी-गाली अकुशल वर्ग की प्राणी इस विषय पर कुछ कहने की कुव्वत कर सकती है !बात यह है कि गाली प्रेषण में सम्पन्न पुरुष वर्ग से खुद को हीन समझने का एक और कारण हमॆं मिल गया है ,जिसे पाकर हम उस तरफ से अनदेखा नहीं कर पा रहे हैं !हमने पहले भी गाली को मर्दवादी ,वीर्यवादी समाज की भाषा संरचना कहा था ,आज भी कहेंगे! अभी हाल ही में उठा साहित्य भाषा,गाली और बहस&amp;nbsp;का तर्क झंझावात साफ&amp;nbsp;तौर पर हमें, हमारी सामाजिक स्थिति को डिफाइन करने का एक और प्रयास भर ही है शायद !एक स्त्री विहीन विमर्श का दायरा सुनिश्चित करता तमाम बौद्धिक वर्ग....! &lt;/p&gt; &lt;p&gt;......और हम रोज देखते हैं गली मोहल्ले मेट्रो यहां तक कि शिक्षण संस्थानों में गालियों से आकंठ भरे मदमस्त बेपरवाह अपकी -अधपकी -पकी उम्र के मर्दों को !ऎसे में हमें दिखना होता है अनजान..कि हमने नहीं सुना कुछ..कि हमें नहीं पडता फर्क क्योंकि यह जो गाली तुम दे रहे मेरे जननांगों या चरित्र पर नहीं लक्षित है..कि नहीं नहीं सब कुछ ठीक ही तो है ....!किसी&amp;nbsp;चौराहे पर सिर्फ 7-8साल के फटेहाल या फिर गली में खेलते तीसरी क्लास मॆं पढने वाले बच्चे को ऎसी' '&amp;nbsp;भद्र' भाषा का इस्तेमाल करते सुनकर मात्र यह शुक्र मनाना होता हि कि अभी तक हमारे घर का बच्चा यह नहीं सीखा है !वैसे क्यूं इतनी आपत्ति है हमें गालियों से ..इसे पुरुष वर्ग की यौन कुंठा का उत्सर्ग द्वार मानकर भी तो भूला जा सकता है ! स्त्री के शरीर मात्र को लक्ष्य बनाकर करने दो इन्हॆं आपसी छीछालेदर! यहां पिता यह मानकर संतोषी होकर रह सकता है कि उसका पुत्र भाषा का यह तेवर न जानता होगा अपनाता होगा और पुत्र यह भ्रम पाले रहता है कि उसका पिता गालियों की भाषा बोल ही नहीं सकता ....कितने सहज हैं ये भाषिक व्यवहार अपनी- अपनी मर्यादा के खोलो को निभाने में भी कितने उन्मुक्त ....&lt;/p&gt; &lt;p&gt;कभी कभी '&amp;nbsp;विमल जाऎं तो जाऎं कहां' के विमल सिर्फ उस उपन्यास में ही नहीं रहते!&amp;nbsp;विमल जानते हैं कि&amp;nbsp;"पाजामे में पडे पिलपिले पत्थरों का' इतिहास... &lt;/p&gt; &lt;p&gt;हमारी एक मित्र हैं जो शिक्षा विभाग में प्राध्यापिका हैं ....उन्होंने ऎसी ही किसी भावना की&amp;nbsp;रौ में बहकर पुरुष&amp;nbsp; लक्षित गालियों का संधान किया था इस बात को आज 7-8 वर्ष हो गए हैं ...लेकिन अभी तक उन्होंने उन गालियो का इस्तेमाल नहीं किया है ...शायद कर&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp; पायीं...&lt;/p&gt; &lt;div class="wlWriterSmartContent" id="0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:714b579d-6a3d-4b89-9142-aa3aedb8fefc" contenteditable="false" style="padding-right: 0px; display: inline; padding-left: 0px; padding-bottom: 0px; margin: 0px; padding-top: 0px"&gt;Technorati Tags: &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%89%e0%a4%82" rel="tag"&gt;गालियॉं&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%20%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6" rel="tag"&gt;गाली विमर्श&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80" rel="tag"&gt;स्‍त्री&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/abuses" rel="tag"&gt;abuses&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/gender" rel="tag"&gt;gender&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/issues" rel="tag"&gt;issues&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tags/neelima" rel="tag"&gt;neelima&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3501340498128026221?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3501340498128026221/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3501340498128026221' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3501340498128026221'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3501340498128026221'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_18.html' title='गालियों से रिसता चिपचिपा पदार्थ'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-2360335144127388821</id><published>2007-07-16T10:57:00.000+05:30</published><updated>2007-07-16T11:49:18.885+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समीरलाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्ली ब्लॉगर मीट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='असहमति'/><title type='text'>समीर जी, दिल्ली ब्लॉगर मीट में साधुवाद वर्सिस असहमति पर हुआ द्वंद्व</title><content type='html'>यहां तो बहुत गडबडझाला हुआ जा रहा है! हमारे अतिप्रिय समीर जी को मैं स्पष्ट करना चाहूंगी कि दिल्ली ब्लॉगर मीट में उठे जुमले --&lt;a href="http://www.blogger.com/http://masijeevi.blogspot.com/2007/07/blog-post_14.html//"&gt;'साधुवाद युग का अंत&lt;/a&gt; "--केवल एक शाब्दिक प्रतीक भर था जिसका प्रचलन आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणियों में आने वाले साधुवाद शब्द मात्र से हुआ है!&lt;br /&gt;समीर जी ,आपका ब्लॉग लेखन हिंदी ब्लॉग जगत में जो भूमिका रखता है उसे जाहिर करने के लिए एक टिप्पणी मात्र काफी नहीं होगी ! मैं यहां इतना ही कहना चाहती हूं कि उपरोक्त जुमले का पूरे प्रसंग में उद्देश्य यही था कि हिंदी ब्लॉगिंग मेच्योर हो रही है और हम असहमतियों और विवादों को बढता देख रहे हैं ! वहां यह कहा गया था कि अब परस्पर उत्साह बढाने वाले माहौल के स्थान पर विरोधी विचारों को रखने की परंपरा की नींव पड रही है ! यह भी कहा गया कि नए ब्लॉगरों को उत्साह वर्धन की जरूरत हमेशा रहेगी लेकिन एक सीमा के बाद हर चिट्ठाकार अपने विचार रखेगा जो जाहिराना तौर पर आपस में मेल नहीं खाते होंगे और विमर्श को जन्म दॆंगे! ब्लॉग जगत के हालिया बदलावों के मद्देनजर इस बात की और भी ज्यादा पुष्टि होती है !&lt;a href="http://www.hindini.com/fursatiya/"&gt; फुरसतिया जी &lt;/a&gt;के यहां सृजन जी की टिप्पणी में भी इस संबंध में बातें रखी गई हैं !&lt;br /&gt;आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का इरादा वहां मौजूद किसी भी ब्लॉगर का नहीं था ! मसिजीवी ने अपने लेख में जो बात रखी वह उस मीट में पैदा हुए विमर्श से जुडी थी !यूं तो आपके पदचिन्हों पर चलकर हम सब भी साधुवाद के जुमले को बहुत इस्तेमाल करते हैं , लेकिन नए असहमतियों के दौर में इस साधुवाद करने की प्रवृत्ति के स्थान पर सार्थक विरोधी विचार रखने की प्रवृत्ति के बलवती होने की संभावनाओं पर विचार किया गया था! यहां लक्षय ----"हम सभी ब्लॉगरों की प्रवृत्ति पर था '!----आप के लेखन की सार्थकता या इस जगह पर आपकी उपस्थिति को कट्घरे में डालने का विचार कमसे कम मै जितना उक्त लेख के लेखक को जानती हूं सबसे आखिरी विचार होगा!आप से मौज की आप द्वारा ही दी हुई छूट का अगर यह अर्थ होना था तो वाकई यह एक कमजोर शैली के लेख के कारण ही हुआ होगा !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-2360335144127388821?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/2360335144127388821/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=2360335144127388821' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2360335144127388821'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/2360335144127388821'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_16.html' title='समीर जी, दिल्ली ब्लॉगर मीट में साधुवाद वर्सिस असहमति पर हुआ द्वंद्व'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3236526740377280619</id><published>2007-07-13T11:33:00.001+05:30</published><updated>2008-12-09T20:56:35.986+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='neelima'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='delhi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शाम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='evening'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्‍ली'/><title type='text'>मेरे शहर में शाम</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/RpcrYN4UCMI/AAAAAAAAALg/0EfEM3PjLeM/s1600-h/PICT0226.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5086581999180974274" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/RpcrYN4UCMI/AAAAAAAAALg/0EfEM3PjLeM/s400/PICT0226.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मेरे शहर में शाम हर रोज आती है ! रोज उतनी ही बासी, उतनी ही भागदौड भरी और उतनी ही उदासीन !अब शाम कवि की काव्य प्रेरणा उस तरह से नहीं रही है शायद जैसी पहले हुआ करती थी ! संझा का झुटपुट, चिडिया की टुट-टुट वाली कविता भावना उपजाने में नाकाम शहरी शाम ! ये शामें ललाती सी , लुभाती सी कहां रही हैं, न कवि का मन अब कहने को करता होगा---मेघमय आसमान से उतर रही संध्या -सुंदरी परी - सी- धीरे धीरे धीरे..! भीडे लालडोरे इलाकों या फिर ऊंची सोसायटियों की ऊंची बिल्डिंगों के ऊपर के आकाश में कब शाम रात से समझौते का सौदा कर बैठती है और कब डूब जाती है शहराती नहीं जान पाता ,न जानना चाहता है&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;!मेरे शहर में दोपहर ढलने का नोटिस हाथ में लिए उजास निर्वासित सा निकल पडता है ! शाम बडकुंवरिया की सी पथरीली भंगिमा लिए आन खडी होती है बेकली का भाव अपने चेहरे पर लिए , बेकली अंधेरे की भीमकाया में खो जाने की.... ! &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मेरे शहर की धमनियों में बहती है मेट्रो मेरी शान ! इस छोर से उस छोर !उडेलती चलती है तरल शहराती झुंड--छोटे छोटे क्षुद्र कटोरों जैसे घरों में ! ऊपर आकाश में लाल और काले रंग का पारंपरिक मिलन और उसकी छाया में यमुना के पुशतों पर दौडता साइकिलों का रेला ...रोज रोज के लिए यूं ही प्रोग्रांड है ये दृष्य..मेरे शहर के केनवास पर ! यहां हर शाम थका - मांदा सा सूरज दिन भर की ड्यूटी से पसीज जाता है पर इन साइकिलों पर सवार कामगरों का मेला दस -दस घंटों की काम की पारी से भी क्या नहीं थकता ?....कम से कम साइकिलों के पैडलों पर पडते उनके पैरों की गति तो यही कहती है ....शाम के बेतरतीबे कोलाज में बेमेली से चिपके निरर्थक हिज्जे से चिपके जीते जन ...लाकों जन....&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;दिन में हल्की शर्म का झीना नकाब ओढे मेरा शहर हर शाम मॉलों में नंगा होने पर उतारू सा लगता है ! चमक, यौवन मूड और मौके का अद्भुत हाट !नया मूल्य , नया तेवर लिए शाम वहां बाजारू सी होने पर आमादा हर सकुचाये को निमंत्रण देती है....नए नेह का निशा निमंत्रण... &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;कैसे ठुकरा दिया जाए ये निमंत्रण....बहुत संयम की बात है..&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/RpcXxd4UCKI/AAAAAAAAALQ/-COqeK362F4/s1600-h/PICT0225.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5086560442740115618" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/RpcXxd4UCKI/AAAAAAAAALQ/-COqeK362F4/s400/PICT0225.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;ऊपर आकाश मॆं विरोधी रंगों का कितनी कुशलता से किया गया मिश्रण और यहां शहर की जमीन पर अंधेरे और चमक का साफ साफ बंटवारा.....यहां शाम जानती है दोनो छोरों की परिभाषा ......हम जाने या न जाने .....और जानना चाहें या न चाहें... &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3236526740377280619?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3236526740377280619/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3236526740377280619' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3236526740377280619'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3236526740377280619'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_13.html' title='मेरे शहर में शाम'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/RpcrYN4UCMI/AAAAAAAAALg/0EfEM3PjLeM/s72-c/PICT0226.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-919616152016403748</id><published>2007-07-06T13:36:00.001+05:30</published><updated>2008-12-09T20:56:36.230+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='photo'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='parivar'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='family'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='population'/><title type='text'>ये दो और इनके सिर्फ तेईस...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/Ro34Qv1ubPI/AAAAAAAAALA/dYpglC8XDG8/s1600-h/parivar.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5083992520974560498" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/Ro34Qv1ubPI/AAAAAAAAALA/dYpglC8XDG8/s400/parivar.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रायटर ऐजेंसी से प्राप्‍त ये तस्‍वीर आज हिदुस्‍तान टाईम्‍स में छपी है! बड़े आकार के लिए क्लिक करें&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-919616152016403748?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/919616152016403748/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=919616152016403748' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/919616152016403748'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/919616152016403748'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_06.html' title='ये दो और इनके सिर्फ तेईस...'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/Ro34Qv1ubPI/AAAAAAAAALA/dYpglC8XDG8/s72-c/parivar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-9105873648919487331</id><published>2007-07-03T13:54:00.000+05:30</published><updated>2007-07-03T15:27:02.166+05:30</updated><title type='text'>अविनाश जी ! मोहल्ले के मर्दवादी भाषिक तेवरों को लगाम दीजिए</title><content type='html'>&lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/index.ht"&gt;मोहल्ले&lt;/a&gt; पर जाना पहली बार एक दुखद अनुभूति रहा ! बडे विचारकों की साहित्य की जमीन पर की हुई विष्टा से जी मितला गया ! बहस की भाषा मर्दवादी , बदमजा और मुठभेडी ! चिंतन खोखला तो भाषा थुलथुली , लिजलिजी ! मन बना लिया था कि इस विवाद से दूर का नाता नहीं रख्ना है पर वहां &lt;a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/"&gt;नोटपैड &lt;/a&gt;जी टिप्पणियों में एक कोशिश देखकर मैंने सुबह अविनाश जी से बात की ! वह बहस तो अधूरी रह गई किंतु मोहल्ला बनाम अविनाश जी की सोच कुछ हद तक सामने आई--&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; क्या गदर मचा रहे हैं जनाब आप&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: आदाब... कुछ गड़बड़ हो गया है क्‍या....&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; आप को भी तो कुछ महसूस हो रहा होगा न गडबड जैसा ;)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: मैं किसी गड़बड़ी को लेकर साकांक्ष नहीं हूं... अगर ऐसा है, तो मुझे बताया जाए कि मुझे क्‍या करना चाहिए...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; नए लोगों को न डराओ यहां मैं तो अभी देख ही रही हूं सब अभी अमझ में नहीं आया है मामला पर जानना है आप क्या कुछ नहीं देख रहे क्या यही सब होना चाहिए ??क्लियर स्टेंड क्या है बताऎ तो यही भाषा हो सकती है कुछ और नहीं या हम सब नए और आम लोग बहुत नासमझ हैं&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: देखिए... मेरी मंशा है कि हिंदी पर बात हो... हिंदी में लिखे जा रहे पर बात हो... हममें से कइयों को लगता है कि हिंदी में जो कुछ भी आज लिखा जा रहा है, उसके सरोकार नहीं हैं... अभी भी सवर्ण मानस की अभिव्‍यक्तियां हिंदी साहित्‍य के केंद्र में हैं... तो हिंदी की मुख्‍यधारा में इन दिनों क्‍या-कैसी बहस चल रही है, उसकी एक झलकी ही आप यहां देख रही हैं&lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com/"&gt;... मसिजीवी &lt;/a&gt;ने सही लिखा- कि अगर हिंदी की दुनिया यही है, तो ऐसी दुनिया में हमें नहीं जाना...&lt;br /&gt;क्लियर स्‍टैंड जैसा कभी कुछ होता नहीं... विमर्श की दुनिया में कम से कम... राजनीति की ज़मीन पर ज़रूर इस तरफ या उस तरफ रह कर बात की जा सकती है...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; हां या तो यह सब दरकिनार होगा या आम लोग यहां से जाऎगे -यही भविष्य है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash:&lt;/strong&gt; आम लोग कौन है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; वैसे भाषा को लेकर स्टेंड की बात की थी मैंने&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: हमारे आपके समाज में जो अभिव्‍यक्तियां हैं, जो शब्‍द हैं, वही पन्‍ने पर उतरेंगे... भाषा दस तरह की आए, उसका मैं कायल हूं आपकी ही भाषा में जो अठखेलियां हैं- वह हिंदी के लिए नई हैं&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; यही तर्क तो आज के हिंदी सीरियल वाले , एकता कपूर देती हैं&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash:&lt;/strong&gt; तो भाषाई परहेज़ एक तरह से लोकतंत्र का निषेध है&lt;br /&gt;तब तो आप दलित साहित्‍य को खारिज़ कर देंगी, जिसमें धड़ल्‍ले से गालियों का प्रयोग हो रहा है एकता कपूर क्‍यों‍ कह रही है, और साहित्‍य में इसकी मांग क्‍यों उठ रही है, इसकी अलग-अलग वजहें हैं... भाषाई गरिमा में हिंदी का दम घुटता रहा है बहुत सारी बातें निकलकर नहीं आ पायी हैं&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; भाषा में यह चूतिया वाली शब्दावली कभी किसी महिला की तो नहीं दिखी ? न ही महिला कहीं ऎसी किसी बहस में दिखती है ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: मैं इस शब्‍द या किसी भी गाली का प्रयोग नहीं करता...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; चूतिया कहते ही सारी अभिव्यक्ति पा जाते हैं आप ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: व्‍यक्तिगत रूप से...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash:&lt;/strong&gt; अभिव्‍यक्ति एक शब्‍द से नहीं फूटती आपने ब्‍लैक फ्राइडे फिल्‍म देखी होगी उसमें इस शब्‍द का धड़ल्‍ले से प्रयोग किया गया है पुरुषों की दुनिया में इस शब्‍द का इस्‍तेमाल चुइंगम की तरह किया जाता है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; शब्द तो पूरी भाषिक संरचना हैं अकेले वजूद नहीं रखते&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: हमारे समाज में तमाम गालियां स्‍त्री विरोधी हैं&lt;br /&gt;आप देखिए... बोधिसत्‍व हिंदी के बड़े कवि हैं...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; तभी तो कह रही हूं पुरुषों की बहस जिसमें सारी यौन कुंठाओं की बारास्ता साहित्य अभिव्यक्ति हो रही है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: उन्‍होंने चूतिया का इस्‍तेमाल किया... हां, अब आपने सही बात कही क्‍या होना चाहिए, क्‍या नहीं होना चाहिए... बात इस पर करनी ही नहीं चाहिए बात ये है कि जो जैसा है वो वैसा दिख जाए&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me&lt;/strong&gt;: साहित्य की भाषा और बहस की भाषा में फर्क होता है जनाब&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash:&lt;/strong&gt; तो जब बोधिसत्‍व जैसे बड़े कवि इस शब्‍द का इस्‍तेमाल करते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि हिंदी में इन दिनों अभिव्‍यक्तियों का कैसा दौर चल रहा है ! मैं दूसरों की भाषा सेंसर करने के पक्ष में नहीं हूं... मैं अनुरोध ही कर सकता हूं मैंने किया भी है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; बहुत गलत बात कि वे बडे कवि हैं तो क्या वे फिलमी एक्टर की तरह हमें भाषा का फैशन बताऎगें ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: ये आप उन्‍हें बताइए...&lt;br /&gt;me: आप भी तो जानिए हमारी बात! आपके यहां ही यह सब चल रहा है आप उस सब से वास्ता तोड कर साइड में नहीं खडे हो सकते हैं न&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash:&lt;/strong&gt; यही तो मैं कह रहा हूं... मैं दूसरों की भाषा सेंसर नहीं कर सकता। या तो मैं पूरा वाक्‍य ही नहीं छापूंगा... मेरे पास अभी 19 आर्टिकल है, जिसे नहीं छाप रहा... इस‍ी वजह से, क्‍योंकि वो छापने के काबिल नहीं है लेकिन विमर्श में कोई उग्र हो गया है या कोई बदज़ुबानी कर दी है, तो उसे खामोश नहीं कर देना चाहिए पूरी बात आने देनी चाहिए...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; तो यह काबिल था यानि ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: इतना धैर्य हममें होना चाहिए... क्‍यों हम गालियों से परहेज़ करेंगे, अगर सिर्फ गाली के लिए गाली न दी गयी हो हमारे संस्‍कारों कें स्रोत दरअसल हमारी सुहागिन परंपराएं हैं, कोई आज़ाद और अपनी निर्मिति नहीं इसलिए हम हरे-हरे कहने लगते हैं... और शिव शिव कहने लगते हैं&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; बात घूम कर वहीं मत पहुंचाइए न ! गाली ! मर्दवादी अंदाज में गाली जिससे स्त्री के बारे में दबी हुई उनकी मानसिकता सामने आती है उन सब के दावों को खारिज करती हुई कि वे नए समय के स्त्रीवादी विमर्शों से ताल्लुक रखते हैं&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: तो ये तो अच्‍छी बात है... पर्दाफाश ज़रूरी है जो जिस मानसिकता का है, उसकी मानसिकता ज़ाहिर होनी चाहिए&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; तो मतलब यह कि उन सब को चूतिया कहने की आजादी होनी चाहिए बिना उसके एक मर्दवादी सटीक अभिव्यक्ति कर ही नहीं सकता&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: न आप मेरी बात समझ रही हैं... न मैं आपकी बात समझ रहा हूं... दरअसल मैं सेंसर के पक्ष में नहीं हूं.... &lt;a href="http://www.hindini.com/eswami/"&gt;ईस्‍वामी&lt;/a&gt; ने एक बार ठीक कहा था कि आप उधर मत जाओ, जिधर कुछ गंदी हवाएं बह रही हैं... चौपटस्‍वामी ने भी विवाद की अविनाशप्रियता में यही कहा था..&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;. me&lt;/strong&gt;: अर्थात?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: अभिव्‍यक्तियों का एक कोना ऐसा भी रहने देना चाहिए...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; और वहां स्त्रियां जाऎ या नहीं ? और अगर जाऎ तो किस भाषा का इस्तिमाल करें ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: देखिए नोटपैड ने आकर अपनी बात कही कि नहीं... बहुत वाजिब बात कही है... स्त्रियां आएंगी... और आईना दिखा कर जाएंगी...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; जाऎ तो यह मान कर कि वहां उनके गुप्तांगों पर बनाई गई गली वाली गालियों में बहस होगी &lt;strong&gt;avinash:&lt;/strong&gt; क्‍या अक्‍सर ऐसा होता है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; नोट पैड गई थी क्या हुआ वे जनाब मासूम बन गए नोट पैड ? कहां हो अविनाश जी ;)?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash:&lt;/strong&gt; अभी सुबह-सुबह उठा ही था... चाय-पानी भी नहीं चढ़ाया है...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; ओह ;)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: कभी मिलेंगे तो बात करेंगे&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me: चलो&lt;/strong&gt; बाद में बहसेंगे&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash:&lt;/strong&gt; शुक्रिया&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me&lt;/strong&gt;: वैसे यह तो एक चिट्ठा तैयार हो गया है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash&lt;/strong&gt;: आप इसे डाल दो&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;me:&lt;/strong&gt; छाप दें ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;avinash:&lt;/strong&gt; छाप दीजिए...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-9105873648919487331?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/9105873648919487331/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=9105873648919487331' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/9105873648919487331'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/9105873648919487331'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post_03.html' title='अविनाश जी ! मोहल्ले के मर्दवादी भाषिक तेवरों को लगाम दीजिए'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-7910371345249219114</id><published>2007-07-01T17:37:00.000+05:30</published><updated>2007-07-01T17:39:57.747+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य - व्यंग्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नीलिमा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फुरसतिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य - व्यंग्य hindi blogging'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blogging'/><title type='text'>कौन है असल फुरसतिया ?</title><content type='html'>आजकल हिंदी ब्लॉग जगत परेशान है ! सब ब्लॉगियों की समस्या है कि लिखना बहुत कुछ है पर वक्त बडा कम है ! उसका ज्यादातर हिस्सा तो नौकरी, घर आदि-आदि पचडों में जाया जा रहा है फुरसत की घोर कमी के काल में ब्लॉग जगत की बादशाही की तमन्ना दम तोड रही है ! अब जायज है कि ऎसे विकट समय संकट में मजे से लिखते फुरसतमय ब्लॉग लेखक से जलन हो बैठे ! ऎसे में जले पर नमक के छिदकाव सा करते &lt;a href="http://www.chitthajagat.in/"&gt;ब्लॉग एग्रीगेटरों &lt;/a&gt;का उदय होने से वाकई मैं भी परेशान हूं ! ये बिन चाहे ही आपको आपकी औकात बता दे रहे हैं और बिन “ मांगे मोती मिले ...वाले दोहे के सत्यापित मतलब को एक बार फिर से शक के घेरे में डाल रहे हैं ! उधर ब्लॉगिए धड़ाधड पोस्टें दाग रहे हैं _हिट होने के तरीके , दो मिनट में पोस्ट लिखने के तरीके , पंगा लेके हिट होने के तरीके , कम समय में टिपियाकर ग्राहक बटोरने के तरीके ,&lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com/"&gt; लिंक दो लिंक लो &lt;/a&gt;वाले तरीके., गाली देके हिट होने के तरीके............एक से एक जालिम और खुराफाती आजमाए हुए ! समझ नहीं आता किसकी दुकान में जाऎ ! हमें तो लगता है ये सारा मामला इतना सीधा नहीं है होता तो फुरसतिया जी बता न देते कि उनकी इस फुरसत का राज क्या है ! अब कई ब्लॉगर उनको उकसा बैठे कि भी कभी तो फंसेंगे ---- &lt;a href="http://iyatta.blogspot.com/2007/06/blog-post_23.html"&gt;इयत्ता &lt;/a&gt;वाले लिख रहे हैं असल फुरसतिया कौन है ! &lt;a href="http://pagdandi1.blogspot.com/"&gt;अनुराग जी&lt;/a&gt; पानी के बतासे खिलवाकर भुलावे में उगलवान चाह रहें कि जैसे ही तीखा लगे और &lt;a href="http://www.hindini.com/fursatiya/"&gt;फुरसतिया&lt;/a&gt; जी पानी मांगे तो पानी का गिलास दूर से दिखला- दिखला के कहें कि पहले बताओ फुरसत का राज क्या है ? आलम यह है कि उनके यहां &lt;a href="http://sanjeettripathi.blogspot.com/"&gt;टिप्पणी &lt;/a&gt;में में एक सज्जन कह रहे हैं कि --आज कि आपकी पोस्ट आपके नाम को सार्थक नहीं कर कर रही—मानो जवाब मॆं धोखे से वे गुप्त रहस्य पर से पर्दा उठा बैठेंगे !&lt;br /&gt;अब वैसे फुरसतिया तो कम &lt;a href="http://pangebaj.blogspot.com/2007/06/blog-post_30.html"&gt;अरुण भाईसा &lt;/a&gt;भी नहीं हैं देखिए न इतनी फुरसत में कि प्यारे से डागी के सजीलेपन की ओर हम सब गैरफुरसतियों का ध्‍यान दिलवा रहॆं है! अब कुत्ते तो कई हमारी गली में भी घूमते हैं और उनमें से दो एक सजीले भी हैं पर हममें कभी इतना फुरसतियापा होता तो वे सजीले सुकुमार हमारी भी काव्य प्रेरणा बन पाते ! वैसे &lt;a href="http://puranikalok.blogspot.com/"&gt;आलोक जी&lt;/a&gt; से बडा फुरसतिया कौन होगा – जिस चीज में हम ऎब निकाल- निकाल कर रोंते हैं वे हर उस चीज में मजा ढूंढ लेते हैं! हमें तो भएया रोने को भी वक्त कम पड जाता है और वे हैं कि हंसते हैं और हंसाते भी है ! अब &lt;a href="http://azdak.blogspot.com/2007/06/blog-post_14.html"&gt;प्रमोद भइया &lt;/a&gt;का फुरसतपना उनसे ससुर कुछ भी लिखवा बैठता है ! यहां तक कि बकरी की लॆंडी उनकी रचना प्रेरणा का मूल आधार ही है! वे जड- मूल पर लिखते हैं , गहरा और मौलिक ! बकरी जैसी निरीह और सुकुमार प्राणी का महत्व प्रतिपादन करने की फुरसत वह भी इस आपाधापी के युग में निश्चय ही वे सच्चे फुरसतिया होंगे ! &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/07/blog-post.html"&gt;मोहल्ला &lt;/a&gt;तो फुरसत में ही चलाया जा रहा सामूहिक प्रयास है वरना कौन अपने दरवाजे से निकलकर दो मिनट गली मोहल्ले में रुकता है आजकल ! हमारा तो हाल यह है कि अपने ही विचार इकट्ठे नहीं कर पाते और मोहल्ला इतने सारे विद्वानों की अमृतवाणी संजोकर आ घमकता है और वह भी बिना नागा ! अब&lt;a href="http://hgdp.blogspot.com/2007/07/blog-post.html"&gt; ज्ञानदत्त जी &lt;/a&gt;को ही देखो बेहद बिजी भारतीय प्लेटफार्म पर बैठकर ही वे कितनी फुरसत से अपने मन में हलचल होने देते हैं !वैसे हलचल तो हमारे मन मंदिर में भी होती है बहुत , पर क्या करें जब तक फुरसत में आते हैं मन शांत हो चुका होता है और आप सब एक बेहतरीन- लाजवाब पोस्ट से वंचित रह जाते हैं!&lt;a href="http://veerurawat.blogspot.com/"&gt; उत्तराखंडियों &lt;/a&gt;की फुरसत बहुत ही सामयिक है जिस दिन भी उन्हॆं फुरसत होती है भुगतना हमें पडता है जनाब और यदि उस दिन हमारा चिट्ठाचर्चा की ड्यूटी हुई तो भगवान ही जानता है कि हमें अपनी काहिली पर कितनी शर्मिंदगी होती है !&lt;br /&gt;वैसे मुझे अब लग रहा है कि पोस्ट अब कुछ ज्यादा ही लंबा गई है क्या मैं भी फुरसतिया हो गई हूं ? बिलकुल मुमकिन है जनाब !फुरसत पर बात करना कोई हंसी ठट्ठा नहीं है और जिसके भीतर फुरसतिया नहीं है वह तो कभी फुरसत पर अपनी लेखनी चला ही नहीं सकता ! यह वक्त की कमी या ज्यादती का सवाल नहीं है यह तो मूल्य है जिसे आज बहुत कमतर समझने वाले समय मॆं हम जी रहे हैं और ब्लॉगरी कर रहे हैं ! नेतागिरी , चमचागिरी , भाईगिरी , गुंडागिरी सब बने बनाए सेट रास्तों को छोड ब्लऑगिरी – आह ! तो आइए न पूछें फुरतिया जी से उनकी फुरसत का राज और ढूंढें अपने- अपने भीतर -- फुरसतिया -----एक असल फुरसतिया !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-7910371345249219114?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/7910371345249219114/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=7910371345249219114' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7910371345249219114'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7910371345249219114'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='कौन है असल फुरसतिया ?'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-7157210135477170429</id><published>2007-06-29T20:39:00.000+05:30</published><updated>2007-06-29T20:40:40.190+05:30</updated><title type='text'>परीक्षण पोस्‍ट- अनदेखा करें</title><content type='html'>&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=j4esboyblueb" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"&gt;&lt;img src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी";&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-7157210135477170429?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7157210135477170429'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/7157210135477170429'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/06/blog-post_29.html' title='परीक्षण पोस्‍ट- अनदेखा करें'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-3281754357084818312</id><published>2007-06-25T07:46:00.000+05:30</published><updated>2007-06-25T09:00:32.307+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य - व्यंग्य hindi blogging'/><title type='text'>तो हाजिर है हिंदी ब्लॉगिंग पर मेरे शोध के परिणाम</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;क्या है ब्लॉगिंग&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉग़िंग ऎसी खोह है जामे सब खो जात&lt;br /&gt;मनसा वाचा कर्मणा, जीवन वहीं बितात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉगिंग ऎसी बानी है निसदिन करें बलात&lt;br /&gt;यदि उच्चारें लोक में, बहुतहि मार हैं खात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉगिंग के आनंद का कछु होत न सकत बखान&lt;br /&gt;कहिबै कू सोभा नहीं करत ही मिलत परमान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फुरसत की यह लेखनी फुरसत मॆं पढी जाय&lt;br /&gt;जबरन पाठक ढूंढि के , जबरिया जाई पढवाय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;ब्लॉगित जाति से तात्पर्य&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लोक जगत के सज्जन सभी मिलि मिलि यहां बतियात&lt;br /&gt;टिप्पणी टिप्पणी खेलिके , हरतु परस्पर ताप&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉगर ऎसी जाति है जामें बहुत उपजाति&lt;br /&gt;मैचिंग वाणी उवाचिए बैठिए एक ही पांति&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉगर ऎसा जीवडा जाके सिर नहीं पांव&lt;br /&gt;कौन जाने किस नाम से कौन कहा कहि जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉगिंग करि करि जग मुवा पापुलर भया न कोय&lt;br /&gt;सबतें प्रेम ते भेंटिऐ , इंडिबलॉगिज कहलाय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गूंगे की यह सर्करा(चीनी) मन ही मन मुस्काय&lt;br /&gt;और पूछें तो प्राणी यह सकत नहीं समझाय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;ब्लॉगिंग का भविष्य एवं दिशा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉगिंग करन जो मैं चला मन अकुंठ होय जाय&lt;br /&gt;न जाने किस वॆश में खुद से खुद मिलि जाय&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;शुभ -शुभ मंगल लिखि- लिखि सहृदय को सहलाएं&lt;br /&gt;जाकि अमंगल लेखनी तुरत ही गाली खाय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह ब्लॉग का पंथ कराल महा तलवार की धार पे धावनो है&lt;br /&gt;साचे ब्लॉगर चलें तजि आपनपौं(अहम)झिझकें कपटी जे निसांक (निश्शंक) नहीं&lt;br /&gt;तुम कौन सी पाटी(पाठ) पढे हो लला लिखो ढेर पै पढत छटांक नहीं&lt;br /&gt;गहे सत्य यहां निसिवासर ही उचरें सुरवाणी , अपवाद नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कुछ सावधानियां&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉगिंग उतनी कीजिए कायम रहे कुटुंब&lt;br /&gt;ब्लॉगराइन की व्यथा को दूर करें अविलंब&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;टारच गहि गहि सर्च किए ब्लॉगिंग के गुन - दोस&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;गुन दोसन की पोटली सम है यही संतोस&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;सर्च&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; बहुत ही कीन्ही हम उत्तर बहु -बहु पाय&lt;br /&gt;निष्कर्षन की पावती बहुविध दीन्हीं सुना&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;य&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36523763-3281754357084818312?l=vadsamvad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vadsamvad.blogspot.com/feeds/3281754357084818312/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36523763&amp;postID=3281754357084818312' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3281754357084818312'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36523763/posts/default/3281754357084818312'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vadsamvad.blogspot.com/2007/06/blog-post_24.html' title='तो हाजिर है हिंदी ब्लॉगिंग पर मेरे शोध के परिणाम'/><author><name>Neelima</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14606208778450390430</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCbfUYmeGWQ/RiyULUwYLWI/AAAAAAAAAEY/Pw8Im2PzpY8/s400/neel.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36523763.post-6140331430069538590</id><published>2007-06-20T14:36:00.000+05:30</published><updated>2008-12-09T20:56:36.410+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='pratibha patil'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='purdah'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='president'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='neelima'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='veil'/><title type='text'>पल्‍लू के साए में राष्‍ट्रपति भवन</title><content type='html'>जब से मेरी सासू मां ने सिर पर पल्लू लिए प्रतिभा पाटिल की तस्वीर को टी वी – अखबारों में देखा है तब से वे अपने तजुर्बों और पूर्व कथनों की विजय गाथा गा पा रही हैं ! एक परंपरागत ,लज्जाशीला , मर्यादावाहिनी ,कुल -सेविका नारी –सिर पर आंचल माथे पर सिंदूरी बिंदी –अहा कैसी पवित्रता से भरी एक आदर्श भारतीय स्त्री-छवि ! पहले वे कहा करती रही हैं कि “ देखो सामने वाली डाक्टरनी को सिर पर आंचल लिए क्लीनिक जाती है सिलाई - कढाई सब जानती है, एक तुम आज कल की बेहयाई से सिर उघाडे घूमने वाली बहुएं जिन्होंने आजादी के नाम पे तबाही मची हुई है “!..... आज फिर एक बार उनकी दबी आवाज कडक हो उठी है प्रतिभा जी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/Rnjz4CNTp8I/AAAAAAAAAKk/w3FC3MIupZo/s1600-h/PratibhaPatil.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078076723851143106" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" height="205" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_qCbfUYmeGWQ/Rnjz4CNTp8I/AAAAAAAAAKk/w3FC3MIupZo/s400/PratibhaPatil.jpg" width="143" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;तो मैं आज जहां से चली थी फिर वहीं आ पहुंची हूं ! जाने क्यूं एक कवि लिख गए –पढिए गीता बनिए सीता , फिर किसी मूर्ख की हों परिणीता , भौंह कंटीली आंखें गीली , घर की सबसे बडी पतीली भर कर भात पसाइए........! सिर पर आंचल लिए दांत की पकड से उसे गिरने से बचाती घर बाहर के काम सवांरती आम भारतीय स्त्री ! जहां सब स्त्रियां एक सी हैं किसी का कोई अलग नाम नहीं अस्त
